विचार
पुलवामा की व्यथा- सब वैसे ही चलता रहेगा या कुछ बदलेगा?

मै व्यंग्य लिखता हूँ। मेरी लेखनी को व्यंग्य लिखने में अधिक परिश्रम नहीं करना होता है। समाज मे इतना विरोधाभास है कि आप उसे बिना लाग-लपेट के लिख दे तो स्वत: व्यंग्य बन जाता है। व्यवस्था से निराशा व्यंग्य का निर्माण कर देती है। बुझते हुए अलाव से फूँक मार कर जली हुई आग व्यंग्य है, किंतु इसके लिए उसमें चिंगारी छुपी होना आवश्यक है। पूर्णतया बुझी हुई आग को हवा देने से राख ही उड़ती है। व्यंग्य निराशा में बन जाता है, हताशा में नहीं। मन व्यथित हो तो व्यंग्य नहीं बन पाता।

आत्माहुति देने वाले 39 बहादुरों के शव पर और पाशविक हिंसा पर क्या लिखा जा सकेगा। लिखने वाले लिख भी देते हैं। ऐसे कलमवीरों के वाक् चातुर्य की ढीठता अचंभित भी कर देती है। इनका हृदय हुतात्माओं पर द्रवित नहीं होता। कुछ लेखकों को प्रकृति ने राजनेता सुलभ दोहरे मोटापे की त्वचा से अनुग्रहित किया है। जब ये केले के छिलके पर फिसले हुए मोटे व्यक्ति पर उत्कृष्ट व्यंग्य लिखकर थक चुके होते हैं, ये हुतात्माओ पर लिख कर सरकार और व्यवस्था पर हमला बोलते हैं। ना इनकी वाणी मे वेदना होती है, ना संवाद में संवेदना।

व्यक्ति की मृत्यु राजनीति मे तीन प्रकार से देखी जाती है। जब व्यक्ति राजनीतिक बैनर बन जाता है, व्यक्ति व्यक्ति रह जाता है, और व्यक्ति संख्या बन जाता है। व्यक्ति की संख्या बन कर आँकड़ों मे धँस जाना वर्तमान राजनीति के अनुकूल है। इससे रोष बुझता है और तथ्यों को सरलता से ढाँपा जा सकता है। जो व्यक्ति वोट बैंक के समीकरण में बैठता है, बैनर बन जाता है, जो नहीं बैठता, आँकड़ा बन जाता है। जो आँकड़ा बन जाता है, उसके नाम पर ग़ैर-क़ानूनी इमारतें बनती है जिनमें राजनेता फ़्लैट बुक कराते हैं। जो बैनर बनता है, उसके नाम और चेहरे पर प्लेकार्ड बनते हैं, उसकी याद मे मोमबत्तियाँ जलाई जाती हैं।

पाकिस्तान से हम सदा से रूष्ट थे, अब और हो जाएँगे। उसका प्रभाव हमारे सर्वाधिक अनुग्रहित मित्र राष्ट्र पर क्या पड़ेगा यह विचारणीय है। बयालिस भारतीय सैनिकों की आत्माहुति के पश्चात विपक्ष विद्युत गति से नख-डैने तीव्र कर के आक्रामक हो गया है, पत्रकार शांति की दुशाला ओढ़ कर गांधी जी के बंदरों की मुद्रा मे समाधिस्थ हो गए हैं। प्रधानमंत्री क्या करेंगे, किसी को पता नहीं है, पर पक्ष प्रधानमंत्री के निर्णय के समर्थन मे तर्क तैयार करके बैठा है। यदि प्रधानमंत्री कोई उग्र निर्णय लेते हैं तो यह उनका शौर्य होगा और यदि नहीं लेते तो यह उनकी राजनैतिक परिपक्वता होगी। भारत विश्वमत प्रेमी राष्ट्र रहा है। भारतीय नेता को मंत्री, मंत्री को प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री को यूएन सर्टिफ़ाइड होने का शौक़ आज़ादी के बाद से रहा है। यह शौक़ बना रहेगा।

आतंकी हमले मे हमला करने वालों को निरपराध घोषित कर के हमला ना रोक पाने वाले को अपराधी घोषित करने का प्रयास आरंभ हो गया है। पत्रकारिता मे अतंर्राष्ट्रीय ख्याति का मार्ग छद्म शांति की वार्ता से होकर जाता है।

नेता युद्ध की अग्नि से निकल कर राष्ट्र नेता और फिर विश्वनेता बनते हैं। आगे भी बनेंगे। एक पक्ष छप्पन इंच की छाती का दम भरेगा, दूसरा उसके ना होने का। विपक्ष सत्ता में आते ही आधुनिक युद्धक विमानों के सौदे को रद्द करने का आश्वासन देगा, साथ ही सत्ता पक्ष को वयोवृद्ध विमानों के साथ ही युद्ध में उतरने को प्रेरित करेगा। हिंसा का उत्तर, संभव है कि हिंसा ना हो। किंतु यह ऐसा प्रश्न है जिसके भिन्न उत्तर हो सकते हैं। उत्तर की आशा को हिंसा की चाह में लपेट कर फेंक देने की साज़िश होगी ताकि हिंसा से इतर अन्य विकल्प भी बाहर हो जाएँ। सांस्कृतिक और वैचारिक विवाद को राजनैतिक माध्यम से हल करने का प्रयास होगा। धर्म के नाम पर हिंसा होती रहेगी और हम यह मान कर कि कश्मीरी युवा सड़क और पुल चाहता है, आतंक की धौंकनी मे धन का इंधन भरते रहेंगे। पुल और सड़क बनते रहेंगे, कश्मीरी नेता सड़क बनाने के लिए भारत से और ना बनने देने के लिए पाकिस्तान से कमीशन बनाते रहेंगे। सैनिकों के घरों के दरवाज़े बूटों की थपकी की प्रतीक्षा मे जागे रहेंगे, उनके बच्चों की गुलाबी हथेलियाँ पिता की उंगली से लिपटने की चाह मे तड़पती रहेंगी। सैनिकों के घरों के दीपक बुझते रहेंगे और इंडिया गेट पर मोमबत्तियाँ जलती रहेंगी। सिंधु मे भारतीय रक्त बहता रहेगा और सिंधु का पानी पाकिस्तान को बहता रहेगा। राजनैतिक रक्तबीज रा़क्षस पाकिस्तान दिवस पर पाकिस्तान दूतावास मे शेरवानी पहन कर ग़ज़लें सुन कर वाह-वाह करेगा। हम रोग के चिन्हों से लड़ते रहेंगे और उसके मूल को छूने से बचते रहेंगे। आतंकवाद के प्यादों को मार के हम अपनी पीठ थपथपा लेंगे और हिंसा के वैचारिक धर्मगुरू हिंसा को स्वीकार्य बनाने और हिंसा के नए प्यादे खड़े करने के लिए सेमीनार और कान्फ्रेंस आयोजित करते रहेंगे। सब वैसे ही चलता रहेगा या कुछ बदलेगा?