विचार
चारित्रिक पतन के साथ संभव नहीं है राष्ट्र निर्माण
चारित्रिक पतन के साथ संभव नहीं है राष्ट्र निर्माण

प्रसंग
  • यदि हमारे आचरणों में बदलाव न हुआ तो मोदी से बेहतर और ख़राब सरकारें आती रहेंगी और जाती रहेंगी और हम यथास्थिति में ही रह जायेंगे

हमारे प्रधानमंत्री का आचरण यदि भ्रष्ट नहीं है तो इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि देश के प्रत्येक व्यक्ति ने स्वयं को भ्रष्टाचार से मुक्त कर लिया है। देश की जनता चाहती है कि उसे एक अच्छा नेता मिले लेकिन क्या यह स्वयं अपने आचरणों की शुद्धता की कसौटी पर खरी उतरती है? जवाब है ‘नहीं’।

राष्ट्र के नागरिक संविधान से जिस प्रकार अपने संवैधानिक अधिकारों की मांग करते हैं क्या उसी तरह संविधान द्वारा निर्धारित अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहन भी करते हैं? जवाब फिर से वही है, ‘नहीं’। दूध, घी, तेल, नमक, शक्कर, आटा, चावल, गहूं से लेकर डीजल, पेट्रोल और बहुत सारी दैनिक वस्तुओं और अन्य कई सारे मुद्दों पर प्रधानमंत्री हमारे निशाने पर होते हैं, ठीक है, होने भी चाहिए आखिर कहीं न कहीं तो वह जिम्मेदार हैं ही हैं लेकिन हम में से कितने लोग होंगे जिन्होंने अपने कर भुगतान से बचने के लिए अनुचित तरीकों का प्रयोग नहीं किया होगा।

गिरेबाँ में झांकिए, प्रगति के लिए प्रयासरत राष्ट्र वहां भी छटपटाता नज़र आएगा। बिजली, पानी, सड़क और बुनियादी ढाँचे जैसी मूल प्रगति की जिम्मेदारी निःसंदेह रूप से सरकारों की होती है लेकिन इसके लिए या तो नागरिकों का यथोचित सहयोग होता है या फिर सरकारें ऋण लेती हैं। आप कह सकते हैं कि जनता का पैसा तो सरकारें ही खा जाती हैं, तो मैं स्पष्ट करना चाहूँगा कि यहाँ कांग्रेस की भ्रष्टतम सरकारों की बात नहीं हो रही है और भ्रष्टाचार में उनकी असीम आस्था के लिए आप पानी पी-पी कर उन्हें कोसने के लिए स्वतंत्र हैं।

हालाँकि यह भी नहीं कहा जा सकता की मोदी सरकार में सभी का दामन साफ़ है। प्रधानमंत्री मोदी समेत कुछ एक लोग होंगे जिन पर संदेह करना बेईमानी होगी लेकिन सत्ता की दुकान में भ्रष्टाचार के तराजू से रिश्वत तोलते अन्य मंत्रियों और भ्रष्ट अफसर तंत्र एवं प्रशासन का क्या? क्षमा कीजिये लेकिन सम्माननीय न्यायालय भी न्यायशील होने का ढोंग न करें।

कभी कुछ समय बिताइए कोर्ट-कचहरी के बाहर। समाज के विवादों, कलहों और झगड़ों के अंतिम समाधान के रूप में और शोषित वर्ग को न्याय दिलाने के लिए स्थापित राष्ट्रपति के बाद सर्वशक्तिमान न्यायालयों के बिचौलिए, दलाल और वकील इन्हीं शोषित लोगों के शोषण की गंगा में हाथ धोते नज़र आते हैं। कोई बुज़ुर्ग अपनी वृद्ध पत्नी के साथ जब इन चूसक परिसरों में पधारता है, जो दोपहर की भूख घर से एक कपड़े में लपेट कर लाई गयीं मोटी सूखी रोटियों और नमक के साथ उसी परिसर में किसी वृक्ष के नीचे बैठकर मिटाता है, जिसके पास पिछले दिन तक कमाए हुए धन के रूप में उसकी पत्नी की सिकुड़ी हुई पुरानी साड़ी के खूंट में गुंजट कर बंधे हुए छुट्टे पैसों और ज़मीर के अलावा कोई दूसरी पूँजी नहीं होती है, और जब वह अपनी इच्छाओं को मारते हुए अथाह परिश्रम समेटे उस खूंट से 100 रुपए का नोट निकालकर दलाल को पकड़ाते हैं तो लोकतंत्र मानवता पर राक्षसी अट्टहास करता हुआ प्रतीत होता है, संविधान का शरीर स्वयं के नाखूनों से कुरेदा जाता है, मानव जीवन चीत्कार करता है और मानसिक द्वन्द संवेदनावश प्रलय का आकांक्षी हो जाता है। माना कि यदि अंत में उन व्यक्तियों को न्याय मिल भी गया लेकिन तब तक वे एक अन्यायपूर्ण, अनुचित और असंवैधानिक प्रक्रिया का शिकार हो चुके होते हैं।

इसके अलावा भ्रष्ट आचरण का महाजाल आम नागरिक, छुटभैये नेताओं और पूरे प्रशासन तंत्र में फैला हुआ है। मोदी सरकार भ्रष्टाचार को मिटाने का चाहे जितना ही दंभ क्यों न भर ले लेकिन जमीनी स्तर की हकीकत कुछ और ही है। यह निचले स्तर पर भ्रष्टाचार मिटाने में असफल रही है और वह इसलिए क्योंकि एक सरकार बिजली, पानी, सड़क, रोजगार या अन्य विकास परिपथों के माध्यम से राष्ट्र की शक्ल तो संवार सकती है लेकिन हमारे-आप के नैतिक चरित्र को नहीं।

क्या इस विकृत चरित्र के पीछे एक कारण अशिक्षा है? जी नहीं और बिल्कुल नहीं, और यह इसलिए क्योंकि कुछ पुराने नेताओं को छोड़कर आज कल के सभी नए राजनेता शिक्षित हैं, प्रशासन में किसी अनपढ़ की तो भर्ती ही नहीं होती लेकिन फिर भी इनमें से अधिकांश लोग भ्रष्ट निकलते हैं। आईएस, पीसीएस की पढ़ाई में असाधारण अध्ययन करना होता है। फिर सवाल यह उठता है कि उनकी शिक्षा उन्हें अच्छे आचरणों के लिए प्रेरित क्यों नहीं कर पाती? जवाब आपको अंत में मिल जायेगा।

केंद्र या राज्य सरकार की किसी भी योजना में भले ही शीर्ष स्तर पर भ्रष्टाचार न हो लेकिन निचले स्तरों पर इसे स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है, जैसे – प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना को ही ले लीजिये। ग्रामीण कौशल विकास केन्द्रों में गुणवत्ता के मानक धूल चाट रहे हैं, कौशल विकास के नाम पर सरकार से पैसा ऐंठने के लिए छात्र-छात्राओं की संख्याओं को येन केन प्रकारेण बढाया जा रहा है। इन केन्द्रों में नियुक्त शिक्षकों को स्वयं शिक्षित होने की आवश्यकता है। इस स्तरहीनता को क्या आप भ्रष्टाचार का नाम नहीं देंगे जहाँ कौशल विकास की आशा में छात्र-छात्रायें अपना समय बर्बाद कर रहे हैं। इसमें वितरित की जाने की जाने वाली ड्रेसों को देखिये। मुझे नहीं पता एक ड्रेस के लिए सरकार से कितना धन आवंटित होता है और इन केन्द्रों को चलाने वाले लोग इसमें कितना पैसा लगाते हैं लेकिन अगर आप इन ड्रेसों के कपड़े, उधड़ती सिलाइयों और टूटती बटनों को देखेंगे तो मुझे नहीं लगता ये सब एक राष्ट्रप्रेमी को संतुष्टि प्रदान कर पाएंगे।

अब बारी आती है हमें हमारे खुद के गिरेबाँ में झाँकने की। मोदी सरकार के विमुद्रीकरण या नोटबंदी के निर्णायक कदम से हम सभी अवगत हैं। जाहिर है सरकार ने जनता की भलाई के लिए ही यह कदम उठाया था। लेकिन भला हो इस देश की जनता का जो दरअसल राष्ट्रवाद से परिचित ही नहीं है और इसका राष्ट्रवाद केवल 15 अगस्त और 26 जनवरी को ही दिखाई पड़ता है। क्या उद्योगपति, क्या आम जनता और यहाँ तक कि राष्ट्रीय से लेकर क्षेत्रीय बैंकों ने अपने पतित चरित्र का जो उदहारण पेश किया वह राष्ट्रद्रोह के अपराध से कहीं कम नहीं है। बैंकों ने अरबों रुपए के नोटों की हेराफेरी की साथ ही आम जनता ने भी कमीशन ले-लेकर अपने बैंक खातों में पैसे जमा किये। कहाँ गई राष्ट्रभक्ति? क्या सारा जिम्मा मोदी का ही है? हमारा कोई फ़र्ज़ नहीं? नोट देखते ही हमारा राष्ट्रवाद विलुप्त हो जाता है।

यदि हमारे आचरणों में बदलाव न हुआ तो मोदी से बेहतर और ख़राब सरकारें आती रहेंगी और जाती रहेंगी और हम यथास्थिति में ही रह जायेंगे। चूंकि शासन, प्रशासन, न्यायपालिका, कार्यपालिका तथा प्रत्येक क्षेत्र में लोग हमारे समाज से ही जाते हैं एवं आम नागरिक भी समाज का ही एक हिस्सा है, तो कहीं न कहीं कमी समाज के नैतिक मूल्यों के विकास में है। समाज में शिक्षा तो है लेकिन शिक्षा पद्धति सही नहीं है। हमारे आचरण के सकारात्मक विकास में अभाव का कारण है आधुनिक शिक्षा पद्धति। जिसके बदले जाने के बाद भी परिवर्तन धीरे-धीरे ही संभव है, जिसमें पीढियां खप जाएँगी। लेकिन जरूरत इसी बात की है कि इसे बदला जाए और तब तक देश के लोग देश के उत्थान में बेहतर आचरण और व्यवहार का परिचय दें। अच्छे आचरण और अच्छे चरित्र के बिना एक बेहतर राष्ट्र की कल्पना असंभव है।