विचार
जिन विद्यालयों की तुलना राहुल गांधी ने पाकिस्तान के मदरसों से की, वे वास्तव में क्या हैं

विद्यालय सिर्फ किताबी ज्ञान प्राप्त करने का स्थान ही नहीं वरन् व्यवहारिक-सामाजिक सरोकारों से जुड़ने-समझने का स्त्रोत भी हैं। विद्यालय नियमों की एक ऐसी परिधि है जिसके अंदर रहकर विद्यार्थी आत्मिक उत्थान के आकाश में स्वच्छंदता से उड़ान भरता है और अतीत की गौरवमयी परंपराओं का स्मरण कर उन्नत भविष्य की राह पर निष्कंठक शिक्षा का दीप जलाने आगे बढ़ता रहता है।

यह नैतिक मूल्यों और मौलिक विचारों के संप्रेषण का केंद्रक है जहाँ से संस्कारों की पावन पवन मन-व्यवहार को आलोकित करते हुए सभ्य, संस्कारशील, संगठित समाज का निर्माण करती है। वास्तव में विद्या भारती के शिक्षा केंद्र राष्ट्र निर्माण के अग्रणी संस्थान हैं जो निरंतर बढ़ते उन्माद के बीच भी राष्ट्रभाव की न सिर्फ अलख जगा रहें बल्कि नन्हीं कोपलों को पीढ़ियों की पल्लवित परंपराओं और संस्कारों से सुसज्जित कर एक उन्नत, विचारशील जीवंत राष्ट्र की नींव रखने में महती भूमिका निभा रहे हैं।

निरंतर बढ़ते बाज़ारीकरण के दौर में जहाँ शिक्षा व्यवसाय बन गया हो, शिक्षक व्यवसायी बन बैठे हों, अधिक अक प्राप्त करना ही शिक्षा का उद्देश्य हो गया हो, नैतिक शिक्षा किताबों तक सिमट गई हो, संस्कार आधुनकिता के कुहासे में धुंधला गए हों, ऐसे समय में सिर्फ शिशु मंदिर और विद्या भारती ही राष्ट्र निर्माण की वे पाठशालाएँ हैं जहाँ विद्यार्थियों के अंतस में भारतीयता के भाव को जाग्रत कर उनके नैतिक, चारित्रिक और सामाजिक गुणों का विकास समग्र रूप से होता है।

दरअसल पश्चिमी अंधानुकरण के समय में भारत में अंग्रेज़ीयत का अनुसरण चलन में है, कॉन्वेंट स्कूलों का मायाजाल भारतीय जनमानस को अपनी जड़ों से धीरे-धीरे काटने का काम कर रहा है। ऐसे में शिशु मंदिर और विद्या भारती ही हैं जो छात्रों में भारतीयता का बीज रोप कर, उन्हें अपनी गौरवशाली इतिहास से परिचित कराकर बहुआयामी व्यक्तित्व को विकसित कर व्यक्ति निर्माण से राष्ट्र निर्माण करते हैं।

यही कारण है कि यह विद्या मंदिर सदैव से ही भारत विरोधी तत्वों और मिशनरियों के आँख में खटकते रहे हैं। समय-समय पर उनकी कुंठा गाहे-बगाहे सामने आ ही जाती है। आजकल भ्रम फैलाना विशेष रूप से चलन में है। कुछ लोग भ्रम के स्वर्ग में रहने के आदी हो गए हैं, धरातल पर उनकी नज़र ही नहीं है और सत्य एवं तथ्य की चिता जलाकर झूठ के धुएँ में विलाप कर रहे हैं।

वे अपनी आत्ममुग्धता के कारण सत्य को जान नहीं रहे हैं या जानते हुए भी व्यर्थ विलाप में लगे हैं। उन्मुक्तता इतनी अधिक है कि वास्तविकता पर नज़र ही नहीं है। अभी हाल ही में अपने अस्तित्व बचाने के लिए संघर्ष करती देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस के राहुल गांधी ने बयान दिया कि आरएसएस अपने स्कूलों में एक खास तरह की दुनिया दिखाता है और साथ ही इन स्कूलों की तुलना पाकिस्तान के उन मदरसों से कर दी जो आतंकवादियों को प्रशिक्षण देते हैं।

उनके इस बयान में राजनीतिक असफलता की कुंठा और संघ के प्रति नफरत साफ़ नज़र आती है। दरअसल, विदेशी वंशज उस भारतीय संस्कृति की विराटता को, उन शिक्षा केंद्रों की महत्ता को कैसे समझ पाएँगे जहाँ विद्यालय में आगमन के समय “ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:, पृथ्वी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:” मंत्र, भोजन के समय “ॐ सह नाववतु,सह नौ भुनक्तु” तथा प्रस्थान करते हुए “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया” मंत्र उच्चारित किया जाता है।

अथार्त् जहाँ दिन की शुरुआत से लेकर समापन तक लोग सिर्फ विश्व कल्याण, विश्व शांति की संकल्पना के साथ आगे बढ़ते हैं। उन शिक्षा केंद्रों, संस्कार गृहों में तथा आतंकी प्रशिक्षण केंद्रों में राहुल गांधी को अंतर समझ नहीं आता, यह उनकी बौद्धिक संकीर्णता है। ईश्वर उन्हें सद्बुद्धि दें! जिससे वे इन विद्यालयों एवं उनके छात्रों के योगदान को देख सकें।