विचार
त्रेतायुग के राम और कलयुग की अयोध्या

भारत के ज़ख्मों से भरे इतिहास की एक धूलधूसरित कड़ी है अयोध्या। अंधेरे अतीत में एक रोशन मशाल जैसी, जो अपने बीते हुए कल की एक शानदार झलक दिखाती है। अयोध्या की स्मृतियों में क्या-क्या दर्ज होगा? दशरथ के महलों में राम की पहली किलकारी अयोध्या को याद होगी। कौशल्या की गोद में वे रथ पर सवार होकर अयोध्या के राजमार्गों से निकले होंगे। ठुमककर चलते राम के नन्हें पैरों की पदचाप और पायलों का बजना सरयू नदी के तटों ने सुना ही होगा। सरयू ने युवा होते राम को भी कभी किसी किनारे पर मौन में बैठे देखा होगा। राम ने अपने भविष्य की भूमिका पर यहीं-कहीं कुछ सोचा-विचारा होगा। राम के समय की अयोध्या कैसी होगी? वनवास के लिए प्रस्थान करते हुए राम को देखकर अयोध्या पर क्या बीती होगी और जब चौदह साल के वनवास के बाद वे लौटे होंगे तो अयोध्या में क्या दृश्य रहा होगा? आज अगर राम अपनी अयोध्या में आकर देखें तो उनके मन में क्या भाव आएँगे?

अयोध्या की अंतहीन कहानी में कौन जाने कितने अध्याय हैं। कितने किरदार हैं। एक तरह से अयोध्या की आहत स्मृतियाँ उतनी ही पुरानी हैं, जितनी भारत की। अयोध्या जब कुछ कहेगी तो अपने आसपास कुछ वाराणसी से भी पूछेगी, कुछ प्रयागराज से भी कानाफूसी करेगी और मथुरा के पास भी कहने-बताने को उतना ही कुछ होगा। श्रावस्ती से लेकर कौशंबी और सारनाथ भी कई किस्से लेकर आएँगे। मगर इनके वैभव के अध्याय सदियों पहले खत्म हो चुके हैं। ये सदियों के सताए हुए शहर हैं। गंगा, यमुना और सरयू के तटों पर इन बस्तियों ने अपने सबसे चमकदार दौर भी देखे और फिर गहरी अमावस में भी दाखिल हुए।

भारत की एक हजार साल की गुलामी सिर्फ बेरहम बहेलियों की हुकूमत का ही स्याह दौर नहीं था। दस सदियों के बाद जब यह दौर गुजरा तब तक यह देश तीन टुकड़ों में टूट-फूटकर दुनिया के सामने आया। अयोध्या देखकर सहमी होगी। इस टूटफूट में उसके लिए कुछ भी नया नहीं था। अयोध्या की भूमिगत परतों में टूट-टूटकर बिखरी हुई अनंत स्मृतियाँ हैं। राम तो युगों पुरानी कथाओं में अपनी जगह बना चुके थे और उनकी अयोध्या का नाम भी उनके साथ अटूट और अमर हो चुका था। राम तो अपने हिस्से की भूमिका पूरी कर कब भारत की चेतना में जा समाए, कोई नहीं जानता। लेकिन अयोध्या कहाँ जाती? उसे तो यहीं रहना था। भारत की कष्टप्रद यात्रा का एक पड़ाव अयोध्या भी बनी रही। जो कुछ भारत ने अपने हर हिस्से में भोगा-भुगता, अयोध्या के हिस्से में भी वही आया। अयोध्या कैसे बचती और कब तक बचती?

सातवीं सदी में सिंध की सरहदों के लहूलुहान होते ही सामने अखंड भारत वहशियों के निशाने पर आ चुका था। ग्यारहवीं सदी तक लूटपाट और हमलों की बेरहम दास्तानें दिल्ली से कन्नौज और श्रावस्ती तक पसरने लगी थीं। अयोध्या ने उन लुटेरे और खूनी काफिलों को अपने आसपास से धूल उड़ाते और खून बहाते हुए अवश्य ही देखा होगा। एक दिन दिल्ली में चंद खरीदे हुए गुलाम काबिज़ हुए और भारत के आसमान पर सदियों तक चलने वाला ग्रहण फैल गया। दूर होकर भी अयोध्या तक ये बदली हुई हवाएँ आई होंगी। लेकिन 500 साल बीतने के बाद बाबर नाम के एक और लुटेरे हमलावर का नाम अयोध्या से जा चिपका।

(Photo by Shankar Mourya/Hindustan Times via Getty Images)

विष्णु हरि के एक प्राचीन और भव्य मंदिर की रौनक उस दौर में भी अयोध्या को राम की स्मृतियों से तरोताज़ा रखती होंगी। यह गढ़वाल वंश के राजा गोविंदचंद्र ने बनवाया था। देश के अनगिनत राजवंशों ने हर सदी में अयोध्या में कुछ न कुछ जोड़ा था। मंदिर, घाट और धर्मशालाएँ बनवाईं थीं। मगर एक समय अयोध्या में कुछ टूटा। कुछ बिखरा। कुछ खत्म हुआ। मलबे में से कुछ नया खड़ा हुआ। अब मंदिर नहीं एक ढाँचा था, जो साढ़े चार सौ साल तक अयोध्या में सीना तानकर खड़ा रहा। इसके साथ राम नहीं, बाबर का नाम था। आज़ाद भारत में यह ढाँचा एक विवाद के रूप में अदालत में जा अटका, जहाँ न्यायालयीन श्रमिक छानबीन करके सच को तलाशने में लग गए। साठ साल तक दो पीढ़ियों के इंतजार के बाद लखनऊ से एक फैसला आया। फिर मामला दिल्ली में जा अटका।

स्वराजप्रकाश गुप्त और ठाकुरप्रसाद वर्मा पुरातत्व के जानकार हैं। अयोध्या के कई कोनों में उन्होंने खुदाइयाँ की हैं। दस्तावेज खंगाले हैं। एक किताब उन्होंने लिखी-अयोध्या का इतिहास एवं पुरातत्व, ऋग्वेद काल से अब तक। इस किताब में उन्होंने 70 से ज्यादा तस्वीरें छापीं। ये किसी मंदिर के टुकड़ों की शानदार तस्वीरें हैं। ये टुकड़े उन्हें ढाँचे के आसपास जमीन की परतों में मिले थे। इनमें एक शिलालेख भी था, जिसमें यह खुलासा हुआ कि ढाँचे की जगह पर बने मंदिर को किसने और कब बनवाया था। यह ढाँचा एक लावारिस और वीरान इमारत की शक्ल में था, जो मंदिर की जगह पर खड़ा था। इसकी वजह से अंग्रेजों तक 78 जानलेवा झगड़ों का रिकॉर्ड भी अयोध्या की याददाश्त में है।

अयोध्या में क्या था और क्या हुआ था, इसका पता बहुत लोगों को न चल पाता लेकिन एक रथयात्रा ने आहत अयोध्या का यह अध्याय दुनिया के सामने जाहिर कर दिया। वह लालकृष्ण आडवाणी की सोमनाथ से निकली रथयात्रा थी। भारत के गाँव-गाँव और गली-गली में कई जोशीले नारे गूंज उठे थे। वह यात्रा तो अधबीच में रोक दी गई थी लेकिन अयोध्या का आँसू भारत के गालों पर ढुलक गया था। दिसंबर 1992 में वह 500 साल पुराना ढाँचा बेकाबू भीड़ ने जमीन पर ला दिया।

अयोध्या में लेखक विजय मनोहर तिवारी

मैंने अयोध्या जाकर कई बार यहाँ की खामोशियों को सुना है। जर्जर इमारतों और उजाड़ टीलों को टटोला है। लोगों से मिला हूँ। आठ साल पहले जिस दिन पहला फैसला हाईकोर्ट से आया, उस दिन अयोध्या की सुनसान गलियों में लोगों ने बड़े गर्व से बताया था कि छह दिसंबर को वे कहाँ थे और गिरते हुए ढाँचे के ईंट-पत्थरों को लेकर भागे थे। मलबे के वे हिस्से ऐतिहासिक धरोहर की तरह घरों में सुरक्षित रखे गए थे। उस विध्वंस को लेकर कोई यहाँ अफसोस से भरा नहीं था। अयोध्या वालों के लिए यह एक पुराना हिसाब था, जिसे चुकता किया जा चुका था। जहाँ तक दंगों का सवाल था, अयोध्यावासियों की नजर में इस या उस कारण से दंगे होते ही रहे थे। 78 खूनी लड़ाइयाँ राम जन्मभूमि की मुक्ति को लेकर हो चुकी थीं।

अयोध्या ने अपने राम को एक बदशक्ल टेंट में पनाह लेते देखा, जहाँ एक पुरोहित और अनगिनत पहरेदार थे। दुनिया भर के करोड़ों भारतीयों के आराध्य मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम को इस सरकारी पनाहगाह में देखना हमेशा ही अजीब था। मैं जब भी अयोध्या के बेहद कड़े सुरक्षा इंतजामों, बारीक जाँच-पड़ताल और तलाशी के बाद इस टेंट के सामने आया, लज्जित भाव से ही आया। किस मुँह से राम से आँखें मिलाते। अब यह देश गुलाम नहीं था। सुलतानों और बादशाहों को कब्रों में सोए वक्त बीत चुका था। देश की सरहदों पर बटवारे के ताजे जख्म थे। मगर अयोध्या के लिए वक्त 500 सालों से ठहरा हुअा ही था। मंदिर बनाने की कोशिशों में तराशे गए पत्थर रखे-रखे काले पड़ रहे थे। यह एक सपने के कलपुरजे थे। जब यह सपना पूरा होगा तो ये टुकड़े एक मंदिर की शक्ल ले लेंगे। लेकिन आज की अयोध्या में राम की कोई अनुभूति नहीं थी। यह कस्बा एक अजीब सी नकारात्मक ऊर्जा से सराबोर था। दुष्ट राजनीति की एक भरी-पूरी चारागाह।

अयोध्या की पुरानी इमारतों का रखरखाव बेहद ही खराब था। ज्यादातर दीवारें झड़ रही थीं या उन पर काई की काली पपड़ी जमी थी। कई दशकों से इनकी सफाई और पुताई तक नहीं हुई थी। राम की नगरी में यह क्या माजरा था? मुझे हर बार यह ताज्जुब होता था कि पंडे-पुजारी, मालदार ट्रस्टियों और मुनाफाखोर कारोबारियों को कभी अयोध्या का यह उजाड़ वर्तमान खटकता क्यों नहीं था? अयोध्या की करीब 70 हजार आबादी में सात हजार मुसलमान हैं और 70 मस्जिदें होंगी। इन मुसलमानों के घरों का चूल्हा भी राम भक्तों के कारण जलता है। अयोध्या में दुनिया भर से लोग सिर्फ राम के नाम से ही आते हैं। कुछ मुसलमानों ने ही बताया कि ज्यादा से ज्यादा 30 मस्जिदों में ही नमाज होती होगी। बाकी सब ढाँचे की शक्ल में गिरने की कगार पर खड़ी हैं। बाबरी ढाँचा भी इनमें ही शामिल था। सिर्फ बाबर ही नहीं शाहजहाँ और आैरंगजेब के नाम के जर्जर ढाँचे भी संकरी गलियों और घाटों के पीछे से झाँकते हैं। अयोध्या में बीस मजार-मकबरों की सूची नौ गजी मजार के बाहर टंगी देखी। बाबरी ढाँचे के नाम पर एक्शन कमेटी की सियासत से मुसलमान बेहद ख़फ़ा रहे हैं।

इस केस से जुड़े दो किरदार देश भर में मशहूर हुए। एक रामजन्म भूमि न्यास के पूर्व प्रमुख रामचंद्रदास परमहंस और दूसरे पांजी मोहल्ले के हाशिम अंसारी। एक मंदिर के पक्षधर, दूसरा मस्जिद का पैरोकार। परमहंस से मैं दो बार मिला था। वे अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में बहुत मायूस थे। उन्हें अफसोस था कि एक स्वयंसिद्ध केस का फैसला वे अपने जीते-जी नहीं देख पाएँगे। वही हुआ। बूढ़े हाशिम को भी कोई उम्मीद नहीं थी कि वह कोई अंतिम फैसला देख पाएगा।

सितंबर 2010 में हाईकोर्ट के फैसले की उस शाम फ़ैज़ाबाद रेलवे स्टेशन वीरान था। ट्रेनें खाली थीं। हम मोबाइल फोन की रोशनी में टटोलते हुए डिब्बे में सवार हुए थे। हर स्टेशन पर भयावह सन्नाटा पसरा था। आंखों में अयोध्या अब तक तैरती है। हजारों साल पुरानी एक ऐसी बसाहट, जिसकी अनंत स्मृतियों में राम सबसे ऊपर और सबसे भव्य हैं। लेकिन राम के आदर्श राज्य और उनकी महान भूमिकाओं की कोई खुशबू यहाँ नहीं थी। सब कुछ कड़वे विवादों की भेंट चढ़ाया जा चुका था। अयोध्या से लौटते हुए जेहन में गोधरा का जलता हुआ ट्रेन का डिब्बा धधक रहा था। लपटों से घिरा, जिसमें अयोध्या से लौट रहे लोग जिंदा जल मरने के पहले आखिरी होश रहने तक अपने प्राणों की रक्षा के लिए चीखते रहे होंगे। गुलामी से छुटकारा पाने के बावजूद भारत में स्वतंत्रताबोध अपनी जड़ें नहीं जमा सका। हम अपने ही अतीत से कटे हुए खड़े हैं। देश टुकड़े-टुकड़े होने के बावजूद अपने पौराणिक महानायकों के लिए एक इमारत बनाने के लिए सात दशक से मोहताज है और किसी काे लज्जा नहीं है। न हिंदू नेताओं को, न मुसलमानों को, जिनके पुरखे भी कभी गुलामी में अपमान झेलते हुए अपनी पहचानें बदलने को विवश हुए होंगे।

हर बार लौटते हुए लगा कि राम की अयोध्या वही है। मगर यह त्रेता युग नहीं, कलयुग है। राम अयोध्या के अतीत की कहानियों में जगमगा रहे हैं। कलयुग पूरे भारत में अपने अंधेरे से जूझ रहा है।

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक। उनकी छः पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com