विचार
खिड़कियाँ, विश्व के संबंध और जीवन दर्शन

प्रसंग

  • हिंदू संस्कृति में हमारे पास खिड़कियों का एक अनूठा अवसर है, उनकी एक विविधता है, जिनके माध्यम से हम अपने व्यक्तिगत जीवन, हमारी बौद्धिक खोज, प्रकृति में हमारी खोज, और ब्रह्मांड के हमारे अनुभव को आकार दे सकते हैं।

सुधाकर कस्तूरी ने कहा “स्टॉप”। मैंने दारासुरम मंदिर की तस्वीरों का स्लाइडशो रोक दिया और साइंस-फिक्शन के उन उपन्यासों के लेखक का चेहरा देखा जिन उपन्यासों ने तमिल में असाधारण सफलता प्राप्त की है। कस्तूरी के उपन्यास 6174 (2012) में गणितीय अवधारणाएँ हैं, जो प्राचीन भारत के स्थापत्य चमत्कारों और काव्य चमत्कारों को संजोए हुए हैं। यह उपन्यास एक साइंस-फिक्शन फैंटेसी थ्रिलर है।

सुधाकर कस्तूरी ने दारासुरम मंदिर की इस खिड़की में हेमचंद्र-फिबोनैकी पैटर्न पाया।

कस्तूरी ने मुझसे पूछा, “तुमने देखा यह क्या है?” मुझे निरुत्तर पाकर, उन्होंने पूछा, “क्या आपको मेरे उपन्यास का वह अंश याद है जहाँ पर वे एक सेमिनार में आयताकार फिबोनैकी रंगोलियों (खिड़की से छनकर आती हुई धूप से बनी या छायाचित्र) की चर्चा करते हैं?” इस पुराने मंदिर में मेरे सामने, एक स्थिर खिड़की थी जिससे छनकर सूरज की रोशनी आ रही थी और एक छायाचित्र पैटर्न बन रहा था। अब, मुझे याद आया। चेन्नई में रहने वाले डॉ. नारानन वर्षों से इनमें पाए जाने वाले गणितीय पैटर्नों का अध्ययन कर रहे हैं, वह एक वास्तविक जीवन के भौतिक शास्त्री हैं। उन्होंने इनमें आयताकार हेमचंद्र-फिबोनैकी रंगोलियों की खोज की थी। कस्तूरी ने इन रंगोलियों की वास्तविक गणित का उल्लेख किया था। उन्होंने अपने उपन्यास में खासकर इन रंगोलियों का उल्लेख किया, और ठीक हमारे सामने, आठवीं शताब्दी से पहले के चोल मंदिर की नक्काशीदार खिड़की में बनाए गए ठीक वैसे ही पैटर्न दिखाए।

सुधाकर कस्तूरी एक तमिल साइंस-फिक्शन लेखक हैं।

दक्षिण भारत में प्राचीन मंदिरों की खिड़कियाँ आकर्षक हैं। उनमें अंतःनिहित पैटर्न के जरिये वे हमारे वास्तविकता के नजरिये को आकार देती हैं। वे पर्यवेक्षक और पर्यवेक्षण के बीच में इंटरफेस हैं। इन प्राचीन मंदिरों में हम जो चकित कर देने वाली खिड़कियाँ देखते हैं, चाहे वे पल्लवों द्वारा बनाई गई हों या चालुक्यों या चोलों द्वारा या और जो भी कुछ नाम हैं, शायद वास्तविकता को देखने और अनुभव करने के लिए हमारे लिए हमारी हिंदू संस्कृति में उपलब्ध आश्चर्यजनक ज्ञानवादी बहुवाद को दर्शाती हैं।

बादामी गुफा मंदिर में खिड़कियाँ – चालुक्य

माया एक ऐसी ही खिड़की है या शायद खिड़कियों की खिड़की है। वह एक ही समय में वास्तविकता का इंटरफ़ेस और सह-निर्माता दोनों है जैसा कि हम इसे समझते हैं। फिर यह हमें स्पष्ट बाइनरियों के बीच की वास्तविकता को समझने की अनुमति देती है। चूँकि माया को अक्सर एक प्रकार का भ्रम और वास्तविकता को जानने में रुकावट माना गया है, आदि शंकर ने एक बुनियादी वास्तविकता हासिल करने के लिए इसको ज़रूरी बताया है। वह माया को इस प्रकार व्यक्त करते हैं –

“वह अव्यक्तनामनी है और परमेश की शक्ति है। इसका कोई आरंभ नहीं है और यह अविद्या है। यह तीन गुणों (त्रिगुणात्मिका) की आंतरिक आत्मा है। यह सर्वोच्च आंतरिक सिद्धांत (परा) है। प्रभावों के माध्यम से इसका अनुमान लगाया जा सकता है और केवल उन स्पष्ट तर्कों के माध्यम से ही ऐसा किया जा सकता है। इस तरह की है यह माया जिसके माध्यम से पूरा अस्तित्व उजागर होता है।”

विवेकचूड़ामणि (क्रेस्ट-ज्वेल ऑफ़ डिस्क्रिमिनेशन: छंद 108)

अव्यक्त शब्द के उपयोग का प्राथमिक महत्व है। जैनों के सप्तभंगी या स्याद्वाद में अव्यक्त एक महत्वपूर्ण घटक बन जाता है। सात अवस्थाओं में से चार में अव्यक्त है। आदि शंकर ने माया के जिन नामों को परिभाषित किया है, उनमें से प्रत्येक को श्री ललिता सहस्रनाम स्वयं देवी के नाम बताते हैं। इस तरह से वह अव्यक्त हैं, वह त्रिगुणात्मिक हैं, वह परा हैं, वह अविद्या हैं।

नामों के अनुक्रम में, चूँकि देवी के लिए अव्यक्त एक अलग नाम है, इसकी विपरीत अवस्था, व्यक्त, ऐसी नहीं है। इसके बजाय, व्यक्त-अव्यक्त की कोई प्रत्यक्ष प्रणाली नहीं है।

ऐसी खिड़की किस प्रकार की दृष्टि रखने में हमारी मदद कर सकती है?

एक हालिया लेख में, न्यूरोबायोलॉजिस्ट (तंत्रिका जीव विज्ञानी) टॉड ई. फ़ीनबर्ग और जॉन मालाट ने चेतना के अध्ययन में एक अहम समस्या की रूपरेखा प्रस्तुत की –  ‘एक ज्ञानात्मक अवरोध’  जिसे ‘ऑटो-इरिड्यूसिबिलिटी’ (auto-irreducibility) कहा जाता है।

“ऑटो-इरिड्यूसिबिलिटी का मतलब होता है कि अगर एक बार किसी की चेतना को जाग्रत कर दिया जाता है तो हमें नहीं पता होता है कि कौन सी तंत्रिका प्रक्रियाएं हमारे अनुभव पैदा कर रही हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो, हमारे पास हमारी तंत्रिका कोशिकाओं तक कोई सीधी पहुँच नहीं होती है, केवल उन अनुभवों तक ही हमारी पहुँच होती है जो वे पैदा करती हैं। इस बाधा को पहली बार गोर्डन ग्लोबस द्वारा इंगित किया गया था, जिन्होंने इसे “वर्ल्ड नॉट” का एक पहलू कहा था, इस शब्द को शोपेनहावर (Schopenhauer) ने मस्तिष्क और चेतना के बीच संबंधों को समझाने की कोशिश करते समय सामने आने वाले कई रहस्यों (गूढ़ प्रश्नों) को व्यक्त करने के लिए प्रतिपादित किया था।”

‘अनलॉकिंग दि मिस्ट्री ऑफ कॉन्सियसनेस’ (साइंटिफिक अमेरिकन, 17 अक्टूबर 2018)

लेखकों ने इसे पहले ही एक क्रम-विकास-संबंधी विकास के रूप में देखा है। उनके अनुसार, आत्मवाद स्वयं “विकसित हुआ है क्योंकि इसे वस्तुनिष्ठता से ‘अनुभव’ नहीं किया जा सकता है” (दि एन्सिएन्ट ओरिजिन्स ऑफ कॉन्सियसनेस, एमआईटी प्रेस, 2016)। गोर्डन ग्लोबस ने स्वयं अपने मूल दस्तावेज़ में लिखा था कि ‘तंत्रिका तंत्र में अपनी संरचना के लिए संचालित कोई संवेदी तंत्र नहीं होता है।’

डॉ. ग्लोबस, जो अब मनोचिकित्सक और दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर हैं, ने 1973 में अपने दस्तावेज़ में, चेतना का अध्ययन करते समय सामने आने वाली इस समस्या का जिक्र किया था –

“दिमाग और पदार्थ के बीच संबंधों के रहस्य…….को शोपेनहावर ने ‘वर्ल्ड नॉट’ नाम शायद इसलिए दिया था क्योंकि इसमें बहुत सारे मुद्दे उलझे हुए हैं।… मानसिक घटनाओं को किसी भी तंत्रिका के मूर्त रूपों के बारे में कोई जानकारी नहीं होती है,…जैसे मानसिक घटनाओं को तंत्रिका के मूर्त रूपों के बारे में जानकारी नहीं होती है, वैसे ही तंत्रिका घटनाओं के पास कोई जानकारी नहीं होती है कि यह घटनाएँ तंत्रिका-सम्बन्धी रूप से जुड़ी होती हैं।”

अनएक्सपेक्टेड साइमेट्रिक इन द “वर्ल्ड नॉट”, साइंस, 15 जून 1973 : खंड 180, मुद्दा 4091, पेज 1129-1136.

उन्होंने दो पहचानों का सूत्रपात किया – एक मानसिक घटना का आत्मवादी परिप्रेक्ष्य है जिसे उन्होंने मनोविश्लेषक पहचान बताया और दूसरा, पर्यवेक्षक का परिप्रेक्ष्य जिसमें आत्मवाद की मानसिक घटनाएँ आत्मवाद की तंत्रिका सम्बन्धी घटनाओं (चेतना-मनोवैज्ञानिक पहचान) के साथ दृढ़ता से समान हैं। आगे बढ़ने के लिए नील्स बोहर के संपूरकता के सिद्धान्त का उपयोग करके इन दो दृष्टिकोणों का व्यवहार किया जाना चाहिए, गोर्डन ने जोर देकर कहा –

“हालाँकि स्थिति में बराबर, परिप्रेक्ष्यों को एक साथ लागू नहीं किया जा सकता है और प्रत्येक वास्तविकता के बारे में विभिन्न जानकारियाँ प्रदान करता है, जैसे प्रकाश अवलोकन की विधि के आधार पर एक तरंग या कण प्रतीत होता है, जिसमें विधियों को एक साथ लागू नहीं किया जा सकता है। इस तरह से बोहर की समझ में साइकोइवेंट और साइकोन्यूरल पहचान संपूरक हैं। … बोहर के पूरकता के सिद्धान्त के वर्तमान अनुप्रयोग का मस्तिष्क और पदार्थ की समस्या के साथ सम्बन्ध क्वांटम फिजिक्स में इसके अपने अनुप्रयोग के लिए सरल सादृश्य की अपेक्षा गहरा प्रतीत होता है। बल्कि, दोनों अनुप्रयोग एक सामान्य दार्शनिक सिद्धान्त के उपयोग को दर्शाते हैं।”

अनएक्सपेक्टेड साइमेट्रिक इन दि “World Knot”, साइंस, 15 जून 1973 : खंड 180, मुद्दा 4091, पेज 1129-1136.

भारतीय भौतिक शास्त्री और शिक्षाविद् डी एस कोठारी (1906-1993) ने भी अपने आखिरी दस्तावेज़ में इसके बारे में जिक्र किया था कि किस तरह से बोहर का संपूरक सिद्धान्त एक बड़ा दर्शन है जिसे विज्ञान के कई क्षेत्रों में लागू किया जा सकता है। उन्होंने यह भी बताया कि कैसे यह कदाचित विपरीत परिपेक्ष्यों के लिए परम्परागत वेदांत के और जैन दृष्टिकोण के साथ सामंजस्य बिठाता है:

“उपनिषदों, बौद्ध धर्म और जैन धर्म में प्रस्तावित गहन नैतिक और आध्यात्मिक अंतर्दृष्टि का मूल अनिवार्य रूप से जीवन और अस्तित्व की समस्याओं के संपूरकता दृष्टिकोण पर निर्भर करता हालाँकि सूत्रीकरण भिन्न हो सकते हैं।”

दि कंप्लीमेंटैरिटी प्रिसिंपिल एंड ईस्टर्न फिलॉस्फी, नील्स बोहर सेंटेनरी वॉल्यूम्स, हावर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1985, पेज 325-331

फिर, उन्होंने ईसा उपनिषद पर श्री अरबिंदो की समीक्षा का हवाला दिया है, जहाँ साधक ने सचेत पुरुष और अभूतपूर्व प्रकृति से शुरू होने वाले बाइनरी युग्मों को सूचीबद्ध किया है और अन्य के बीच एक स्थिर ब्राह्मण एवं कई मौजूदा और भावी हलचलों, सक्रिय देवता और उदासीन अक्षरा ब्राह्मण, विद्या और अविद्या इत्यादि को सूचीबद्ध किया है। स्याद्वाद में वास्तविकता की चौथी भविष्यवाणी में कोठारी के दस्तावेज़ में विशेष जोर अव्यक्त पर है, जिसे उन्होंने तरंग-कण द्विविधता पर लागू किया है।

डॉ. दौलत सिंह कोठारी नील्स बोहर के शताब्दी के खंड के लिए अपने दस्तावेज़ में तरंग-कण संपूरकता के लिए स्याद्वाद लागू करते हैं।

जैसा कि पहले ही देखा गया है, आदि शंकर अव्यक्त को माया के रूप में बताते हैं। अब हम देखेंगे कि ग्लोबस चेतना को समझने और इसका अध्ययन करने के लिए एक प्रणाली तैयार करने में माया को अपनाने की दिशा में कैसे प्रगतिशील रूप से आगे बढ़ते हैं।

डॉ. गॉरडन ग्लोबस के कार्यों से पता चलता है कि चेतना और मस्तिष्क प्रक्रियाओं के अध्ययन के उनके दृष्टिकोण में माया की समझ कैसे सामने आती है।

1986-87 में ग्लोबस ने सपने की घटना पर अपना अध्ययन प्रकाशित किया- उनकी “खोज की रणनीति” यानी “सपने देखने का अन्वेषण जागृति को प्रकाशमय कर सकता है।” और उन्होंने औपचारिक रूप से प्राचीन भारतीय दर्शन के लिए माया के सिद्धांत तक पहुँचने की खोज की।

माया पर बीसवीं शताब्दी के दृष्टिकोण के वर्तमान अन्वेषण ने उत्पादन/उत्पाद की अवधारणा को बढ़ावा दिया है जो माया की अवधारणा की ओर अभिमुख होती है।

ड्रीम लाइफ, वेक लाइफ ह्यूमन कंडीशंस थ्रू ड्रीम्स, सनी प्रेस, 1987

हालाँकि, कुछ असमानताएँ हैं। आखिरकार हिंदू धर्म में पौराणिक शिल्पकार विश्वकर्मा भी हैं और इसलिए, माया अभी भी दुनिया के लिए एक तंत्र है और इस “तंत्र का संचालक ईश्वर” है। फिर, उल्लेखनीय अंतर्दृष्टि के साथ, डॉ ग्लोबस आगाह करते हैं कि हिंदू, “एक शिल्पकार के रूप में सृष्टि-निर्माता” शाब्दिक अर्थ में नहीं समझना चाहिए क्योंकि “हिंदू दर्शन में गहरी मान्यताएँ हैं।” यहां पर वह माया को भगवान रुद्र की कला के रूप में इंगित करते हैं, जो हमारे मायाजाल वाले मस्तिष्क में छवियों का सृजन करते हैं और जो “प्रारूपात्मक निर्माता हैं।” उन्होंने निष्कर्ष निकालाः

यद्यपि वास्तविकता के भाव/सार, निरंतरता का मिश्रण अविभाजित प्रतीत होता है (स्पंदनात्मक हस्तक्षेप की अराजकता), रुद्र के संपर्क को प्रकट करते हुए संभावनाएं इसके आस-पास लिपटी हैं, जिस तरह बोहम का होलोमूवमेंट उलझाव से अस्तित्व की खोज करता है।

ड्रीम लाइफ, वेक लाइफ ह्यूमन कंडीशंस थ्रू ड्रीम्स, सनी प्रेस, 1987

दूसरे शब्दों में, माया का समागम उससे हुआ जिसे आदि शंकर ने ‘परमेश शक्ति’ कहा।

1995 में, ग्लोबस ने मस्तिष्क और चेतना पर अध्ययन करते हुए बताया कि “विषय (जैसा कि आदर्शवाद में है) या वस्तु (जैसा कि भौतिकवाद में है) को प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए बल्कि यह एक गतिशील प्रक्रिया, जिसमें विषय / वस्तु और अन्य सभी आध्यात्मिक द्विविधताएं व्युत्पन्न होती हैं, को दी जानी चाहिए।” यह प्रक्रिया माया है जिसे उन्होंने जागृत और स्वप्न दोनों अवस्थाओं के दौरान एक गतिशील, आत्म-नियोजित, अद्वैत और होलोनॉमिक मूवमेंट कहा (द पोस्टमॉडर्न ब्रेन)।

वर्ष 2003 तक, क्वांटम मैकेनिक्स चेतना और मस्तिष्क प्रक्रियाओं के अध्ययन में एक गंभीर आकस्मिक स्थिति के रूप में उभरी रही। ग्लोबस बताते हैं-

अब, पहली बार, केवल वास्तविक झूठी धारणा के बजाय भौतिक वास्तविकता के संदर्भ में माया की व्याख्या की गई है। हम उसे भूल से उत्कृष्ट स्वायत्तता प्रदान करते हैं जो वास्तव में अव्यवस्थित और भ्रमित तरीके से उत्पन्न है। संसार का अस्तित्व लगातार बढ़ता रहा है न कि आत्म-निर्भरता। इस प्रकार क्वान्टम थ्योरी, उत्तरपरिघटनात्मक अवतरण पर विचित्र समरूपता में कमी करते हुए, ड्यूअल मोड क्वांटम ब्रेन डायनामिक्स के माध्यम से हमारे सर्वप्रथम अस्तित्व तक विस्तारित होती है।  प्रत्येक अस्तित्व (प्राणी), एक प्राणी के रूप में, पूरी तरह से भिन्न है। प्रतिदिन दुनिया में जो होता है वह सब माया है। हम वास्तव में अकेले हैं, जब तक हम हैं संसार के मुताबिक अपने-अपने मायामोह से जकड़े हुए हैं।

‘थिंकिंग-टूगेदर पोस्टफेनोमेनोलॉजी ऐंड क्वांटम ब्रेन डायनामिक्स‘, 2003

एक बार फिर, क्वान्टम ब्रेन डायनामिक्स पर चर्चा करते हुए उन्होंने एक विचार व्यक्त किया जो शैव सिद्धांत में माया की अवधारणा की व्याख्या करता है-

“कोई ईकाई संभावनाओं से परिपूर्ण है। संभावनाएँ एक-दूसरें में घुली-मिली हैं, इनके अंश एक-दूसरे के ऊपर आच्छादित हैं, संभावनाओं का विस्तार है, ये बहुआयामी हैं। इन संभावनाओं में यथार्थ नज़र आता है, ये बहुआयामी संभावनाओं के वजनी पाश में लिपटा हुआ है। संभावनाओं को यथार्थ से जोड़ने की प्रक्रिया किसी व्यक्ति का आंतरिक मामला है। एक व्यक्ति इस बहुआयामी संसार में वास्तविकता के प्रतिनिधियों से मिलता है… और विश्व में उसके प्रकट होने का भेद शून्यता में खुलता है- इससे एक संयुग्म जोड़ा बनता है। अप्रत्याशित रूप से, यह माया सिद्धांत के चिरस्थायी दर्शन के साथ मेल खाता है। …आम व्याख्या में माया एक संभावित रूप से संशोधनीय ज्ञान-संबंधी भ्रम है, जबकि इकाई के संदर्भ में व्याख्या करने पर माया एक अपरिहार्य सत्ता मीमांसा संबंधी भ्रम है।”

कान्सियसनेस ऐंड क्वांटम ब्रेन डायनॉमिक्स इन दि इमर्जिंग फिजिक्स ऑफ कन्सियसनेस (एडिटेड बाइ जैक ए तुस्ज्युन्स्की), स्प्रिंगर, 2006, पेज 371-85

इसके बाद 2009 में, ग्लोबस ने “प्रक्रिया दर्शन के साथ सुसंगत पारदर्शी संसार की एक क्वांटम न्यूरोफिलॉसॉफिकल व्याख्या करने की कोशिश की।” हालांकि पश्चिम में प्रक्रिया तत्वज्ञानियों की लंबी परंपरा है, हेराक्लिटस से लेकर अल्फ्रेड नॉर्थ व्हाइटहेड तक इसे बाहर कर दिया गया। जबकि हिंदू धर्म में, यह न केवल पश्चिम की भविष्यवाणी करता है, बल्कि एक दर्शन के रूप में संस्कृति में स्वयं को अच्छी तरह से स्थापित किया गया है, जैसा कि शिव के नृत्य में दर्शाया गया है। इस कार्य में, क्वांटम ब्रेन डायनामिक्स पर केन्द्रित दार्शनिक मुद्दों पर चर्चा करते समय ग्लोबस माया देवी को पुकारते हैं-

एक क्षणिक प्रणाली के रूप में मस्तिष्क में ध्यान के माध्यम से विटेलो चेतना को कुछ हद तक अपदस्थ करते हैं और इसे पर्यावरण मोड और सिस्टम मोड के समरूप स्मृति संकेतों के बीच एक विषय बनाते हैं लेकिन विटेलो फिर भी बाहरी दुनिया से चेतना को अलग करते हैं। यह संसार, जिससे हम इतने मुग्ध हैं और जिसके बारे में हम इतनी अधिक चिंता करते हैं, दार्शनिक विचार-विमर्श का एक केंद्र है। लेकिन संसार पर से ध्यान आसानी से हट जाता है क्योंकि मस्तिष्क की पारदर्शी शक्ति के परिणामस्वरूप, गैर-भावनात्मक ढंग से यह प्रकट हो जाता है। क्वांटम “तंत्र, जो उत्कृष्टता के भ्रम को बनाए रखती है, को छुपाते हुए देवी माया द्वारा आवरण हटा दिया जाता है।

दि ट्रांसपैरेन्ट बिकमिंग ऑफ वर्ल्ड- अ क्रासिंग बिटवीन प्रोसेस फिलॉसफी ऐंड क्वांटम न्यूरोफिलॉसफी, 2009

और फिर से-

“मस्तिष्क के विभिन्न क्षेत्रों में अचानक उत्पन्न होने वाली अप्रत्याशित समानताओं के विभिन्न गुण होते हैं दोनों के बीच सह-सम्बद्धता की बाध्यताएँ बाह्य संवेदी इनपुट, आतंरिक इच्छानुरूप इनपुट और पहचान की पुनः खोज से उत्पन्न होती हैंसमान इनपुट्स और समान समस्वरता से इसी तरह की दुनिया समानांतर पर प्रकट होती है और समान परिस्थितियों को देखते हुए भ्रमित होने की संभावना रहती है क्वान्टम मस्तिष्क के क्रियान्वयनी की पारदर्शिता में देवी माया का शासन आसानी से देखा जा सकता है।”

दि ट्रांसपैरेंट बिकमिंग ऑफ वर्ल्ड- अ क्रासिंग बिटवीन प्रोसेस फिलॉसफी ऐंड क्वांटम न्यूरोफिलॉसफी, 2009

हम हमारी खिडकियों का उपयोग कब करेंगे?

खिड़कियों पर वापस आते हैं, यह ग्लोबस के बारे में नहीं है और न ही यह सही या गलत वास्तविकता के प्रति उनके नज़रिए के बारे में है – हालाँकि, वह निश्चित रूप से एक उदहारण देते हैं कि हिंदू दर्शन कैसे विज्ञान का अनुभव करने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है। इस प्रकार प्रत्येक दर्शन और अवधारणा एक खिड़की बन सकती है। दरअसल, ‘वर्ल्ड नॉट’ की अवधारणा को तैयार करने में आर्थर शोपेनहाउर ने हिंदू विचारों का एक बहुत मजबूत प्रभाव दिखाया। सामान्य पश्चिमी मन-शरीर द्विविधता में आने के बजाय शोपेनहाउर ज्ञाता-ज्ञान अर्जन और ज्ञात की समस्या में आगे बढ़ते हैं:

“तदनुसार, विषय स्वयं को सिर्फ एक जिज्ञासु के रूप में जानता है न कि एक जानकार के रूप में। प्रतिनिधित्व करने वाला अहंकार कभी भी स्वयं में प्रतिनिधित्व या प्रयोजन नहीं बन सकता क्योंकि सभी प्रतिनिधित्वों के आवश्यक सहसंबंधी के रूप में, यह उनकी स्थिति है। इसके विपरीत पवित्र उपनिषद से उत्कृष्ट मार्ग लागू होता है: “यह दिखाई नहीं देता है: यह सबकुछ देखता है; यह सुनाई नहीं देता है: यह सबकुछ सुनता है; यह ज्ञात नहीं है: यह सबकुछ जानता है; और इसे पहचाना नहीं जाता: यह सबकुछ पहचानता है। इसे देखने, जानने, सुनने और पहचानने वाली इकाई के अलावा और कोई दूसरा नहीं है।” परिणामतः ज्ञान अर्जन का कोई ज्ञान नहीं है, क्योंकि इसे आवश्यकता होगी कि विषय स्वयं ज्ञान अर्जन से अलग हो और फिर भी उस ज्ञान अर्जन को जाने; और यह असंभव है। … अब गुण द्वारा ज्ञान अर्जन के साथ इच्छा के विषय की पहचान, जिससे (और वास्तव में ज़रूरी) शब्द ‘मैं’ दोनों को शामिल और इंगित करता है, दुनिया की गाँठ है और इसलिए गूढ़ है। … लेकिन जो भी इस पहचान की गूढ़ प्रकृति को समझता है, वह मेरे साथ इसे उत्कृष्टता के समान चमत्कार कहेगा।”

ऑन द फोरफोल्ड रूट ऑफ़ द प्रिंसिपल ऑफ़ सफिसियेंट रीज़न (1813:1847)

बोहर, जिन्हें संपूरकता सिद्धांत, जिसे ग्लोबस और कोठारी ‘वर्ल्ड नॉट’, जिसे चेतना के अध्ययन में एक मौलिक समस्या के रूप में पहचाना जाता है, के एक समाधान की पेशकश के रूप में देखते हैं, वह भी उपनिषदों से प्रभावित थे। भौतिक शास्त्री जॉन व्हीलर ने श्री रामकृष्ण मिशन के स्वामी जितात्मानंद को 10 जून 1999 को लिखे पत्र में यह स्वीकार किया:

“मेरे अद्भुत गुरु, नील्स बोहर उपनिषदों में गहरी रूचि ले चुके थे और उन्होंने जवाबों की अपेक्षा सवालों में मुझसे बात की। मुझे यह सोचना अच्छा लगता है कि कोई इस बात का पता लगाएगा कि भारत की गहरी सोच ने किस तरह ग्रीस और वहाँ से हमारे समय के दर्शन तक अपना रास्ता बनाया।”

यह नहीं कहना है कि हम पहले से ही सबकुछ जानते हैं बल्कि यह कहना है कि हमारे पास खिडकियों का एक अनूठा अवसर है, उनकी एक विविधता है, जिनके माध्यम से हम अपने व्यक्तिगत जीवन, हमारी बौद्धिक खोज, प्रकृति में हमारी खोज, और ब्रह्मांड के हमारे अनुभव को आकार दे सकते हैं। प्राचीन भव्य मंदिर हिंदू संस्कृति की सम्पूर्णता हैं, और इनमें क्या खूबसूरत खिड़कियाँ हैं, जो स्वयं देवताओं द्वारा संरक्षित होने योग्य हैं!

स्वराज्य के हेरिटेज टूर, 2018 से चालुक्य कालीन खिड़की

अरविंद स्वराज्य में एक सहायक संपादक है।