विचार
क्यों मिशन शक्ति को आंशिक सम्मान से अधिक की है आवश्यकता

आशुचित्र- क्यों मिशन शक्ति जैसी उपलब्धियों का हो अपक्षपातपूर्ण सम्मान

कल (27 मार्च) मिशन शक्ति की सफलता की घोषणा के बाद लोगों की कई तरह की प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं। कुछ ने इसे भारत की उपलब्धि माना और गर्व की अनुभूति की, कुछ ने प्रश्न खड़ा किया कि यह घोषणा चुनावों से पूर्व ही क्यों, कुछ ने माना कि मोदी ने घोषणा कर वैज्ञानिकों को मिलने वाला श्रेय अपने नाम कर लिया और कई ने तो यह दावा किया कि इस सफलता पर वास्तविक अधिकार भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का है।

बारी-बारी से इन सबकी बात करते हैं। पहली श्रेणी के लोग या तो मोदी समर्थक हैं या सीधे-सादे लोग हैं जिन्हें देश के विकास से मतलब है फिर चाहे वह किसी के भी माध्यम से हो। दूसरी श्रेणी के लोग वे हैं जिन्हें भय है कि मोदी को चुनावों में इस उपलब्धि का लाभ मिलेगा। तीसरी श्रेणी के लोग वे हैं जिनकी तर्कक्षमता क्षीण है। वैज्ञानिकों को किस बात का श्रेय मिलेगा- यह तकनीक बनाने का। निस्संदेह यह श्रेय मोदी को नहीं मिल सकता क्योंकि लोग जानते हैं कि यह मोदी के बस की बात नहीं। मोदी को जो श्रेय मिलेगा- वह है निर्णय लेने का जो वैज्ञानिकों को नहीं मिल सकता क्योंकि वैज्ञानिक तो यह तकनीक बना चुके थे, उन्हें आवश्यकता थी राजनीतिक सबल की।

अब आते हैं चौथी श्रेणी के लोगों पर जो हर बार की तरह इस बात का श्रेय भी नेहरू-गांधी परिवार की झोली में डालना चाहते हैं। पहला तर्क यह कि नेहरू स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री थे जिस कारण उन्हें कई चीज़ों को शुरू करने का अवसर मिला। यदि इस तर्क से देखा जाए तो उज्ज्वला योजना के लिए भी मोदी को श्रेय नहीं दिया जाना चाहिए क्योंकि भोजन पकाने के लिए आग का पहला प्रयोग तो आदिमानव ने किया था, भारत के हर घर में जो रौशनी है उसके लिए हम एडिसन के आभारी हैं, आदि ऐसे तर्कहीन तर्क हो सकते हैं।

मानव जाति की सभ्यता फल-फूल ही इस आधार पर रही है कि हर पीढ़ी को शुरू से शुरुआत नहीं करनी पड़ती। उसकी पिछली पीढ़ी उसके लिए कुछ तैयार करके जाती है और हर पीढ़ी खुदके विकास के साथ अगली पीढ़ी का मार्ग भी प्रशस्त करती है। पिछली पीढ़ियों के सम्मान के लिए वर्तमान पीढ़ी की उपलब्धियों को कमतर आँकना आने वाली पीढ़ियों को एक कमज़ोर शुरुआत देगा।

हालाँकि जब नेहरू की बात की जाए तो उनकी करनी और कथनी में अंतर दिखता है। संसद में विज्ञान के विकास के लिए बड़े-बड़े भाषण देने वाले नेहरू बहुत कम क्षेत्रों में अपने विचारों को प्रभावी रूप से लागू कर पाए। उनकी उपलब्धियों और असफलताओं का आँकलन करना इस लेख का उद्देश्य नहीं है।

चुनावों से पहले इस घोषणा से मिलने वाला राजनीतिक लाभ एक उपोत्पाद (बाई-प्रोडक्ट) हो सकता है लेकिन उद्देश्य नहीं। एक उदार अनुमान के तहत मात्र 20 प्रतिशत भारतीय ही समझ पाएँगे कि भारत ने जो किया है उसके मायने क्या हैं और कोई भी राजनीतिक दल इस संख्या के लोगों को रिझाने के लिए इतना बड़ा कदम नहीं उठा सकता।

दूसरी ओर जो लोग इस बात का श्रेय नेहरू को दे रहे हैं, वे राष्ट्र को दो तरह से हानि पहुँचा रहे हैं- पहला अपनी पक्षपातपूर्ण टिप्पणी से वे इस सफलता के प्रति देश के उत्साह को क्षति पहुँचा रहे हैं। दूसरा इस प्रकार के प्रयास का सम्मान न करके वे आगे होने वाले ऐसे प्रयासों के प्रति लोगों को हतोत्साहित कर रहे हैं।

किसी भी कार्य के सही-गलत के परीक्षण से पूर्व मानवीय प्रकृति उस कार्य से मिलने वाले सम्मान की और आकर्षित होती है। यदि वामपंथी होना आपको समाज में ‘कूल’ दिखाता है तो पहले आप वामपंथी बनते हैं, बाद में सोचते हैं कि आप सही है या नहीं। यदि जिहाद करना आपके कट्टर इस्लामी समाज में सम्मान दिलाएगा तो आप आतंकवादी बनेंगे। भारतीय शिक्षा व्यवस्था में अयोग्य शिक्षकों की समस्या का मूल भी सम्मान है। युवाओं में पैसा कमाने की होड़ का मूल भी सम्मान ही है।

जब तक राष्ट्र के लिए कार्य करने वाले लोगों का भरसक सम्मान नहीं होगा तब तक इस कार्य के लिए आगे आने वाले लोगों की संख्या में कमी ही रहेगी। राजनीतिक स्वार्थ के लिए टिप्पणी करने से पूर्व इसके दीर्घकालिक परिणामों पर भी विचार अवश्य करें।

लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के व्यक्तिगत हैं। 

निष्ठा अनुश्री स्वराज्य में उप-संपादक हैं। वे @nishthaanushree के माध्यम से ट्वीट करती हैं।