राजनीति / विचार
तत्काल आवश्यकता- कांग्रेस-वामपंथियों के दुष्प्रचार को देना होगा करारा जवाब

आशुचित्र- वर्तमान सत्तारूढ़ व्यवस्था के नेता जो भले ही भारतीय सभ्यता के विकास के लिए प्रतिबद्ध हों, लेकिन वे दुष्प्रचार और अर्ध-सत्य प्रचार-प्रसार से निपटने के लिए तैयार नहीं हैं और ज़रा से दबाव में कमज़ोर पड़ जाते हैं।

हमारा लोकतंत्र अर्ध-पक्व है जिसमें अंग्रेज़ों द्वारा छोड़ी गई कई दोष-रेखाएँ हैं। हालाँकि, ये दरारें वास्तविकता में मध्य एशिया के लूटेरों के 700 साल से अधिक के आक्रमण के बाद बनीं हैं।

इस अस्त-व्यस्त संरचना को मिश्रित समुदायों और 1947 से राइसिना हिल्स के सत्तारूढ़ चालबाज़ों ने स्थायी छोड़ दिया, जब तक कि मई 2014 में नई सरकार ने कार्यभार नहीं संभाला। प्रशासकों के लिए आसान नहीं था कि वे मलिन स्थिति को साफ करें, लेकिन भाजपा की एन.डी.ए. सरकार के दौरान सकारात्मक परिवर्तन देखे गए। हालाँकि यह साफ हो गया कि पिछले शासकों द्वारा किए गए गलत कार्यों को सही करने के लिए ये सरकार तैयार नहीं थी और अल्प-शक्त थी।

लेखक ने हाल ही में यह समझने के लिए एक विश्लेषणात्मक ढाँचा तैयार किया कि कुलीनतंत्र और उत्कृष्ट वर्ग जो राजनीतिक युद्धों में हार जाते हैं, वे कैसे अपने उत्तराधिकारियों के शासनकाल को दुर्बल करते हैं।

हालाँकि, मेरा लेख इसी वर्ष मार्च में प्रकाशित हुआ था, लेकिन देश में स्थिति और अस्थिर हो गई है। कांग्रेस की यू.पी.ए. सरकार इस अस्थिरता की प्रचालक है जो केंद्र सरकार पर अनेक मुद्दों पर हमले कर रही है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर विशेषकर निशाना साधा जा रहा है। इन आक्रमणों का मुख्य मुद्दा भारतीय वायु सेना का राफेल सौदा रहा है जो दशक भर की वार्ता के बाद सितंबर 2016 में सुनिश्चित हुआ था।

सच्चाई यह है कि राफेल सौदा कांग्रेस की डूबती हुई कश्ती का सहारा सिद्ध हुआ है जो लगभग मृत हो चुकी थी। इस जीर्ण वाहन ने गति पकड़ ली है और भाजपा के रथ पर वार कर रहा है। खासकर कि राहुल गांधी अपने मीडिया समर्थकों के साथ इस मुद्दे पर अपना पूरा ध्यान दे रहे हैं। प्रिंट और एलेक्ट्रॉनिक मीडिया में वाद-विवाद का स्तर तेज़, सूचना के अभाव से पीड़ित, बुरी तरह मुड़ा हुआ और विकृत है। कुछ मीडिया संस्थाएँ जो इस वाक्-युद्ध में तथ्यों के सहारे लड़ रहे हैं, वे इतनी कम हैं कि उंगलियों पर गिनी जा सकती हैं।

सत्तारूढ़ व्यवस्था इस मुद्दे पर न जाने क्यों बचावपूर्ण रवैया अपना रही है और हमले का जवाब देने में भ्रमित नज़र आ रही है। मंत्री और पार्टी प्रवक्ता मुँह बंद किए और कम तैयार नज़र आ रहे हैं। हालाँकि यह चूक क्षमा योग्य नहीं है, क्योंकि इतिहास हमेशा विजेताओं द्वारा लिखा जाता है, हमें पीछे मुड़कर देखना चाहिए कि इस प्रकार की परिस्थितियों में क्या हुआ और इतिहास से अमूल्य सीख लेनी चाहिए।

पहला पाठ जो मैं अतीत से पाठकों के सामने रखूँगा, वह फ्रांस के पॉपुलर फ्रंट गवर्नमेंट के विरुद्ध 1930 के दशक के मध्य में विरोधियों द्वारा की गई साज़िश है। प्रतिरोधियों में देश के बड़े व्यापार समूह, प्राचीन रक्षा अवशेष, कैथोलिक चर्च और जर्मनी-इटली के नाज़ी-फ़ासी समर्थक सम्मिलित थे।

अन्य यूरोपी देशों की तरह ही 1930 के दशक में फ्रांस ने भी सामाजिक तनाव और वर्ग युद्ध देखा। इसके साथ 1920 के अंत और 1930 के आरंभ में ग्रेट डिप्रेशन के कारण संघर्ष भी था। जनवरी 1933 में पड़ोसी देश जर्मनी में हिटलर सत्ता में आया और एक साल बाद वामपंथी दलों और पूर्व राजवादियों के प्रचालन से फ्रांसीसी सरकार का पतन हो गया।

1936 में पॉपुलर फ्रंट ने संसदीय चुनाव जीते और सामाजिक प्रजातंत्रवादी लियन ब्लम ने उग्रवादियों के साथ मिलकर सरकार बना ली जिसे साम्यवादियों का समर्थन प्राप्त था। अनुकूल चुनावी परिणामों से प्रोत्साहित होकर कर्मचारी वर्ग ने हड़तालें की और कारखानों पर कब्ज़ा कर लिया, जो जंगल की आग की तरह फैला और एक सामान्य हड़ताल का रूप लिया जिसके कारण 25 लाख लोग गतिमान हुए। फ्रांस क्रांति की कगार पर था।

सरकार ने सामाजिक-कल्याण और आर्थिक सुधार के लिए अत्यावश्यक कदम उठाए जिसके अनुसार विभिन्न उद्योगों के कर्मचारियों को वेतन-वृद्धि, 40 घंटों का कार्यकारी सप्ताह, प्रदत्त वार्षिक अवकाश और स्वास्थ्य सुविधा दी गई।

हड़ताल के अधिकार और सामूहिक सौदेबाज़ी को भी सांस्थानिक कर दिया गया। इसके कारण बड़े व्यापारों, चर्चों और अभिजात वर्गों से सरकार का विरोध हुआ। कट्टर दक्षिणपंथियों ने सरकार पर संसद में और बाहर वार किया।

पॉपुलर फ्रंट के विरोधी बस अपने प्रचार-प्रसार तक ही सीमित नहीं रहे। कगूल नामक कट्टर समूह ने सरकार के विरुद्ध सैन्य बल के प्रयोग करने का भी प्रयास किया लेकिन भाग्यवश यह असफल हुआ। लेकिन सरकार समर्थक कुछ लोगों की हत्याएँ ज़रूर हुईं। सरकार विरोधी एक क्रूर प्रेस अभियान भी चलाया गया। सोशलिस्ट मिनिस्टर फॉर इंटीरियर (गृहमंत्री) रोजर सलेंग्रो पर झूठा आरोप लगाया गया कि प्रथम विश्वयुद्ध में उन्होंने कायरता दिखाई और उन्हें आत्महत्या के लिए उकसाया गया।

हमारे पाठक इस कहानी के सदृश हमारी स्थिति समझ गए होंगे हालाँकि हर घटना का समानक उपलब्ध नहीं है। इस महत्त्वपूर्ण घटना को हमें पहचानना चाहिए कि इसमें फ्रांस सरकार के समान आंतरिक तनाव उत्पन्न करने जैसी स्थिति है।

अब हम दूसरे ऐतिहासिक उदाहरण पर आते हैं जहाँ एक आरोपित कुलीनतंत्र एक वैध सरकार को अस्थिर करने का प्रयास करता है। यह 1930 में स्पेन के लोकप्रिय रिपब्लीकन सरकार के तख्तापलट का किस्सा है। यहाँ भी दोनों पक्ष लगभग वैसे ही हैं। स्पेन की रिपब्लीकन सरकार के विरोधी जो मुक्त लोकतांत्रिक चुनावों में बहुमत से जीते थे, कैथॉलिक क्लर्जी, कुलीन वर्ग और सेना में उच्च वर्ग के अफसरों से बनी थी।

फ्रांस की तरह नहीं, स्पेन ने वैध रिपब्लीकन प्रशासन और जनरल फ्रैंको (अधिकारी वर्ग व अफ्रीका के अंतःक्षेत्र की सेना) के बलों के बीच बहुत बड़ा सैन्य संघर्ष देखा। इन विद्रोही सैन्य बलों को नाज़ी जर्मनी और मुसोलिनी के इटली का समर्थन प्राप्त था जबकि ब्रिटेन और फ्रांस के निषेध के कारण रिपब्लीकन सरकार के सैन्य बलों को हथियार उपलब्ध नहीं हुए।

हमारी पीढ़ी की सामूहिक स्मृति में स्पेन का गृह युद्ध दशकों बाद आता है। हमारे पास जॉर्ज ऑरवेल का सीमा-चिन्ह ‘होमेज टू केटेलोनिया’, जो एक आत्मकथा के साथ-साथ सामाजिक-राजनीतिक अध्ययन है। फिर हमारे पास अर्नेस्ट हेमिंगवे की महाकाव्य उपन्यास ‘फॉर व्हूम द बेल टॉल्स’ है और इसके समतुल्य इसका सिनेमाई (इंग्रिड बर्गमैन और केरी ग्रांट द्वारा अभिनीत) संस्करण है।

स्पेन के गृह युद्ध से समकालीन भारत के लिए बहुत सीखें हैं। प्राथमिक तौर पर इस निबंध का विषय- कैसे उत्कृष्ट वर्ग, कुलीनतंत्र और संपन्न दबाव समूह (जो प्रायः विदेशों द्वारा आर्थिक रूप से पोषित होते हैं) एक देश की लोकतांत्रिक संरचना और प्रक्रियाओं को क्षतिग्रस्त कर सकते हैं। इस ऐतिहासिक त्रासदी पर ऑरवेल का सार निर्णय यह था कि स्पेन की चयनित सरकार के विरुद्ध फ्रांसिस्को फ्रैंको की सेना का विद्रोह “फ़ासिज़्म नहीं बल्कि सामंतवाद स्थापित करने के लिए था।”

मैं इस निष्कर्ष का पूर्णतः समर्थन नहीं करता हूँ लेकिन यादव, गांधी और अन्यों के संदर्भ में भारत का अनुभव इशारा करता है कि इस विचार में बहुत कुछ है। 2014 में बनी भाजपा सरकार इन अर्ध-सामंती ताल्लुकेदारों को परेशान करती हैं और यह ऐसी ताकतें नहीं हैं जो शांत हो जाएँ।

इस विष्लेषण के निष्कर्ष तक पहुँचने के पहले, हमें दो घटनाओं को याद करना चाहिए जहाँ ज़बरदस्त विरचना और झूठों को लोकतांत्रिक देशों में राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित करने के लिए प्रयोग किया गया है। पहली घटना है मनगढंत ज़िनोवीव पत्र की जो ब्रिटिश अखबार द डेली मेल  द्वारा अक्टूबर 1924 के चुनावों से कुछ दिन पहले ही छापा गया था। यह ज़बरदस्त जालसाज़ी लेबर सरकार पर कंज़र्वेटिव विजय का एक बड़ा कारण थी।

ब्रिटिश सरकार को 75 वर्ष से अधिक लगे यह कबूलने में कि ज़िनोवीव पत्र एक जालसाज़ी थी जिसने ब्रिटिश राजनीतिक इतिहास को बहुत प्रभावित किया। देश की गुप्त सेवा एम.आई.6 इस प्रकरण में संदिग्ध मानी जा रही थी। भारतीयों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि भारतीय निर्णय प्रक्रिया को पटरी से उतारने के लिए इसी प्रकार के प्रयास हो रहे हैं और वो भी रक्षा क्षेत्र व राष्ट्र सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषयों पर।

मनगढंत झूठों और विकृतियों का अंतर्राष्ट्रीय विचार और राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित करने का एक और उदाहरण है कुख्यात प्रोटोकॉल्स ऑफ द एल्डर्स ऑफ ज़ायन  जो पहली बार रूस में 1903 में जारी किया गया। इस अपरिष्कृत और अश्लील प्रकाशन जिसका दावा था कि यहूदी एक वैश्विक नायकत्व स्थापित करने के लिए बूतपरस्तों द्वारा अशांति फैलाएँगे।

1934-35 में स्विस ट्रायल में झूठा साबित होने के बावजूद इस प्रकाशन का उपयोग ईसाइयों और एंटी-सेमिटिक बलों द्वारा अपना एजेंडा फैलाने के लिए हो चुका था। हेनरी फोर्ड ने 1920 के दशक में इस प्रकाशन के अंग्रेज़ी अनुवाद की छपाई और यू.एस. में वितरण के लिए बहुत संपत्ति दी थी। इस्लामिक दुनिया आज भी इस प्रकाशन के कथन पर विश्वास करती है और इज़रायल व इस्लाम विरोधी-आंदोलनों के दमन के लिए प्रचार-प्रसार में इसका प्रयोग करती है।

इस समय हम भारत में देखते हैं कि भारतीय सभ्यता के विरोधी गठबंधन बलों द्वारा ज़बरदस्त दुष्प्रचार और क्रूर प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। वर्तमान सरकार को भारतीय सभ्यता के लिए उपयुक्त दृष्टि से देखा जाता है, हालाँकि कुछ लोग इसे निर्बल, संकोची व बचावपूर्ण मानते हैं।

यह मुझे आखिरी मुद्दे पर लेकर आता है जहाँ मुझे नेता और प्रवक्ता ‘वॉल फ्लावर’ की मुद्रा में नज़र आते हैं, जब उन्हें मनगढंत बातों, मिथ्या और अर्ध-सत्यों से घेरा जाता है। वे ज़रा से दबाव में कमज़ोर पड़ते नज़र आते हैं। इससे बुरी बात है कि वे आवश्यक बुनियादी खोज करने में अक्षम पाए गए हैं जो उन्हें दुष्प्रचार से लड़ने में सहायक सिद्ध होगी। निश्चित रूप से यह बड़े उद्देश्य को हानि पहुँचाता है और 2014 के चुनावी परिणाम को कायम रखने के उनके प्रण को भंग करता है।

रिसर्च से भ्रामक सत्य के प्रभाव का पता चला है। यह किसी सूचना के बार-बार प्रचार होने पर उसे सत्य मान लेने की प्रवृत्ति है। जब लोगों को सत्य जाँचने के लिए बुलाया जाता है, तो वे पहले ये जाँचते हैं कि यह सूचना उनकी समझ के अनुकूल है या नहीं अथवा वे इससे परिचित हें या नहीं। साफ तौर पर 24 जनपथ में बैठा दल इल सभी तकनीकों से वाकिफ़ है।

हम समापन जॉर्ज ऑरवेल व उनके 1984 के कथन से करते हैं- अंत में पार्टी घोषणा करेगी दो और पाँच बनाया गया दो, और आपको इसपर विश्वास करना होगा। यह अपरिहार्य है कि वे ऐसा दावा अभी या बाद में तो करेंगे ही, उनकी स्थिति का तर्क इसकी माँग करता है। केवल अनुभव की वैधता नहीं बल्कि बाहरी सच्चाई के अस्तित्व को भी उनके दर्शन से मौन रूप से नकार दिया जाएगा।