विचार
ननकाना साहिब में दिखा वहशत का रंग असल में सरहद की दोनों तरफ है

पाकिस्तान के ननकाना साहिब गुरुद्वारे के सामने जो कुछ हुआ, वह पूरी दुनिया के लिए एक धमकी है। उन वहशियों के सिर पर खून सवार था। वे खुलेआम धमका रहे थे कि वहाँ एक भी सिख को नहीं रहने देंगे। वहाँ गुरुद्वारा भी नहीं रहेगा। उसकी जगह मस्जिद बनेगी। ननकाना साहिब का नाम भी गुलामे अली मुस्तफा शहर कर दिया जाएगा।

आप भारत के किसी शहर में बहुसंख्यकों से ऐसे दुर्व्यवहार की उम्मीद नहीं कर सकते। वे खुद ही पलायन कर जाएँगे। घटते-घटते खत्म हो जाएँगे। लेकिन इस जंगली भाषा और जाहिल तेवर में कहीं नज़र नहीं आएँगे।

भारत जिस एक बात को सारी दुनिया के सामने रखना चाहता है वह यही है कि पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों का कोई भविष्य नहीं है। वे तेज़ी से घटती हुई आबादी हैं, जो 70 साल में चौथाई से भी कम बची है। वे सिख हैं, ईसाई हैं, पारसी और हिंदू हैं। उनकी बेटियाँ गायब हो रही हैं। वे कत्ल किए जा रहे हैं। उनका जबरन धर्मांतरण हो रहा है। बटवारे के बाद पाकिस्तान में बने रहकर आज वे एक तरह के नर्क में आखिरी सांसें ले हैं। दुनिया भर में मानवाधिकारों के लिए सक्रिय संगठनों के लिए यह सबसे बड़ा विषय है।

ननकाना साहिब में एक दिन गुरुद्वारे के ग्रंथी की बेटी को अगवा करके निकाह पढ़ाया गया, उसका धर्मांतरण कर दिया गया। इस मामले की शिकायत करने पर वहशी भीड़ आरोपी को बचाने के लिए गुरुद्वारे को घेर रही है। वे इस्लाम के ऐसे नारे लगा रहे हैं, जो पूरी दुनिया में दहशत पैदा करने के लिए कुख्यात हो चुके हैं। इस तरह से वे ननकाना साहिब की आड़ में पूरी दुनिया को धमका रहे हैं।

अपनी अल्पसंख्यक अवाम पर बेइंतहा जुल्म करते हुए वे खुद को पीड़ित पक्ष की तरह पेश करने में हर कहीं माहिर हैं, जिन्होंने अपने मुताबिक ही इस्लाम की शान में चार चांद लगाने का ठेका ले रखा है।

पाकिस्तान की इस भीड़ की वहशत उनके चेहरों पर साफ है। वे खूनखराबे पर उतारू हैं। वे गुंडागर्दी और दहशतगर्दी पर आमादा हैं। ननकाना साहिब का नाम बदलने और गुरुद्वारे की जगह मस्जिद बनाने के साथ एक भी सिख को नहीं रहने देने की धमकियाँ स्पष्ट कर रही हैं कि वे ऐसे इस्लाम का परचम बुलंद कर रहे हैं, जिसमें किसी और को कोई जगह नहीं है। या तो इस्लाम को मानो या मरने के लिए तैयार रहो। न दूसरों के इबादतस्थल बचेंगे। नाम भी नहीं रहने देंगे

दूसरी तरफ भारत में क्या चल रहा है? यहाँ नागरिकता कानून को लेकर वैसी ही भीड़ सड़कों पर है। इनकी वहशत नारे लिखी तख्तियों के पीछे छिपी है। सेक्युलर शायर और एक्टर भी जो कुछ कह रहे हैं, वह पाकिस्तान की सड़कों पर उतरी भीड़ का ही एक सभ्य और साफ-सुथरा संस्करण ही है।

लहजे की एक मामूली परत के पीछे दोनों की वहशत एक जैसी है। दोनों तरफ एक समान बात यह है कि चाहे अल्पसंख्यक हों या बहुसंख्यक हों, मुसलमानों के पैदाइशी विशेष अधिकार हैं। क्योंकि वे एक ऐसे मजहब को मानते हैं, जो जिसकी घोषणा सर्वश्रेष्ठ होने की है। इसलिए बाकी सब दोयम दरजे पर ही खुद को रखें, इसी में उनकी बेहतरी है। वर्ना हम जहां भी हैं, जीने नहीं देंगे। रहने नहीं देंगे।

हकीकत में इस्लाम के इस प्रचलित ढाँचे में दूसरे समुदायों के लिए इज्ज़त से जीने और रहने लायक सहिष्णुता का नामोनिशान तक नहीं है। सरहद के इस या उस पार भीड़ की नुमाइंदगी करने वाले अपने धर्मांतरित पुरखों के असल और बदकिस्मत इतिहास से बेखबर एक ऐसी भीड़ में बदल दिए गए हैं, जो संख्या के हिंसक पशु बल में यकीन करती है।

वे दुनिया में जहाँ भी हैं, उन्हें इस्लाम के न मानने वालों से अकारण इंतकाम लेना है। हर कहीं वे बेवजह पीड़ित होने की मानसिकता में हैं। वे इस भ्रम में भयभीत हैं कि सारी दुनिया उनके पीछे पड़ी है। भारत में उनकी इस बिगड़ी हुई आदत के लिए यहाँ का वह नकली सेक्युलरिज्म है, जिसने 15-18 करोड़ आबादी को अल्पसंख्यक का पर्याय मान लिया।

ऐसा मानकर तुष्टिकरण की राजनीति का जहर लगातार बोया। इस एकतरफा और एकपक्षीय सेक्युलरिज्म की पोल काफी हद तक खुल चुकी है। इसलिए सारे सेक्युलर जंतु परदे के पीछे से सिर्फ मुसलमानों को भड़काने का काम कर रहे हैं।

 ननकाना साहिब में जो कुछ हुआ है, उस पर भारत के सेक्युलर मुस्लिम शायरों,  लेखकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी कुछ गौर करना चाहिए। मान लिया कि भारत में मुसलमानों को सारे हक दूसरों से ज्यादा चाहिए। सबसे ऊपर चाहिए। उनके अधिकार ही हैं। वे सदा कर्त्तव्यों से मुक्त हैं। वे जब चाहें देश को आग लगाएँ। जुमे की नमाज के बाद हर कहीं उन्मादी भीड़ की शक्ल में दिखाएँ कि शांति का धर्म होता कैसा है।

अब यह कौन बताएगा कि ननकाना साहिब में जो खून उबलती आंखें तरेर रहे हैं, वे सही इस्लाम का चेहरा हैं या नहीं हैं या इसमें किसी सुधार-संशोधन की गुंजाइश है? क्या आज़मी, अख्तर या इंदौरी साहब इस्लाम की इनकी व्याख्या पर गौर फरमाएँगे।

अपनी उम्दा अक्ली से कोई सही रास्ता बताएँगे? यहाँ नागरिकता कानून पर दिमाग भटकाने वालों को स्पष्ट करना चाहिए कि जिस इस्लाम का गुणगान ननकाना साहिब में हुआ है, वह क्या है? इस्लाम में किसी और धर्म को मानने वालों और उनकी बहन-बेटियों को इज्ज़त से रहने और जीने लायक कितनी गुंजाइश है?

ननकाना साहिब की वहशी भीड़ और भारत में हाथों में तख्तियाँ लिए सड़कों पर उतरी भीड़ में कोई फर्क नहीं है। वे इस्लाम को बदनाम ही कर रहे हैं। यह उन मुसलमानों को खुलकर सामने आने का समय है, जो मानते हैं कि इस्लाम का मतलब ही है शांति। अब तक यह शांंतिप्रिय जमात या तो भूमिगत है या है ही नहीं। यह उन समझदार मुसलमानों को मुखर होने का समय है, जो देश को सबसे पहले मानते हैं।

ऐसा वर्ग भी या तो खामोश बैठा है या है ही नहीं। मुसलमानों के ऐसे तौर-तरीकों ने उनकी ही जिस एक सबसे प्यारी चीज को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाया है, वह इस्लाम है। उन्हें यह भी समझ लेना चाहिए कि उनके इस भटकाव में भारत की सेक्युलर पार्टियों का ही सबसे बड़ा हाथ है, जिनके 60 साल सत्ता में रहते उनका कोई भला नहीं हुआ। उन्हें यह तय करना है कि वे संख्या का पशु बल नहीं हैं। वे एक समझदार कौम हैं, जो दुनिया में शांति से रहना चाहती है और अपने मुल्क की वफादार है।

अभी हम पिछले 1,000 साल तक हुए भीषण नरसंहारों, व्यापक धर्मांतरण, मंदिरों की तोड़फोड़ और लूटमार को एक तरफ रख देते हैं। हम हमारे ही उन बेबस पुरखों की भी बात नहीं करते, जिन्हें तलवारों के जोर पर ज़िंदा रहने की सज़ा के तौर पर इस्लाम कुबूल करवाया गया और इस लिहाज से 15 अगस्त 1947 का दिन उस सजा से आम माफी का दिन था, जब उन सबको अपनी मूल पहचानों में लौट आना चाहिए था, जो इस्लाम के आधार पर बने पाकिस्तान में नहीं गए थे और भारतीय होने के  नाते भारत में रहना कुबूल किया था। अब उस सज़ा को ढोते रहने की कोई ज़रूरत ही नहीं थी, जाे अतीत में ज़िंदा रहने की एवज में थोपी गई थी।

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। भारत में इस्लाम के विस्तार पर 20 साल से अध्ययनरत। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com