भारती / विचार
मोदी ने दिखाए विकास के रूप— प्रधान-सेवक से सुधारों के प्रधान-प्रचारक बनने की यात्रा

इस सप्ताह में दो दिन, 8 फरवरी को राज्य सभा में और 10 फरवरी को लोक सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेतृत्व और राजनीतिक अति आत्मविश्वास तथा ढिठाई का परिचय दिया। तीन सुधारवादी कृषि कानूनों के विरोध में घिरे हुए मोदी ने संकोच दिखाने की बजाय हर प्रकार से उन कानूनों का बचाव किया।

साथ ही मोदी ने किसान प्रदर्शनकारियों के बीच घुस चुके विघटनकारियों को आईना दिखाया जो किसान आंदोलन का मुद्दा कृषि कानूनों से भटकाकर कुछ और बनाना चाहते थे। उन्होंने निहित स्वार्थों से प्रदर्शन करने वालों को ‘आंदोलनजीवी’ कहकर आंदोलनकारियों से अलग भी कर दिया और स्पष्ट किया कि सरकार आंदोलनकारियों की बात सुनेगी लेकिन आंदोलनजीवियों के आगे झुकेगी नहीं।

हालाँकि यह बात तय नहीं है कि किसान संघों के साथ जिस समझौते पर आंदोलन समाप्त होंगे, वह कृषि सुधारों को जस का तस रखेगा और किसी को मुँह छुपाने की आवश्यकता नहीं होगी, लेकिन प्रधानमंत्री के वक्तव्य में निजी क्षेत्र के बचाव में जो मुखरता और विभिन्न क्षेत्रों में सुधारों की आवश्यकता पर जो प्रतिबद्धता दिखी, वह सराहनीय है।

उन्होंने न सिर्फ कृषि सुधारों का समर्थन किया बल्कि निजी व्यापार और व्यापारियों को लगातार नीची दृष्टि से देखने के रवैये को देश के लिए हानिकारक भी बताया। भारत में दो बड़े उद्योगपतियों, (गौतम) अडानी और (मुकेश) अंबानी को बुरा दिखाने की बात पर बिना नाम लिए हुए मोदी ने बोला,

“निजी क्षेत्र के लिए गलत शब्दों का उपयोग, उन्हें नकार देना किसी ज़माने में सरकार ने किया होगा, उससे वोट मिलते होंगे लेकिन अब वह समय चला गया है। निजी क्षेत्र को नीचा दिखाने का प्रचलन अब स्वीकार्य नहीं है।”

वहीं, दूसरी ओर राहुल गांधी को इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ा।कल (11 फरवरी) को अपने भाषण में उन्होंने फिर से वही बात दोहराई कि प्रधानमंत्री उनके उद्योगपति साथियों के हित में काम कर रहे हैं। “हम दो, हमारे दो” से उनका निशाना था कि मोदी और अमित शाह अंबानी तथा अडानी को लाभ दिला रहे हैं।

लगता है उम्र के साथ-साथ नई बातों को सीखने की क्षमता राहुल गांधी खो चुके हैं। लेकिन राहुल गांधी की समझ में खोट और वास्तविकता में विषयांतर है। जो मायने रखता है, वह यह है कि मोदी ने क्या कहा और उसका उल्लेख यहाँ आवश्यक है-

“वेल्थ क्रिएटर्स (संपत्ति बनाने वालों) को संदेह की दृष्टि से न देखें। जब संपत्ति बनेगी, तब ही बाँटी जा सकेगी… संपत्ति बनाना निस्संदेह ही आवश्यक है। जो संपत्ति बनाते हैं, वे भारत ती संपत्ति हैं और हम उनका सम्मान करते हैं।”

प्रधानमंत्री ने निर्धनता पर शब्दाडंबरों को छोड़ दिया है- जो कि अभी तक भारत में राजनीतिक यात्रा के लिए आवश्यक मानी जाती रही है, जहाँ व्यापारियों को सार्वजनिक रूप से भला-बुरा कहा जाता है लेकिन निजी रूप से उनसे चुनावों के लिए चंदा और अन्य सहायताएँ माँगी जाती हैं।

प्रधानमंत्री ने नए क्षेत्रों में निजी क्षेत्र के प्रवेश और सार्वजनिक क्षेत्र इकाइयों के निजीकरण का समर्थन भी कड़े शब्दों में किया। उन्होंने कहा कि कई क्षेत्रों में सार्वजनिक उद्यमों की आवश्यकता है लेकिन बाबु कंपनी अच्छे से नहीं चला सकते हैं। उन्होंने पूछा-

“क्या बाबु सब कुछ करेंगे? यदि कोई आईएएस बन जाता है तो क्या वह फर्टिलाइज़र, केमिकल उद्योग चलाएगा या प्लेन उड़ाएगा… देश को बाबुओं के हाथ में देकर हम क्या करना चाहते हैं? यदि बाबु इस देश के हैं तो युवा भी इसी देश के हैं (जो निजी क्षेत्र में काम करेंगे)।”

नौकरशाही में सुधारों की आवश्यकता है, यह संकेत प्रधानमंत्री ने स्पष्ट रूप से अपने वक्तव्य में दे दिया है और स्पष्ट रूप से यह भी कह दिया है कि उनका ध्यान सार्वजनिक उद्यमियों को चलाने पर नहीं हो सकता। कृषि कानूनों का बचाव करके उन्होंने हर क्षेत्र में सुधारों का समर्थन कर दिया है। उन्होंने कहा-

“स्टेटस को (यथास्थिति) मानसिकता देश का विनाश करती है। हमारी अर्थव्यवस्था और संस्कृति का आधार है कृषि, हमारे त्यौहार कृषि मौसमों से जुड़े हैं। हम इस क्षेत्र को अनदेखा नहीं कर सकते हैं और अब कुछ करना ही होगा। जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ेगी, भूमि के टुकड़े छोटे होते जाएँगे। इसलिए हमें क्षेत्र में सुधार लाकर सुनिश्चित करना चाहिए कि हमारे किसानों के पास फसल उगाने और बेचने का विकल्प हो। हमारे अन्नदाता समृद्ध हों और हमारा दायित्व है कि उन्हें इसका अवसर दें।”

लोक सभा में यह वक्तव्य नरेंद्र मोदी के राजनीतिक और व्यक्तिगत क्रमागति उन्नति के एक चरण का चरम बिंदु है। 2002 का हिंदुत्व आइकन 2007 में विकास प्रणेता बन गया और 2014 में निर्धनों का मसीहै। 2018 में जब काले धन पर वार और दिवालिया कानून लागू करने से व्यापारियों का विश्वास कम हुआ तब नए मोदी उभरना शुरू हुए।

जून 2018 में मोदी इंडिया इंक के नेताओं से मिले और 2019 के चुनावों से पूर्व उन्हें भारत के भविष्य का आश्वासन दिया तथा इसी बात को 2019 के स्वतंत्रता दिवस वक्तव्य में सम्मिलित किया और “वेल्थ क्रिएटर्स” के योगदानों पर ज़ोर दिया। स्पष्ट रूप से अब मोदी अब सुधारवाद को अपनी पहचान बना रहे हैं।

लोक सभा में उनका वक्तव्य इस बात का परिचायक है कि अब वे सुधार-प्रचारक की भूमिका निभाने और विपरीत परिस्थितियों के बीच भी देश के नागरिकों को सुधार का विचार समझाने के लिए तैयार हैं। 2024 में अपने कार्यकाल के अंत तक यदि वे कुछ न करें और बस सुधारों को आगे बढ़ाते रहें तो उन्हें भारत के सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री के रूप में याद किया जाएगा।

दूसरे कार्यकाल के बचे हुए 39 माहों में वे भारत में परिवर्तन लाने के लिए जाने जाने वाले जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, नरसिंहा राव और अटल बिहारी वाजपेयी, सभी को पीछे छोड़ देंगे। 1973 से 1988 तक 15 वर्षों के लिए आरएसएस प्रचारक और फिर भाजपा की गुजरात इकाई में सक्रिय रहने वाले मोदी अपने व्यक्तित्व को पूरा कर रहे हैं।

2014 में उन्होंने देश का प्रधान-सेवक होने का वादा किया था और फिर देश की संपत्ति की रखवाली के लिए ‘चौकीदार’ बनने की बात की। अब वे आर्थिक व संरचनात्मक सुधारों के प्रधान-प्रचार बन गए हैं।