विचार
ॐ की ऊर्जा, रचना, संरचना और प्रभाव
सावन के महीने में “ॐ नमः शिवाय” की गूंज साधारण है लेकिन “ॐ” कोई साधारण शब्द या ध्वनि मात्र नहीं बल्कि शाश्वत सत्य है। एक अलौकिक, अद्वितीय और अपरिमार्जित अनुनाद है।
ॐ साहस, शक्ति, साधना, संघर्ष, समन्वय और संरचना का परिपूर्ण, पारदर्शक, सार्थक सम्मिश्रित गूढ़ साम्य है। इसके उच्चारण से नाभि से लेकर नासिका से होती हुई मस्तिष्क तक की कई कोशिकाएँ तरंगित होती हैं। योग के अनुसार इससे शरीर की अंतःकोशिकाओं का व्यायाम होता है, जिससे आतंरिक चेतना जागृत होती है।
ॐ अजर, अमर, अविनाशी शाश्वत सत्य है जो समस्त ब्रह्माण्ड में गुंजायित है।
मांडूक्य उपनिषद् के अनुसार “ॐ” ब्रह्म का प्रतीक है तथा यह बताता है कि ब्रह्म की ऊर्जा पहले हमेशा थी, आज भी है और चिर काल तक हमेशा रहेगी।
वैज्ञानिकों ने भी ब्रह्माण्ड की ध्वनि पर शोध किया है और यह पाया कि ॐ का निनाद सतत गूंजता रहता है। हर जगह ब्रह्म व्याप्त है, ॐ तीन वर्णों से बना है लेकिन यह शब्द नहीं है, यह ध्वनि है जो ऊर्जा है। इसके उच्चारण से आत्मिक ऊर्जा सुप्तावस्था से जागृत अवस्था में आती है जिससे आत्म ज्ञान होता है।
ॐ मन के समस्त संतापों को हरकर उसमें सृजनात्मकता एवं सकारात्मकता की लौ जलाने वाला पुंज है।
जिस प्रकार विघ्नहर्ता गणेश जी की स्तुति से व्यक्ति बाधाओं की वैतरणी सहज ही पार उतर जाता है, उसी तरह “ॐ” के उच्चारण से समस्त विकार दूर हो जाते हैं एवं अंतस में अलौकिक चेतना का अनंत प्रसार हो जाता है।
ॐ की आकृति, गणेश जी की आकृति से मिलती-जुलती है। ऊपरी वक्र, उनका सर, निचला वक्र, उनका पेट तथा बीच का उनके सूँड़ का परिचायक है। जैसे सभी मंत्रों के आदि में ॐ से शुरुआत होती है वैसे ही सभी देवताओं के पूजन से पहले गणेश की पूजा की जाती है। यह बीज मंत्र है।
हम जब ॐ कहते हैं तो उसे अ, उ और म का जोड़ समझते हैं या सीधा-सीधा ‘ओम’ समझते हैं, लेकिन यह न जोड़ है न ही ओम। ॐ, अ, उ और म से बनी एक तरंगित ध्वनि है और कई रूपों में वर्णित है।
जब हम ध्यानावस्था में प्रवेश कर ओमकार का उच्चारण करते हैं तो जीव को आत्मा से मिलन का सुखद एहसास होता है। कंठ से शुरू हुए ध्वनि को गहराई में भीतर नाभि की तरफ लेकर फिर ओ बोलते हुए म पर अंत करके, अल्प समय के लिए नाभि तक के स्पंदन को महसूस किया जाता है।
फिर दूसरी बार ॐ कहने से पहले अल्प विराम दिया जाता है, यह अल्प विराम आप की पूरी चेतना को विश्राम देकर “तुरीय” अवस्था में ले जाता है और इस तरह का उच्चारण, एक नई स्फूर्ति, नई ऊर्जा देता है।
ॐ अंतस चेतना को जाग्रत कर आत्मा की सात्विकता और निर्गुण निराकार ब्रह्मा से साक्षात्कार का पवित्र स्त्रोत है। ‘अ’ (वैस्वनर) आत्मा की जागृत अवस्था का द्योतक है। ‘उ’ (तेजस) आत्मा की स्वप्निल अवस्था का द्योतक है और ‘म’ (प्रज्ञा) आत्मा की गहरी निद्रा का द्योतक है।
हम सबको जानते-पहचानते हैं सिवाय स्वयं के। हम कहते हैं कि यह मेरा हाथ है, पैर है, मेरा सर आदि, लेकिन यह मै कौन है, जिसका हाथ है, पैर है सर है? यह हाथ, पैर सर तो मरने के बाद भी रहता है तो फिर जाता कौन है ? जो जाता है वह आत्मा है।
ॐ कई वक्रों से बना है। नीचे का बड़ा वक्र, चेतना या जागृत अवस्था का प्रतीक है, बीच का बाहरी तरफ निकला वक्र स्वप्निल अवस्था का प्रतीक है, ऊपरी छोटा वक्र सुप्तावस्था का प्रतीक है ऊपर का बिंदु, इन तीनों अवस्थाओं से अलग आत्मा की मुक्त अवस्था का प्रतीक है तथा बिंदु के नीचे का वक्र, माया का प्रतीक है।
माया से विच्छेदित होकर ही आत्मा मुक्त होती है। माया के नीचे आत्मा चेतन-अचेतन अवस्था में रहती है तथा मायाजाल से आच्छादित रहती है, किंतु माया से परे और ऊपर होने से वह मुक्त अवस्था में या कहें तो ब्रह्म अवस्था में आ जाती है। इसे ‘तुरीय’ या चौथी अवस्था कहते हैं।
इस तरह ॐ आत्मा की वह अवस्था बताता है जिसमे यह संसार आता है, रहता है और चला जाता है। यानि कि आत्मा शाश्वत है, संसार आता जाता रहता है, यही आत्मा ब्रह्म है। आत्मा जब पुनर्जन्म लेती है तो उसका पिछला संसार बीत चुका होता है।