विचार
रोबॉटिक सर्जरी करने वाला भारत में निर्मित एसएसआई मंत्रा कैसे विकसित हुआ

भारत में एक दशक से रोबॉटिक प्रणाली की सहायता से सर्जरी की जा रही है। राष्ट्रीय स्तर के सरकारी अस्पताल और कई निजी कॉरपोरेट अस्पतालों में 72 ऐसी प्रणालियाँ हैं जिनमें से अधिकांश एक यूएस विनिर्माता द्वारा बनाए गई हैं जिसका इस क्षेत्र में आभासी एकाधिकार है।

नई दिल्ली के राजीव गांधी कैंसर संस्थान (आरजीसीआई) में ऐसी 73वीं प्रणाली है जो भारत में निर्मित है। 19 जनवरी को इस प्रणाली को औपचारिक रूप से शुरू किया गया। इसका नाम है एसएसआई मंत्रा जो कि मल्टी आर्म नॉवेल टेली रोबॉटिक असिस्टेंस का लघु रूप है और इसे बनाने वाली कंपनी का नाम एसएस इनोवेशन्स है।

एसएस डॉ सुधीर श्रीवास्तव हैं जो भारत में जन्मे हृदय सर्जन हैं। वे राजस्थान के एक चिकित्सा महाविद्यालय से मेडिकल डिग्री लेकर 21 वर्ष की आयु में कनाडा चले गए थे और वहाँ ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय में वक्ष सर्जरी में विशेषज्ञता प्राप्त की।

वे फिर टेक्सास (यूएस) चले गए जहाँँ उन्होंने विश्व की पहली पूर्णतः एंडोस्कोपिक सिंगल वेसल कोरोनरी आर्टरी बाइपास (टिकैब) सर्जरी की और हृदय तथा रक्तवाहिका संबंधी श्रेष्ठता के प्रतिष्ठित केंद्र की स्थापना में सहायता की।

जब सर्जरी करने के लिए रोबॉटिक प्रणालियाँ उपलब्ध होने लगीं, तब डॉ श्रीवास्तव ने विश्व में पहली बार शिकागो विश्वविद्यालय में धड़कते हृदय पर क्वाड्रपल टिकैब किया। हृदय की 1,400 रोबॉटिक सर्जरी कर चुके श्रीवास्तव ने स्वदेश लौटने का निर्णय लिया।

रोबॉटिक सर्जरी प्रणाली की उच्च लागत, जो भारत आते-आते 16-20 करोड़ रुपये का हो जाता है, को समझते हुए उन्होंने एक दल बनाया और इस प्रणाली को पूर्णतः देश में विकसित किया। उन्होंने यूएस, चीन और न्यूज़ीलैंड की कुछ कंपनियों से साझेदारी की लेकिन अधिकांश काम सरकार प्रायोजित आंध्र प्रदेश स्थिति अटल इन्क्युबेशन इकाई में हुआ।

चीन में जानवरों पर एसएसआई मंत्रा का ट्रायल करते डॉ सुधीर श्रीवास्तव (@mathurjitesh)

2016 में एसएस इनोवेशन्स की स्थापना के चार वर्षों बाद 30 से भी कम युवा भारतीय अभियंताओं के दल ने मंत्रा प्रणाली को डिज़ाइन और विकसित कर दिया तथा एशिया के पहले मेडिकल उपकरण पार्क- आंध्र प्रदेश मेडिकल टेक्नॉलोजी ज़ोन (एएमटीज़ेड) की एक इकाई में इसकी प्रारंभिक प्रतियाँ बनने लगीं।

वाइज़ग से एएमटीज़ेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) डॉ जितेंद्र शर्मा और इस परियोजना के समर्थक दिल्ली से नीति आयोग के सीईओ अमिताभ कांत ने वीडियो माध्यम से जुड़कर एसएसआई मंत्रा का लोकार्पण 19 जनवरी को किया।

इसमें आरजीसीआई के चिकित्सा निदेशक सुधीर रावल भी उपस्थित थे जिन्होंने इस परियोजना के मानव ट्रायल कका अनुभव साझा करते हुए कहा, “मैं स्वयं क्लिनिकल ट्रायल्स से काफी निकटता से जुड़ा हुआ था और परिणाम अद्भुत थे।”

इस विषय पर कांत ने कहा, “भारत में डिज़ाइन और निर्मित मंत्रा प्रणाली भारतीयों के लिए मेडिकल और रोबॉटिक तकनीकों का द्वार खोल देगी।” ऐसा हो भी रहा है- डॉ शर्मा ने बताया कि इस वर्ष के अप्रिल में एएमटीज़ेड की इकाई से पहली भारत निर्मित मैग्नेटिक रेज़ोनेन्स इमेजिंग (एमआरआई) स्कैनिंग प्रणाली को भी लॉन्च किया जाएगा।

डॉ श्रीवास्तव बताते हैं कि मंत्रा प्रणाली में जो विशेषताएँ हैं, वह कई अन्य रोबॉटिक सर्जरी प्रणालियों में नहीं होती है- जैसे चार की जगह पाँच रोबॉटिक बाहें, 2डी की जगह 3डी हाई डेफिनिशन इमेजिंग। वे रोबॉटिक्स को सर्जरी का भविष्य मानते हैं।

एसएसआई मंत्रा का सर्जन कमांड (बाएँ) और 3डी डिस्प्ले (दाएँ)

“मेरा विज़न ऐसी तकनीकी उन्नत प्रणालियाँँ बनाना है जिनकी लागत कम हो, उपयोग में सरल हों और सभी प्रकार की सर्जरी करने में सक्षम हों जो विश्व के अधिक से अधिक रोगियों को लाभ पहुँचाए। पारंपरिक सर्जरी के स्थान पर रोबॉट का उपयोग करने से कम चीरे लगाने पड़ते हैं जिससे दर्द कम होता है, निशान कम पड़ते हैं और रोगी शीघ्र स्वस्थ हो जाता है।”, उन्होंने कहा।

एएसआई ने व्यावसायिक रूप से निर्माण शुरू नहीं किया है लेकिन डॉ श्रीवास्तव को अपेक्षा है कि वे मंत्रा को 4-5 करोड़ रुपये प्रति इकाई के मूल्य पर बेच सकेंगे जो कि मुख्य प्रतिस्पर्धी की लागत का एक-चौथाई है। वे मानते हैं कि भारत में टेली-सर्जरी लाभकारी होगी जो स्वास्थ्य सेवाओं से अछूते ग्रामीण क्षेत्रों में उन्नत सर्जिकल सेवा पहुँचा सकेगी।

मार्केट सर्वेक्षण दर्शाते हैं कि दक्षिण एशियाई क्षेत्र में एसएसआई प्रणालियों के निर्यात की माँग काफी होगा जिससे यह न सिर्फ आत्मनिर्भर भारत अभियान का जीवंत उदाहरण होगा बल्कि एक योग्य निर्यात वस्तु भी बन सकेगा।

सर्जन के हाथों की प्रतिमूर्ति

टेली-रोबॉटिक सर्जरी में रोबॉटिक आर्म की सहायता से छोटे उपकरणों से प्रक्रिया की जा सकती है। सर्जन कम्प्यूटर की सहायता से इस आर्म को नियंत्रित करता है। इस आर्म में लगी इलेक्ट्रॉनिक आँख बड़ी हाई डेफिनिशन का 3डी चित्र दिखाती है। रोबॉट सर्जन की हाथ की गतिविधियों की नकल करके चलता है और हाथ काँपने जैसी गलतियों को रोकता है।

रोबॉट की सहायता से सर्जरी

भारत में नई दिल्ली स्थित एम्स में पहली रोबॉटिक सर्जरी यूएस निर्मित डा विंची प्रणाली (सर्वाधिक उपयोग होने वाली रोबॉटिक सर्जरी प्रणाली) के माध्यम से जुलाई 2006 में की गई थी।

भारत में पहली रोबॉटिक कोरोनरी सर्जरी दिसंबर 2018 में गांधीनगर स्थित एपेक्स हृदय संस्थान में 30 किलोमीटर दूर स्थित रोगी पर साइमन्स कंपनी की प्रणाली कोरिन्डस वास्क्युलर रोबॉटिक्स की सहायता से की गई थी।

माना जाता है कि विश्व भर में 6,000 रोबॉटिक सर्जरी प्रणालियाँ हैं जिनमें से 4,000 अकेले यूएस में कार्यरत हैं।