भारती / विचार
टीका की नई नीति को स्पष्टीकरण की आवश्यकता, 1 मई की जल्दबाज़ी से बेहतर देरी

मैं पिछले दो दिनों से स्वयं और अपनी पत्नी को टीका की दूसरी डोज़ लगवाने के लिए जो संघर्ष कर रहा हूँ, उससे मुझे दो आधारभूत समस्याएँ समझ में आई हैं- पहली यह कि लघु अवधि में आपूर्ति की तंगी है, विशेषकर कोवैक्सीन के लिए और दूसरी समस्या है टीका मूल्य पर विभाजित सहमतियाँ।

वर्तमान परिदृश्य में केंद्र को एक मूल्य पर टीका मिलता है, राज्यों से अपेक्षा है कि वे अपने आप टीका के किसी मूल्य पर समझौता करें और निजी स्वास्थ्य सेवा प्रदाता एवं निगमों को उससे उच्चतर दर पर टीका मिलेगा। पिछले कुछ सप्ताहों की घटनाओं से हम निम्न समस्याओं और नीति विफलताओं का निष्कर्ष निकाल सकते हैं-

पहला, टीका की पहुँच धीरे-धीरे विभिन्न आयुवर्गों तक बढ़ाने की पुरानी नीति अब अप्रासंगिक हो गई है। हो सकता है वह नीति त्रुटिपूर्ण रही हो लेकिन 18 वर्ष से अधिक आयु के हर व्यक्ति को अचानक टीका देने की घोषणा, वह भी तब जब आपूर्ति माँग के अनुरूप नहीं है, वह उससे भी अधिक त्रुटिपूर्ण है।

यह जो नई नीति है, वह राजनीतिक दबाव और लघु अवधि के विचार से प्रेरित लगती है। कोई नीति तब तक काम नहीं करेगी, जब तक हम दूरदृष्टि से विचार न करें क्योंकि सिर्फ माँग के बढ़ने से विनिर्माता अगले कुछ महीनों में आपूर्ति नहीं बढ़ा सकते हैं।

दूसरा, तीन दरों वाले मॉडल में बड़े फेरबदल की आवश्यकता है। आप अपेक्षा नहीं कर सकते कि 28 राज्य अपनी लघु अवधि की टीका आपूर्ति के लिए अलग से समझौता करें और फिर मूल्य भी किफायती रहे। यदि महाराष्ट्र 1.5 करोड़ और उत्तर प्रदेश 1 करोड़ वैक्सीन का ऑर्डर देता है तो स्पष्ट है कि ये तत्काल आवश्यकताएँ हैं और दीर्घ अवधि की वैक्सीन आवश्यकताओं का आकलन नहीं किया गया है।

तार्किक रूप से केंद्र को राज्यों से परामर्श करना चाहिए, उनकी लघु अवधि और दीर्घ अवधि की आवश्यकताओं को एक-साथ लाना चाहिए और फिर घरेलू एवं वैश्विक विनिर्माताओं से सर्वश्रेष्ठ मूल्य के लिए समझौता करना चाहिए। इसके बाद निजी खिलाड़ियों से अपनी आवश्यकताओं और उच्च दर देकर टीकाकरण हेतु इच्छुक लोगों के लिए व्यावसायिक स्तर पर वैक्सीन खरीदने के लिए कहा जा सकता है।

कोविशील्ड

तीसरा, नीति का एक महत्त्वपूर्ण उद्देश्य भी है जो पहले प्रत्यक्ष नहीं हुआ था- वैक्सीन अब एक सार्वजनिक वस्तु बन गए हैं और कोई निजी लाभ या बढ़ते कोविड मामलों से निपटने के लिए कोई अतिरिक्त विकल्प नहीं रह गए हैं। इसका अर्थ हुआ कि जो इसे मुफ्त चाहते हैं, उन्हें टीका मुफ्त में मिलना चाहिए।

यह संकेत देता है कि केंद्र को विनिर्माताओं से और मोलभाव करके सब्सिडी की जो लागत होती है, उसे ऑर्डर संख्या के अनुसार राज्यों से बाँट लेनी चाहिए। आदर्श स्थिति वह होगी जिसमें सरकार को एक मूल्य पर वैक्सीन मिले (न कि केंद्र के लिए 150 रुपये, राज्यों के लिए 300-400 रुपये, आदि) जहाँ पर सब्सिडी लागत का बटवारा केंद्र और राज्य के बीच हो।

सीमित आयुवर्ग के लोग जो संक्रमण से अधिक प्रभावितों की श्रेणी में आते हैं, उनके लिए केंद्र पूरा खर्चा उठा सकती है। वहीं, इस श्रेणी से बाहर के लोगों के लिएकेंद्र और राज्य खर्चे को आधा-आधा बाँट सकते हैं। केंद्र और राज्य की सूची में किस आयुवर्ग के लोग आएँगे, इसकी समीक्षा हर माह की जा सकती है ताकि राज्यों और वैक्सीन विनिर्माताओं को अपनी अर्थव्यवस्थाओं को संभालने का समय मिल जाए।

चौथा, कुछ टिप्पणीकारों ने सलाह दी है कि विदेशी टीकों के लिए द्वार बंद करना एक गलती थी लेकिन यदि आप उनके लिए राज्य द्वारा सब्सिडी के रूप में खर्च की जाने वाली राशि की गणना करेंगे तो पाएँगे कि वित्तीय सहायता से घरेलू आपूर्तिकर्ताओं को प्राथमिकता देना ही समझदारी है क्योंकि विदेशी टीके प्रति डोज़ 15-20 डॉलर से कम नहीं पड़ने वाले।

बाज़ार आधारित दरों पर भी सीरम इंस्टीट्यूट 5 डॉलर पर एक डोज़ दे सकता है और मोलभाव करके मूल्य कम भी कराया जा सकता है। इससे दोगुने या तिगुने दाम से कम कोई विदेशी आपूर्तिकर्ता टीका नहीं देगा। इसके अलावा फाइज़र और मॉडर्ना जैसे टीकों को शीत भंडारण इंफ्रास्ट्रक्चर की आवश्यकता है जो भारत में उपलब्ध नहीं है।

फाइज़र का टीका

 

हालाँकि, फिर भी टीका नीति का यह भाग संशोधित किया जा चुका है और कोई भी कंपनी जहाँ माँग हो, वहाँ अपना टीका बेच सकती है।

पाँचवाँ, मूल्य। भारतीय टीका विनिर्माताओं ने अपना मूल्य 400-600 रुपये (और निजी क्षेत्र के लिए और अधिक) इसलिए घोषित किया है क्योंकि वे जानते हैं कि कुछ समय बाद माँग की आपूर्ति करने में समस्या आने वाली है। क्षमता बढ़ाने, भंडारण व वितरण प्रणाली सुदृढ़ करने में समय और निवेश लगता है लेकिन क्या कोई गारंटी दे सकता है कि वर्तमान माँग 2022 या उसके बाद भी बनी रहेगी।

इस समस्या का समाधान केंद्र के हाथों में है, वह दो चीज़ें कर सकती है- कम से कम अगले 12 महीनों तक नज़र बनाए रखे और कोविड के घटने पर माँग एकदम से न गिर जाए, उस स्थिति में किसी नुकसान से बचाने के लिए कंपनियों को न्यूनतम मुआवज़ा आश्वस्त करे।

12 महीने तक स्थिति पर नज़र रखने से न सिर्फ राज्य और वैक्सीन विनिर्माता तीसरी या चौथी लहर के लिए तैयारी कर पाएँगे बल्कि साथ ही सरकार को डाटा भी मिलेगा कि मध्यम अवधि में वैक्सीन निर्माताओं को कैसे मुआवज़ा दिया जाए जब माँग अनपेक्षित रहे।

छठा, नई वायरस संरचनाओं के लिए नए टीकों का विकास करने हेतु और निवेश करने की आवश्यकता है। साथ ही अधिक अनुवांशिक टेस्टिंग की भी आवश्यकता है। साथ ही 18 वर्ष से कम आयु के लोगों और बच्चों की रक्षा के लिए भी तरीके ढूंढने की आवश्यकता को हमें अनदेखा नहीं करना चाहिए।

इन विषयों पर सोचने का समय अब है जब नाबालिग आयुवर्ग से अभी भी कम मामले देखने को मिल रहे हैं। हम यह मानकर नहीं चल सकते कि वे सदैव कोविड से सुरक्षित रहेंगे या भाग्य उनका साथ देता रहेगा। पहले हम यह सुन रहे थे कि वायरस युवाओं को प्रभावित नहीं कर रहा है, लेकिन अचानक इस आयुवर्ग में भी कोविड के गंभीर मामले देखने को मिल रहे हैं।

वायरस प्राथमिकता सिर्फ इस बात को देता है कि लोगों को संक्रमित करने की शक्ति उसमें बनी रहे। जब वयस्कों का टीकाकरण हो जाएगा तो हम अपेक्षा कर सकते हैं कि अनुवांशिक परिवर्तन करके वायरस एक ऐसा रूप धर लेगा जो नाबालिगों को निशाना बनाने लगे क्योंकि वे लोग तब तक सुरक्षित नहीं हो सकेंगे।

हम अपेक्षा करते हैं कि इन सारी समस्याओं का समाधान 1 मई तक कर दिया जाए, जब देश को एक नई टीका नीति मिलेगी। हालाँकि, यह बुरा विचार नहीं है कि हम सभी का टीकाकरण करने की तिथि को थोड़ा आगे बढ़ा दें जब तक कि आपूर्ति और मूल्य की स्थिति स्पष्ट न हो जाए।

जल्दबाज़ी में गलती करने से बेहतर होगा कि हम सभी का टीकाकरण शुरू करने से पहले अपनी नीति को दुरुस्त कर लें क्योंकि अभी यह नीति पूरी तैयार नहीं लगती है।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi के माध्यम से ट्वीट करते हैं।