विचार
मातृभाषा में शिक्षण क्यों राष्ट्रीय शिक्षा नीति का एक ऐतिहासिक और क्रांतिकारी प्रयास

प्रसंग- शिक्षा में मातृभाषा का महत्त्व।

भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की घोषणा 21वीं सदी की ज्ञान संबंधी चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए, भारत को एक सशक्त ज्ञान आधारित राष्ट्र बनाने तथा इसे वैश्विक महाशक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में एक ऐतिहासिक एवं क्रांतिकारी क़दम है।

वास्तव में, भारत में ऐसी चिर प्रतीक्षित शिक्षा नीति की आवश्यकता थी, जिस शिक्षा को ग्रहण करने के बाद शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक एवं सांस्कृतिक रूप से विकसित ऐसे कौशलयुक्त युवाओं का सृजन हो सके जिनमें गौरवशाली भारतीय संस्कृति की जीवंतता, भारतीय भाषाओं में प्रवीणता तथा भारतीय दृष्टि के अनुरूप ज्ञान-विज्ञान में दक्षता स्पष्ट रूप से परिलक्षित हो।

इस शिक्षा नीति में भाषा के सामर्थ्य को स्पष्ट रूप से इंगित करते हुए कम से कम कक्षा पाँच तक मातृभाषा, स्थानीय भाषा या क्षेत्रीय भाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने पर विशेष बल दिया गया है तथा कक्षा आठ और उसके आगे भी भारतीय भाषाओं में अध्ययन का प्रावधान किया गया है। इसके साथ ही विद्यालयीय एवं उच्च शिक्षा में त्रिभाषा फ़ार्मूले के अंतर्गत देवभाषा संस्कृत तथा भारत की अन्य पारंपरिक भाषाओं में से विकल्प चुनने का प्रावधान है।

बाल्यावस्था में मानसिक विकास की गति तीव्र होती है तथा इस अवस्था में मातृभाषा में अध्ययन से बच्चे के अंदर चिंतन, स्मरण, निर्णय लेने की क्षमता जैसी वृत्तियों का सहज विकास होता है। भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम है तथा संस्कृति की वाहिका है, मातृभाषा में अध्ययन से अपनी भाषा के प्रति ममत्व और आत्मीयता का भाव तो जगेगा ही, साथ ही साथ छात्र आगे चलकर पांडित्य भाव के साथ अपनी मातृभाषा में पारंगत होंगे तथा भारतीय संस्कृति के सशक्त वाहक होंगे।

मौलिक चिंतन किसी और भाषा में नहीं बल्कि अपनी मातृभाषा या स्थानीय भाषा में ही संभव है। मातृभाषा में लिया हुआ ज्ञान संपूर्णता के साथ छात्र के मस्तिष्क में शत-प्रतिशत स्वीकार्य होता है तथा इस ज्ञान की छाप अमिट होती है। अपनी भाषा ही सारी उन्नतियों का मूलाधार है जैसा कि भारतेंदु हरिश्चंद्र ने कहा था- “निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल।”

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 350 (अ) के अनुसार यह प्रावधान है कि हर राज्य प्रयास करे कि वहाँ के भाषाई अल्पसंख्यक समूह को प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में दी जाए। शिक्षा का अधिकार अधिनियम के अनुभाग 29 (2) के अनुसार शैक्षणिक संस्थाओं से अपेक्षा की जाती है कि शिक्षण का माध्यम यथासंभव बच्चे की मातृभाषा में हो। अतः विद्यालयों में शिक्षण की भाषा का निर्णय लेने में राज्य सरकारें स्वतंत्र हैं।

प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री प्रोफेसर यशपाल के नेतृत्व में निर्मित विद्यालयीय शिक्षा के लिए अब तक के नवीनतम दस्तावेज़ “राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005” के खंड 3.1.1 के अनुसार विद्यालयों में शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होना चाहिए क्योंकि मातृभाषा में ही छात्र अपने घर, आस-पास तथा सामाजिक वातावरण की गतिविधियों को स्वाभाविक रूप से सीख पाते हैं।

यहाँ तक कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति- 1968 के खंड 4(3) के अनुसार शिक्षा के स्तर में सुधार और ज्ञान के विस्तार हेतु भारतीय भाषाओं एवं साहित्य को सशक्त रूप से विकसित करना आवश्यक है। यूनेस्को के 2003 के रिपोर्ट ‘बहुभाषी विश्व में शिक्षा’  के दिशानिर्देश के अनुसार मातृभाषा में शिक्षण से शैक्षणिक गुणवत्ता में बढ़ोतरी होती है तथा ज्ञान और अनुभव की वृद्धि में सहायता मिलती है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 उपरोक्त प्रावधानों के मूल भाव को समाहित करते हुए भारतीय भाषाओं को सही अर्थों में प्रतिस्थापित करने की दिशा में विद्यालयों और उच्च शिक्षा में बहु-भाषावाद को बढ़ावा देगी तथा इससे विद्यालयों में मातृभाषा या स्थानीय भाषा में पठन-पाठन सुनिश्चित हो सकेगा।

त्रिभाषा फ़ार्मूले के अंतर्गत निश्चित रूप से केंद्र और राज्य सरकारों की महती ज़िम्मेदारी होगी कि वे गुणवत्तायुक्त भाषाई शिक्षकों को तैयार करें। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के परिदृश्य को देखें तो हमारी मानसिक ग़ुलामी ही भारतीय भाषाओं के विकास में मुख्य बाधा रही है।

वैदिक काल से लेकर 19वीं सदी के मध्य तक भारत में अध्ययन-अध्यापन के लिए गुरुकुल की व्यवस्था थी तथा शिक्षा का माध्यम संस्कृत एवं भारतीय भाषाएँ थी। प्राचीन काल में भारतीय शिक्षा व्यवस्था भारतीय भाषाओं के बल पर इतनी सुदृढ़ थी कि भारत विश्वगुरु था। विश्व के प्राचीन महान विश्वविद्यालय तक्षशिला, नालन्दा, विक्रमशिला भारत में थे, जहाँ ज्ञान, विज्ञान, कला, दर्शन, धर्म, आदि की शिक्षा संस्कृत एवं अन्य भारतीय भाषाओं में दी जाती थी।

विश्व का प्राचीनतम धर्मग्रंथ ऋग्वेद संस्कृत भाषा में है। हमारे वेदों उपनिषदों की भाषा संस्कृत है, जिनमें ज्ञान, विज्ञान, तकनीकी की जितनी सामग्री है वह अन्यत्र कहीं नहीं। प्राचीन काल से ही ऋषि, मुनियों, दार्शनिकों, वैज्ञानिकों ने इसी भारतभूमि से संस्कृत और भारतीय भाषाओं में ज्ञान, विज्ञान, साहित्य के विभिन्न अनमोल ग्रंथों की रचना की जिससे संपूर्ण विश्व को दिशा मिली।

परमाणु पर शोध करने वाले महर्षि कणाद, आयुर्वेदिक ग्रंथ ‘सुश्रुत संहिता’ के प्रणेता महर्षि सुश्रुत, रसायन विज्ञानी आचार्य नागार्जुन, यौगिक दर्शन के प्रणेता महर्षि पतंजलि, आर्यभट्टियम के रचयिता आर्यभट्ट तथा वराहमिहिर एवं भास्कराचार्य, आदि ने संस्कृत भाषा में अपने ग्रंथों की रचना कर भारतवर्ष से ही ज्ञान-विज्ञान को पूरे विश्व में प्रतिष्ठित किया।

संस्कृत भाषा के सामर्थ्य और इसकी वैज्ञानिकता को देखते हुए बाबासाहब अंबेडकर इसे राष्ट्रभाषा बनाने के पक्षधर थे। संस्कृत भाषा कई भारतीय भाषाओं की जननी है, पूर्ण रूप से वैज्ञानिक है, तकनीकी के दृष्टिकोण से सक्षम है, तमिल के 42 प्रतिशत शब्द संस्कृत के हैं।

पूरे भारत में संस्कृत के अध्ययन से भारतीय भाषाओं में एकरूपता आएगी, उत्तर-दक्षिण का भाषाई भेद मिटेगा तथा भारतीय एकता को बल मिलेगा। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अनुसार त्रिभाषा फ़ार्मूले के अंतर्गत विद्यालयों के छात्र भारतीय भाषाओं एवं संस्कृत भाषा में प्रवीणता सुनिश्चित कर सकेंगे।

आज आम छात्रों में भारतीय भाषाओं को लिखने और बोलने में प्रवीण होने की आवश्यकता है। आज विश्व के विकसित देश अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, इज़राइल, फ़्रान्स आदि की अपनी एक भाषा है जो उनकी बोलचाल तथा गणित, विज्ञान सहित व्यवसाय की भी भाषा है। इन देशों में इनकी अपनी भाषा में ही पठन-पाठन की बाध्यता है।

हमें भारत की गौरवमयी ज्ञान-विज्ञान की परंपरा का स्मरण करते हुए समझना होगा कि भारतीय भाषाएँ भारत की अस्मिता की पहचान हैं, जो विविधता में एकता का दर्शन कराती हैं। भारतीय भाषाएँ देश की प्रशासनिक, वैज्ञानिक, तकनीकी, वाणिज्यिक, आदि क्षेत्रों की भाषा संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने में पूर्ण रूप से सक्षम हैं। भारत और विश्व में फैले हुए ज्ञान भंडार को भारतीय भाषाओं के माध्यम से विद्यार्थी समुदाय के बीच में लाने की आवश्यकता है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में भारतीय भाषाओं में पारंगत युवाओं के सृजन के लिए दृढ़ इच्छाशक्ति और संकल्प का स्पष्ट भाव दिखता है। निश्चित रूप से ज्ञान की विविध विधाओं का अध्ययन अपनी भाषा में करने के फलस्वरूप शिक्षा में उत्कृष्टता आएगी तथा ऐसी युवा पीढ़ी का निर्माण हो सकेगा जो पूर्ण रूप से भारतीय मूल्यों एवं परम्पराओं के प्रति समर्पित होगी।

हमारे समाज की आवश्यकताओं के अनुरूप समर्थ, कौशलयुक्त उद्यमी युवाओं का निर्माण सम्भव हो सकेगा, जो समाज के विभिन्न क्षेत्रों में नेतृत्व प्रदान करने में सफल होंगे, भारत की गौरवमयी संस्कृति के वाहक होंगे। ऐसे समर्थ युवाओं के निर्माण  से निश्चित ही समर्थ, सशक्त और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण की संकल्पना साकार हो सकेगी।

प्रोफ़ेसर रमाशंकर दूबे गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति हैं। वे @RamaShankerDub5 के माध्यम से ट्वीट करते हैं।