विचार
न आक्रमण, न प्रवास- जानें भारतीयों के विषय में क्या कहता है अनुवांशिक अध्ययन

आशुचित्र- आर्य आक्रमण मॉडल की जगह प्रवास व्याख्या को अपनाया गया। अब एक नया अध्ययन इसके स्थान पर परस्पर प्रभाव मॉडल स्थापित कर रहा है।

वर्ष 2018 में प्रसिद्ध मीडिया में प्राचीन भारत में आवासन से संबंधित मनुष्य जाति पर चल रहे आणविक अनुसंधानों को लेकर कई आलेख प्रकाशित हुए जिन्होंने लोगों को जागरूक किया। प्राचीन डीएनए के परीक्षण में नए विकास ने इस नई दिलचस्पी को बढ़ावा दिया है। कई बार यह कहानियाँ औपनिवेशिक सामग्री जैसे आर्य और गैर-आर्य कहानियों के साथ भी आती हैं। भारत में आर्यों का आगमन 3,500 वर्ष पूर्व माना जाता है तथा इसका राजनीतिक प्रभाव दिखता है। यह देखना असामान्य नहीं होगा कि सार्वजनिक तौर पर लिखने वाले किसी भी नए आविष्कार के आस-पास के संवेदनवाद का फायदा उठाते हैं तथा कभी-कभी अनुसंधानकर्ता भी इसे भुगतते हैं।

इसी माहौल में एक अनुसंधान पत्र प्रकाशित हुआ है जो भारत के आवासन में हुई जटिल प्राचीन घटनाओं का उल्लेख करता है। “द जिनेटिक एंसीसट्री ऑफ मॉडर्न इंडस वैली पॉप्युलेशन्स फ्रॉम नॉर्थवेस्ट इंडिया” (अमेरिकन जर्नल ऑफ ह्यूमन जिनेटिक्स) नामक विषय पर एस्टोनियन बायोसेंटर के डॉ. अजय के पाठक, इंस्टिट्यूट ऑफ जीनोमिक्स, तारतु विश्वविद्यालय तथा एक अंतरराष्ट्रीय दल ने शोध किया था। इस पत्र में टूमस कीवीसील्ड, मैट मेट्सपालू, रिचर्ड विलेम्स जैसे आणविक नृविज्ञान के प्रतिष्ठित नाम, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के डॉ. ज्ञानेश्वर चौबे भी शामिल हैं। डॉ. चौबे प्राचीन दक्षिण एशिया जीनोमिक डायनामिक्स के कार्य के लिए ज़िम्मेदार हैं। इस दल में पूरे विश्व के कुल 17 अनुसंधानकर्ता शामिल थे।

पत्र में दक्षिण एशिया तथा पश्चिम यूरेशिया के बीच हुए कई ऐतिहासिक पलायनों के प्रसंग के आधार पर उत्तर-पश्चिम भारत के 45 आधुनिक व्यक्तियों के जीनोम स्तर पर आनुवंशिक डाटा का अध्ययन किया गया है। पत्र के अनुसार जिन समूहों का अध्ययन किया गया है उनमें एक समुदाय रोर “आनुवंशिकी तौर पर पश्चिमी भारत के लोगों से समानता रखते हैं।”

डॉ अजय के पाठक

यह क्यों महत्त्वपूर्ण है तथा मीडिया का ध्यान पाने वाले अन्य शोधों से किस तरह भिन्न है? इस पर डॉ. पाठक उत्तर देते हैं, “उत्तर-पश्चिमी भारत के कई सारे अनुवांशिक अध्ययन यूनिपैरेंटल डाटा का उपयोग करते हैं तथा पैतृक वंशावली या मातृक वंशावली के अध्ययन पर केंद्रित होते हैं। यह अध्ययन बाइपैरेंटल जीनोम डाटा का उपयोग करता है तथा इस महत्त्वपूर्ण क्षेत्र के लोगों के अनुवांशिक डाटा को स्पष्ट रूप से प्रकट करता है।”

जिन रोर व्यक्तियों के डाटा पर शोध किया गया, वे कुरुक्षेत्र के 100 किलोमीटर के दायरे में रहने वाले लोग हैं। वहीं कुछ डाटा 100-400 किलोमीटर के दायरे वाले व्यक्तियों का भी लिया गया है। इसमें सिडनी में कार्यरत तथा आईआईटीयन अनुराग कादियान ने नमूने एकत्रित करने में सहायता की। अनुराग हरियाणा के रोर समुदाय की वंशावली की जड़ों को समझने के लिए उत्सुकता रखते हैं। डॉ. पाठक के अनुसार, “सिंधु घाटी के पश्चिमी तथा पूर्वी क्षेत्र के लोगों में अनुवांशिक निरंतरता दिखती है जो घाटी में प्रागैतिहासिक (प्री-हिस्टॉरिकल) समय में पलायन को स्पष्ट करता है।” इस पलायन का कारण कई वर्षों तक पड़ा रहा सूखा हो सकता है। जैसा कि एक अन्य अध्ययन में बताया गया था कि इस क्षेत्र में 900 वर्षों तक सूखा पड़ा रहा था जिसने सिंधु घाटी सभ्यता को खत्म कर दिया होगा तथा यहाँ के लोगों ने अनुकूल मौसम तथा पानी के संसाधन खोजते हुए गंगा के आस-पास के मैदानी क्षेत्र में पलायन किया होगा।

अध्ययन के अन्य महत्त्वपूर्ण बिंदुओं में एक है- आधुनिक सिंधु क्षेत्र के लोगों में अनुवांशिक विविधता होना। इसके लिए वैज्ञानिकों का कहना है कि यह प्राचीन सिंधु सभ्यता के समय आई होगी। डॉ. पाठक के अनुसार इसे पुरातात्विक सबूत अधिक मंडित करते हैं जो बताते हैं, “हड़प्पा सभ्यता ने भिन्न क्षेत्रीय तथा जनजातीय विशेषताओं को एकीकृत किया होगा।”

पूरे विश्व के डीएनए से तुलना करने के बाद इस अध्ययन का प्रमुख निष्कर्ष रहा कि रोर तथा जाट समुदाय अनुवांशिक तौर पर पश्चिमी भारत में रहने वाली जनसंख्या के समान हैं। रोर तथा जाट समुदाय के लोगों की मध्य एशियाई तथा कांस्य युग के मैदानी इलाकों के समुदायों से तथा ईरानी निओलिथिक की तुलना में एनेटोलियन निओलिथिक से अधिक समानता की वजह से रहस्य और गहरा जाता है। डॉ. पाठक के अनुसार, “यह शोध इन समुदायों को मुख्य जनसंख्या बताता है जिस कारण उत्तर भारत की वंशावली दक्षिण एशिया में सिंधु क्षेत्र के लोगों के भारी पलायन की वजह से फैली।” परस्पर क्रिया पर आधारित यह प्रारूप शिष्ट तथा कुशल अध्ययन पर आधारित है तथा पलायन अथवा आक्रमण पर आधारित प्रारूपों से भिन्न है।

अभी भी कुछ चीजों पर मंथन किया जा रहा है। वहीं मैदानी आबादी को भी दो खंडों में विभाजित कर दिया गया है- पहला तो प्राचीन से लेकर मध्य कांस्य युग (स्टेपी_ईएमबीए) तथा दूसरा नवीन से लेकर मध्य कांस्य युग (स्टेपी_एमएलबीए) तक। अध्ययन में उपयोग किया गया एक प्रारूप बताता है, “गंगा के आस-पास के मैदानों के उत्तर भारतीय भारत-यूरोपियन समुदाय तथा द्रविड़ियन दक्षिणी एशियाई समुदाय स्टेपी_ईएमबीए लोगों से समानता रखते हैं न कि स्टेपी_एमएलबीए समुदाय से। “वहीं पाकिस्तान की स्वात घाटी के प्रागैतिहासिक तथा प्राचीन ऐतिहासिक दक्षिणी एशियाई लोगों में स्टेपी_एमएलबीए से अधिक समानता है। इसी कारण पहेली अभी उलझी हुई है लेकिन परस्पर क्रियाओं पर आधारित स्वरूप अधिक विश्वसनीय होता जा रहा है।

इस अध्ययन का हिस्सा रहे डॉ. चौबे कहते हैं, “किसी भी समय में अफ्रीका के बाद भारत में सबसे कम अतिक्रमण हुआ है।” और “अनुवांशिक डाटा भाषाई डाटा से समानता नहीं रखता।” वहीं अनुवांशिक अंकगणक आर1ए स्टेपी के फैलाव पर आधारित है। डॉ. चौबे ने हाल में दिए अपने प्रस्तुतिकरण में आर1ए की शाखा- एल657 (या एम780) के मूल को स्थिर बताया। अध्ययन ने एक चीज़ स्पष्ट रूप से बताई है- भारत तथा उसकी सभ्यता केंद्र हमेशा भिन्न आबादियों का केंद्र रही है जिनके मिश्रण से हम भारतीय बने हैं।

अरविंदन स्वराज्य में सहयोगी संपादक हैं।