विचार / शिक्षा-नौकरी
पद्म पुरस्कार से सम्मानित भारत के गाँवों से सॉफ्टवेयर विकसित करने वाले श्रीधर वेंबु

इस वर्ष पद्म पुरस्कार से सम्मानित होने वाले तकनीकी क्षेत्र से जुड़े एक मात्र व्यक्ति हैं श्रीधर वेंबु जो कि चेन्नई में मुख्यालय वाले ज़ोहो कॉरपोरेशन के संस्थापक व मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं। कार्यालय की उत्पादकता बढ़ाने के लिए इस कंपनी के उत्पाद सेल्सफोर्स और माइक्रोसॉफ्ट जैसे वैश्विक ब्रांडों को उन्हीं के बाज़ार में चुनौती दे रहे हैं।

वेंबु को पद्म श्री पुरस्कार से सम्मानित करना कार्यालय उत्पादकता सॉफ्टवेयर के तीव्र प्रतिस्पर्धी वैश्विक बाज़ार में ढाई दशक पुरानी इस कंपनी द्वारा एक वास्तविक भारतीय ब्रांड खड़ा करने के लिए अंततः एक धन्यवाद ज्ञापन है। ज़ोहो और वेंबु- दोनों ही कम आँके जाते हैं और उद्योग के लाइमलाइट रडार में नहीं आ पाते हैं लेकिन वे अपने कॉरपोरेट उपभोक्ताओं के व्यापार को बल अवश्य दे रहे हैं।

इसमें संस्कृति की भी भूमिका है- यूएस आधारित तकनीकी कंपनियों में थोड़े समय तक काम करने के बाद वेंबु ने अपनी स्वयं की सॉफ्टवेयर कंपनी एडवेन्टनेट 1996 में शुरू की जिसमें उनके दो भाई भी भागीदार थे। 2009 में इसी पारिवारिक व्यापार का नाम बदलकर ज़ोहो कर दिया गया और इसे केंद्रित कर दिया गया तेज़ी से बढ़ते हुए ‘सास’ व्यापार अर्थात् सेवा के रूप में सॉफ्टवेयर विकसित करने पर।

पूर्ण रूप से चेन्नई में विकसित किए गए ज़ोहो लेबल के साथ कुछ ऑफिस सॉफ्टवेयर लॉन्च किए गए जिनकी मार्केटिंग इकाई यूएस में थी। 2017 में इन सॉफ्टवेयरों को एकत्रित करके ज़ोहोवन का नाम दिया गया जिसको शीघ्र ही विश्व भर में 5 करोड़ उपभोक्ता मिल गए।

10 या उससे कम उपभोक्ता वाले व्यापारों को ज़ोहो मुफ्त में अपने सारे सॉफ्टवेयर देता है जिससे वह भले ही पैसा न कमा पाए लेकिन कई व्यापारों का विश्वास प्राप्त कर लेता है। इसमें ज़ोहो का व्यापार मॉडल भी है कि जब कंपनी बड़ी होगी, तब वे ज़ोहो के देनदार ग्राहक बन जाएँगे।

चेन्नई के बाहरी क्षेत्र में वल्लनचेरी के इस्टैनिका आईटी पार्क में ज़ोहो का 12 मंजिला मुख्यालय है जहाँ 3,000 लोगों का विकास कार्य करने वाला सशक्त दल है जिन्हें वेंबु ने तैयार किया है और आईआईटी में प्रतिभा खोजने वाले ट्रेंड को चुनौती दे रहे हैं।

चेन्नई मुख्यालय (बाएँ), तनकाशी कार्यालय (दाएँ)

उन्होंने विद्यालयी शिक्षा छोड़ चुके या महाविद्यालय जाने वाले तमिलनाडु के युवकों को चुना, ज़ोहो विश्वविद्यालय के प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में उन्हें डाला और उन्हें सॉफ्टवेयर कौशल सिखाया। ज़ोहो टावर के बड़े से भोजन स्थल में तमिल ही प्रमुख भाषा है और भोजन के समय एक प्रशिक्षु से लेकर सीईओ तक दही-चावल, सांभर चावल या पोंगल और फिल्टर कापी के लिए पंक्तिबद्ध हो जाते हैं।

ग्रामीण आईटी केंद्र

वेंबु दृढ़ रूप से मानते हैं कि भारत में प्रतिभा मेट्रो शहरों की जागीर नहीं है इसलिए उन्होंने तमिलनाडु के तिरुनलवली जिले में तनकाशी के बाहरी क्षेत्र में स्थित सिलाराइपुरवु गाँव में एक विकास केंद्र शुरू किया है और आसपास के क्षेत्र से विद्यालय छोड़े देने वाले और डिप्लोमा कर चुके 150 युवाओं को चुना।

जल्द ही उन लोगों ने ज़ोहो के नेक्स्ट बिग थिंग के लिए आवश्यक सॉफ्टवेयर कौशल प्राप्त कर लिया। इस सॉफ्टवेयर के माध्यम से उपभोक्ताओं की सहायता डेस्क के रूप में ज़ोहोडेस्क चलाया जाएगा जिसे 2016 में ही भारत में टेक महिंद्रा और डेमलर तथा यूएस के सियर्स समूह की एक इकाई जैसे ग्राहक मिल गए थे।

यह केंद्र प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर और कुर्तलम झरने से मात्र 2 किलोमीटर दूर है। आसपास कोई हवाई अड्डा नहीं है- निकटतम हवाई अड्डा तुतिकोरिन तीन घंटे दूर स्थित है और राज्य की सीमा पार करके केरल का तिरुवनंतपुरम हवाई अड्डा भी इतना ही दूर है।

ज़ोहो में आने वाले इतने लोग इच्छुक हैं कि ज़ोहो ने 30,000 वर्ग फीट के क्षेत्र में सुविधा का विकास शुरू कर दिया है ताकि अतिरिक्त 200 अभियंताओं के लिए जगह हो। ज़ोहो शीघ्र ही तनकाशी में सर्वाधिक लोगों को रोजगार देने वाला बन गया- तकनीक की नई लहर लाने के साथ उसने उस प्रतिभा को तराशा जो अन्यथा ग्रामीण और कृषि क्षेत्र में पीछे रह जाती।

अपने दल के साथ वेंबु

तनकाशी में काम करते हुए वेंबु अपनी जड़ों से जुड़ जाते हैं- चप्पल, शर्ट और मुंडु पहनकर साइकल चलाकर कार्यालय जाते हैं। तनकाशी में अच्छे परिणाम मिलने के बाद वेंबु ने आंध्र प्रदेश के रेनीगुंटा में एक दूसरा ग्रामीण केंद्र शुरू किया जो एक और मंदिर नगर- तिरुपति के निकट स्थित है।

ज़ोहो के आधुनिकतम अवतार- ज़ोहोऑफिस, जो कि भारत का पहला वेब-आधारित, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस-आधारित कार्यालय उत्पादकता समाधान है, को विकसित करने के लिए सभी केंद्रों के अभियंताओं और संसाधनों ने मिलकर काम किया।

दूरदर्शी सोच

ग्रामीण केंद्रों ने आकस्मिक समय पर ज़ोहो की सहायता की- जब कोविड के कारण लॉकडाउन हुआ, तब कई महीनों तक चेन्नई स्थित मुख्य इकाई काम नहीं कर सकी लेकिन ग्रामीण केंद्रों पर संक्रमण का कम प्रभाव हुआ और वे शीघ्र ही सामान्य रूप से काम करने लगे।

विस्तार के लिए वेंबु का ध्यान बेंगलुरु, हैदराबाद या गुरुग्राम जैसे अन्य तकनीकी नगरों पर नहीं जाता है, बल्कि वे मानते हैं कि ज़ोहो का कर्तव्य है छोटे केंद्रों को बढ़ावा देना। उन्होंने ट्वीट किया था, “क्या हम शहरों के विकास को सीमित कर सकते हैं, ताकि हम स्थानीय रूप से उपलब्ध पानी जैसे प्राकृतिक संसाधनों को समाप्त न कर दें?”

वे एक और कारण भी बताते हैं, “यदि आप प्रतिभाशाली हैं लेकिन भेड़ चाल में लग गए हैं तो छोटे समुदाय की ओर जाना आपकी सहायता कर सकता है। ‘प्रतिष्ठा’ के कारण आप कई जालों में फँस जाते हैं जो हमारे मस्तिष्क को बांधे रखता है जैसे किस ब्रांड के कपड़े, जूते, फोन, कार, आदि हों लेकिन छोटे समुदाय में जाकर आप इन सब की चिंता छोड़ देते हैं। यह काफी मोक्षदायक है!”

जब वेंबु को बताया गया कि उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया जा रहा है तब वे इसका श्रेय साझा करते हुए ट्वीट में लिखते हैं, “यह बहुत सम्मान की बात है और मैं बहुत कृतज्ञ हूँ। मैं इसे समर्पित करना चाहूँगा अपने कर्मचारियों को जो मेरा वृहद् परिवार है क्योंकि ये लोग मुझपर विश्वास बनाए हुए हैं।”

वेंबु आजकल बहुत परिश्रम का काम कर रहे हैं, वे ज़ोहो के नए उत्पाद के ऑपचारिक विमोचन की तैयारी कर रहे हैं। यह नया उत्पाद है भारत में विकसित मैसेजिंग टूल अरत्तई जो वॉट्सैप का स्थान ले सकता है।

देर आए पर दुरुस्त आए

पद्म पुरस्कार के लिए उद्यमी और व्यापारियों को सम्मानित करने के लिए सरकार ने कुछ वरिष्ठों को भी चुना है जो अब 80-90 की आयु में है और कई दशक पहले उन्होंने अपने योगदान शुरू कर दिए थे। ये हैं-

रजनी बेक्टर (पद्म श्री)- 80 वर्षीय महिला जिन्होंने लुधियाना में एक घर के बने खाने का व्यापार 300 रुपये से 1978 में शुरू किया था जो अब 500 करोड़ रुपये की कंपनी- ‘मिसेज़ बेक्टर्स फूड स्पेशलिटीज़’ बन चुकी है जिसके ‘मिसेज़ बेक्टर्स क्रेमिका’ और ‘इंग्लिश अवन’ जैसे लोकप्रिय बिस्किट व बेकरी उत्पाद हैं।

रजनीकांत देवीदास श्रौफ (पद्म भूषण)- कृषि रसायनों में अग्रणी यूनाइटेड फोसफोरस लिमिटेड के 87 वर्षीय संस्थापक जिन्हें भारत के ‘फसल सुरक्षा किंग’ के रूप में जाना जाता है।

जसवंतीबेन जमनादास पोपट (पद्म श्री)- 80 रुपये की पुंजी से ‘श्री महिला गृह उद्योग लिज्जत पापड़’ शुरू करने वाली सात गुजराती गृहणियों में से एक मात्र जीवित 91 वर्षीय महिला। 1,000 करोड़ रुपये की मूल्य वाली लिज्जत आज पापड़ में देश की सबसे बड़ी कंपनी और देश भर में 50,000 महिलाओं को रोजगार देती है।