विचार
लॉकडाउन के विफल होने का राहुल गांधी का दावा संदेहास्पद

कुछ दिवस पूर्व राहुल गांधी ने ट्विटर पर कुछ चार्ट डाले थे जो भारत और यूरोप के लॉकडाउन की तुलना कर रहे थे। चार्ट में दर्शाया गया कि भारत ने वायरस संक्रमण के बढ़ने के बावजूद लॉकडाउन समाप्त कर दिया जबकि यूरोप के लॉकडाउन तब खत्म किए गए जब संक्रमण वक्र “समतल” होता जा रहा था।

इन चार्ट के शीर्षक में गांधी ने लिखा, “एक विफल लॉकडाउन ऐसा दिखाता है।” इस ट्वीट में भारत,जर्मनी, स्पेन, ब्रिटेन और इटली के चार्ट सम्मिलित किए गए थे।

हो सकता है कि गांधी की बात में कोई दम हो या हो सकता है ये बातें खोखली हों। लेकिन हमें काफी समय बाद ज्ञात होगा कि क्या यह लॉकडाउन सच में “विफल” था अथवा नहीं क्योंकि इस समय भारत के प्रदर्शन का निर्णय करना शीघ्रता होगी। इसके कई कारण हैं।

पहला, भारत के कई प्रमुख राज्यों और शहरों में लॉकडाउन समाप्त नहीं हुआ है। भले ही राष्ट्रीय स्तर पर कोई लॉकडाउन नहीं है जिसका विस्तार हर गाँव, हर जिले, हर नगर तक हो लेकिन भारत के काफी भाग में यह अभी तक व्याप्त है। एक तरफ जहाँ हम कह सकते हैं कि देश में लॉकडाउन खत्म कर दिया गया है, वहीं कई स्थान अभी भी लॉकडाउन के अधीन ही हैं।

हमने कड़े राष्ट्रीय लॉकडाउन को चतुर स्थानीय लॉकडाउन से बदल दिया है। अब शहर और राज्य हमारी लड़ाई का नेतृत्व कर रहे हैं, वहीं केंद्र केवल अनलॉक के दिशानिर्देश और नियम जारी कर रहा है।

दूसरा, क्या यह संभव नहीं है कि हमने जानबूझकर जीविका को जीवन से ऊपर रखना शुरू कर दिया है, भले ही प्रभावी रूप से ऐसा कहा नहीं गया है। धनवान पश्चिम निरंतर लॉकडाउन जारी रख सकता है और लोग केवल इसके कारण अधिक संख्या में निर्धन भी नहीं होंगे।

भारत में हम बेरोजगारी और निर्धनता को झेल पाने में सक्षम नहीं हैं। अनलॉक1.0 को मैं जीविका को प्राणों से ऊपर रखने के रूप में देखता हूँ, विशेषकर तब जब लॉकडाउन के शुरुआती महीनों ने हमें बता दिया है कि इस वायरस अधिक संख्या में मृत्यु नहीं हो रही है।

ट्यूबरकुलोसिस, डायबिटिस और हृदय रोग से कम नुकसान ही इस महामारी ने पहुँचाया है। यहाँ तक कि मौसमी बुखार और मानसून के कारण होने वाले रोग भी कई बार देश के कुछ भागों में इससे अधिक घातक सिद्ध हो जाते हैं।

तीसरा, उपरोक्त चार्ट दिग्भर्मित करने वाले क्यों हैं इसका एक और महत्त्वपूर्ण कारण है- भारत प्रभावी रूप से एक महाद्वीप है। जनसंख्या के मामले में यह यूरोपीय संघ (इंग्लैंड को छोड़कर) से तीन गुना बड़ा है।

तीन भारतीय राज्यों- उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार- की जनसंख्या का योग 48.6 करोड़ है जो यूरोपीय संघ की 44.6 करोड़ जनसंख्या से अधिक है। इस प्रकार अगर तर्कसंगत तुलना करनी हो तो यूरोपीय संघ के देशों के साथ भारतीय राज्यों की तुलना की जानी चाहिए, न कि पूरे भारत की।

चौथा, जब हम संक्रमितों की संख्या की बजाय मृतकों की संख्या देखें तो पूरा दृश्य बदल जाता है। जॉन हॉपकिन्स विश्वविद्यालय के डाटा के अनुसार प्रति 10 लाख लोगों में मृतक संख्या में यूनाइटेड किंग्डम शीर्ष पर 61 अंक के साथ था, इटली और यूएस में क्रमशः यह आँकड़ा 56 और 34 का है।

यूरोप में कोविड-19 के विरुद्ध सर्वेश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले जर्मनी में भी 8,783 लोगों की मृत्यु हो चुकी है और प्रति 10 लाख जनसंख्या में उनका मृत्यु आँकड़ा 12 का है। और बेहतर प्रदर्शन करने वाले दक्षिण कोरिया, जिसे कोविड-19 से लड़ने के मॉडल के रूप में भी प्रस्तुत किया जा रहा है, में 273 मौतें हुईं जो प्रति 10 लाख में मृत्यु के आँकड़े को 5.4 पर ले जाता है।

और भारत की मृत्यु दर? मात्र 0.53 प्रति 10 लाख। भारत में टेस्टिंग कम होने और 80 प्रतिशत मामलों में लक्षण न देखे जाने के कारण संक्रमितों की संख्या कमतर बताई जा सकती है लेकिन मृतकों के आँकड़े नहीं छुपाए जा सकते। इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि हमने काफी जल्दी लॉकडाउन समाप्त कर दिया बल्कि यह कहा जा सकता है कि राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन हमने काफी जल्दी लागू कर दिया। और अब इसी गलती को सुधारा जा रहा है।

पाँचवा, भारत में भी कुछ राज्य- केरल, कर्नाटक, हरियाणा, उत्तराखं, पंजाब, हिमाचल प्रदेश और ओडिशा- वायरस को नियंत्रित करने में अच्छा प्रदर्शन दिखा चुके हैं लेकिन अब वे वायरस की दूसरी लहर के साक्षी बन सकते हैं क्योंकि लॉकडाुन नियमों में छूट दी गई है और लोग अब आ-जा सकते हैं।

गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश के चिंताजनक ट्रेंड अब उलटे हो रहे हैं क्योंकि स्वस्थ होने वाले रोगियों की संख्या तेज़ी से बढ़ रही है। कुछ राज्यों (कर्नाटक, उत्तराखंड और राजस्थान) में स्वस्थ होने वाले रोगियों की संख्या संक्रमण के नए मामलों से भी अधिक है। केवल महाराष्ट्र, दिल्ली और तमिलनाडु चिंता का विषय बने हुए हैं लेकिन बड़ी संभावना है कि यह मामलों के आखिरी शिखर हों।

कोविड-19 के आँकलन और इससे निपटने की भारतीय मुद्रा की सही आलोटना यह होगी- हमने राष्र्व्यापी लॉकडाउन थोड़ा जल्दी लागू कर दिया बल्कि हमें इसे सबसे खतरे वाले शहरों और जिलों तक सीमित करने का प्रयास करना चाहिए था।

1 जून से शुरू हुआ अनलॉक 1.0 इसी गलती को सुधारने के लिए है और इसका अर्थ यह हुआ कि हम कुंद हथियार से सर्जिकल स्ट्राइक की ओर बढ़ रहे हैं। मूर्ख लॉकडाउन से चतुर लॉकडाउन की ओर।

यह अवश्य है कि यूरोप की उच्च संक्रमण और मृत्यु दर ने हमारी सरकार को शीघ्र लॉकडाउन करने के लिए प्रेरित किया होगा ताकि विनाश को रोका जा सके  क्योंकि तब हमारे पास बड़ी संख्या के संक्रमण के लिए न टेस्टिंग और न स्वास्थ्य सुविधाएँ थीं, न ही ऐसा डाटा था जिससे अनुमान लगाया जा सके कि भारत इससे कितना प्रभावित होगा।

अप्रैल के अंत तक लॉकाुन के शुरुआती दो चरण हमें तैयारी करने का अवसर देने के लिए थे और अगले दो नुकसानदायक सिद्ध हुए क्योंकि अनावश्यक रूप से जीविकाओं पर दुष्प्रभाव पड़ा।

मई का महीना, जब प्रवासी बड़ी संख्या में अपने घरों की ओर लौटने लगे थे, जीविका को प्राणों से ऊपर रखने की समझ देने के लिए निर्णायक सिद्ध हुआ, विशेषकर कम मृत्यु दर के हमारे अनुभव के आधार पर।

जब डाटा आया तब अनलॉक का निर्णय लिया जा सका जबकि मार्च में जब राष्ट्रीय लॉकडाुन लागू किया गया था तब हमारे पास कोई डाटा नहीं था, केवल यूरोप की जानकारी हमारे पास थी जो अनुकूल चित्र प्रस्तुत नहीं करती थी। हम दक्षिण कोरिया का मॉडल अपना सकते थे लेकिन भारत कीविविधता के आगे ऐसा कर पाना कठिन होता।

इस प्रकार यदि तत्कालीन जानकारी के आधार पर देखा जाए तो न लॉकडाउन और न अनलॉक तर्कहीन निर्णय हैं।

एक चेतावनी- लॉकडाउन नियमों में छूट दिए जाने पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने वायरस की दूसरी लहर के लिए चेताया है जब पूरे विश्व को पुनः जीविका और जीवन के बीच किसी एक को चुनने का निर्णय लेना होगा। लेकिन अगली बार निर्णय लेने में आसानी होगी।

राहुल गांधी को ये बातें कहीं और फैलानी चाहिए।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं। अंग्रेज़ी से हिंदी अनुवाद निष्ठा अनुश्री द्वारा।