विचार
भारत के निजी स्कूल लाभ कमाएं, लेकिन मुनाफाखोर न बनें

प्रसंग
  • शिक्षा के क्षेत्र में निजी विद्यालय शहरी भारत के उदय के लिए अनिवार्य हैं और इसलिए यह जरुरी है कि उन्हें मुनाफाखोरी से दूर रखते हुए उनका मुनाफा सुरक्षित रखा जाए।

2010 और 2015 के बीच आंध्र प्रदेश ने अपने सरकारी स्कूलों में 8,00,000 से ज्यादा छात्रों की गिरावट देखी। इसी अवधि में गुजरात ने 85,000, छत्तीसगढ़ ने 5,00,000, हरियाणा ने 4,00,000 से अधिक, हिमाचल ने 1,60,000, जम्मू-कश्मीर ने 1,80,000, झारखण्ड ने 8,60,000 और केरल ने 2,10,000 छात्रों की गिरावट दर्ज की। इस अवधि में मध्य प्रदेश के लिए यह गिरावट 26,00,000 थी जबकि महाराष्ट्र के लिए यह 14,00,000 थी। सरकारी स्कूलों के नामांकन में उड़ीसा को 6,00,000, पंजाब को 90,000 और कर्नाटक को 5,00,000 छात्रों से हाथ धोना पड़ा।लेकिन, इतनी बड़ी संख्या में सरकारी विद्यालयों के बच्चे गए कहाँ?

2010 और 2015 के बीच, निजी स्कूलों में नामांकन आंध्र प्रदेश में 3,50,000, गुजरात में 10,00,000 से अधिक, छत्तीसगढ़ में 3,50,000, हरियाणा में 7,00,000, हिमाचल प्रदेश में 86,000, जम्मू-कश्मीर में 46,000, झारखंड में 5,80,000 और केरल में 10,00,000 तक पहुंचा था। मध्य प्रदेश में यह वृद्धि 96,000 तक पहुँची थी। उड़ीसा और पंजाब ने अपने निजी स्कूलों के नामांकन में क्रमशः 3,92,000 और 1,18,000 छात्रों की वृद्धि देखी थी।

डाटा की कमी के चलते उत्तर-पूर्व के राज्यों को छोड़कर, 2010 से 2015 के बीच पूरे भारत में सरकारी स्कूलों से 1,31,17,470 छात्र कम हुए जबकि निजी स्कूलों में 17,51,800 से अधिक छात्रों का इज़ाफा हुआ। हालाँकि निजी स्कूलों में नामांकन सरकारी स्कूलों की तुलना में 50% से भी कम था।

इस प्रकार, निजी संस्थानों ने भारत के शिक्षा के बाज़ार में बाधा डाली है लेकिन फिर भी अभी तक वह पूरी आबादी पर पकड़ नहीं बना पाए हैं।

मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा आयोजित राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण ने 700 से ज्यादा जिलों के 1,00,000 स्कूलों के 22,00,000 छात्रों को कवर किया। सभी राज्यों के सरकारी स्कूलों में जब छात्र कक्षा 3 से बढ़ते हुए कक्षा 8 तक जाते हैं तो इनके परिणामों में गिरावट देखी जाती है।

इसप्रदर्शन में गिरावट होने का ठीकरा ‘शिक्षा का अधिकार’ अधिनियम में त्रुटियों के मत्थे फोड़ा जा सकता है। वहीं, यह सरकारी स्कूलों में शिक्षा के गिरते मानकों को भी प्रदर्शित करता है।

भारत के एक उच्च-मध्यम श्रेणी की अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ने के साथ सरकारी स्कूलों से निजी स्कूलों में छात्रों का जाना समझ में आता है। पहला, गुरुग्राम, बेंगलुरु, चेन्नई, दिल्ली, नोएडा, चंडीगढ़ और पुणे जैसे शहरों में विस्तारशील शहरीकरण और आय के स्तरों में बढ़ोत्तरी ने निजी स्कूलों में नामांकनों की एक बड़ी संख्या को आमंत्रित किया है।

दूसरा, अधिकांश निजी विद्यालयों का बुनियादी ढाँचा सरकारी विद्यालयों के मुकाबले कहीं बेहतर है। जब तक ‘स्वच्छ भारत’ अभियान शुरू नहीं हुआ था तब तक शहरी क्षेत्रों के कई सरकारी स्कूलों में लड़कियों के लिए उचित शौचालय सुविधाओं का अभाव था।

तीसरा, भाषाओं और विज्ञान विषयों के महत्व ने अभिभावकों को अपने बच्चों के लिए एक विकल्प के रूप में निजी विद्यालयों को चुनने के लिए प्रेरित किया, जैसा कि नामांकन संख्याओं से स्पष्ट है।

आने वाले वर्षों में भी छात्रों का यह विस्थापन ऐसे ही जारी रहेगा क्योंकि भारत अपनी प्रति व्यक्ति आय को दोगुना करते हुए 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। इसलिए, निजी स्कूलों में वर्तमान और अनुमानित वृद्धि के साथ आसान हो चुकी पहुँच को देखते हुए राज्यों के लोगों के लिए निजी स्कूलों की वहनीयता आवश्यक हो जाएगी।

सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण, किसी कानून या नीति के जरिये सरकार इन स्कूलों द्वारा लिए जाने वाले शुल्क को निर्धारित नहीं कर सकती है। हाँ, एक बाजार समाधान के रूप में निजी संस्थान अपना स्थायित्व सुनिश्चित करने के लिए अपनी शिक्षण संस्थाओं का वाणिज्यकरण करेंगे और करना चाहिए लेकिन यह शुल्क सरकारी तानाशाही के बगैर होना चाहिए।

हालाँकि वाणिज्यकरण घोर पूँजीवाद में बिल्कुल नहीं बदलना चाहिए, जैसा कि आजकल कुछ निजी विश्वविद्यालयों में दिखाई देता है।टीएमए पाई फाउंडेशन बनाम कर्नाटक राज्य (2002) मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि राज्यों को यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि राजस्व में ‘उचित अधिशेष’ की अनुमति देने के दौरान अत्यधिक मुनाफाखोरी न हो।

इस्लामी एकेडमी ऑफ एजुकेशन बनाम कर्नाटक राज्य (2003) और मॉडर्न स्कूल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2004) मामलों में इस निर्णय की और भी पुष्टि हो गयी जब अदालत ने निजी खिलाडियों को उनकी संस्थाओं के विकास और विस्तार के लिए एक वाजिब अधिशेष की अनुमति दी।

हालाँकि इसने कुछ राज्यों को नियामक सक्रियता में शामिल होने से नहीं रोका है। जबकि आरटीई निजी स्कूलों में शुल्क के प्रतिव्यक्ति गणन पर रोक लगाता है, वहीं कर्नाटक में अकादमिक वर्ष की शुरुआत में शुल्क की घोषणा आवश्यक होती है। उत्तर प्रदेश शुल्क में वृद्धि को तीन वर्षों में 10 प्रतिशत तक सीमित करता है। आन्ध्र प्रदेश में प्राप्त किए गए शुल्क को निर्धारित उद्देश्यों के अलावा किन्हीं अन्य प्रयोजनों में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। हरियाणा में कुछ प्रावधान शुल्क के विनियमन के लिए हैं जो स्कूलों के अलग-अलग स्तरों के अनुसार भिन्न होते हैं । जब निजी स्कूलों द्वारा लिए जाने वाले शुल्क की बात आती है तो कर्नाटक इसमें सबसे आगे है। कुछ अन्य राज्य निजी स्कूलों में लगाये जाने वाले शुल्कों को नियंत्रित करने के लिए नियामक कानूनों के अपने संस्करणों पर भी विचार कर रहे हैं।

बिना आदेश के विनियमन एक ऐसा विचार है जिसे पूरी तरह बर्खास्त नहीं किया जा सकता है। हालांकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि निजी स्कूल क्षेत्र में घोर पूंजीवाद महत्वाकांक्षी शहरी भारतीयों की संभावनाओं को नुकसान पहुँचा सकता है। इस प्रकार, यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि व्यक्तिगत संस्थानों के राजस्व को ऐसे तरीके से नियंत्रित या विनियमित नहीं किया जाए जो उनके विकास और विस्तार की संभावनाओं को नुकसान पहुँचाए। एक संतुलन बनाये रखने के लिए राज्यों को स्कूलों द्वारा लिए जाने वाले शुल्क को समझने के लिए मूल निकायों और स्कूल प्रबंधन दोनों के साथ संलग्न होना चाहिए।

आज, गुरुग्राम में एक निश्चित स्कूल श्रृंखला कक्षा -1 से शुरुआत करने वाले छात्रों के लिए एक मुस्त भुगतान के रूप में 10 लाख रुपये से अधिक शुल्क लेती है। इस शुल्क में छात्र-छात्राओं को कक्षा 10 तक की शिक्षा प्रदान की जाती है। अन्य शहरी लोगों के लिए किसी भी अच्छे स्कूल का शुल्क 60,000 रुपये सालाना से लेकर 150,000 रुपये सालाना तक है। शुल्क में बदलाव बुनियादी ढाँचे पर निर्भर होता है। हालांकि, क्या एक अच्छे स्कूल के लिए अच्छा बुनियादी ढाँचा जरूरी है?

आधारभूत श्रेष्ठता की अपेक्षा किए बिना सभी निजी स्कूलों के शिक्षा परिणामों का मूल्यांकन किया जाना जाहिए, जिसमें अकादमिक, सांस्कृतिक, खेल और अन्य पाठ्यचर्या गतिविधियां शामिल हों। विनियमन पर प्रतिबंध नहीं थोपा जाना चाहिए, और माता-पिता की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए निजी संस्थानों की प्राथमिकताओं की उपेक्षा नहीं की जा सकती है।

जब शिक्षा पर खर्चों के प्रबंधन की बात आती है तो सरकार आदर्श विकल्प नहीं है। 2010-11 में सरकार ने 4400 सरकारी स्कूलों में 14,000 से अधिक शिक्षकों के वेतन पर 480 करोड़ रुपये खर्च किए। विडंबना यह है कि इन 4,400 स्कूलों में छात्रों की संख्या शून्य थी।

शहरी भारत को दो प्रमुख कारणों से निजी स्कूलों की जरूरत है। एक तो, हमारे सरकारी स्कूलोंकी व्यवस्था सही नहीं है जिसको सही करने में कम से कम एक दशक का समय लग जाएगा। दूसरा,शहर वालों को शिक्षा के लिए जो चाहिए वह उनको केवल निजी संस्थानों के माध्यम से ही पूरा किया जा सकता है। इस प्रकार निजी संस्थानों के घोर पूँजीवाद को नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन उनके नुकसान की कीमत पर नहीं।

व्यावसायीकरण और घोर पूँजीवाद के बीचकेअंतर को कम करते हुए निजी स्कूलों की फीस राज्य या सरकार द्वारा विनियमित होनी चाहिए।

तुषार गुप्ता स्वराज्य के एक वरिष्ठ उप-संपादक हैं। वह @tushjain15 पर ट्वीट करते हैं।