विचार
प्राकृतिक आपदाओं मे राहत के प्रयासों की आवश्यकता है, उसे ‘दैवीय प्रतिशोध’ बताने की नहीं

प्रसंग
  • प्राचीन विचारधारा मे प्राकृतिक आपदाओं को दैवीय दण्ड के रूप में देखा जाता था। हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान के अनुसार विघटन दैवीय क्रोध के कारण नहीं बल्कि प्राकृतिक चक्रों की वजह से होता है।

नवंबर 2004 मे श्री जयेंद्र सरस्वती को गिरफ्तार करके कैद कर लिया गया था। तमिलनाडु मीडिया ने उनके खिलाफ भीड़ द्वारा हत्या के तहत एक द्वेषपूर्ण अभियान चलाया। उसी वर्ष क्रिसमस के तुरंत बाद सुनामी ने कहर बरपाया था। दक्षिणी भारत पूरी तरह तबाह हो गया था और तमिलनाडु को सबसे बुरी तरह नुकसान पहुँचा था जहाँ हजारों लोग मारे गए थे।

कुछ अति उत्साही भक्तों ने सुनामी को आचार्य की गिरफ्तारी, एक दैवीय प्रतिशोध के रूप में दिखी। लेकिन, जयेंद्र सरस्वती ने स्वयं इसका समर्थन नहीं किया। उन्होंने जेल से एक संदेश भेजा कि वह बहुत दुःखी थे और उन्होंने दिवंगत आत्माओं के लिए प्रार्थना की थी। उन्होंने कहा कि उन्होंने उन परिवारों की पीड़ा साझा की जिन्होंने अपने नजदीकी और प्रियजनों को खो दिया था। आचार्य का यह संकेत सनातन धर्म के मूल्यों को प्रतिबिंबित करता है, यह उन लोगों को सीखना और व्यवहार में लाना चाहिए जो ऐसा मानते हैं कि सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म के दौरान महिलाओं को जाने की अनुमति देने की वजह से केरल में बाढ़ आई है।

प्राचीन विचार रखने वाले लोगों ने प्राकृतिक आपदाओं को दैवीय दण्ड के रूप में देखा। ऐसे धर्म हैं जिन्होंने मानवीय अपराधों के लिए दैवीय दण्ड के डर के बारे में विस्तृत धर्मशास्त्र का निर्माण किया है। भारत में भी ऐसे देवताओं का डर है जो बदले में दण्ड देते हैं। हालांकि, हिंदू धर्म ने एक तरफ सांख्य दर्शन और दूसरी तरफ वेदिक ब्राह्मण के माध्यम से इस तरह के भय पर विजय प्राप्त कर ली है।

बाइबिल की परंपरा के अनुसार जल-प्रलय (बाढ़) निर्माता-देवता (विधाता) के गुस्से के कारण आती है। गुस्से में वह पूरी आबादी को सजा के रूप में नष्ट कर देते हैं। हिंदू विचारक राम स्वरुप ने ऐसे ईश्वर को अहंकारी बताया है। दण्डित करने वाले देवता के रूप में भगवान की यह अवधारणा मन के अहंकार क्षेत्रों से उत्पन्न होती है। वही, हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान के अनुसार  विघटन दैवीय क्रोध के कारण नहीं बल्कि प्राकृतिक चक्रों के रूप में होता है।

वेदांत देसिका का कहना है कि भगवान की दया या भगवती (देवी) की करुणा इस ब्रह्माण्डीय विघटन का निर्माण करती है। मनुष्यों समेत कोई प्राणी जब भी त्रुटियां करते हैं, तो उन्हें देवता से क्रोध नहीं बल्कि केवल करुणा मिलती होती है। प्रलय या ब्रह्माण्ड का विघटन सभी प्रकार के जीवों द्वारा की गई सभी त्रुटियों को समाप्त करने के लिए होता है। लेकिन देवता मे कोई गुस्सा नहीं होता है। शायद, यह ब्रह्माण्डीय ऊर्जा है लेकिन व्यक्तिगत पापों के लिए कोई दैवीय सामूहिक सजा नहीं है।

पुराणों के द्वारा लोगों को यह दिखाया व समझाया गया है।  पौराणिक भाषा सुरुचिपूर्ण एवं  भावनात्मक है और इसकी गहराई में दर्शन समाहित है। भागवत पुराण  के अनुसार, इंद्र देवता ने उन लोगों को दंडित करने के लिए मूसलाधार वर्षा की, जिन लोगों ने उन्हें प्रसाद चढ़ाने से इनकार कर दिया। श्रीकृष्ण, जिन्होंने अपने लोगों में इंद्र की बजाय गोवर्धन पर्वत की पूजा करने का प्रचलन शुरू किया,  ने उस पहाड़ को उठा लिया और उन्हें मूसलाधार बारिश से बचा लिया।

यहाँ पर अहं-देव का एक उदाहरण है और भय-केंद्रित धर्मशास्त्र पर गहरी आध्यात्मिकता की विजय प्राप्ती है। कृष्ण, गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी उंगली पर रोके हुए, छोटी मानवीय गलतियों से लेकर उत्पन्न दैवीय क्रोध को नीचा दिखाने के लिए अपनी स्वयं की किशोरावस्था की प्रवृत्तियों के विरुद्ध एक रखवाले के रूप में खड़े हैं और बाढ़, भूकंप और महामारी, को एक दिव्य प्रतिशोध की तरह देख रहे हैं।

तमिलनाडु में, पुहार की एक स्थानीय बौद्ध पौराणिक कथा के अनुसार, चोलों के बंदरगाह शहर को समुद्री देवी द्वारा राजा इंद्र के त्यौहार को भूल जाने के कारण नष्ट कर दिया गया था। जब एक पांड्य राजा ने द्रष्टा-कवि माणिकवासागर को कैद कर लिया, तो भगवान शिव ने क्रोधित होकर वेगई नदी के जल स्तर को बहुत बढ़ा दिया था। हालांकि, दैवीय क्रोध की तुलना में भगवान की लीला को इस तरह वर्णित किया गया है जहां राजा ने स्वयं भगवान शिव को डंडे मारे।

शिलप्पदिकारम महाकाव्य मे क्रोधित कण्णगी मदुरै/मदुरई को जलाकर नष्ट करने का आदेश देते हुए कहती है कि बुजुर्गों, महिलाओं, बच्चों और धार्मिक लोगों को छोड़कर केवल दुष्टों को दंड दिया जाए।

प्रलय की कथाएं पूरी दुनिया में मौजूद हैं। पौराणिक कथाओं में दैवीय क्रोध किसी भी तरह जल-प्रलय से संबंधित नहीं है। यह केवल एक प्राकृतिक चक्र है। यहाँ तक कि मनु जल-प्रलय से बचने में सक्षम थे क्योंकि उन्होंने मछली के प्रति सहानुभूति की और प्रकृति में उपस्थित व्यवस्था ‘शक्तिशाली ही राज करता है’ का पालन करके उसको आश्रय दिया। इसलिए यहाँ पर मानव प्रकृति, जो “स्वस्थतम की उत्तरजीविता” का विरोध करती है, को प्रकृति विरोधी के रूप में नहीं बल्कि एक उन्नत करने तथा जीवन बचाने वाले सिद्धांत के रूप में देखा जाता है।

न्याय की खोज और इससे संबंधित बहसें हालांकि पारंपरिक विचार वालों के लिए अप्रिय हैं। उनका कितनी बार हिंदु विरोधी और छद्म-धर्मनिरपेक्ष वामों द्वारा प्रतिकूल दुरुपयोग किया गया,  लेकिन यह समाज के समग्र कल्याण पर अभी भी सकारात्मक प्रभाव डाल सकती हैं और समाज के नैतिक सतुलन को बेहतर बना सकती हैं।

मनु की बात पर वापस आते है, जब उन्होंने’बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है’ वाले प्रचलित कानून से मछली को बचाया, तब वह  प्रकृति के कानून के खिलाफ चले गए, लेकिन अपने इस अपराध से उन्होंने,अपने समाज और जीवन को विनाश से बचाया। कोई सिरफिरा ही यह कहेगा बाढ़ आई क्योंकि मनु ने प्रकृति के नियमों का उल्लंघन किया था।धर्म हमेशा से एक सतर्क सिद्धांत रहा है जो कठोरता और अन्याय जैसी स्थिर मान्यताओं के खिलाफ कार्य करता है।

आइए हम बहस और हर परंपरा पर संवाद करते हैं साथ ही परंपराओं को संरक्षित करते हुए उन्हें आधुनिक आवश्यकताओं के अनुरूप परिवर्तित करते हैं।निश्चित रूप से, अय्यप्पा स्वामी, उपनिषदिक ताट तवम असी का प्रतीक हैं, जो इंद्र की तरह अभिमानी देवता नहीं हैं या कुछ लोगों के कथित अपराधों के लिए निर्दोष महिलाओं और बच्चों को सामूहिक रूप से दंडित करने के वाले असभ्य प्रकार के देवता भी नहीं हैं।

पाप की जड सामूहिक है।

यीशु के खून के अभिशाप के मिथक का प्रयोग यहूदियों पर अत्याचार करने के लिए किया गया और जिसकी वजह से यहूदी विरोधी भावना सामूहिक रूप से भड़क गई।

कर्म काफी हद तक व्यक्तिगत होता है।

2016 में, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस), अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा या एबीपीएस की अखिल भारतीय प्रतिनिधि परिषद ने एक प्रस्ताव पारित किया जिसने कुछ हिंदू मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश को प्रतिबंधित करने वाली प्रथाओं को खत्म करने की मांग की गई। यह नियम महिलाओं के पुजारी बनने के विचारधारा का भी समर्थन करता था।

एक सभ्य सामाजिक जीव में यही परिवर्तन होता है। जब संघ ने इन प्रस्तावों को पारित किया, तो यह प्रतीत हुआ कि हिंदू-भौतिक नारीवादियों की मांग करने वाले प्रचारक संघ व  हिंदू समाज स्वयं सामाजिक परिवर्तन के लिए बहस और बातचीत में शामिल होने के लिए तैयार है।यह एक परिवर्तन है जो’ब्राह्मण हिंदू पितृसत्ता’ बनाम ‘प्रबुद्ध प्रगतिशील नारीवाद’, की दोहरी  संरचनाओं से परे होगा जो भारतीय संदर्भ में औसत और अर्थहीन हैं।

सबरी पहाड़ियों के स्वामी देवता स्वामी अय्यप्पा,अपने क्रोध से बाढ़ लाने के बजाय संघ के द्वारा उठाए गए प्रस्ताव से खुश होंगे।

श्री ललिता सहस्रनाम कहते हैं कि बहुत दूर तक ऐसी त्रासदियों के होने के कारण भगवान, मानव प्राकृतिक और मानव निर्मित आपदाओं के कारण दर्द से छुटकारा पाने के लिए, दैवीय प्रयासों में खुद को प्रकट करता है। वह रोग हरनेवाली चाँद की रोशनी हैं जो आपदाओं मे उत्पन्न हुई पीड़ा को कम करती हैं (357वां नाम – तापत्रयाग्नि संतप्त समाह्लादन चन्द्रिका)। हर हाथ जो मदद करता है वह उनका हाथ है।

अरविंदन स्वराज्य में एक सहायक संपादक है।