विचार
नेताजी को जानने-समझने के लिए इतिहास की दृष्टि में संतुलन आवश्यक

आशुचित्र- आज की पीढ़ी जब अपने इतिहास के बारे में पढ़ती है तो नेताजी के बारे में नए सिरे से जानने की आवश्यकता महसूस करती है।

इंग्लैंड के तत्कालीन प्रधानमंत्री क्लेमेंट एटली ने जिन नेताजी को अंग्रेज़ों के भारत से पलायन का सबसे बड़ा कारण बताया था, उन नेताजी का ज़िक्र हमारे पाठ्यक्रमों की चंद लाइनों तक समेटने वाले हमारे दरबारी इतिहासकारों और उनके संरक्षकों को विफल करते हुए आज फिर से नेताजी सुभाष चंद्र बोस भारतीय जनमानस के विचारों के केंद्र में आ गए हैं।  द्वारा लाल किले पर तिरंगा फहराया गया। 21 अक्टूबर 1943 को सिंगापुर में स्थापित की गई नेताजी की आज़ाद हिंद फौज के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में 21 अक्टूबर 2018 को भारत के प्रधानमंत्री द्वारा लाल किले पर तिरंगा फहराया जाना नेताजी के योगदान के प्रति देश की कृतज्ञता जताने का सही तरीका था।

भारत के स्वतंत्रता संग्राम में किसी भी प्रकार का योगदान देने वाला सेनानी हमारी आज की पीढ़ी के लिए वंदनीय होना चाहिए। आज़ादी की लड़ाई के नायक व नायिकाओं में तुलना करना उचित नहीं है लेकिन स्वतंत्रता के बाद जब आज़ादी की लड़ाई का इतिहास लिखा गया तो हमारे ‘आधिकारिक’ इतिहाकारों ने अपने राजनीतिक संरक्षकों के हितों का आग्रह लेते हुए स्वतंत्रता के इतिहास को दरबारी रंग में रंग दिया। कुछ राजनेताओं को और ऊँचा उठाने के लिए दूसरे सेनानियों को बौना किया गया। यह कदम दुर्भाग्यपूर्ण था और इसने हमारी पिछली पीढ़ियों की इतिहास की समझ को गलत ढंग से प्रभावित भी किया। जब हमारे पाठ्यक्रम की पुस्तकों में भगत सिंह के लिए ‘आतंकी’ शब्द का प्रयोग हुआ, शिवाजी के लिए ‘पहाड़ी चूहा’ और वीर मराठों के लिए ‘लुटेरा’ शब्द का प्रयोग हुआ तो इस बात में कोई संदेह नहीं रह गया कि हमारा पाठ्यक्रम हमारे इतिहास की सही तस्वीर पेश नहीं कर रहा है। 1857 में हुए ‘स्वतंत्रता के प्रथम विद्रोह’ को ‘कुछ सिपाहियों की बगावत’ कहने और मानने वाले तथा भारतीयों के जन-मन में ‘नेता जी’ के उपनाम से समाए हुए सुभाष बाबू के लिए ‘तोजो का कुत्ता’ जैसे तंज कसने वाले लोगों की मानसिकता एक है। इनकी कलमों से निकली हमारे इतिहास की कहानियों ने हमारी आज की पीढ़ी को विरासत में अनेक दृष्टिदोष दिए हैं। आज आवश्यकता है कि उन दृष्टिदोषों को दूर करते हुए अपनी युवा पीढ़ी की इतिहास को देखने वाली दृष्टि को साफ और संतुलित किया जाए। राष्ट्रभाव के लिए जीने व मरने वाले हमारे नायक, नायिकाओं व विभूतियों से हमारे युवाओं, किशोरों व नौनिहलों को परिचित कराया जाए ताकि हमारे प्रेरणा स्रोत सही लोग हों।

आज सूचना प्राप्त करने के माध्यम पहले की तुलना में कहीं अधिक हैं। इस सूचना क्रांति के युग में ज़बरदस्ती काढ़ा गया इतिहास वास्तविकता को ज़्यादा समय तक नहीं छिपा सकता। आज की पीढ़ी जब अपने इतिहास के बारे में पढ़ती है तो नेताजी के बारे में नए सिरे से जानने की आवश्यकता महसूस करती है।

इस पीढ़ी को सिर्फ यही बताया गया है कि नेताजी ने आज़ाद हिंद फौज की स्थापना की थी। उसे यह बताए जाने की आवश्यकता है कि उन्होंने न सिर्फ आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन किया था बल्कि उस फ़ौज के पराक्रम से विजित ब्रिटिश इंडिया के क्षेत्रों को भारत की आज़ाद भूमि घोषित करते हुए आज़ाद हिंद सरकार की स्थापना भी की थी। आज की पीढ़ी को यह भी बताया गया है कि नेताजी ने नाज़ी जर्मनी और जापान की मदद ली और हिंसा का मार्ग चुना अतः वह हमारे लिए आदर्श नहीं हो सकते। परंतु, साथ में यह भी बताया जाना चाहिए कि आज़ाद हिंद सरकार को उस समय चीन, कोरिया, इटली, जर्मनी, फिलिपीन्स, थाईलैंड, बर्मा, क्रोएशिया आदि देशों ने भी अधिकारिक रूप से भारत की सरकर के रूप में मान्यता दी थी। इससे ब्रिटिश सरकार की अंतर्राष्ट्रीय छवि के ऊपर गहरा आघात हुआ था। इतना ही नहीं सुभाष बाबू ने आज़ाद हिंद भारत की सरकार के द्वारा आज़ाद हिंद का बैंक भी स्थापित कर लिया था जिसका नाम आज़ाद हिन्द बैंक रखा गया। जिसने अपनी अलग मुद्राएँ छापीं व उन्हें प्रचलन में भी ले आए।

नेताजी के योगदान को कम करके दिखाने के पीछे के कारणों की तलाश उनके द्वारा स्वयं महात्मा गांधी के उम्मीदवार को हराने के प्रसंग में जाकर भी की जा सकती है और यह तलाश नेताजी द्वारा साम्यवाद को सिरे नकारे जाने के विचार में जाकर भी की जा सकती है। परंतु नेताजी का राष्ट्र प्रेम और उनसे उपजती अपार रचनात्मक संभावनाएँ अपने आप में ही दरबारी कलमकारों द्वारा उन्हें न पसंद किए जाने का पर्याप्त कारण है। 14 वर्ष की आयु में घर से भागकर दक्षिणेश्वर जाकर रामकृष्ण आश्रम में सन्यासी बनने का प्रयास करने वाले सुभाष को अगर रामकृष्ण मठ के संतों ने लौटाया न होता, तो संभवतः भारत को ‘नेताजी’ सुभाष चंद्र बोस न मिलते। और शायद भारत को 1947 में अंग्रेज़ भारत इतनी आसानी से छोड़ कर गए भी न होते।

प्रेसीडेंसी कॉलेज के जिस छात्र सुभाष ने भारतीय समाज के बारे में अभद्र टिप्पणी करने के लिए अंग्रेज़ प्रोफेसर को जूते से मारा, उसी सुभाष के सैन्य अभियान ने भारतीयों के मन में यह भाव स्थापित किया कि मात्र सत्याग्रह एवं बातचीत ही नहीं बल्कि सशस्त्र संघर्ष भी स्वतंत्रता संग्राम में पूर्णतः वैध और नैतिक रास्ता है।

सुभाष चंद्र बोस ने मात्र अपने नेतृत्व के दम पर भारत के लिए अपनी सरकार, अपनी स्वतंत्र सेना और अपना स्वतंत्र कोष स्थापित करके तथा उसे लगभग आधी दुनिया से मान्यता दिला कर अंग्रेज़ी सरकार के नैतिक आधार को समाप्त कर दिया। इन उपलब्धियों ने भारतीयों में यह भाव भरा कि स्वतंत्रता को याचना से नहीं बल्कि रण से प्राप्त किया जा सकता है। नेता जी के आह्वान पर बहुत ही भारी संख्या में भारत वंशी सिपाही और अधिकारी दुनिया भर में फैली ब्रिटिश सेना को छोड़ कर आज़ाद हिंद फ़ौज में शामिल हो गए। नेताजी के नेतृत्व में विश्वास व्यक्त करते हुए ब्रिटिश प्रशासन में कार्यरत अनेक प्रशासनिक अधिकारियों ने भी नेताजी से भेंट कर स्वयं को उनकी सेवा में समर्पित किया। नेताजी ने यह सब तमाम संसाधन और लोग द्वितीय विश्वयुद्ध के संकट काल में जुटाए थे और इन्हीं के दम पर नेताजी ने भारत में पूर्वोत्तर की दिशा से अंग्रेज़ी सेना पर हमला कर दिया। अंग्रेज़ी सेना पहले की तुलना में काफी कमज़ोर हो चुकी थी तथा आज़ाद हिंद फ़ौज के सामने उसको अनेक मोर्चों पर करारी शिकस्त का सामना करना पड़ रहा था लेकिन अंतर्राष्ट्रीय घटनाक्रमों में हुए परिवर्तनों के चलते एवं नेताजी के मित्र राष्ट्र जापान के द्वारा आत्म समर्पण करने के करण नेताजी को अपना अभियान मणिपुर में ही रोकना पड़ा।

अगस्त 1945 में नेताजी को एक विमान हादसे में मृत घोषित कर दिया गया। हालाँकि उनकी मृत्यु पर संदेह बना रहा और यह बहस का एक अलग ही मुद्दा है। परंतु इतना कह सकते हैं कि 1945 के बाद नेता जी प्रत्यक्ष रूप से कभी सक्रिय नहीं हुए लेकिन उनकी प्रेरणा ने अंग्रेज़ी सरकार को झकझोरना जारी रखा। 1946 में मुंबई में अंग्रेज़ों को एक अभूतपूर्व चुनौती का सामना करना पड़ा जब पहली बार रॉयल इंडियन नेवी (RIN) ने अंग्रेज़ी सरकार के हुक्म को मानने से इनकार कर दिया। इस विद्रोह ने और इससे पहले आज़ाद हिंद फौज की गतिविधियों ने अंग्रेज़ों के भारत में टिकने का सबसे बड़ा आधार यानि सेना पर उनके नियंत्रण को समाप्त कर दिया। आम अंग्रेज़ों को भारत में अपनी दैहिक सुरक्षा की चिंता सताने लगी और यही भय उनके भारत से पलायन का प्रमुख कारण बना।

कवि प्रदीप द्वारा महात्मा गांधी जी की स्तुति में लिखा गीत ‘दे दी हमे आज़ादी बिना खड़ग, बिना ढाल….’ एक भावनात्मक अभिव्यक्ति है लेकिन यह ऐतिहासिक तथ्य नहीं है। लेकिन जन स्मृति में इसी भाव को तथ्य के रूप में स्थापित करने का कुत्सित प्रयास करने वालों ने हमारे समाज के साथ अन्याय ही किया है| बलिदान देने वाले नेताजी, भगत सिंह, वीर सावरकर जैसे सेनानियों के योगदान को शामिल किए बिना भारत की स्वतंत्रता का इतिहास लिखा ही नहीं जा सकता।

श्रीनिवास अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के राष्ट्रीय सह-संगठन मंत्री हैं।