विचार
भीड़ हिंसा के शिकार बिहार के पुलिसकर्मी अश्विनी कुमार के मानवाधिकारों पर चुप्पी क्यों

कॉमरेड यह कहकर भागना चाहेंगे कि प्रश्न “हाइपोथेटिकल” है, लेकिन यह सवाल उतना मौका नहीं देता। ऐसा इसलिए क्योंकि प्रश्न एक सत्य घटना पर ही है! सोचिए कि किसी राज्य में चुनाव चल रहे हों, यानी राष्ट्रीय मीडिया ने भी अपनी कड़ी नज़र जमा रखी हो, दर्जनों पत्रकार मौजूद हों। लोग भी रुचि लेकर उस राज्य से आने वाली ख़बरें सुन रहे हों।

और ऐसे में एक दिन बीच चुनाव में, अचानक पता चले कि “भीड़” ने एक व्यक्ति को “पीट-पीटकर मार डाला है”! फिर क्या होगा? अख़बार के पहले पन्ने की बड़ी खबर है? अब सोचिए कि पीटकर जिसे मारा गया, वह पुलिस का थाना इंचार्ज हो और वहाँ एक संदिग्ध से पूछताछ करने आया हो तब? अब तो पक्का प्राइम टाइम डिबेट के लायक खबर है ना?

अफ़सोस कि ऐसा कुछ हुआ नहीं। मेरा मतलब अख़बारों के पहले पन्ने या प्राइम टाइम की डिबेट में ऐसा कुछ नहीं हुआ। बिहार-बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में, किशनगंज, पुर्णिया, और काफी हद तक कटिहार-अररिया इत्यादि में भी, मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या ज्यादा है। इसी इलाके में एक जाँच के क्रम में बिहार से एक थाना इंचार्ज बंगाल पहुँचे।

जैसी कि प्रक्रिया है, एक राज्य से दूसरे राज्य आने पर उन्होंने बाकायदा स्थानीय थाने को सूचित भी किया। आरोपी जिस गाँव में रहता था वहाँ पहुँचते ही भीड़ ने पुलिस को घेर लिया। बाकी सात पुलिसकर्मी अपनी जान बचाकर भाग निकले। अश्विनी कुमार को भीड़ ने मार डाला। इस मामले में फिरोज़ आलम, अबुज़ार आलम और शनूर खातून को गिरफ्तार कर लिया गया है।

आप न भी चाहें तो आपको इस मामले से हाल का ही एक झारखंड का मामला याद आ रहा होगा। वहाँ भीड़ ने एक मोटरसाइकिल चोर माने जा रहे व्यक्ति को खंभे से बांधकर रखा था। पिटाई के बाद उसे पुलिस के हवाले कर दिया गया। तीन-चार दिन बाद उस व्यक्ति की मृत्यु हो गई।

जब उसका खंभे से बंधा वीडियो वायरल हुआ, तो एक तथाकथित बहुसंख्यक समुदाय को ही ऐसी सभी हत्याओं का अपराधी बना दिया गया। करीब दो वर्ष बीतने के बाद झारखंड को देखेंगे तो वहाँ मोटरसाइकिल चोर होने के शक में लोगों को भीड़ द्वारा पीट दिया जाना कोई नई बात नहीं है।

केवल 2021 में देखेंगे तो 8 मार्च को सचिन नाम के एक युवक को मोटरसाइकिल चोर होने के शक में पीटकर मार डाला गया था। सचिन का इससे पहले कोई पुलिस रिकॉर्ड भी नहीं था। इसके अलावा भी इस दौर में झारखंड में ऐसी घटनाएँ होती रही हैं।

एक एनजीओ के लिए काम करने वाली पाँच महिलाओं के सामूहिक बलात्कार के लिए “फादर” अलफोंसो ऐंड और उसके मिशनरी साथियों को 2019 में ही सजा हुई थी। राष्ट्रीय महिला आयोग के हस्तक्षेप के बाद बड़ी मुश्किल से इस मामले में सज़ाएँ हुईं।

दोनों मामलों को एक समुदाय विशेष के व्यक्ति की भीड़ द्वारा पिटाई से मिलाकर देखेंगे तो साफ़ दिख जाएगा कि कैसे मीडिया एक विशेष किस्म के मामलों को ही देखता है, और कैसे कई मामलों को साफ़ अनदेखा कर देता है। इन सबके बीच पालघर (महाराष्ट्र) में हुए साधुओं की हत्या का मामला भी याद किया जा सकता है।

अब जब मुंबई पुलिस के आला अधिकारी 100 करोड़ रुपये की वसूली के आरोपों में हैं, तो पालघर मामले का वीडियो होने के बाद भी उद्भेदन क्यों नहीं हो पाया, यह किसी के लिए आश्चर्य की बात तो नहीं रही। वहीं, झारखंड जनाधिकार महासभा का कहना है कि मार्च 2016 से जून 2020 के बीच ही राज्य में 24 लोगों को भीड़ द्वारा पीटकर मार दिए जाने की घटनाएँ हो चुकी हैं।

ऐसे मामलों में पीटे जा रहे व्यक्ति/व्यक्तियों पर चोर होने से लेकर अवैध संबंधों तक के अभियोग लगाए गए हैं। अलग-अलग वजहों से हुई ऐसी घटनाओं को झारखंड जनाधिकार महासभा केवल एक “हिंदुत्व की विचारधारा” पर क्यों थोप देना चाहती है यह एक अलग जाँच का विषय हो सकता है।

यहाँ ये गौर किए जाने लायक ज़रूर है कि जिन क्षेत्रों में धर्म-परिवर्तन की घटनाएँ बढ़ती हैं, वहाँ भीड़ द्वारा ऐसी हिंसा की घटनाएँ भी बढ़ने लगती हैं। डायन बताकर जहाँ महिलाओं को मारा जाता है, उन क्षेत्रों में भी धर्म-परिवर्तन के मामलों में कितनी बढ़ोतरी हुई, इसपर भी ध्यान दिया जा सकता है।

इस किस्म के मामलों से निपटने के लिए 2018 में सर्वोच्च न्यायलय ने राज्यों को समितियाँ बनाने का निर्देश दिया था। झारखंड उच्च न्यायलय भी बढ़ती हुई भीड़ की हिंसा जैसी वारदातों के लिए राज्य सरकार को फटकार लगा चुका है।

मार्च 2021 में जब लगातार ऐसी दो घटनाएँ हुईं तो झारखंड सरकार ने भीड़ की हिंसा से निपटने के लिए जिला स्तर पर समितियाँ बनाने का निर्णय भी लिया था। ऐसे मामलों के लिए सभी जिलाधिकारियों को दिशा-निर्देश जारी किए जाने वाले थे।

अफ़सोस कि राज्य सरकारों के लिए भीड़ द्वारा की जाने वाली इस तरह की हिंसा कोई बड़ा मुद्दा नहीं रही। शायद यही वजह है कि 2018 के न्यायलय के आदेश पर 2021 तक भी अमल नहीं हो पाता। इन सबके बीच बंगाल में भीड़ एक पुलिसकर्मी को पीटकर मार डालती है।

अफ़सोस कि इसपर मानवाधिकार के मुद्दे पर बोलने वाले नहीं बोलते। इस मुद्दे पर वे लोग भी नहीं बोलते जो ऐसे मामलों को किसी “हिंदुत्व की विचारधारा” से जोड़कर दिखाने पर तुले होते हैं। इस किस्म में मामलों में मुआवज़े का भी कोई तयशुदा मानक नहीं है।

अगर मामले को “हिंदुत्व की विचारधारा” से जोड़कर दिखाया जा सके तो मुआवज़ा करोड़ों रुपये का हो सकता है। महाराष्ट्र में 2014 के नियमों के हिसाब से मृत्यु की स्थिति में मुआवजा 2 लाख रुपये का होता है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने 17 जुलाई 2018 के तहसीन पूनावाला बनाम भारत सरकार के फैसले के अनुरूप मुआवज़ा देने का फैसला हाल ही में लागू किया है यानी कि भीड़ ने पीड़ित किस राज्य में मारा, पीड़ित की जाति-धर्म क्या था, इन सबपर निर्भर है कि उसे मुआवज़ा कितना मिलेगा!

भीड़ द्वारा ऐसी हिंसा क्यों की जाती है, इसकी वजहों को ढूँढने जाएँगे तो शायद बहुत से अलग-अलग कारण मिलें, लेकिन जो एक बात हर मामले में नज़र आती है, वह है ऐसे मामलों के खिलाफ उठने वाली आवाज़ें।

जब मृतक और अपराधियों का मजहब देखकर उसपर “प्रोटेस्ट” करने या नहीं करने का फैसला लिया जाने लगता है तो चुप्पी साधने वाले इन्सान होने की सीढ़ी से एक पायदान नीचे तो ज़रूर गिर जाते हैं। ऐसी स्थिति में ये कहा जा सकता है कि अश्विनी कुमार की मौत पर चुप्पी साधे लोग बिलकुल गिरे हुए हैं।

जबतक हमने इस मामले पर कुछ लिखा, तबतक पुर्णिया (मृतक का गृह जिला) से खबर आई कि अश्विनी कुमार की 70 वर्षीय माँ भी अपने बेटे की मौत का सदमा झेल नहीं पायी। उनकी हृदयाघात से मृत्यु हो गई। एक ही शाम उस घर से दो अर्थियाँ निकली होंगी।

बाकी मानवाधिकार मानवों के लिए होते हैं, ये याद करना होगा। उसके पेशे, उसके मजहब, उसकी जाति, उसे मारने वालों के नाम के आधार पर जबतक आप बोलने या चुप रहने का फैसला करते रहेंगे, इस किस्म की घटनाओं की पुनरावृति तो होती ही रहेगी!