विचार
राम हम सबके हैं- न हमारी विजय, न आपकी पराजय

यह एक ऐसा प्रकरण था, जिसकी कोई ज़रूरत नहीं थी। यह एक ऐसी सुनवाई थी, जो सिर्फ इसलिए हुई क्योंकि प्रकरण आया। यह एक ऐसा मसला था, जिससे अनावश्यक खेला गया। जिस दिन राम की जन्मभूमि का मामला अदालत में गया, उसी दिन तय हो गया कि फैसला जब भी आए, न्याय तो अब क्या होगा। यह प्रकरण फैसले के लिए ही अदालत गया, न्याय के लिए नहीं।

फैसला कुछ भी हो, वह न हमारी विजय है, न आपकी पराजय है। अदालत में जाते ही यह मामला हम दोनों हारे हैं। यह हारे हुए दो पक्षों की सुनवाई थी, जो दो पक्ष भी नहीं हैं। इसलिए कि राम सिर्फ हमारे नहीं हैं। आपके भी उतने ही हैं, क्योंकि यह देश सिर्फ हमारा नहीं है।

आपने भी यहीं जन्म लिया है। यहीं दफन होना होना है। मंदिर हम दोनों ने मिलकर बनाया था। मिलकर भी क्यों? जिन्होंने मंदिर बनाया था, वे एक ही थे। हमारे पुरखे, आपके पुरखे अलग नहीं थे। अगर वे कहीं से यह सब तमाशा देख रहे होंगे तो क्या सोचते होंगे? वे हम पर हंसते होंगे। आप पर रोते होंगे।

अयोध्या हम सबकी है। राम हम सबके हैं। यह देश हम सबका है। इतिहास से बेखबरी अलग पहचान को पुख्ता बनाने का वहम पैदा करती है। इस देश का सबसे ज्यादा नुकसान जिस सेक्युलरिज्म ने किया है, उतना तो 800-1000 साल के विदेशी हुक्मरानों ने गुलाम बनाकर भी न किया होगा।

कम से कम उनका मकसद तो साफ था। उनके समय यह तो तय था कि हम उनके गुलाम हैं। वे हम पर राज करते हैं। जब चाहेंगे मंदिरों को मिट्‌टी में मिला देंगे। जहाँ चाहेंगे हमें बेइज्ज़त कर देंगे। जहाँ मर्जी होगी, पहचानें बदल देंगे। जितना चाहेंगे लूट लेंगे। खफा हुए तो कत्लेआम मचा देंगे। कोई क्या बिगाड़ लेगा।

वे सुलतान थे। वे बादशाह थे। वे नवाब थे। वे निजाम थे। वे गर्वनर जनरल थे। वे वायसराय थे। उनके हाथों में तलवारें थीं। तोपें थीं। बंदूकें थीं। चाबुक थे। कोड़े थे। उनके सामने जो थे, वो हम थे। हम भी, आप भी। कोड़ों के निशान हम दोनों की पीठ पर हैं। चेहरों पर बदली हुई पहचानें चिपकी हुई हैं। तलवारों ने हम दोनों का ही खून बहाया है। तोपों के आगे हम दोनों के ही चीथड़े उड़े हैं। सलाखों के पीछे हम दोनों को ही डाला गया है।

हम इस देश के घायल अतीत के ऐसे किरदार हैं, जो अलग कभी थे ही नहीं। हम यहीं के थे। वे बाहर से आए थे। उन्होंने यहाँ कब्जे किए। एक के बाद दूसरे ने कब्जे किए। हम पर जुल्म किए। हममें से कुछ की पहचानें बदल दीं। कई लोग अपनी पहचानें बचाने के लिए भागते रहे। बदली हुई पहचान तो एक नाम है। उससे शिराओं में बहता खून थोड़े ही बदल गया। वह तो एक ही है। मिलाकर देख लो!

सेक्युलरिज्म ने उस घायल अतीत को अपने लालच से ढक दिया, जाे हमें यह याद दिलाता कि हम अलग नहीं हैं, एक ही हैं। सदियों तक हमारे अपमानित पुरखे एक ही थे। जिन्होंने यह माना कि हम एक नहीं हैं, अलग हैं। हमारे बीच कोई मेलजोल भी मुमकिन नहीं है। हम अपनी अलग हो चुकी पहचान के साथ बिल्कुल ही अलग हिस्सा चाहते हैं।

ऐसा हुआ भी। सन् 47 में वे अलग हो गए। सरहदें खींच लीं। अलग पहचान के साथ अपना मुल्क बना लिया। जिन्ना ने उसे पाकिस्तान कहा। हालाँकि जिन्ना खुद दो पीढ़ी पहले बदली हुई पहचान का एक बदकिस्मत किरदार था। सिर्फ दो पीढ़ी। 100 साल के भीतर उनके दादा और पिता के नाम क्या थे? कहाँ अलग थे?

यह सिर्फ समय के फासले की बात है। जिन्ना दो पीढ़ी पहले हिंदू ठक्कर थे। कोई चार पीढ़ी पहले कुछ और था। कोई छह पीढ़ी पहले अलग कर दिया गया। किसी को सात पीढ़ी हो गई होंगी। उसके पहले तो सब यहीं थे। अलग कौन किससे था? किसने अलग कर दिया? कैसे अलग हो गए? क्या ब्लड ग्रुप बदल गया? क्या दो की जगह तीन किडनियाँ हो गईं? क्या आँखें कुछ और देखने लगीं? कानों को अलग सुर सुनाई देने लगे? दिल ने अलग तरह से धड़कना शुरू कर दिया?

राम 8-10 पीढ़ियों की इस भटकन के भी हज़ारों साल पहले से हमारे हैं। अयोध्या हमारी है। हमारे पुरखों ने ही उनकी कहानियाँँ हम तक पहुँचाई हैं। उन्होंने बेशकीमती बुत बनाए। हैरतअंगेज़ बुतखाने खड़े किए हैं।

ये तोड़फोड़ तो चंद सदियों की खटपट है। वे बेहूदे जाहिल लोग बाहर से आए और बुतखाने तोड़कर इबादतगाहें बना दीं। तलवार हाथ में थी। वहीं के रामआसरे को रिजवान बना दिया। रामआसरे पहले बुतखानों में पूजा करता था। रिजवान हो गया तो उन्हीं इबादगाहों में जाने लगा। अब वह कहता है कि यह हमारी इबादतगाह है। हम कहते हैं तुम राम आसरे हो। कुलजमा यही मामला है।

कोई कैसे राम की जन्मभूमि पर अदालत में लड़ सकता है? अगर ऐसा हुआ है तो ‘असल मेमोरी’ से ‘डिस्कनेक्ट’ ही तो है। थोड़ी देर के लिए कनेक्ट होकर सोचिए। सबको अपने भीतर राम ही झिलमिलाते नज़र आएँगे। तब थोपी गई पहचानें पल भर में झड़ जाएँगी। आँख से आँसू झर निकलेंगे। हम सब अपने किए पर शर्मिंदा होंगे।

इसी मिट्‌टी में हम सबकी पीढ़िया पली हैं। यहीं की मिट्‌टी में मिली हैं। जो कुछ भी भोगा-भुगता है, वह सब हमारा है। न कोई जीता है, न कोई हारा है। अपनों से कोई क्या जीतेगा, अपनों से कोई क्या हारेगा। लेकिन हम अपनों से ही हारे हैं। हमें कोई क्या हराता। अपनों के फरेब ने हर सदी में हमें घायल किया है। लहूलुहान किया है। वे फरेबी कभी सुलतान बनकर आए, कभी सेक्युलर वेश में।

देश के टुकड़े करके भी जिन्हें चैन न मिला, वे मतलबी आज़ादी मिलते ही चंद सदियों की अलग पहचान को बिल्कुल ही अलग करने में लग गए। वे अलगाव को पोसते रहे। आप इस वहम में पड़ गए कि हम वाकई अलग हैं। हमारी पहचानें अलग हैं। आपको पता ही नहीं चला और उन फरेबियों ने आपको ‘वोट बैंक’ बना दिया।

एक समझदार और जिंदा समाज पर ‘वोट बैंक’ का शर्मनाक तमगा टंग गया और अयोध्या में अटके किसी जिलानी, गिलानी, अंसारी और धवन के चेहरे पर शिकन तक नहीं आई। सेक्युलरिज्म के नाम पर वोट बैंक पर डाके का एकाधिकार उन सियासी फरेबियों का ही बना रहा।

कब से यह डकैती चल रही है? डकैतों के ये गिरोह दिल्ली से लेकर हर सूबे में फैले रहे हैं। उन्होंने आपको कहीं का नहीं छोड़ा। जो राम की संयुक्त विरासत से टूटे और सेक्युलर फरेबियों के छलावे में अपनी अलग पहचानों का दम भरते हुए सरहद पार गए, वहां उनके मुंह पर सरेआम पड़ी “मुहाजिर’ की गाली सारी दुनिया ने सुनी।

कितने रंज की बात है। कितना अफसोसनाक है। हम कहाँ हो सकते थे, कहाँ पहुँच गए। रगों में बहता एक ही खून एक-दूसरे के खून का प्यासा हो गया। 10 सदियों से यह खून बह रहा है। सरहदें लहूलुहान हैं। हम सबका अतीत एक है। अतीत में हम सब एक हैं।

जो भी खूबियाँ थीं, हमारी थीं। जो भी खामियाँ थीं, हमारी थीं। जो भी गलतियाँ थीं, हमारी थीं। कोई गलती ऐसी नहीं, जो सुधर न सके। कोई खामी ऐसी नहीं, जो दुरुस्त न हो सके। हमारी गलतियों और हमारी खामियों का फायदा उन फरेबियों ने उठाया, जो बाहर के थे।

आज़ादी के बाद फरेबियों का ‘स्थानीयकरण’ हो गया। अब वे हमारे ही बीच के थे, जिन्हें न दया थी, न शर्म। वे लुटे हुओं को लूट रहे थे। वे मरे हुओं को मार रहे थे। अब तोप, तलवार, बंदूक और कोड़े नहीं, मीठे घोषणा-पत्र थे। भाषण थे। वादे थे। मगर उनके मन उतने ही काले थे।

जो भी हो, अदालत का फैसला एक मौका है। खामोश होकर खुद को आइने में देखने का एक सुनहरा मौका। हम खुद को देखें। अपना चेहरा देखें। पहचानने की कोशिश करें। खुद को भी और फरेबियों को भी। हम अपनी असल पहचान को खोजें।

वह वक्त की परतों में छिपी है। गायब तो कतई नहीं है। वक्त की परतों के पार इस देश की कोई सरहद नहीं है। कोई अलग पहचान नहीं है। शांति, अहिंसा और त्याग की ही चमकती पहचान है। वह हम सबकी है।

उसके पीछे राम की कहानियाँ हैं। राम अयोध्या के थे। वहीं पैदा हुए थे। हाथों में आई सत्ता को छोड़कर 14 साल जंगलों में भटके थे। जंगल के जीवन की भी कई कहानियाँ हैं। दोस्ती की कहानियाँ। रिश्तों की कहानियाँ। भलाई की कहानियाँ। वे लौटकर अयोध्या ही आए थे।

सब कुछ स्मृतियों में भी शेष है, मंदिरों के मलबों पर खड़े हज़ारों ढाँचों में भी। राम एक ऐसा दीया हैं, जो कभी बुझ ही नहीं सकता। जिन्होंने सदियों तक मंदिर तोड़े, वे सब मिटकर मिट्‌टी में मिल गए। उनकी विषैली विरासत को कोई क्यों थामे हुए है?

और राम कहाँ खत्म हुए‌? वे तो हमारे भीतर जगमग हैं। संसार उनकी मिसालें देता है। अब अदालत का फैसला जो भी हो, वह न हमारी विजय है, न आपकी पराजय। हम आमने-सामने के दो पक्ष नहीं हैं। हम एक ही हैं। एक ही थे। राम हम सबके हैं। अयोध्या हम सबकी है। हमारे पुरखे एक थे।