विचार
भारत के लिए सर्वश्रेष्ठ विचार की खोज

 आशुचित्र-

  • 70 वर्षीय भारत राज्य तथा 5,000 वर्षीय भारत राष्ट्र में बहुत फर्क है
  • कौन बताएगा कि किस विचार का भारत बेहतर है?

हाल ही में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों ने हमारे सुखद जीवन के अस्थिर प्रयासों को सम्मुख प्रस्तुत कर दिया है।

मैं आशा करता हूँ कि भारत में ज़मीनी स्तर पर व्याप्त परिस्थितियाँ ऐसी होतीं कि सत्ताधारी पार्टी और विपक्षी पार्टी के मध्य निर्माणकारी आदान-प्रदान हो पाता जैसा कि आदर्श रूप में होना चाहिए जैसा एक स्वस्थ लोकतंत्र में होता है। इसमें कोई संशय नहीं कि प्रजातंत्र सरकार का सर्वश्रेष्ठ प्रकार है।

आज हम जिस मूल समस्या का सामना कर रहे हैं, वह यह है कि भारत का विचार सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा प्रस्तावित किया जाता है और विपक्षी दल का विचार उससे एकदम विपरीत होता है। इनमें किसी भी प्रकार समानता नहीं है, एक भी नहीं।

इस समानता के अभाव ने वातावरण का इस प्रकार ध्रुवीकरण कर दिया है कि किसी भी सामाजिक विषय पर राजनीतिक दलों तथा भिन्न राजनीतिक विचारों वाले व्यक्तियों में कहीं भी समानता दिखना लगभग असंभव हो गया है।

यदि मुख्य विपक्षी पार्टी के 70 वर्षों के कार्यों का अवलोकन करें तो दिखता है कि पिछले 70 सालों में उसने अच्छा कार्य नहीं किया है। वहीं कुछ लोगों का कहना है कि किसी भी पार्टी के प्रदर्शन को परखने के लिए 70 साल का समय पर्याप्त नहीं है तथा उसने अच्छा कार्य किया है। यहाँ बात मानसिकता पर आ जाती है।

वर्तमान की सरकार सत्ता में बहुत ही कम समय रही है। अत: अभी यह कह पाना थोड़ा मुश्किल होगा कि वर्तमान सरकार के विचार भारत के लिए उपयुक्त हैं या नहीं।

एक विचार में भारत प्राचीन सभ्यताओं, तथ्यों, गाथाओं तथा रीतियों पर आधारित है। वहीं दूसरा कुछ समझदार तथा उच्च शिक्षित लोगों द्वारा लिखे गए संविधान पर आधारित है। पहले प्रतिरूप का समय के साथ अवलोकन हो चुका है। वहीं दूसरा अभी नवीनतम है तथा अभी इस पर कुछ नहीं कहा जा सकता। हमें यह नहीं मानना चाहिए कि दूसरा सदैव के लिए स्थिर है। संविधान में आवश्यक बदलाव का प्रावधान हमेशा से है।

यह स्पष्ट है कि 70 साल के भारत गणराज्य तथा 5,000 साल के भारत देश में बहुत फर्क है।

कौन बताएगा कि किस विचार का भारत बेहतर है?

यदि भ्रष्टाचार इतना व्यापक नहीं होता तो क्या इन दोनों में से भारत का कोई भी विचार कारगर सिद्ध होगा? क्या इसका कारण संविधान जो 1947 से दोषपूर्ण है, की बजाय भ्रष्टाचार रहा है? और क्या इतने व्यापक भ्रष्टाचार में राष्ट्रवादी भारत का प्रतिरूप भी विफल होगा?

अंत में हम सभी को ऐसे वैचारिक विकल्प का चयन करना होगा जो विकास, शिक्षा तथा प्रबोधन की ओर सबसे कम समय में लेकर जाए। यह पूरा मामला अर्थव्यवस्था का है। आज इस दुर्भाग्यशाली देश का हर नागरिक तकलीफ में है क्योंकि अर्थव्यवस्था जूझ रही है।

संविधान के निर्माता क्या कहते यदि उन्हें 2019 का भारत दिखाया जाता?

गौतम देसीराजू भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु में रसायन शास्त्र के प्राध्यापक हैं।