विचार
धारा 377 समाप्त: एलजीबीटी अधिकारों पर एक विशेष हिन्दू दृष्टिकोण के विकास की आवश्यकता
धारा 377 समाप्त

प्रसंग
  • हिन्दू नेताओं को एलजीबीटी अधिकारों पर एक विशिष्ट हिन्दू परिप्रेक्ष्य विकसित करने के लिए कार्य करना चाहिए न कि विक्टोरियन समाज के रीति-रिवाजों, जो कि गैर-भारतीय संवेदनाओं से प्रभावित हैं, का पालन करना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों की एक संवैधानिक न्यायपीठ ने गुरुवार (6 सितंबर 2018) को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 को रद्द कर दिया। सहमत वयस्कों के बीच समलैंगिक यौन सम्बन्ध भारत में अब वैध हैं।

भारतीय दंड संहिता की धारा 377 सन् 1860 का एक औपनिवेशिक कानून है जो आजीवन कारावास तक की सजा के साथ “अप्राकृतिक” यौन आचरण के लिए दंड है। 2013 में भारतीय उच्चतम न्यायलय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय को उलट दिया था, जिस निर्णय ने धारा 377 को इस आधार पर असंवैधानिक माना था कि यह लोगों और उनके निर्वाचित प्रतिनिधियों के लिए एक मामला था न कि अदालतों के लिए।उस समय संघ परिवार से जुड़े कुछ नेताओं ने समलैंगिकता को भारतीय संस्कृति के खिलाफ देखा था। वास्तव में,यह एक ऐसा मामला है जहाँ भारतीय संस्कृति के साथ-साथ शायद हिन्दू धर्म के तथाकथित रक्षक (पाश्चात्य से प्रभावित) न सिर्फ गलत हैं बल्कि ऐसा लगता है कि वे उसी प्रभाव के तहत काम कर रहे हैं जिस प्रभाव से वे बचाना चाहते हैं।

फिलहाल, पहले वाले पर बात कर लेते हैं। धारा 377 विक्टोरियन समाज के रीति-रिवाजों का एक उत्पाद है।”द एलियन लीगेसी” नामक ह्यूमन राइट्स वॉच (एचआरडब्लू) की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत से युगांडा और नाइजीरिया से पापुआ न्यू गिनी तक तीन दर्जन से अधिक देशों में कानून समलैंगिक आचरण पर एक अकेले कानून से लिए गए हैं जिसे 1860 में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों ने भारत में लागू किया था।रिपोर्ट से पता चलता है कि अंग्रेजों ने देखा कि उसकी जीती हुई संस्कृतियाँ कामुकता पर बेपरवाह थीं। ब्रिटिश वाइसरायलॉर्ड एल्गिन ने चेतावनी दी थी कि इस “विशेष पूर्वी बुराई” को प्राप्त करके ब्रिटिश सैनिक “सोडोम और गमोरा की प्रतिकृति” के वशीभूत हो सकते हैं।

रिपोर्ट कहती है, “औपनिवेशिक कानून निर्माताओं और विधिवेत्ताओं ने औपनिवेशिक नियंत्रण का समर्थन करने के लिए किसी चर्चा या सांस्कृतिक परामर्श के बिना ऐसे कानूनों को बनाया।उनका मानना था कि कानून, प्रतिरोधी जनसमूह में यूरोपीय नैतिकता पैदा कर सकते हैं। वास्तव में, उन्होंने कानून इसलिए बनाया क्योंकि उन्होंने सोचा कि “देशज” संस्कृतियाँ “विकृत” यौन आचरण को पर्याप्त दण्डित नहीं करती थीं।उपनिवेशवादियों को यौन आचरणों में अनिवार्य पुनः शिक्षा की आवश्यकता थी। शाही शासकों ने कहा कि,जब तक वे बसने वाले समाजों की कामुकतापूर्ण नजदीकियों में रहते हैं, तब तक “देशज” दुष्चरित्र और “श्वेत” सदाचार को अलग रखना चाहिए: “श्वेत” सदाचार की प्रशंसा हुई और संरक्षित किया गया और “देशज” दुष्चरित्र को नियंत्रित किया गया और अधीन रखा गया।”

विक्टोरियन युग के ब्रिटिश नेताओं ने सोडोम और गोमोरा की प्रसिद्ध बाइबिल की कहानी या लेविटिकस की किताब की अपनी समझ के आधार पर समलैंगिक आचरण के खिलाफ कार्य किया, जिसके अनुसार समलैंगिक अपने आचरण के आधार पर स्वर्ग में प्रवेश पाने से वंचित थे। इसके अलावा, एचआरडब्ल्यू की रिपोर्ट के अनुसार, सेक्स को विकृत करने के विचार,जिनसे सोडोमी कानूनों की उत्पत्ति हुई थी, पुराने ईसाई धर्मशास्त्र से सम्बंधित थे जिसने यौन आनंद को केवल प्रजनन तक की ही अनुमति दी थी (विशिष्ट रूप से, ईसाईयों को)|

इस बारे में हिंदू धर्म का क्या कहना है? हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन (एचएएफ) में हम मानते हैं कि किसी भी सामाजिक मुद्दे के रूप में, इस मामले के लिए एक वास्तविक हिंदू दृष्टिकोण को न केवल श्रुतियों (वेदों और उपनिषद जैसे ग्रंथ जो सनातन सत्यों को प्रतिपादित करते हैं) और स्मृतियों ( जो मनु स्मृति और यज्ञवल्क्य स्मृति जैसे ग्रंथ में समय, स्थान और परिस्थिति से बंधे सामाजिक कानूनों और प्रथाओं का विस्तार करती हैं) की तरफ वापस रुख करना चाहिए बल्कि उनके बीच भेद को अपनाना चाहिए। स्मृतियां समयबद्ध हैं और परिवर्तन के अधीन हैंऔर इस तरह के द्विभाजन, जो हिंदू धर्म के लिए अद्वितीय हैं, समलैंगिकों के अधिकारों के लिए एचएएफ के दृष्टिकोण को मजबूत करते हैं।

हिंदू श्रुति ग्रंथ यौन उन्मुखीकरण या सामान्य रूप से सामाजिक मुद्दों पर गौर नहीं करते हैं। वे दर्शाते हैं कि प्रत्येक प्राणी एक अविनाशी आत्मा है जो शरीर को धारण करती है और जीवन का अंतिम लक्ष्य स्वर्ग नहीं बल्कि मोक्ष (जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति) है। मोक्ष आत्माको प्राप्त होता है, जो कि भौतिक शरीर और व्यक्तित्व (अहं) के साथ-साथ वंश, जाति, लिंग और यौन अभिविन्यास जैसे बाहरी गुणों से अलग है।

मोक्ष योग और आध्यात्मिक प्रथाओं के माध्यम से प्राप्त होता है और मोक्ष की प्राप्ति का अर्थ है यौनाचार सहित सांसारिक इच्छाओं और लालसाओं को पार करना। यदि इसे उत्तेजनात्मक रूप में देखा जाएतो एक समलैंगिक व्यक्ति जिसने अपनी लालसाओं (यौन या अन्य) पर काबू पा लिया हो, वह वास्तव में गैर-समलैंगिक व्यक्ति, जो इच्छाओं का दास होता है, की तुलना में मोक्ष के ज्यादा करीब होता है।

दूसरे धर्मों के विपरीत, हिंदू श्रुति ग्रंथ में ऐसा कुछ नहीं कहते जो समलैंगिकों को सामान्य लोगों से नीचा दिखाते हों। उन्हें खुद अपने उत्पीड़न का समर्थन करने देते हैं।

स्मृतियों ने श्रुतियों को आत्मसात किया है और समलैंगिकता के लिए व्यापक आधार पर कठोर दंड की कभी भी वकालत नहीं की है। ऐसा कहा जाता है कि स्मृतियों में ऐतिहासिक रूप से सामाजिक कानूनों को निर्धारित किया गया है। कनाडा के मॉन्ट्रियल में स्थित मैकगिल यूनिवर्सिटी में एक हिन्दू अकादमिक प्रोफेसर अरविन्द शर्मा समलैंगिकता और हिन्दू धर्म* पर अपने निबंध में लिखते हैं किः “प्राचीन लेखों से यह पता चलता है कि,सन्यास पर जोर देने से बचने के लिए, हिन्दू धर्म मानव जीवन के तीनों पहलुओं – धर्म, अर्थ और काम – में एक यौन सकारात्मक धर्म है।”

मनु स्मृति इस अभ्यास का हल्का-फुल्का विरोध करती तो है, लेकिन इसके लिए दंड विधान सिर्फ यह निर्धारित करती हैकि दोषी को कपड़े पहने-पहने सार्वजनिक रूप से स्नान करवाया जाए! (मनु स्मृति 11:75) एक कुंवारी लड़की के साथ अवैध संबंध रखने वाली वृद्ध महिला के लिए जो सबसे कड़ी सजा निर्धारित की गई है वह है उसकी दो उंगलियाँ काटना (या सिर मुंडाकर गधे की सवारी करवाना) (समान स्त्रोत में, 8:370)। लेकिन यहाँ पर चिंता कुँवारेपन को लेकर है न कि समलैंगिकता को लेकर। इसी तरह, दो उंगलियाँ काटने (साथ ही सोने के 600 पाने का जुर्माना) का दंड उस पुरुष के लिए निर्धारित किया गया है जिसने किसी कुंवारी लड़की के कौमार्य को भंग कर दिया हो (समान स्त्रोत में, 8:367)। यदि दो वृद्ध महिलाएं इन कृत्यों में संलग्न पाई जाती हैं तो उनके लिए इस प्रकार के किसी दंड का प्रावधान नहीं है।

इस प्रकार, एलजीबीटी गतिविधियों के लिए श्रुतियाँ किसी भी प्रकार से व्यक्ति की मोक्ष प्राप्ति में बाधक नहीं हैं और प्राचीन भारत की आचार संहिता भी इस प्रकार के मामलों में दंड देने के बजाय उनको नजरअंदाज करती है। प्रोफेसर अरविन्द शर्मा यह भी कहते हैं कि अगर बाली संस्कृति को अति प्राचीन या ट्रांस-इंडियन हिन्दुत्व का प्रतिनिधित्व करने वाला मान लिया जाए तो समलैंगिकता के प्रति हिन्दू दृष्टिकोण एक उदासीन रूख अपनाता है और इसको हल्के मनोरंजनों में से एक मानता है। हिन्दू महाकाव्यों के कई पात्र जैसे कि शिखंड़ी, चित्रांगदा (अर्जुन की पत्नी और बभ्रुवाहन की माता) और महाभारत से बृहन्नला, यौन उन्मुखीकरण और लिंग समरूपता की एक श्रृंखला प्रदर्शित करते हैं। यौन उन्मुखीकरण या लिंग समरूपता के कारण इन पात्रों में से किसी के भी साथ भेदभाव नहीं हुआ। उनकी लैंगिकता के बजाय उनकी क्षमताओं के आधार पर उनको आंका जाता है और सम्मान किया जाता है।

अर्थशास्त्र और कामसूत्र में किसी भी प्रकार के कष्ट से मुक्त विभिन्न व्यवसायों में शामिल एलजीबीटी व्यक्तियों का वर्णन किया गया है। अर्धनारीश्वर (शिव का आधा पुरूष और आधा महिला का रूप) और भगवान अयप्पा (मोहिनी के रूप में भगवान विष्णु और भगवान शिव से जन्मे) की कहानियां लिंग के मामलों में हिन्दू धर्म द्वारा अपनाए गए सूक्ष्म दृष्टिकोण को इंगित करती हैं।

यह सब देखते हुए, भारत में एलजीबीटी मुद्दों के प्रति एक हिंदू दृष्टिकोणधारा 377 के उन्मूलन के लिए तर्क देगा।(6 सितंबर 2018 कोयह कानून निरस्त कर दिया गया है, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले में कहा गया है।)

पुरातन हिन्दूत्व की बुद्धिमता तब झलकती है जब कोई समलैंगिकों को ‘अपराधी’ कहने के परिणामों पर प्रतिबिंबित करता है।

कानून केवल इस बात पर, कि वे कैसे दिखते हैं या वे किससे प्यार करते हैं, कुछ लोगों को दोयम दर्जा देता है, उनकी गोपनीयता पर हमला करता है और उनकी प्रतिष्ठा को कम करता है। यह अन्य तरीकों से राजनीतिक प्रतिशोध के लिए पर्याप्त अवसर प्रदान करता है क्योंकि इसका प्रयोग दुश्मनों को कलंकित करने, जीवन उनका नष्ट करने और पुलिस बल, जिसे पहले से ही भ्रष्ट तथा बेकसूर लोगों को गलियां देने का एक शक्तिशाली माध्यम माना जाता है, प्रदान करने के लिए किया जा सकता है। यह एलजीबीटी व्यक्तियों को उनका जीवन “गुप्त” रहकर बिताने के लिए भी बाध्य करता है।

भारत में पूर्ण समलैंगिक विवाह समानता में बदलाव करना संभवतः एक लंबी प्रक्रिया है। एलजीबीटी व्यक्तियों के लिए अमेरिका का पूर्ण समलैंगिक विवाह समानता अभियान 30 वर्षों से अधिक समय के सार्वजनिक संघर्ष के बाद आया। यह “घरेलू संगठनों” की धारणा से पहले भी था जिनमें कई राज्यों ने एलजीबीटी दंपत्तियों को सबसे अधिक धर्मनिरपेक्ष लाभ प्रदान किए, यद्यपि इसमें विवाह के धार्मिक संस्कार शामिल नहीं थे। सामाजिक संगठन भी भारत में मध्यवर्ती उपाय हो सकते हैं, क्योंकि इनसे उन कई मुद्दों पर ध्यान देने में मदद मिलेगी जिनका कोई धार्मिक आधार नहींहै। इनमें एलजीबीटी लोगों के लिए रोजगार लाभ, कर और बीमा दरों में अंतर, रोजगार में भेदभाव के खिलाफ सुरक्षा, आवास, होटल, अस्पताल, संपत्ति की विरासत आदि शामिल हैं। एचएएफ ने सभी अमेरिकियों के लिए विवाह समानता का समर्थन किया,और हमने इसके लिए विभिन्न अमेरिकी अदालतों, जिसमें अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय भी शामिल है, में दस्तावेज प्रस्तुत किए।

लेकिन एलजीबीटी हिंदुओं के लिए समलैंगिक विवाह के बारे में क्या? इस बात पर जोर दिया जाना चाहिए कि वास्तव में भारत में किन्नरों, जो कि उभयलिंगी व्यक्ति हैं, के विवाह संस्कार का लंबा इतिहास है। हालिया वर्षों में, अमेरिका में कुछ हिन्दू पुजारियों और समलिंगी जोड़ों ने पारंपरिक हिन्दू विवाह रिवाजों को अपनाया है और स्वीकृति प्राप्त की है, विशेष रूप से सप्तपदी रीति में, जो कि एक प्रमुख विवाह रीति है जो एक आदर्श हिन्दू विवाह के सात वचनों को लागू करती है। ये वचन प्रत्येक दंपत्ति को जीवन की साझेदारी के वास्तविक उद्देश्यों का स्मरण कराते हैं- (1) एक दूसरे का भरण पोषण करना (2) दृढ़तापूर्वक एक दूसरे का साथ देना (3) आध्यात्मिक दायित्वों को पूर्ण करना (4) पारस्परिक सम्मान के माध्यम से खुशी और निर्वाह की दिशा में कार्य करना (5)सदाचारी संतानों के पालन पोषण के माध्यम से सभी जीवित प्राणियों के कल्याण के लिए कार्य करना (6) साथ रहकर अच्छे मौसमों के लिए प्रार्थना करना, जैसे वह अपने सुख-दुख साझा कर रहे हों और (7) समझ, निष्ठा और मित्रता हेतु केवल अपने लिए ही नहीं बल्कि सार्वभौमिक शांति के लिए भी प्रार्थना करना।

अन्य कानूनी अधिकारों की तरह, विवाह का अधिकार धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के साथ प्रतिस्पर्धा कर सकता है। संप्रदाय, मंदिर, धर्म गुरू और पुजारी इस प्रकार विवाह को अपनी परंपराओं के अनुरूप परिभाषित करने का एक  अनैच्छिक अधिकार रखते हैं, क्योंकि वे समय के साथ उनकी व्याख्या और पुन: व्याख्या करते रहते हैं। चूंकि हिंदू धर्म के पास कोई ऐसा केंद्रीय प्राधिकरण नहीं है जो धर्मशास्र को नियंत्रित करता हो, इसलिए धर्म के अलग-अलग समूह धार्मिक मोर्चे पर अपनी इच्छानुसार तेजी से या धीमी गति से आगे बढ़ने के लिए स्वतंत्र हैं। इसलिए एक तरफ समलैंगिक विवाह के धार्मिक संस्कार विकसित होते रहेंगे (और कई मामलों में नहीं भी हो सकते हैं। , ), वहीं दूसरी तरफ सरकारें (कम से कम अमेरिका और दुनिया भर के कई अन्य देशों में) कानूनी अधिकार या सामाजिक अनुबंध के रूप में विवाह के मामले में अब भेदभाव नहीं करती हैं। हम मानते हैं कि यह अवधारणा, कि विवाह की परिभाषा को परिभाषित करने और/या अपनाने के लिए धर्म के क्षेत्र में स्वतंत्रता है लेकिन सरकारों को अब और भेदभाव नहीं करना चाहिए और कुछ विवाहों को कानूनी और कुछ को गैर-कानूनी नहीं ठहराना चाहिए, एक महत्वपूर्ण सूक्ष्म अंतर है जो शायद ही कभी सार्वजनिक भारतीय चर्चा में व्यक्त किया गया है। यह भारत के भीतर सांस्कृतिक प्रथाओं की शानदार विविधता और देश में एक समान नागरिक संहिता की कमी के कारण और विशेष रूप से प्रासंगिक हो जाता है।

इसलिए, एचएएफ सुझाव देता है कि निम्नलिखित महत्वपूर्ण विचारों पर गौर किया जाना चाहिए: पहला, हमें वैज्ञानिक और चिकित्सा परिणामों के आधार पर काम करने की जरूरत है। ज्यादातर जीवों में समलैंगिक उन्मुखता कम प्रतिशत में  स्वाभाविक  रूप से होती है।

ये प्राप्त की हुई आदतें नहीं हैंऔर निश्चित रूप से एक विकार, विकलांगता, या “ठीक होने वाली बीमारी” नहीं है। दूसरा, बाहरी गुणों पर ध्यान न देते हुए हिन्दू शिक्षाएं सभी प्राणियों को जन्मजात अध्यात्मिक समानता देती है। ऐसे में, हिंदुओं को एलजीबीटी व्यक्तियों को अस्वीकार या सामाजिक रूप से बहिष्कृत नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें मोक्ष के मार्ग पर साथी के रूप में स्वीकार करना चाहिए। तीसरा, हिंदू धर्म ने बुद्धिमानी से सामाज से आध्यात्मिकता को अलग कर दिया है और यह समय के साथ प्रथाओं को बदलने और समझने की अनुमति देता है। विभिन्न ऐतिहासिक स्मृतियां ऐसे परिवर्तनों का प्रमाण पत्र हैंऔर यहां तक कि प्राचीन काल में भी स्मृतियों में कभी समलैंगिकता के लिए बड़े पैमाने परकठोर दंड की वकालत नहीं की गयी है।

एचएएफ में, हम मानते हैं कि हमारे धार्मिक एवं अन्य हिन्दू नेताओं के लिए महत्वपूर्ण है कि वे एलजीबीटी अधिकारों पर एक विशिष्ट हिंदू परिप्रेक्ष्य विकसित करने के लिए हमारे श्रुति/स्मृति ढांचे के भीतर कार्य करें न कि भारत में वर्तमान सामाजिक रीति-रिवाजों, जो गैर-भारतीय संवेदनाओं से गहराई से प्रभावित हैं,का अनुसरण करें। उपनिवेशवाद ने दशकों पहले भारत छोड़ दिया था। यह सही समय है जब भारतीय अपने सामाजिक और मनोवैज्ञानिक नियंत्रण को छोड़ दे।

इस लेख का एक पुराना संस्करण 4 जुलाई 2015 को ‘एलजीबीटी अधिकारों के लिए एक हिंदू दृष्टिकोण’ के रूप में प्रकाशित किया गया था।