विचार
गणतंत्र की सफलता के लिए राष्ट्रभाषा आवश्यक?

जब गणतंत्र की बात आती है तो स्वत: भाषा का प्रश्न उभर आता है। क्या हम भाषिक स्तर पर संविधान की मूल भावना के साथ न्याय बरत रहे हैं, हम सभी को अपने अंर्तमन से पूछना चाहिए। भारत में सरकारी या निजी स्तर पर स्वभाषाओं की स्थिति क्या है? इस पर किसी शोध की आवश्यकता नहीं है। हम आज भी अपनी भाषाओं के गुणवत्ता-बोध के मामले में हीनता-बोध से ग्रस्त हैं। इसमें सभी पक्ष दोषी है। क्या व्यवस्था या तंत्र बिना स्वभाषा के सही जन-अभिव्यक्ति करने में सक्षम सिद्ध हो सकी हैं? उत्तर है– नहीं।

संविधान के भाषाई अनुच्छेदों की स्थिति किसी से छुपी हुई नहीं है। निजी क्षेत्र में तो और भी शर्मनाक स्थिति है। क्या संविधान केवल सरकारी क्षेत्रों पर लागू होता है? उदारीकरण के बाद तो निजी क्षेत्र का वर्चस्व बढ़ा है। फिर भी हिंदी एवं भारतीय भाषाओं की स्थिति निजी क्षेत्रों में बोली या विज्ञापन से आगे नहीं बढ़ पाई है।

अब तो सरकारी क्षेत्र में भी निजी क्षेत्रों का रंग चढ़ने लगा है। ऐसे में 72वें गणतंत्र दिवस पर हम सभी को विचारना होगा कि भारत के गणतंत्र का भविष्य कैसा होगा? क्या विदेशी भाषा की बैसाखी पर खड़ा भारत मैकॉले के सपनों का भारत नहीं होगा? जब हम रक्त एवं वर्ण से तो भारतीय होंगे पर हमारे संस्कार अंग्रेज़ी आधारित होंगे। क्योंकि कहा गया है- भाषा गई, संस्कृति गई  

इस अवसर पर मैं आप सभी से एक पुरानी खबर साझा करना चाहूँगा जो संचार माध्यमों से संबंधित हैं। वर्ष 2015 में उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल राम नाईक द्वारा इलाहाबाद विश्‍वविद्यालय के एक सम्मेलन में दिए गए संबोधन में वे हिंदी व भारतीय भाषा माध्यम से शिक्षा देने पर ज़ोर देते हैं। इस सम्मेलन का विषय था- थियोरी एंड टीचिंग ऑफ इंग्लिश।  शीर्षक देखिए। 

अंग्रेज़ी के समाचार-पत्रों के संपादकों को परेशानी इस बात की नहीं हुई कि माननीय राज्यपाल ने माध्यमिक स्तर तक की शिक्षा का माध्यम हेतु हिंदी पर ज़ोर क्यों दियाउनकी समस्या इस बात पर थी कि उन्होंने अंग्रेज़ी में शिक्षाविषय पर आयोजित सम्मेलन में हिंदी माध्यम पर ज़ोर क्यों दियायहाँ देखिए कि अंग्रेज़ी के संपादक अपनी नौकरी के प्रति कितने वफादार हैं।

क्या हिंदी व भारतीय भाषाओं के समाचार-पत्रों के संपादकों का यह नैतिक दायित्व नहीं बनता कि वे इस बात को प्रमुखता के साथ उजागर करें कि भाषाई हीनता ने इस देश का कितना नुकसान किया है? अंग्रेज़ी के प्रति श्रेष्ठता बोध तथा हिंगलिश की भाषाई अपसंस्कृति ने भारतीय समाज का क्रूर नुकसान किया है। 

इस दिशा में छिटपुट प्रयास ही होते हैं पर सशक्तता के साथ नहीं। हिंदी के बल पर रात-दिन चिल्लाने वाले, अधिकांश चैनल भी अंग्रेज़ियत वाले हैं। अब कोई इस विषय पर चर्चा भी नहीं करता। तत्कालीन राज्यपाल महोदय के संभाषण की उल्लेखनीय बात रही- It is myth that only those studying in convent school have a better career अर्थात् यह मिथ्या है कि जो कॉन्वेंट में पढ़ रहे हैं, उनका ही भविष्य उज्ज्वल हैं

ग़ौरतलब है कि देश के अधिकांश राज्यों में हिंदी पूर्व में भी स्वीकार्य थी और अब भी है। दोष व्यवस्था के साथ-साथ हमारी हीनता बोध का है जिसे प्रसरित करने में हमारी संचार माध्यमों का बहुत बड़ा हाथ रहा है। अलग-अलग संदर्भो में इस व्यवस्था, हीनता बोध का सभी ने इस्तेमाल किया। आज़ादी के बाद सत्ता के मद में डूबे वर्ग ने व्यवस्था हेतु अनिवार्य राष्ट्रभाषा की अहमियत को कभी गहराई से समझने की कोशिश भी नहीं की जिसका खामियाजा हम सभी भुगत रहे हैं।  

भाषा किसी भी देश, समाज के निष्कंटक प्रवाह के लिए धमनी की भाँति कार्य करती है। तमाम दुरुहताओं के बावजूद भारतवर्ष के लिए हिंदी धमनी ही है। यह कोई भावनात्मक बात नहीं बल्कि स्थापित तथ्य है। गणतंत्र की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि हिंदी की उपादेयता को सर्वांगीण स्तर पर जागरूकता के साथ स्थापित किया जाए।

हिंदी भारतीयता का विस्तार है। भारतीयता के अहम तत्त्व के रूप में सरकारों के साथ ही निजी क्षेत्रों को भी इसपर गंभीरता से ध्यान देने की आवश्यकता है और भाषा के क्षेत्र में प्राथमिक, माध्यमिक के साथ-साथ इसे उच्च शिक्षा में भी महत्त्व देना होगा तभी भारत की साख व्यापारिक, व्यावसायिक एवं शासकीय क्षेत्रों में भी सम्मानीय‌ रूप से बढ़ सकेगी।

राष्ट्रीय स्तर पर हिंदी के प्रयोग को प्राथमिकता प्रदान करने की भावना रखना आवश्यक है। जिस दिन यह भावना सामूहिक स्तर पर प्रवेश कर जाएगी, उस दिन से ही भाषाई दूरियाँ समाप्त हो जाएँगी। एक सफल गणतंत्र के लिए इसे समझना बेहद आवश्यक है।

भारत में भाषा के प्रति अतिश्योक्ति पूर्ण व्यवहारों की प्रबलताओं ने हमारे सामाजिक और राजनैतिक जीवन में भी परस्पर दूरियाँ बढ़ाई हैं, इससे इनकार नहीं किया‌ जा सकता। अब आवश्यकता है कि गणतंत्र की मज़बूती के लिए व्यवस्था समरसता को बढ़ाने का कार्य करें। 

देश भले स्वाधीन हो गया, परंतु अभी भी अंग्रेज़ी साम्राज्यवाद के विष से उबरा नहीं। इस हेतु सकारात्मक कदम उठाने की आवश्यकता है। वर्तमान शिक्षा नीति से कुछ सकारात्मक उम्मीद जगी है। फिर भी इसे सही नीति से लागू करने की आवश्यकता है। इस हेतु तत्संबंधी साहित्य और शिक्षण प्रणाली को अनवरत दुरुस्त करना होगा तभी भविष्य सशक्त होगा।  

‘एक भारत : श्रेष्ठ भारत’ जैसे कदम उपयोगी साबित हो सकते हैं। पर सबसे अधिक ज़रूरी है हिंदी के मामलों में सर्व-सहमति की तभी भारत का सबसे विशाल गणतंत्र- सबसे सशक्त गणतंत्र के रूप में स्थापित होगा। एक सफल गणतंत्र के लिए राष्ट्रभाषा के साथ ही लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में ख्यात संचार माध्यमों को भी अपना दायित्व समझना होगा।