विचार
16 वर्षों तक सरपंच रहकर गाँव को प्राकृतिक संपदा लौटाने वाले की अनुकरणीय कहानी

विदिशा जिले में कुल्हार नामक एक गाँव है। यह एक छोटा सा रेलवे स्टेशन है, जिसके आसपास 1,000-1,500 साल पुराने ऐतिहासिक स्मारकों की विरासत है। लेकिन गाँव की आधुनिक विरासत है- हरे-भरे दो घने जंगल और छह बड़े तालाब।

68 साल के वीएम शर्मा ने 1972 में दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक किया था। उन्होंने जयपुर विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर का पहला साल पूरा किया। लेकिन उसी समय गाँव वालों ने उन्हें सरपंच बनाकर इस बात के लिए राजी किया कि वे गाँव में ही रहें। कुछ नया करें।

वे इस शर्त पर आए कि गाँव के हित में फैसले लेने की पूरी आज़ादी होगी। किसी गैर-कानूनी काम के लिए कोई निजी दबाव नहीं बनाएगा। कोई ऐसी सिफारिश नहीं करेगा, जिसे करना अनुचित हो। गाँव वालों ने हामी भरी और एक नई यात्रा शुरू हुई।

गाँव आकर ज़िम्मेदारी संभालने के बाद उनका पहला काम था 40 हेक्टेयर ज़मीन से गाँव वालों के ही अवैध कब्ज़े हटाना। यह दो हिस्सों में था- 14 और 26 हेक्टेयर। कई लोग बरसों से जमे थे। इसलिए मुश्किल से हटे। हटने के साथ ही दुश्मनी अलग से पाल बैठे। लेकिन शर्मा के पास इस ज़मीन के बेहतर इस्तेमाल की योजना थी। वे किसी रंजिश के तहत या खुद का कब्ज़ा करने के लिए ज़मीन को अतिक्रमण मुक्त नहीं कर रहे थे। उनके पास कुछ अच्छी योजनाएँ थीं।

उन दिनों सामाजिक वानिकी योजना के तहत दो साल में उन्होंने तमाम अड़ंगों के बीच करीब 35,000 पौधे रोपे। फेंसिंग कराई। देखरेख बढ़ाई। वही ज़मीन आज बांस, शीशम, नीम, करंज, सागौन, इमली और अमरूद के दो घने जंगल में बदल चुकी है। लेकिन इस हरियाली को बचाए रखने के लिए पानी की ज़रूरत थी। इसके लिए भूजल को उलीचने की बजाए उन्होंने बारिश के पानी को सहेजने पर विचार किया।

अब बारी आई तालाब खोदने की। उन्हीं दिनों तीसरी रेल लाइन बिछ रही थी। कुल्हार की मिट्‌टी में लाल मुरम बड़ी मात्रा में पाई जाती है। शर्मा गाँवों के अपने सहयोगियों के साथ यह आइडिया लेकर रेल प्रबंधन और ठेकेदार कंपनी के पास गए कि रेलवे लाइन के लिए मुरम की ज़रूरत होगी। अगर गांव की चुनिंदा लोकेशन से वे मुरम लें तो उनकी पंचायत मदद कर सकती है। इसमें कंपनी का ट्रांसपोर्ट का पैसा बचेगा। रेलवे में यह प्रस्ताव हाथों-हाथ मंजूर हुआ।

शर्मा ने गाँव के चारों तरफ छह स्थान चुने और हरेक से 300-400 फीट लंबे-चौड़े क्षेत्र पर 15 फीट गहराई तक मुरम निकलवाई। इसके बदले सरकार को करीब 4 लाख का राज्सव मिला और कुल्हार को मिले ये व्यवस्थित ढंग से खुदे हुए छोटे-छोटे तालाब। पहली ही बारिश में एक अथाह जलराशि गाँव के पास अगली गर्मी तक के लिए सुरक्षित थी।

तालाब

फिर हर बारिश में इनमें जमा करीब 45 क्युबिक फीट पानी ने आसपास की 1,500 बीघा ज़मीन को हमेशा के लिए सिंचित बना दिया। आज भी सैकड़ों किसान 5,000 फीट लंबी पाइपलाइन से जनवरी-फरवरी तक गेहूँ, चना और मसूर की फसलों के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं। पंचायत का अनुमान है कि इस मुफ्त सिंचाई से एक बीघा से औसत एक क्विंटल अनाज की पैदावार भी बढ़ी तो 2,000 रुपए औसत दर के हिसाब से सालाना 30 लाख रुपए का फायदा गाँव वालों को हुआ। यह आकलन न्यूनतम उपज पर है।

विदिशा में उस दौरान कलेक्टर रहे कई अफसरों ने भी यह काम आकर देखा और गाँव वालों का हौसला बढ़ाया। शर्मा कहते हैं, “हमने सरकार की ही योजनाओं का सहारा लिया था। अच्छे अफसरों ने कभी किसी प्रस्ताव को अटकाया नहीं। जब हमारा काम देखा तो उन्होंने गाँव आकर ही मदद की। हालाँकि एक अफसर ने चेताया था कि इतने जुनून से काम कर रहे हो लेकिन अगली पीढ़ी इसी जुनून से इसे सहेजकर नहीं रख पाएगी तो आपका बुढ़ापा खराब होगा।”

गाँव के युवा किसान वीरेंद्र राय कहते हैं, “यह चेतावनी हमारे लिए चुनौती थी। तब हमने संकल्प लिया कि ये दोनों काम गाँव की सामूहिक विरासत की तरह ही सहेजे जाएँगे। अब हम तालाबों के चारों तरफ राह बना रहे हैं। दोनों तरफ पेड़ लगा रहे हैं।”

इस काम में शर्माजी के शहरी मित्रों ने 53,000 रुपए की मदद दी है। यह काम बिना किसी सरकारी फंड के हो रहा है। शर्मा के दो बेटे हैं। एक कनाडा में, दूसरा सेना में। 1994 में इतना काम खड़ा करने के बाद वे सरपंची से तो मुक्त हो गए लेकिन करीब 40,000 पेड़ों के जंगल का प्रबंधन छोटा काम नहीं था। वे लगातार इसकी देखभाल में जुटे। पंचायत के नए प्रतिनिधियों को तैयार किया। नई पीढ़ी के प्रतिनिधि इसमें नया जोड़ रहे हैं।

शर्मा को सरपंची छोड़े ही दो दशक से ज्यादा हो गए। लेकिन इस उम्र में भी वे अपने समय के उन प्रयोगों की सफलता को बनाए रखने में सक्रिय हैं। बाद में सरपंच कोई भी बना हो, वह हरा-भरा जंगल और वे तालाब आज भी उस पहल की याद दिलाते हैं, जो उन्होंने की। दूर-दूर से लोग एक अच्छे काम के सुखद परिणाम देखने कुल्हार का रुख करते हैं। ये काम इस गाँव की उजली पहचान बने हुए हैं।