विचार
पंजाब के किसान क्यों कृषि सुधारों के विरोध में आढ़तियों का समर्थन कर रहे हैं

नरेंद्र मोदी सरकार ने सितंबर में संसद में जिन तीन विधेयकों को पास करवाकर कृषि सुधार लाने का प्रयास किया, उनका पंजाब में खूब विरोध हो रहा है। तीनों कानूनों- कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम 2020, मूल्‍य आश्‍वासन पर किसान समझौता और कृषि सेवा अधिनियम 2020 तथा आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम 2020- को कृषि क्षेत्र का खेल परिवर्तक माना जा रहा है।

व्यापार और वाणिज्य अधिनियम किसानों को अनुमति देता है कि वे अपना उत्पाद देश में कहीं भी, किसी को भी बेच सकें। मूल्य आश्वासन अधिनियम किसानों को अपनी सहूलियत के अनुसार उसी की भाषा में किए गए अनुबंध पर आधारित खेती करने देता है और आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम उन्हें भंडारण सीमाओं की चिंता किए बिना अपने उत्पाद बेचने की अनुमति देता है।

कोरोनावायरस महामारी के दौरान आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए सरकार आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत इन कृषि सुधारों को भी लेकर आई। कृषि लागत और मूल्य आयोग के पूर्व आयुक्त अशोक गुलाटी ने इन सुधारों को पीवी नरसिम्हा राव द्वारा 1991 में लाए गए आर्थिक सुधारों के तुल्य कहा था।

अन्य कई कृषि विशेषज्ञों और अर्थशास्त्रियों ने इन सुधारों का स्वागत किया है। हालाँकि, कांग्रेस और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) छोड़कर जाने वाली शिरोमणि अकाली दल जैसी राजनीतिक पार्टियों ने इन सुधारों का विरोध किया है लेकिन उनके अपने कारण हैं।

“यदि ये कृषि सुधार अपेक्षित परिणाम दिखाते हैं तो कांग्रेस, अकाली दल और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ग्रामीण क्षेत्रों में अपनी पकड़ खो देंगे। इनके कई नेताओं का कृषि उत्पाद बाज़ार समितियों (एपीएमसी) पर अच्छा-खासा प्रभाव है। ‘एक देश, एक बाज़ार’ के सिद्धांत पर आधारित इन कृषि सुधारों का इनपर प्रभाव पड़ेगा।”, मुंबई में स्थापित एक कृषि बाज़ार विशेषज्ञ ने अनाम रहने की शर्त पर बताया।

सरकार के आलोचकों ने यह भय खड़ा किया है कि एपीएमसी का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा और न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय करने वाली नीति रोक दी जाएगी तथा सरकार गेहूँ व चावल नहीं खरीदेगी। हालाँकि, सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि नए बाज़ार मंचों के साथ-साथ एपीएमसी का भी अस्तित्व रहेगा।

किसानों के विरोध प्रदर्शन के बाद सरकार ने एमएसपी पर लिखित आश्वासन देने की बात भी कह दी है और कहा है कि अनाज की सरकारी खरीद उसी तरह से जारी रहेगी। इसके बावजूद मुख्य रूप से पंजाब और कुछ हरियाणा के किसानों को केंद्र सरकार पर विश्वास नहीं है।

27 नवंबर से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में विरोध प्रदर्शन जारी है और माँग है कि तीनों कृषि कानूनों को वापस लिया जाए। केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने किसान संगठनों के साथ छह सत्रों में वार्ता की है लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुई है। “पंजाब के किसानों को कृषि सुधारों का विरोध करने के लिए आगे करके आढ़तिया इनके पीछे छुपे हुए हैं।”, नई दिल्ली में आटा चक्की के मालिक राज नारायण गुप्ता ने कहा।

“आढ़तियों ने किसानों को फुटबॉल बना दिया है। राज्य सरकार भी यही कर रही है क्योंकि मंडी शुल्क और विकास शुल्क (3-3 प्रतिशत) के रूप में वह 6 प्रतिशत कमाती है।”, अखिल भारत चावल निर्यातक संघ के पूर्व उपाध्यक्ष विजय सेतिया ने बताया।

इसके अतिरिक्त भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) के आपातकाल भंडारण के लिए खरीदे जाने वाले चावल और गेहूँ के लिए केंद्र पर आढ़तिया कमिशन के रूप में 2.5 प्रतिशत देने का दबाव बनाया जाता है। हालाँकि इस बार केंद्र ने इसे स्थाई कमिशन पर खरीदा है लेकिन फिर भी यह एमएसपी का 2.3-2.4 प्रतिशत है।

सरकारी कोष का खर्च देखें तो केंद्र सरकार को 1 अक्टूबर से 22 दिसंबर के बीच 38,300 करोड़ रुपये की लागत से पंजाब में हुई 2.027 करोड़ टन धान की खरीद के लिए आढ़तियों को लगभग 1,000 करोड़ रुपये देने पड़े। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि विरोध प्रदर्शन का यही कारण है क्योंकि प्रतिवर्ष अनाज खरीद पर लगभग 1,500 करोड़ रुपये कमाने वाले आढ़तियों को इसे खोने का भय है।

इसके अलावा पंजाब सरकार को मंडी शुल्क और अनाज खरीद पर मिलने वाले विकास शुल्क क्रमशः 3,500 करोड़ रुपये और 5,000 करोड़ रुपये के राजस्व से भी हाथ धोना पड़ सकता है। इसके अलावा कुछ और कारण भी हैं।

जो पंजाब के व्यापारी उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों से सस्ती दर पर चावल व गेहूँ खरीदकर एमएसपी पर बेचते थे, उन्हें भी इससे हाथ धोना पड़ेगा क्योंकि अब कृषि सुधारों के कारण किसानों के पास अपने उत्पाद बेचने के मंचों का विकल्प होगा।

अन्य राज्यों से फसल खरीदकर पंजाब के किसानों द्वारा बेचने का साक्ष्य इस बात में है कि एफसीआई ने 2.028 करोड़ टन खरीफ खरीदी है जिससे 1.35 करोड़ टन चावल मिलेगा, जबकि हाल के वर्षों में पंजाब का अधिकतम उत्पादन 1.338 करोड़ टन रहा है।

यही प्रमुख कारण है कि आढ़तिया, अप्रत्यक्ष रूप से, चाहते हैं कि तीनों कृषि कानून वापस हों। लेकिन किसान, विशेषकर पंजाब के, क्यों उनका समर्थन कर रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार किसान उनका समर्थन इसलिए कर रहे हैं क्योंकि आढ़तिया ही उन्हें बीज खरीदने से लेकर फसल की कटाई तक आवश्यकता के अनुसार ऋण देते हैं।

किसानों को भय है कि आढ़तिया अब उन्हें ऋण देना बंद कर देंगे और आपातकाल की स्थिति में उन्हें समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। यह स्थिति तब भी है जब ये आढ़तिया किसानों को भारी ब्याज दर पर ऋण देते हैं।

“मैं आढ़तिया से ऋण लेता हूँ इसलिए मैं अपनी फसल किसी और को नहीं बेच सकता। मुझे ऋण देने का उसके पास एक ही कारण है कि मैं उसे अपनी फसल बेचता हूँ।”, गेहूँ बिक्री के मौसम में पंजाब स्थित एशिया की सबसे बड़ी अनाज मंडी में एक किसान ने लेखक को 10 वर्ष पूर्व की यात्रा के दौरान बताया था।

जलंधर के निकट एक दूसरे किसान ने बताया था कि परिवार के एक सदस्य को अस्पताल में भर्ती करवाने के लिए उसे पैसे चाहिए थे जो उसे आढ़तिया ने दिए। “खेती के लिए ऋण लेने कई बार हम बैंक गए हैं लेकिन वह प्रक्रिया मुश्किल और धीमी है। हमें वहाँ कई बार जाना पड़ता है।”, किसान ने बताया।

सेतिया ने बताया कि आढ़तिया किसानों को ऋण नकद और वस्तु, दोनों रूपों में देते हैं। “ये आढ़तिया किसानों को पर्ची देते हैं जिसके माध्यम से वे डीज़ल या रसायन या कपड़े खरीद सकते हैं। सब जगह भुगतान आढ़तिया के द्वारा किया जाता है।”, उन्होंने कहा।

उन्होंने यह भी बताया कि पंजाब की राज्य सरकारें लगातार अढ़तिया प्रणाली का समर्थन करती आ रही हैं। “कांग्रेस और अकाली दल ने आढ़तियों का कमिशन 1.5 से बढ़ाकर 2.5 प्रतिशत कर दिया है।”, सेतिया ने कहा। उद्योग से संबंधित अधिकारियों का मानना है कि इससे आढ़तियों को लाभ हुआ है और वे अब अपनी मन की चला सकते हैं।

सेतिया के अनुसार राजनीतिक दल अपने लाभ के लिए किसानों का शोषण कर रहे हैं। “जब असल मुद्दे आते हैं तो ये पार्टियाँ कुछ नहीं कर पातीं।”, उन्होंने कहा।उदाहरण स्वरूप 1988 में केंद्र ने बासमती चावल के निर्यात पर कर लगा दिया। इससे इसका मूल्य 500 रुपये प्रति क्विंटल से गिरकर 150 रुपये हो गया था।

जब पंजाब की कृषि अधिकारी शायमा मान के आगे यह मुद्दा उठाया गया तो उन्होंने आदेश जारी कर दिया कि 450 रुपये प्रति क्विंटल से अधिक दर पर बेचे जाने वाले बासमती चावल कर मुक्त होगा। “तुरंत बासमती चावल का दाम पहले जैसे हो गया और मामला निपट गया। इससे बासमती चावल का निर्यात हो सका। कई बार हमें ऐसी कार्रवाइयों की आवश्यकता होती है।”, सेतिया ने कहा।

2000 के दशक में किसी किसान ने विरोध नहीं किया जब सरकार ने कहा कि पुसा-1121 बासमती की किस्म को गैर-बासमती माना जाएगा। कृषि मंत्रालय की संयुक्त सचिव उपमा चौधरी ने वाणिज्य मंत्रालय से बात की। “आज पुसा-1121 भारत के बासमती निर्यात का 60 प्रतिशत भाग है।”, सेतिया ने कहा।

विशेषज्ञों का मानना है कि मोदी सरकार को कृषि सुधारों को बेहतर रूप में प्रदर्शित करना चाहिए। लेकिन साथ ही यह भी कहना है कि कांग्रेस और अकाली दल जैसी राजनीतिक पार्टियाँ व आढ़तियों ने ऐसा डर का माहौल खड़ा किया है कि वे उसपर विश्वास नहीं कर पा रहे जो उनकी सच में चिंता करता है। अधिकांश विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों को मनाने के सरकार के प्रयासों को सफलता अवश्य मिलेगी।

स्वराज्य के कार्यकारी संपादक एमआर सुब्रमणि  @mrsubramani के माध्यम से ट्वीट करते हैं।