विचार
सबरीमाला और ‘संवैधानिक नैतिकता’ के साथ वास्तविक समस्याएं
सबरीमाला और ‘संवैधानिक नैतिकता’ के साथ वास्तविक समस्याएं

प्रसंग
  • सबरीमाला में विशेष आयु वर्ग की महिलाओं का प्रवेश वर्जित करना किसी के भी संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन नहीं है।
  • इस सिद्धान्त के उल्लंघन पर उच्च न्यायालय का फैसला दोषपूर्ण तर्क और अस्तित्वहीन ‘संवैधानिक नैतिकता’ के ऊपर आधारित है।

सबरीमला मुद्दे (इंडियन यंग लोयेर्स असोशिएशन बनाम द स्टेट ऑफ केरला) पर उच्च नयायालय के फैसले पर मचे हो-हल्ले को बताने की आवश्यकता नहीं है। न्यायालय द्वारा असंवैधानिक और अधिकार से परे के नियम को मान कर और लागू करके, जिसमें 10-50 साल तक की आयु वाली महिलाओं को सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करने से वर्जित किया गया, ने भगवान आयप्पा के हजारों भक्तों को नाराज़ कर दिया। उन्होने सड़कों पर जुलूस निकले, भूख हड़ताल और आत्म-बलिदान करके आत्महत्या करने  की धमकी दी।

यह मामला धार्मिक स्वतन्त्रता और संवैधानिक स्पष्टता के लिए हमेशा एक मौलिक युद्धभूमि था। फिर भी इस फैसले में इतना कट्टरपंथ होने की उम्मीद नहीं थी, या फिर उसके दायरे इतने व्यापक नहीं थे। इस फैसले में, जो मुख्य फैसला का एक हिस्सा था, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा, ‘महिलाओं को कमतर भगवान के बच्चे मानना संवैधानिक नैतिकता पर सवाल खड़ा करता है।‘

यहाँ पर हम फैसले के दो सबसे ज़्यादा कट्टरपंथी नवाचरों का व्याख्यान करेंगे : संवैधानिक नैतिकता और अनुच्छेद 17 की पुनरावृत्ति। यह दोनों ही न्यायालय के फैसले में तर्क के मौलिक अधिकार हैं। दोनों ही मौलिक रूप से दोषपूर्ण और घातक हैं। आने वाले दिनों में यह अस्पष्टता को छोड़ते हुए न्यायालय के माध्यम से गूँजेंगे।

सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अनंत ज्ञान में व्यापक रूप से ‘संवैधानिक नैतिकता’ के वैश्विक सिद्धान्त को अपनाने का विस्तार किया है। संवैधानिक पाठ के ऊपर इस सिद्धान्त को लाया गया था। संविधान की किसी भी व्याख्या को न्यायसंगत बनाने के लिए यह सटीक तरह काम करता है जो इसे नियोजित करने वालों की नैतिकता में आता है।

यह एक मुद्दा है क्योंकि नैतिकता निर्विवाद रूप से अपरिभाषित है। यह सिर्फ समाज से समाज में भिन्न नहीं होता है बल्कि व्यक्ति से व्यक्ति तक भी बदलता है। एक गणतन्त्र, जो सामाजिक और नैतिक पाबंदियों को स्वीकार करता है, को सिर्फ एक ही प्रक्रिया के द्वारा संहिताबद्ध किया जा सकता है; और वो है कानून के द्वारा। संसद खुद ही सक्षम है यह फैसला लेने के लिए कि नैतिकता में क्या होता है । संविधान में इसके पाठ और इसके प्रावधान को छोड़कर नैतिकता का कोई परिभाषित सिद्धांत नहीं है । ‘संवैधानिक नैतिकता’ का प्रयोग करने के लिए यह सुनिश्चित करना है कि अनुच्छेद 13 में उल्लेखित भाग तीन, और भाग तीन खुद हमारे न्यायाधीशों के क्षणिक धारणाओं के परीक्षण से कम या ज्यादा नहीं है। अगर आप यह जोर देकर कहेंगे कि ‘संवैधानिक नैतिकता’ जैसी कोई चीज़ मौजूद है, तो फिर इसे संविधान के अनुपालन के अलावा कुछ नहीं होना चाहिए। यह कहने के लिए कि लोकतंत्र वास्तव में नैतिकता स्थापित करने के कार्य के लिए उपयुक्त है और इसे न्यायाधीशों की एक अचयनित समिति के साथ बदलने के लिए सैध्यान्तिक शासन को राजनितिक ब्यूरो से अधिक कट्टरपंथी और अधिक लोकतान्त्रिक प्रस्तुत करना चाहिए।

फैसले के एक भाग जिसमें जांच होनी चाहिए वह है अनुच्छेद 17 पर निर्भरता, जो छुआछूत पर निषेध से सम्बंधित है। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ के फैसले के अंत में, उदाहरण के लिए, वह निम्लिखित तर्क देते हैं:

“119.1 मैं यह घोषणा करता हूँ:

4) मासिक धर्म के आधार पर महिलाओं का सामाजिक बहिष्कार एक तरह का छुआछूत है जो संवैधानिक मूल्यों पर धब्बा है । “शुद्धता और मलीनता”, जो व्यक्ति को बदनाम करते हैं, का संवैधानिक व्यवस्था में कोई स्थान नहीं है ।

यह दावा, दायरे के भौतिक और परिमाण में ढांचागत, संवैधानिक पाठ की विकृति है । पहले कभी अनुच्छेद 17 को अप्रासंगिक माना जाता होगा क्योंकि सबरीमाला में कभी भी महिलाओं के प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबन्ध नहीं लगाया गया – केवल कुछ आयु के बीच की महिलाओं को प्रवेश से प्रतिबंधित कर दिया गया।

इसके अलावा, यह दावा सामाजिक अस्पष्टता के रूप में ‘छुआछूत’ के इतिहास और गहराई का सम्मान नहीं करता और उन लोगों का अपमान भी कर सकता जिन्होंने छुआछूत के दुष्प्रभावों को झेला है ।

संविधान निर्माताओं के लिए अनुच्छेद 17 क्या मायने रखता है ? यह सिर्फ जाति के आधार पर सदियों से चली आ रही छुआछूत की प्रथा को खत्म करने से ज्यादा और कुछ नहीं है।

प्रावधान के मूलवादी विश्लेषण के लिए ऐतिहासिक साक्ष्य का एक बड़ा हिस्सा मौजूद है । हर रिकॉर्ड, उद्धरण, दस्तावेज और भाषण यह स्पष्ट करता है कि यह छुआछूत के उन्मूलन के लिए था क्योंकि यह दलितों पर लागू होता था।

इसलिए संविधान निर्माताओं के लिए अनुच्छेद 17 के सम्बन्ध में कोई रहस्य नहीं है । फिर सवाल यह उठता है कि इस लेख को विस्तारित करने के लिए स्वतंत्रता को किस हद तक लिया जा सकता है, जो स्पष्ट है और निश्चित रूप से न्यायालय के संज्ञान में है, एक निश्चित आयु में महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करने से कोई मतलब नहीं होना चाहिए ? उत्तर सीधा है, स्वतंत्रता को बिलकुल भी नहीं लेना चाहिए।

किसी विशेष आयु सीमा के दौरान एक मंदिर में प्रवेश करने में असमर्थ होने के कारण किसी के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं होता है। ऐसा माना जाता है कि परेशानियों को बढ़ाते हुए, जहाँ जनता द्वारा चुने गए लोगों पर शासन नहीं छोड़ा जाता है, न्यायालय के द्वारा चुने गये लोग शासन करते हैं।