विचार
एक अलग उत्तरी कर्नाटक राज्य: हमें एक नए राज्य पुनर्गठन आयोग की आवश्यकता

प्रसंग
  • भारत में शायद करीब 40-50 राज्य होने चाहिए, जिसमें तमिलनाडु, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक दो भागों में या यहांँ तक कि तीन भागों में विभाजित होने के लिए प्रमुख दावेदार हैं।
  • इसी वजह से एक नए राज्य पुनर्गठन आयोग का मसला दिन-प्रतिदिन मजबूत हो रहा है।

यदि आंध्र प्रदेश से तेलंगाना का कटु विभाजन कोई संकेत है, तो कोई भी फिर से एक अलग उत्तरी कर्नाटक राज्य की नवीनीकृत मांग करने में संकोच करेगा। उत्तरी कर्नाटक के कुछ मठाधीशों द्वारा एक अलग राज्य की मांग को लेकर किए जा रहे आंदोलन को रोक दिया गया है, हालांकि उत्तर कर्नाटक होराटा समिति नामक एक अन्य संगठन ने प्रस्तावित राज्य के लिए एक ध्वज फहराने का प्रयास किया है।

भारत में छोटे राज्यों की मांग अपरिहार्य है, जहाँ कई राज्य प्रबंधन के लिए बहुत बड़े हैं और प्रशासनिक रूप से बोझिल हैं। इसके अलावा, राज्य की आंतरिक सांस्कृतिक विविधताएं और आर्थिक असमानताएं अलगाववादी विचारों को गति प्रदान करती हैं। कर्नाटक में, मुख्यमंत्री के रूप में एच. डी. कुमारस्वामी के उन्नयन ने यह भय फैला दिया है कि दक्षिणी कर्नाटक उनके प्रशासन का केन्द्र होगा। उनके हाल ही के बजट ने उन भयों को दूर करने के लिए कुछ भी नहीं किया है।

कर्नाटक, जिसकी वर्तमान जनसंख्या 64 मिलियन से अधिक है, अपनी गहन भाषाई एकता के बावजूद दो भागों में बाँटे जाने के योग्य है। राज्य की आबादी वर्तमान फ्रांस की आबादी के लगभग बराबर है और दुनिया में कम से कम 200 देश हैं जो इस समृद्ध दक्षिणी राज्य की तुलना में कम आबादी वाले हैं।

सांस्कृतिक रूप से, उत्तरी कर्नाटक के 13 जिलों ने भारतीय इतिहास में एक अलग भूमिका निभाई है। इन जिलों में पुरानी मुंबई और हैदराबाद क्षेत्र के कुछ हिस्से शामिल हैं और इसके अलावा ये दक्षिणी कर्नाटक की तुलना में अपेक्षाकृत कम विकसित हैं और यहाँ जल की कमी है। सैद्धांतित रूप से, एक अलग उत्तरी कर्नाटक को तेलंगाना, जो हैदराबाद और इसके संसाधनों को पाने में कामयाब रहा, के विपरीत संसाधन बढ़ाने में मुश्किल होगी। उत्तरी कर्नाटक उन संसाधनों से लाभान्वित होगा जिन संसाधनों का निर्माण मैसूर-बेंगलुरु क्षेत्र अपने विकास के लिए कर सकते हैं।

हालांकि, वास्तविकता यह है कि कोई भी समृद्ध राज्य वास्तव में अपने कमजोर क्षेत्रों का पिछड़ापन दूर करने में कामयाब नहीं रहा है, जैसा कि आंध्र प्रदेश के हैदराबाद से विभाजित होकर अलग हुए तेलंगाना का प्रदर्शन इस बात का प्रमाण है। वास्तव में किसी राज्य के समृद्ध क्षेत्र का दायित्व है कि वह उच्च प्रदर्शन के लिए मानक निर्धारित करे, क्योंकि उन क्षेत्रों को शहरीकरण तथा समृद्धि के लिए विकास का नेतृत्व करना होता है। बेंगलुरू और मैसूर को वास्तव में बेहतर शहरी शासन और अपने स्वयं के बुनियादी ढाँचे में अधिक निवेश के माध्यम से दक्षिण भारत के उभरते शहरी समुदाय बनने पर ध्यान देना चाहिए, जिससे उत्तरी कर्नाटक के लोगों सहित उनके आस-पास के गरीब जिलों के प्रवासियों के लिए कार्य की दिशा प्रदान की जा सके। महानगर बेंगलुरु राजनेताओं द्वारा बर्बाद हो रहा है जो धन कमाने और अपने निजी लाभ के लिए शहर का इस्तेमाल करते हैं।

दूसरी तरफ, एक नया राज्य अपने स्वयं के भौगोलिक केंद्र के नज़दीक, संभवतः हुबली-धारवाड़ के आस-पास स्थित अपने प्रशासनिक केंद्र के साथ उत्तरी कर्नाटक में विकास का एक नया केंद्र बन जाएगा। भारत का भविष्य तेज और बुद्धिमत्तापूर्ण शहरीकरण में निहित है, न कि एक समृद्ध शहरी क्षेत्र के द्वारा राज्य के बाहरी हिस्सों के गैर शहरी क्षेत्रों को सहायता देने में। बेंगलुरू अर्ब्स प्राइमा स्टेटस के लिए मुंबई और दिल्ली जैसे शहरों को चुनौती देना भारत के लिए सर्वोत्तम रहेगा, न कि कर्नाटक के बाकी हिस्सों के लिए एक दुधारू गाय बनके। उत्तरी कर्नाटक को एक समृद्ध बेंगलुरु के साथ-साथ अपने नए शहरी- केंद्रों का विकास करके लाभ मिलेगा।

इस प्रकार इस चर्चा से दो निष्कर्ष निकाले जाएंगे।

पहला, एक स्थिति यह है कि पूरी तरह से प्रशासनिक सुविधा के आधार एक पृथक उत्तरी कर्नाटक राज्य हो।

दूसरा, यह विभाजन सौहार्दपूर्ण होना चाहिए और घृणा की विक्षिप्त आंतरिक क्षेत्रीय राजनीति से प्रेरित नहीं होना चाहिए। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश का मामला, जहाँ दोनों क्षेत्रों के बीच दुर्भावना विभाजन के बाद लंबे समय तक जारी रही, हमें बताता है कि हमें किस चीज से बचना है। यह मॉडल उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार से उत्तराखंड, छत्तीसगढ़ और झारखंड के विभाजन जैसा होना चाहिए।

इसे समर्थ बनाने के लिए केंद्र की एनडीए सरकार को अलग राज्य की मांगों पर विचार करने के लिए तार्किक रूप से एक नए राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना करनी चाहिए। इसकी एक रूपरेखा बनानी चाहिए, ताकि विभाजन में नए राज्य और पिछले राज्य दोनों को लाभान्वित किया जा सके। इसे अलग राज्य बनाने की माँग करने वाले क्षेत्रों के लिए मानदंड निर्धारित करने चाहिए और भावनात्मक तर्क के आधार पर मुफ्त का प्रलोभन नहीं देना चाहिए।

भारत में शायद करीब 40-50 राज्य होने चाहिए, जिनमें तमिलनाडु, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और कर्नाटक दो भागों में या यहाँ तक कि तीन भागों में विभाजित होने के लिए प्रमुख दावेदार हैं। हमें पूर्ण रूप से नगर-राज्य बनाने का प्रयास करना चाहिए, जहाँ वे जीवक्षम दिखाई दें।

निश्चित रूप से एक उभयनिष्ठ भाषा पूर्ण रूप से भावनात्मक मुद्दा है जिस पर राज्यों को विभाजित करते समय ध्यान देने की आवश्यकता है। सच्चाई यह है कि कन्नड़ और तेलुगू कमजोर नहीं होंगी क्योंकि फिर उन्हें एक नहीं बल्कि दो राज्यों में समर्थन मिलेगा। यदि आठ हिंदी भाषी-राज्य हो सकते हैं, तो दो तमिल, मराठी, कन्नड़ या तेलुगू भाषी राज्य भी हो सकते हैं। लेकिन इस मुद्दे को संवेदनशीलता से संभालने की जरूरत है और यह सबक सीखने की जरूरत है कि नए राज्यों का निर्माण कटुतापूर्वक नहीं किया जाना चाहिए।

लेकिन एक नए राज्य पुनर्गठन आयोग का मसला दिन-प्रतिदिन मजबूत हो रहा है।

जगन्नाथ स्वराज के संपादकीय निदेशक हैं। वह @TheJaggi पर ट्वीट करते हैं।