विचार
ग्रामीण विद्युतीकरण: उजाले की एक नयी किरण
ग्रामीण विद्युतीकरण: उजाले की एक नयी किरण

प्रसंग
  • लगभग आधी शताब्दी सत्ता में गुजारने के बाद भी अगर आपके देश के नागरिक मजह बिजली जैसी मूलभूत सेवाओं से वंचित रह जाएँ तो दोष आपके सर पर ही मढ़ा जाएगा

आज़ादी से पहले और आज़ादी के बाद भी हमारे बहुत सारे पुरखों ने अपनी ज़िंदगियों में बिजली पाने के सपने की कल्पना भी नहीं की होगी। चूंकि स्वतन्त्रता से पहले हम गुलामी की जंजीरों में जकड़े हुए थे इसलिए उंगली उठाने की दिशा तलाशना ठीक नहीं है लेकिन आज़ादी के 72 वर्षों के बाद अब भी यदि लोग बिजली के बिना ही जीवनयापन कर रहे हों तो सरकारों को लानत भेजने के लिए हमें किसी से अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। 2014 में मोदी सरकार के सत्ता संभालने तक 18452 गाँव ऐसे थे जहां लोग अपनी रातें ढिबरी, लालटेन के उजालों या घुप्प अँधेरों और सन्नाटों में व्यतीत करने के लिए विवश थे। संभवतः कुछ पीढ़ियों ने तो अपनी चारदीवारी के भीतर बिजली की रोशनी ही नहीं देखी होगी। निरपराध रूप से उन लोगों ने इस अंधेरी सजा का सामना किया। उनका हक मारा गया, जिम्मेदार कौन था? सिर्फ और सिर्फ पूर्ववर्ती सरकारें, जिनमें कॉंग्रेस की भागीदारी अधिकतम है। यद्यपि इस बात से इंकार नहीं है कि इन 18452 गांवों के अलावा शेष भारत का अधिकांश विद्युतीकरण कॉंग्रेस शासनकाल के दौरान ही हुआ लेकिन लगभग लगभग आधी शताब्दी सत्ता में गुजारने के बाद भी अगर आपके देश के नागरिक मजह बिजली जैसी मूलभूत सेवाओं से वंचित रह जाएँ तो दोष आपके सर पर ही मढ़ा जाएगा।

चूंकि मोदी सरकार अपने विकास के एजेंडे को पकड़कर सत्ता में आई थी इसलिए इस सरकार ने आते ही विकास के लिए कई लक्ष्य निर्धारित किए जिनमें से एक लक्ष्य था भारत के बचे हुए 18452 गांवों में 1000 दिनों के भीतर बिजली पहुंचाई जाये। लक्ष्य आसान नहीं था क्योंकि कुछ सुदूर गांवों की भौगोलिक परिस्थितियाँ इस कार्य में विघ्न डाल रहीं थीं।

और मिल गया मांझी

हम सब मांझी ‘द माउंटेन मैन’ की कहानी से अनभिज्ञ नहीं होंगे, जिन्होंने अपनी पत्नी की मृत्यु के वियोग में एक बड़ा पहाड़ काटकर रास्ता तैयार किया था क्योंकि अस्पताल पहुँचने के लिए सुगम रास्ता न होने के कारण उनकी पत्नी की मृत्यु पहाड़ों के दुर्गम रास्ते में हो गयी थी। पहाड़ काटने जैसा ही कठोर परिश्रम, लगन और जज़्बा चाहिए था भारत के इन बचे हुए गांवों को रोशनी देने के लिए। कहीं पहाड़, कहीं नदी, कहीं नाला, कहीं जंगल और अन्य प्राकृतिक भौगोलिक अड़चनें। लेकिन कहा जाता है उड़ान परों से नहीं हौसलों से होती है। मांझी ने भी पहाड़ ताकत से नहीं बल्कि इरादों से तोड़ा था। यूं तो मोदी सरकार के मंत्रिमंडल में कई कर्मठ और जुझारू मंत्री हैं लेकिन जो सबसे मजबूत इरादे रखते हैं उनमें से एक हैं पीयूष गोयल। मोदी सरकार का गठन होते ही उन्हें ऊर्जा मंत्रालय का प्रभार सौंपा गया था। उनके उत्तरदायित्वों के निर्वहन का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें बाद में कोयला और रेल मंत्रालय के साथ-साथ वित्त मंत्रालय का प्रभार भी सौंप दिया गया। ऊर्जा मंत्रालय का जिम्मा हाथ में आते ही उन्होंने अपना कार्य युद्धस्तर पर शुरू किया और ‘गर्व’ नाम से एक मोबाइल एप्लिकेशन लॉंच की। जिसका उद्देश्य यह था कि उनके कार्य को कोई भी व्यक्ति किसी भी समय जांच सके और विद्युतीकरण की वर्तमान स्थिति का पता लगा सके।

हालांकि प्रत्येक गाँव में बिजली पहुँचने का अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक घर तक बिजली पहुँच गयी है लेकिन यह कार्य भी प्रगति पर है। 10% विद्युतीकृत घरों वाले गाँव को विद्युतीकृत गाँव माना गया है। यथार्थ से परिचित और गैर-राजनीतिक व्यक्ति यह कहने में गुरेज नहीं करेगा कि मई 2014 से पहले और बाद की विद्युत आपूर्ति की परिस्थितियों में एक बड़ा अंतर रहा है। देश में कुछ नए विद्युत संयंत्रों को स्थापति किया गया है लेकिन वर्तमान विद्युत आपूर्ति से इन संयंत्रों के स्थापन का अनुपात मेल नहीं खाता। देखा जाए तो इनके स्थापनों की तुलना में विद्युत आपूर्ति कहीं ज्यादा है। तो इतनी बिजली आई कहाँ से? इसके पीछे कई कारण हैं। कुछ बिजली तो राज्य सरकारों की कुर्सी तले दबी थी यानी की वे बिजली खरीद में दिलचस्पी नहीं ले रहीं थीं, कुछ बिजली का दुरुपयोग भी था और कुछ थी वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों के प्रोत्साहन में कमी।

अगर आज के समय में राज्य सरकारों की बात करें तो अधिकांश राज्यों में भाजपा या इसके सहयोगी दलों की सरकारें हैं और केंद्र में भी भाजपा सरकार है जिससे आपसी समन्वय में अब गतिरोध कम हैं। अतः अब राज्य सरकारों के स्तर पर बिजली खरीद की समस्या कम हुई है।

एलईडी बल्ब, बचत का एक बड़ा कारक

एलईडी बल्ब एक बड़ा कारक है जिसके माध्यम से एक बड़े पैमाने पर बिजली बचाई गयी है। हमें याद होना चाहिए कि एक समय एक एलईडी बल्ब का मूल्य 250 रुपये से लेकर 400 रुपये तक या इससे भी अधिक हुआ करता था और गांवों में साधारण परंपरागत बिजली के बल्बों, जिनकी कीमत 10 रुपये के आस पास होती है, का इस्तेमाल किया जाता था। इन दोनों प्रकार के बल्बों में पहला मूल अंतर यह है कि एक एलईडी बल्ब एक साधारण बल्ब की तुलना में लगभग 5 गुना ज्यादा समय तक इस्तेमाल किया जा सकता है वहीं दूसरा अंतर यह है कि एक साधारण बल्ब 100 या 200 वॉट का होता है जबकि एक एलईडी बल्ब 5 से लेकर 20 वॉट तक की अलग-अलग श्रेणियों में बाजार में उपलब्ध हैं। स्पष्ट है कि एक 100 वॉट के साधारण बल्ब की तुलना में एक 9 वॉट का एलईडी बल्ब 11 गुना बिजली की कम खपत करेगा। या यूं कहें कि पहले यदि कोई व्यक्ति अपने घर में 11 बल्ब जलाता था अब वह सिर्फ एक ही बल्ब का इस्तेमाल करता है। लेकिन इन एलईडी बल्बों की खरीद में सबसे बड़ी समस्या थी इनकी कीमत, जो बहुत ज्यादा थी। समाधान यह निकला कि ऊर्जा मंत्रालय ने ईईएसएल (एनर्जी एफीसियेंसी सर्विसेस लिमिटेड) से बड़ी मात्रा में एलईडी बल्बों का उत्पादन करवाया और इसे सस्ती कीमतों पर जनता को उपलब्ध करवाया, जिनकी अब कीमत हो गयी थी मात्र 100 रुपये। फ्री और डिस्काउंट के मामले में हम लोगों का कोई सानी नहीं है सो मौका लपक लिया गया। नतीजतन, ईईएसएल अब तक 30,00,00,000 एलईडी बल्ब बेच चुकी है, जिसकी बदौलत 15000 करोड़ रुपये से अधिक की सालाना बचत दर्ज हुई है। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि इन 30 करोड़ बल्बों की गैर-मौजूदगी में हम कितनी बिजली की खपत कर रहे थे।

अक्षय ऊर्जा के स्रोतों पर ज़ोर

पीयूष गोयल के अंतर्गत अक्षय ऊर्जा के स्रोतों, खासकर सौर ऊर्जा, को पिछली सरकारों के मुक़ाबले कहीं अधिक प्रोत्साहन मिला। मुझे थोड़ा-थोड़ा याद है कि एक समय सोलर पैनल खरीदने के लिए एक विशेष औपचारिक प्रक्रिया से गुजरना पड़ता था लेकिन आज कोई भी व्यक्ति सौर ऊर्जा से संबन्धित उपकरण आसानी से प्राप्त कर सकता है। भारत मई 2014 में 2650 मेगावॉट सौर उत्पादन क्षमता के मुक़ाबले जुलाई 2018 तक 23000 मेगावॉट क्षमता हासिल कर चुका है और आगे 2022 तक 100000 मेगावॉट का लक्ष्य निर्धारित है। जिन घरों तक किसी कारणवश बिजली नहीं पहुँच पायी है उन घरों में सौर ऊर्जा अपना काम बखूबी कर रही है।

कुलमिलाकर यदि देखा जाये तो मोदी और भाजपा सरकार में विद्युत आपूर्ति के संबंध में हम एक बेहतर स्थिति में हैं यद्यपि अभी भी बहुत कुछ कार्य शेष है। आपको याद होगा कि पिछली सरकारों में हमें 8 घंटे विद्युत आपूर्ति का आश्वासन था, साक्षी आप स्वयं हैं कि आपको कितनी आपूर्ति मिलती थी। वर्तमान समय में अधिकांश भारत 16-20 घंटे की विद्युत आपूर्ति का साक्षी है। इक्का-दुक्का राजनीतिक लोग आपको विरोध में तर्क दे सकते हैं क्योंकि पिछली सरकारों के कार्यकाल में वे अपनी कनपटी से लेकर मेरुदंड से होते हुए प्रजनन स्थान तक स्पंदन करती पसीने की बूंदों को भूल जाते हैं, क्योंकि वे अब पंखे की हवा में सोने के आदी हो गए हैं। इसलिए आप बस सुनिए और आगे बढ़ जाइए, देश तरक्की कर रहा है…..।