विचार
संघ की वैचारिकी के आलोचक पढ़ें-सुनें-समझें⁠— भागवत प्रेम-कामी हैं, प्रदर्शन-कामी नहीं

प्रसंग- संघ की जनहितैषी वैचारिकी को पाठकों के सम्मुख रखने हेतु

‘सामान्य ज्ञान’ वास्तव में ‘विशिष्ट’ ही नहीं, ‘अतिविशिष्ट’ होता है। बहुतांश लोग प्रायः सामान्य ज्ञान को महत्त्वपूर्ण नहीं मानते हैं। अतः उसके वैशिष्ट्य एवं हितोपकारी पक्ष (महत्त्व) से अनजान रह जाते हैं। अधिकतर लोग ‘सामान्य ज्ञान’ वाली परीक्षा में ‘विशेष रूप से’ ‘विफल’ हो जाते हैं क्योंकि वे उस सामान्य का वैशिष्ट्य या तो जानने की आवश्यकता नहीं समझते हैं, या जानने-समझने में भूल ही कर बैठते हैं। यही मामला ‘प्रेम’ के साथ है और ‘संघ’ के साथ भी! ये दोनों ही अपने स्वरूप में ‘सामान्य’ हैं, परंतु इनका ‘वैशिष्ट्य’ अब तक कितनों को समझ आ पाया है? 

प्रेम श्रद्धा है। प्रेम भक्ति है। प्रेम करुणा है। प्रेम अहिंसा है। प्रेम सेवा (परोपकार) है। प्रेम कल्याण है। प्रेम समन्वय है। प्रेम समर्पण है। प्रेम आस्था है। प्रेम विश्‍वास है। प्रेम अनुष्ठान है। प्रेम धर्म है। प्रेम (भाव) बोध है। प्रेम चित्त है। प्रेम चिंतन है। प्रेम चिंता है। प्रेम त्याग है। प्रेम संयम है। प्रेम क्षमा है। प्रेम मानवता है। प्रेम जिजीविषा है। प्रेम जीवन है। प्रेम आधार है। प्रेम सत्य है। प्रेम ही शाश्‍वत है।

प्रेम के बिना संसार के अस्तित्व की कल्पना की ही नहीं जा सकती। कबीर ने उचित ही कहा है– “जा घट प्रेम न संचरै, सो घट जान मसान। जैसे खाल लोहार की, साँस लेत बिनु प्रान।” कहना न होगा कि भागवत प्रेम-कामी हैं (है) तथा संघ की वैचारिकी हर रूप में ‘प्रेम’ का ही यथोक्त वैविध्यपूर्ण विस्तार है और उसके सेवा कार्यों में यह रूप-वैविध्य सहज ही दृष्टिगोचर होता है, बशर्ते कि कोई अपनी आँखों पर पट्टी न बाँधे बैठा हो! 

कोविड-19 के इस विकट समय में भी संघ का सेवा कार्य एकांत में आत्म–साधना और लोकांत में परोपकार की भावना के साथ व्यवस्थित एवं सुनियोजित रूप में चलता हुआ दृष्टिगोचर हो रहा है। माननीय सरसंघचालक उत्सव हो अथवा आपदा, कार्यकर्ताओं को सेवा कार्य हेतु दिशानिर्देश देते (रहे) हैं।

26 अप्रैल 2020 को उन्होंने लगभग 38 मिनट के उद्‍बोधन में ‘प्रेम’ का ही पाठ प्रकारांतर से पढ़ाया-समझाया है। यह बात और है कि आयातित (फैंसी) वैचारिकी के मायाजाल में फँसे तथा उसके (दुः)प्रभाव से कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों का मन-मस्तिष्क इस प्रकार कलुषित है कि उन्हें संघ की कोई सेवा अच्छी प्रतीत नहीं होती।

ऐसा इस कारण भी कि वे ‘प्रेम’ (भाव) को भुला-बिसरा चुके हैं और केवल प्रदर्शन-कामी (कारी?) बन चुके हैं। उनके विचार इतने विस्फोटक हैं कि वे हर बात पर (में!) आग उगलते हैं। ऐसा इसलिए भी कि वे कटुता एवं कठोरता की सीमाएँ लाँघ कर ‘कट्टरता’ का दामन थामे हुए हैं।

समझदार जानते-समझते हैं कि कट्टरता ‘कठमुल्लापन’ से उपजती है। परंतु ऐसे कठमुल्लापन से ग्रसित तमाम तथाकथित बुद्धिजीवी संघ तथा उसकी वैचारिकी को लांछित करने की मंशा से अवसर तलाशते हैं और जब कभी अवसर मिलता है, संघ-प्रमुख के किसी-न-किसी वाक्य को सुविधानुसार तोड़-मरोड़कर व्याख्यायित करने का अथक उपक्रम करते हैं। संघ के ‘प्रेम’ दर्शन एवं वैविध्य के बावजूद ट्विटर पर इन दिनों चलाए जा रहे #BanRSS के ट्रेंड में कठमुल्लापन को देखा-समझा जा सकता है।

प्रसंगावधान से, कटु से कट्टर बनी मानसिकता के विवेचन हेतु एक संदर्भ की प्रस्तुति प्रसंगोचित है– मेरे एक फोनुआ मित्र हैं। हमारी कभी मेल-मुलाक़ात नहीं हुई परंतु फोन पर ही साहित्य, समाज, विचारधारा एवं राजनीति पर गहन एवं गंभीर चर्चाएँ होती हैं।

जब कभी फोन करते हैं, वार्ता के आदि या अंत में आदतन कुछ प्रश्‍न उछाल देते हैं– “और बताओ, तुम्हारे प. पू. मोहन भागवत जी से बात हुई कि नहीं?”, “और बताओ नागपुर से कोई समाचार आया कि नहीं?”, “और नागपुर में क्या कुछ (होने वाला) हो रहा है?”

वे अपने आपको ‘कॉमरेड’ कहलाना पसंद करते हैं। प्रायः उपरोक्त उपहासात्मक प्रश्‍नों के उत्तर में मेरी सहज प्रतिक्रिया यही होती है– “भागवत जी से मेरी मात्र एक बार की भेंट है और उसमें बात क्या हुई थी, बस ‘दर्शन’ मात्र हो पाए थे।”

परंतु मेरे फोनुआ मित्र को संघ-आलोचना (दोषारोपण) में बहुत मज़ा आता है। वे कम्युनिज़्म पोषक (…!) लेख और सामग्री धड़ाधड़ भेजते हैं। बहुत कुछ तो मैं पढ़ भी लेता हूँ। पढ़ना भी चाहिए! नहीं पढ़ेंगे तो पता कैसे चलेगा कि कांग्रेस पोषित वाम-वाम का जाप करने वाले स्वनामधन्य बुद्धिजीवियों के दिमागी गुहांधकार’ में कौन-सा और कैसा ओरांग उटांग’ बैठा है और उस सघन विचारधारा प्रच्छन्न में कैसे-कैसे ‘नैरेटिव’ गढ़े जा रहे (गए) हैं! अतः मैं उनकी सुन भी लेता हूँ और उनका भेजा हुआ देखपढ़ भी लेता हूँ। 

फिर हम तो पार्थसारथी मोहन की परंपरा (संयम/क्षमा) का निर्वहन करने में विश्‍वास करते हैं। विरोधी को 100 तक की छूट भगवान श्रीकृष्ण योगेश्‍वर ने दी थी, तो हम उनका अनुसरण क्यों न करें? तो ‘कॉमरेड’ मित्र की ओर से 100 लेख/वीडियो इत्यादि आने के बाद अपनी ओर से एकाध कोई लेख-वीडियो भेज देता हूँ।

अवसर पाकर कभी-कभार एकाध अपना लेख भी भेज देता हूँ। फिर जब कहने के लिए कुछ शेष नहीं रह जाता है, इतना अवश्य ही कहते हैं– भाऊ, तुमने अच्छा लिखा है। बधाई! परंतु बहुत उत्तेजक लिखते हो।” तब मैं कहता हूँ–

अच्छा, तब फिर आप भागवत जी को सुनिए। वे प्रेम-कामी हैं, आत्म-प्रकाशन एवं प्रदर्शन-कामी नहीं! उनके व्याख्यानों में उत्तेजना नहीं होती है। वे अत्यंत संतुलित प्रतिभा के धनी हैं। उनके व्याख्यानों का केंद्र भाव ‘प्रेम’ ही है जो, मानवता, सेवा, राष्ट्र-भक्ति तथा प्रेम के यथोक्त रूपों में देखा-परखा जा सकता है।

उन्हें सुनना भी चाहिए और यदा कदा ही सही, संघ विचारकों को पढ़ना भी चाहिए। जब हमें वाम-वृत्तांत पढ़ाया जाता है, तब आपको क्योंकर संघ की वैचारिकी नहीं पढ़नी चाहिए? संघ विचारकों को पढ़ने-सुनने से वैचारिक एकपक्षीयता का ख़तरा ख़त्म हो जाएगा। पहले जानो, फिर व्याख्या करो।”

फिर तो उनके क्रोध की कोई सीमा नहीं रह जाती है। कहते हैं– “ऐसा भी कोई दिन आए कि तुम और मैं किसी टीवी चैनल के डिबेट में साथ-साथ मिलें और यदि कभी किसी संयोगवश ऐसा होगा, तब निश्‍चय ही ‘सिरफुटौवल’ बहस होगी। 

मैं प्रायः कहता हूँ– हम तो ‘सिरफुटौवल’ वाली परंपरा के अनुरागी हैं ही नहीं। हमारी ज्ञान-परंपरा का स्रोत है– ‘एक ने कही दूजे ने मानी, कहे गुरु नानक दोनों ज्ञानी।’ और सदसदविवेक, शास्त्रार्थ, प्रेम, संयम एवं शांति की शिक्षा हमें विरासत में मिली है।

इतने आक्रमण, लूट-खसोट के बावजूद “लोग जहाँ गिर पड़े हैं, हम वहाँ तने खड़े है, द्वंद्व की लड़ाई भी साहस से लड़े हैं, न दुख से डरे, न सुख से मरे हैं, काल की मार में, जहाँ दूसरे झरे हैं, हम वहाँ अब भी, हरे-के-हरे हैं”– ‘शिरीष के फूल’ की तरह!

उत्पात, उपद्रव, हो हल्ला, तोड़फोड़, मारकाट, हिंसा की भाषा सदैव ही हमारी समझ से परे रही है। हमें जो लाठी हासिल है, वह तो ‘चौकीदार’ की है और वह आत्म-रक्षा से अधिक लोक-रक्षा के लिए है। इसमें भी ‘प्रेम’ है– राष्ट्र-प्रेम!

परंतु उनका तकिया-कलाम शुरू हो जाता है– “संघ ऐसा, संघ वैसा…। आप अनुभव करेंगे कि लोग बिना पढ़े-जाने-समझे संघ की वैचारिकी के संबंध में अपने मस्तिष्क के भीतर एक मस्तिष्क रच-गढ़ चुके हैं और उसे दृढ़, भारी–भरकम’ ‘मजबूत संदूक में तालाबंद कर चुके हैं, जो अपनी सुरक्षा एवं सुविधानुसार खुलता और बंद हो जाता है। 

आज हम ‘न्यू इंडिया’ के डिजिटल समय में जी रहे हैं। लगभग सबके पास स्मार्टफोन हैं। संघ को लेकर जिनके मन-मस्तिष्क पूर्वाग्रह और दुराग्रहों से लबालब भरे हैं, उन्हें फोन का ‘स्मार्ट’ उपयोग करना चाहिए। पढ़ने में रुचि न हो और टाइप करने की इच्छा न हो तो आजकल के फोन इतने ‘स्मार्ट’ हो चुके हैं कि वे सुनते भी हैं और सुनाते भी हैं। अतः इस समय प्रवाह में आग्रह यह होना चाहिए कि संघ की वैचारिकी जानने-समझने के लिए कम-से-कम सरसंघचालक के व्याख्यानों को सुनें।

जो भ्रम खड़े किये गए हैं, उनके टूटने से भारत का वर्तमान तो बदलेगा ही, भारत का भविष्य और भविष्य का भारत सुदृढ़ और स्वर्णिम भी होगा। भागवत ने भारतीय विचार मंच’ द्वारा 2017 में आयोजित संगोष्ठी समापन में “सर्वेषां अविरोधेन दृष्टि” कायम रखने का आग्रह करते हुए ‘प्रेम’ का ही संदेश दिया था। अर्थात् संघ की वैचारिकी में ‘प्रेम’ वह तत्व है, जो उसे केवल स्थायित्व ही नहीं देता अपितु विशिष्ट अर्थों में शाश्‍वत बनाता है। संघ का ‘प्रेम’ नित्य नूतन भी है और चिर पुरातन भी। अर्थात् वह अपनी (देशीय) भाव-भूमि से जोड़े रखने में कारगर है।  

आनन-फानन जो संघ की आलोचना करते हैं, उन्हें स्मरण कराने की आवश्यकता है कि न तो संघ सरकार से कोई मानपत्र प्राप्त करने के लिए लालायित (रहा) है, न संघानुयायी कार्यकर्ता किसी प्रमाणपत्र, मानदेय एवं यात्रा भत्ता के लिए ही कार्यरत हैं। वे न पुरस्कार-कामी हैं, न ही ‘अवॉर्ड वापसी गैंग की तरह कुटिल खल कामी।

वे संपूर्ण भारतवासियों की सेवा को न केवल अपना परम धर्म मानते, अपितु राष्ट्रोत्थान के लिए सतत अथक कार्यरत हैं। संघ का समाज इस देश की संपूर्ण जनता है’सर्वेषां अविरोधेन! संघ के लिए सेवा आत्मीय वृत्ति का परिपाक है और उसके लिए आत्म-प्रकाशन हेय है।

कोविड-19 के दौरान सेवारत कार्यकर्ताओं को भागवत ने संघ के इसी पाठ का पुनः स्मरण कराया है। ऐसा करते हुए एकांत में आत्म-साधना और लोकांत में परोपकार वाले संघ के कार्य-स्वरूप को भी उन्होंने रेखांकित किया है। उनका एक वक्तव्य उल्लेखनीय एवं अनुकरणीय है– सातत्य अपने प्रयासों में चलना चाहिए। ऊबना नहीं चाहिए, थकना नहीं चाहिए। करते रहना चाहिए। सबके लिए करना है। इसमें कोई भेद नहीं है। जो जो इसके पीड़ित हैं वो हमारे अपने हैं। 

वर्तमान स्थितियाँ ऐसी हैं, जहाँ संघ के अतिरिक्त कहीं कोई बुद्ध (बुद्धिमान) दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता है और जो स्वनामधन्य हैं, वे धर्म (राष्ट्रीय दायित्व) जानने-समझने के पक्ष में नहीं हैं। आयातित वैचारिकी की कौंध में जो कुछ जान-समझ पाए हैं, वास्तव में वह नीम हक़ीम ख़तरे जान’ से अधिक कुछ नहीं है। अतः उससे उपजी बौद्धिक खुजलाहट (झल्लाहट!) से भारत का भविष्य सँवरेगा नहीं।

ऐसे में एकमात्र विकल्प शेष रह जाता है– संघम (राष्ट्र सेवक) शरणम् गच्छामि। आज यही विकल्प प्रासंगिक एवं प्रीतिकर है। संघ के ‘प्रेम’ वाले यथोक्त पक्षों के कारण संघानुयायियों की संख्या दिन दूनी, रात चौगुनी हुई है। आज संघ उक्त प्रेम-रूपों का एकमात्र विकल्प है। कहना अत्युक्तिपूर्ण न होगा कि राष्ट्र की आत्मा इसी में रची-बसी है। अंततः यह स्वतः सिद्ध हो जाता है कि भागवत प्रेम और भागवत सत्य एक एवं अभिन्न है।

डॉ आनंद पाटील तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं। वे @AnandPatilCU के माध्यम से ट्वीट करते हैं।