विचार
आरक्षण नीति का भविष्य क्या है? यह निदान है या रोग?
शंकर शरण - 22nd November 2018

राँची में हुए राष्ट्रीय ‘लोकमंथन’ (27-30 सितंबर) के समापन में लोक सभा अध्यक्ष माननीया सुमित्रा महाजन ने आरक्षण नीति पर सवाल उठाकर सब को चौंका दिया। एक ओर, आरक्षण और विशेषाधिकार जारी रखने के लिए सत्ताधारी लोग सुप्रीम कोर्ट के निर्णय भी पलट रहे हैं। निजी क्षेत्र पर भी आरक्षण लादने की तैयारी चल रही है। एक बड़े नेता ‘कला और संस्कृति’ में भी आरक्षण की चाह कर चुके हैं। कौन जाने, आगे खेलकूद की टीमों और थियेटर, सिनेमा में भी आरक्षण की माँग होने लगे!

ऐसी स्थिति में सत्ताधारी दल की ही लोक सभा अध्यक्षा ने एक विशाल सभा में कहा कि ‘‘डॉ. अंबेडकर ने आरक्षण की व्यवस्था केवल दस वर्ष के लिए की थी, क्योंकि वे शीघ्र सब के लिए समान व्यवस्था चाहते थे। लेकिन सत्तर साल के बाद भी उसे जारी रख हम सामाजिक झगड़े बढ़ा रहे हैं।’’

श्रीमती महाजन की चिंता विचारणीय है। डॉ. अंबेडकर ने अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था केवल दस वर्ष के लिए तब की थी, जब उन समुदायों के लोग बड़े पदों पर शायद ही दिखते थे। लेकिन आज, जब सभी सत्ता निकायों, संसद, विधान सभाओं, सर्वोच्च पदों और राष्ट्रीय, राजकीय संस्थानों में उन की उपस्थिति नियमित बन चुकी है, तब भी विशेष अधिकारों का जारी रहना कई तरह से हानिकारक सिद्ध हो रहा है।

यह तो कोई नहीं कहेगा कि आज आरक्षण का लाभ उठाने वाली जातियों की स्थिति 1947 की तुलना में बदतर हो गई। तब आरक्षण को अंतहीन, और विविध रूप से बढ़ाए जाने का क्या औचित्य है? अब आरक्षण ऐसी नीति हो गई है जिसके लक्ष्य पाए ही नहीं जा सकते! इसने ऐसे पदधारी बना दिए जो उस के योग्य नहीं हैं। जबकि अनेक योग्य व्यक्तियों को प्रत्यक्ष वंचित किया जाता है, जिस पर कोई ध्यान देने वाला तक नहीं! सामाजिक हित, समानता और निष्पक्षता के सिद्धांत ही ताक पर चले गए हैं।

न तो संविधान, न ही कोई न्याय-दर्शन कहता है कि किसी को इसलिए वंचित किया जाए, क्योंकि ‘सदियों पहले’ उन के पूर्वजों ने दूसरों को ‘वंचित किया होगा’। जबकि आरक्षण से प्रतिकूल प्रभावित होने वाले तमाम प्रतिभावान युवाओं को कुछ यही तर्क पिलाया जाता है। ऐसी तर्कणा दोहरा जुल्म है। एक तो, किसी को उन के ‘पूर्वजों के जुर्मों’ की सजा देना घोर अन्याय है। दूसरे, इन के पूर्वजों ने ऐसे जुर्म किए थे, यह भी केवल मान लिया गया है। न इस का परीक्षण हुआ, न कोई प्रमाण है। वस्तुतः कोई प्रमाण नहीं है, इसीलिए इस मान्यता का परीक्षण नहीं किया जाता।

अतः यहाँ चालू आरक्षण की नीति अपनी परिभाषा से ही कभी अपना घोषित लक्ष्य नहीं पा सकती। वे घोषित लक्ष्य केवल दिखाने के दाँत है, खाने के दाँत कुछ और हैं। आरक्षण राजनीतिक जोर-जबर्दस्ती का हथियार बन चुका है। तमिलनाडु इसका सबसे साफ उदाहरण रहा है। पर केंद्रीय राजनीति में भी वही हाल है। इस का प्रमाण यह भी है कि जब भी न्यायपालिका ने आरक्षण को कुछ भी सुधारने का निर्णय किया, तो संविधान संशोधन करके उसे पलट दिया गया। अब तक कम से कम सात बार ऐसे संशोधन हो चुके हैं।

लेकिन प्राथमिक शिक्षा की गुणवत्ता की गारंटी करने के लिए कोई विधेयक आज तक एक बार भी नहीं आया। न ही सभी भारतीयों को अपनी-अपनी भाषा में भी बड़े अंग्रेजी स्कूलों की तरह अच्छे शिक्षण-प्रशिक्षण मिलने के लिए कुछ सोचा गया। इसी से स्पष्ट है कि सब के लिए ‘समान अवसर’ बनाना या ‘भेद-भाव खत्म करना’ नेताओं की चिंता ही नहीं रही है।

पिछले पचास वर्षों के राजनीतिक इतिहास को देखते हुए कहा जा सकता है कि आरक्षण धूर्ततापूर्ण गतिविधि में बदल गया है। इस ने एक जड़ मानसिकता बनाई, जो नए चिंतन को पनपने नहीं देती। आरक्षण अब नीति नहीं, बल्कि एक औजार बन गया है जिस से नेता, बुद्धिजीवी और जज अपनी न्यायप्रियता का ढिंढोरा पीटते है। इसने सारे विमर्श को जबरन किसी न किसी तरह की अलगाववादी पहचान के अधीन कर दिया। जैसे ही कोई आरक्षण की आलोचना करे, उसे तरह-तरह के अपशब्दों, लांछनों से बेधा जाता है। क्या यह प्रमाण नहीं कि इस से कैसी जड़ मानसिकता बनी है?

विचित्र बात है कि यहाँ जिन सामाजिक समूह का विचार-तंत्र जाति जैसी चीज मानता भी नहीं – जैसे ईसाइयत और इस्लाम – उन्हें भी जातिगत आरक्षण का लाभ मिल रहा है। अल्पसंख्यक आयोग के पूर्व अध्यक्ष तरलोचन सिंह के अनुसार, मुसलमानों में 58 जातियों और 14 जनजातियों को आरक्षण का लाभ दिया जा रहा है। इस प्रकार, एक ओर हिन्दू धर्म-समाज को ‘जातिवाद’ के लिए लांछित करना, और दूसरी ओर ‘जातिवाद मुक्त’ हिन्दू-विरोधी समुदायों को भी जातिगत आरक्षण देना – यह सब अंधी मानसिकता से चल रहा है।

इस मानसिकता को पहचानें। किसी नीति के गुण-दोष पर विचार, समीक्षा करने के बजाए गाली-गलौज या हिंसा पर उतर आना ही वास्तविकता दिखा देता है। जो लेखक या नेता जाति-मजहब भेदों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय, सामाजिक विमर्श और नीति-निर्माण की बात करे, उसे ही जातिवादी और संप्रदायवादी बताया जाता है! यह सोवियत कम्युनिस्ट शैली की बंद, प्रचारात्मक मानिसकता है जो भारतीय बौद्धिकता में प्रभावशाली बनी हुई है।

श्रीमती महाजन ने मात्र एक हानि का संकेत किया। किंतु हानियाँ कई क्षेत्रों में हो रही हैं। जिसमें स्वयं उन समुदायों में निहित स्वार्थ का पैदा हो जाना शामिल है। यह दो-तीन पीढियों से सुविधा, शक्ति, संपन्नता पा लेने के बावजूद सामान्य लोगों और अपने भी समूह के दुर्बल लोगों के हक पर काबिज है और इसे बदलना नहीं चाहता।

शिक्षा, सेवा और कुशलता की हो रही हानि इससे अलग है। योग्यता परीक्षा में शून्य नंबर लाने वाले को भी पीएच.डी. में दाखिला दे दिया जाता है। बिन सोचे कि वैसा नकली पीएच.डी. समाज के किस काम का होगा? ऐसा शिक्षक नियुक्त कर देना, जिसे विषय की समझ तक नहीं, देश और समाज की सरासर हानि है। उन छात्रों के साथ भी अन्याय है, जो शिक्षा ग्रहण करने गए हैं। संसाधनों और समय की बर्बादी के साथ-साथ नकली उन्नति का यह आडंबर राजनीतिबाजों के लिए चाहे लाभकारी हो, इस ने कुल मिलाकर समाज को हानि पहुँचाई है।

निस्संदेह, यह डॉ. अंबेडकर की कल्पना नहीं थी। हमारा देश अन्य देशों के सामने कमजोर स्थिति में बना रहता है। राजकीय तंत्र रुग्ण हो गया है, जिस की भूमिका और आकार तो बढ़ते गए, किंतु पदधारियों की योग्यता की कोई परवाह नहीं रही। यदि महत्त्वपूर्ण स्थानों पर आधे लोग योग्यता की बजाए अन्य कारणों से नियुक्त हो रहे हैं तो यह संपूर्ण राज्यतंत्र को बेबस करके रख देगा। हमारी संसद और विधान सभाएं भी इस का प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। इस के दुष्परिणाम खतरनाक हो सकते हैं।

आरक्षण को ‘सकारात्मक कार्रवाई’ कह उचित ठहराया जाता है। पर इस में कुछ सकारात्मक नहीं। प्रायः यह अवरोध खड़ा करना हो गया है, कि फँला पद किसी और के लिए हैं। वस्तुतः यह दोहरी नकारात्मक कार्रवाई है। न तो सामाजिक हित का ध्यान रखा जाता है, न उन वर्गों के वास्तविक उत्थान का जिन के लिए आरक्षण जमाए रखा गया है। इसीलिए, कभी कहने को भी आरक्षण की समीक्षा, या परिणामों का अध्ययन करने का नाम तक नहीं लिया जाता। कितना अजीब है कि किसी कार्रवाई के परिणामों पर दशकों तक विचार ही न किया जाए!

स्वतंत्र भारत में आरक्षण का इतिहास दिखाता है कि अपवाद मान शुरू की गई चीज नियम को ही बर्बाद कर चुकी है। कुछ लोगों को, कुछ समय के लिए, आरक्षण वाली बात आज हर चीज में, हर स्तर पर, स्थाई आरक्षण की ओर जा रही है। आरक्षण की माँग कैंसर की तरह एक से बढ़कर दूसरे समुदाय में, फिर अगले समुदायों में बढ़ती जा रही है।

फिर, जहाँ आरक्षण मिल गया, वहाँ से आगे दूसरे क्षेत्र में आरक्षण हड़पने, या छीनने की प्रवृत्ति भी चल रही है। प्रोन्नति में, या निजी क्षेत्र में आरक्षण लेने की बातें शुद्ध जोर-जबर्दस्ती और दलीय स्वार्थ के बल पर हो रही है। इस में कोई तर्क या राष्ट्रीय हित नहीं, बल्कि स्वार्थ में अंधे होकर सामाजिक विध्वंस की तैयारी है। यह सब न तो डॉ. अंबेडकर की कल्पना थी, न ही दुनिया के किसी भी देश में हैं। इस प्रकार, केवल हम भारतीय लोग अपने ही हाथों से अपने समाज को तहस-नहस करने में लगे हैं।

अच्छा हो, दुर्बल लोगों को ऐसी सहायता दी जाए कि वह बराबर योग्यता का बन सके। यदि कोई कुपोषण ग्रस्त है, तो उसे विशेष भोजन दें। शिक्षा-दीक्षा की व्यवस्था नहीं, तो उसे अध्ययन करने या प्रशिक्षण के लिए रियायती या मुफ्त स्थान दें। शुल्क माफ कर दें। यदि कोई परिवार बच्चों के श्रम के बिना जीविकोपार्जन करने में कठिनाई महसूस करें, तो उन्हें तब तक आर्थिक सहायता दें, जिस से वे अपने बच्चों को शिक्षण-प्रशिक्षण के लिए मुक्त करें। यह सब सकारात्मक कार्रवाई होगी। ताकि जब काम, परीक्षण, प्रतियोगिता का समय आए, तो केवल योग्य ही लिए जाएँ। वरना, काम का ही स्तर गिराकर तो पूरे समाज की हानि होती है। इस से दुर्बल लोगों के उठने के बदले सबल लोग भी दुर्बल होते हैं।

यह लेख लेखक के व्यक्तिगत विचारों पर आधारित है।