विचार
नक्सली हिंसा का मूल कारण सामाजिक-आर्थिक विषमता नहीं, बल्कि लालच

एक हिंसक राजनीतिक वाद या विचारधारा के रूप में नक्सलवाद निश्चय ही आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा। मेरी चिंताओं का संदर्भ नक्सली हिंसा है, जिसने अचानक से एक बार फिर दक्षिण छत्तीसगढ़ की भूमि को रक्तरंजित कर दिया है, जिसमें कम-से-कम 22 जवानों वीरगति को प्राप्त हुए और कई घायल हैं।

छत्तीसगढ़ राज्य में कांग्रेस सरकार के आने के बाद लगभग मृतप्राय हो चुका नक्सली आंदोलन एक बार पुनः खतरनाक ढंग से सिर उठा रहा है। बीजापुर की घटना अर्धसैन्य बलों और राज्य पुलिस तंत्र के बीच बेमेल संबंध की ओर भी संकेत करती है।

घटना के बाद से सोशल मीडिया पर तथाकथित बुद्धिजीवी वनवासियों के विस्थापन और वंचना का राग अलापने लगे हैं और नक्सली हिंसा के लिए सरकार को ज़िम्मेदार ठहराकर नक्सलियों के इस बर्बर हमले को जायज़ ठहराने की कवायद जारी है।

कुछ बुद्धिजीवी तो इसे आत्मरक्षा तक कह रहे हैं। उनके लिए राज्य के तंत्र के रूप में वहाँ काम कर रहे सड़क निर्माण से लेकर भवन निर्माण तक में लगे मजदूर, अभियंता, अध्यापक, स्वास्थ्यकर्मी आदि की आत्मरक्षा का विषय नक्सली हिंसा के सामने गौण हो जाता है।

उनका प्रश्न कि छत्तीसगढ़ बनने के बाद भी वनवासियों का विकास क्यों नहीं हुआ, वाजिब है। लेकिन आधुनिक विकास और अर्थव्यवस्था के स्वरूप और वनवासियों की स्थिति के मध्य अंतर को समझने की कोशिश किए बगैर इस तरह के सवाल करना एक तरह की नादानी है।

आधुनिक विकास में अर्थव्यवस्था का स्वरूप ज्ञान आधरित है (मनमोहन सिंह और सैम पित्रोदा इस बात के बड़े समर्थक हैं)। संभवतः आधुनिक विकास की दौड़ में वनवासियों के पिछड़ जाने का कारण ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में अपनी जगह न बना पाना हो सकता। ज्ञान-विज्ञान को बढ़ावा देने के लिए सरकारें दक्षिण छत्तीसगढ़ में ऐसे संस्थान खोल भी रही हैं।

दंतेवाड़ा मेरे शोध अध्ययन का क्षेत्र रहा है। वहाँ एक बड़ा डिग्री कॉलेज छात्रावास की सुविधाओं के साथ, एक कन्या महाविद्यालय, एक लाइवलीहुड कॉलेज है और एक जिला ग्रंथालय है। बैलाड़ीला के माइनिंग से दंतेवाड़ा शहर का विकास स्पष्टतया देख सकते हैं।

प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी के लिए मुफ़्त कोचिंग की सुविधा भी शहर में मौजूद है। लेकिन वहाँ का छात्र इस डर से नेशनल कैडेट कोर (एनसीसी) का हिस्सा नहीं बन पाता क्योंकि वर्दी पहननी पड़ेगी, यह नक्सली लोग बर्दाश्त नहीं करेंगे और उसे मार देंगे।

व्यावसायिक अध्ययन इसलिए नहीं कर सकता क्योंकि अंदरूनी गांवों से शहर पढ़ने नक्सली सिर्फ इस शर्त पर आने देते हैं कि या तो लड़का चपरासी बनेगा या गुरुजी। व्यक्ति स्वातंत्र्य पर इससे बड़ा पहरा और क्या होगा कि व्यक्ति वह सबकुछ नहीं कर सकता जो वह करना चाहता है। नक्सली किस स्वतंत्रता और समानता के लिए लड़ रहे हैं?

सरकारें बहुत दोषी हो सकती हैं, लेकिन क्या एक सिविल सोसायटी का महत्तवपूर्ण अंग होने के बाद तथाकथित बुद्धजीवियों ने कभी नक्सली हिंसा के विरुद्ध आवाज़ें मुखर की हैं? वे जानते हैं कि उन जैसे पढ़े-लिखे लोगों का जनतांत्रिक सरकार कुछ बिगाड़ नहीं सकती, इसलिए नपी-तुली भाषा में उसकी आलोचना कर लेते हैं।

लेकिन इस आलोचना के दूसरे पहलू में नक्सल हिंसा के प्रति उनका छिपा समर्थन भी होता है, जिसे आम जन पहचान नहीं पाते। एक वैध राजनीतिक इकाई के ऊपर एक अवैध और हिंसा में लिप्त संगठन कि कार्यवाइयों की निंदा किए जाने की बजाय राज्य को दोषी ठहराना सर्वथा अनुचित है। एक संप्रभु राज्य में हिंसा के प्रयोग का वैध अधिकार सिर्फ राज्य के पास है।

नक्सल हिंसा के पीछे का कारण कोई आर्थिक-सामाजिक विषमता नहीं है। गैर-वनवासी समुदायों का विस्थापन भी आधुनिक विकास के अवसंरचना निर्माण की वजह से हुआ है। लेकिन उनके विस्थापन ने हिंसा का रूप नहीं लिया तो सिर्फ इसलिए कि वहाँ संसाधन के रूप में बस भूमि है जिसपर खेती की जा सकती है और छिपने के लिए न पहाड़ हैं, न जंगल।

बस्तर के प्राकृतिक संसाधन नक्सलियों के लिए अपने हिंसक आंदोलन को चलाने का बेहतरीन जरिया साबित होते हैं। संसाधनों पर भारत सरकार और पूँजीपतियों की प्रत्येक पहुँच उनके गैर-कानूनी आर्थिक लाभों पर सीधी चोट है।

यही कारण है कि नक्सली लोग वनवासियों को आधुनिक विकास और ज्ञान-आधरित अर्थव्यवस्था से हिंसा के बल पर दूर रखना चाहते हैं, ताकि वो अपनी गैर-कानूनी और देश की सुरक्षा विरोधी हरकतों के लिए धन कमा सकें। नक्सल हिंसा का एक लालच परिप्रेक्ष्य (ग्रीड पर्सपेक्टिव) भी है।

लेखक महात्मा गांधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, बिहार में शांति एवं संघर्ष अध्ययन के सहायक प्राध्यापक हैं।