विचार
मिशन 2020+ : क्यों हिंदू धर्म को एक बार फिर मिशनरी धर्म बनना होगा

आशुचित्र- किसी और चीज़ पर प्रतिबंध हिंदुओं के लिए उल्टा प्रभाव डालेगा। इस प्रकार हिंदू धर्म के पुनरोत्थान के लिए सबसे उचित विकल्प मिशनरी का ही बचता है हमारे पास।

यदि कोई ऐसा संकल्प है जो धार्मिक पहचान की चिंता करने वाले सभी हिंदुओं को इस नव वर्ष पर लेना चाहिए तो वह यह है कि उन्हें बुरे विचारों से दूर रहना चाहिए। ऐसा ही एक बुरा विचार है कि धर्मांतरण पर प्रतिबंध लगाकर वे भारत में हिंदुओं की घटती जनसांख्यिकी को रोक पाएँगे।

ऐसा नहीं होगा। यदि हम इस बुरे विचार को त्याग दें तो इसका परिणाम अधिक महत्त्वपूर्ण है- हिंदू धर्म को अपनी शक्ति पुनः अर्जित करने के लिए एक बार फिर एक मिशनरी धर्म बनना होगा।

इससे पहले हम इसके क्यों और कैसे पर विचार करें, इसके पीछे छिपी मूल भावना को समझें- स्थाई रहने वाले को प्रकृति नहीं स्वीकारती। ब्रह्मांड में लगातार परिवर्तन हो रहे हैं, जीवन का अर्थ है जितनी कोशिकाएँ मरें, उनसे अधिक जन्म लें, बाज़ार में टिकनोे वाले व्यापार को अपने उपभोक्ता बढ़ाने होते हैं और ऐसा ही राजनीतिक दलों के लिए भी है।

जो राजनीतिक दल यथास्थिति से संतुष्ट हो जाता है उसका पतन निश्चित है। यही वह वास्तविकता थी जिसने महाराष्ट्र में शिवसेना को भारतीय जनता पार्टी से अलग होने की प्रेरणा दी।

विचार एक ही हाै। यदि किसी का विकास और पोषण नहीं हुआ तो वह सिकुड़कर अंततः मर जाएगा। धर्म एक ऐसा विचार है जिसके भौतिक, भावनात्मक और मानसिक आयाम हैं। यदु उनका विस्तार नहीं हुआ तो वे मर जाएँगे, भले ही इस प्रचलन को आप अपने जीवनकाल में न देख सकें। यदि हिंदू धर्म को इस दयनीय भविष्य से बचना है तो इसे विस्तार पर कार्य करना होगा।

पहले यह समझें कि धर्मांतरण पर रोक लगाकर क्यों हिंदू धर्म की गिरती जनसांख्यिकी को नहीं रोका जा सकता है। कई राज्यों में धर्मांतरण पर प्रतिबंध है लेकिन इसके बावजूद किसी में भी हिंदू धर्म में मानने वालों की घटती संख्या को नहीं रोका जा सका है।

चीन ईसाइयत समेत कई आधिकारिक धर्मों के प्रति अमित्रवत व्यवहार करता है। इसके बावजूद भूमिगत रूप से ईसाई बढ़ रहे हैं। कुछ अनुमान बताते हैं कि 2030 तक चीन यूएस को पीछे छोड़कर सर्वाधिक ईसाइयों का देश बन जाएगा। इस दशक के मध्य से 25 करोड़ ईसाइयों के साथ यूएस सबसे बड़ा ईसाई जनसंख्या वाला देश था।

यूएस में ईसाइयत पतन की ओर है (यूरोप की बात न करें) क्योंकि कई लगों ने इसमें मानना छोड़ दिया है। एक-चौथाई अमेरिकी वयस्कों का कहना है कि वे किसी धर्म में नहीं मानते हैं। पश्चिमी देशों में ईसाइयत का यह पतन भारत जैसे देशों में धर्मांतरण पर बल को प्रोत्साहित कर रहा है।

यही एक कारण है कि क्यों पोप दलाई लामा से नहीं मिलते हैं क्योंकि वैटिकन चीन में बिशपों की नियुक्ति में हस्तक्षेप चाहता है जिससे धर्म को फैलाया जा सके।

एक अन्य प्रतिबंध के उदाहरण से समझें कि क्यों प्रतिबंध कारगर नहीं होते। लगभग 20 राज्यों में गौहत्या पर प्रतिबंध है लेकिन इसके बावजूद गौमांस की तस्करी और गौहत्या पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इसके बीच गौ तस्करों और गौ रक्षकों के बीच तनाव और हिंसा की घटनाएँ देखने को मिलीं। 19.2 करोड़ मवेशी जनसंख्या जिनमें से अधिकांश मादा हैं की आवाजाही व हत्या पर नज़र रखना कठिन काम है।

यदि यह मामला एक पशु के साथ है जिसे लाने, ले जाने के लिए एक मनुष्य की आवश्यकता है तो सोचिए धर्मांतरण पर नज़र रखने में हम कितने सफल हो पाएँगे जब कोई व्यक्ति बिना नाम बदले अपनी घर की चारदीवारी में ही धर्म परिवर्त.न कर ले? इस प्रकार के धर्मांतरण को केवल दखल देने वाली नज़रबंदी से जाना जा सकता है जिसका खुले समाज में कोई स्थान नहीं है।

धर्मांतरण में सहायता करने वाली विदेशी राशि पर प्रतिबंध लगाना सही है लेकिन इसके अलावा किसी और चीज़ पर प्रतिबंध हिंदुओं के लिए उल्टा प्रभाव डालेगा। इस प्रकार हिंदू धर्म के पुनरोत्थान के लिए सबसे उचित विकल्प मिशनरी का ही बचता है हमारे पास।

जो हिंदू दावा करते हैं कि हिंदू धर्मांतरण करवाने वाला धर्म नहीं है, वे गलत हैं क्योंकि इस प्रकार हिंदू धर्म भारतीय उप-महाद्वीप पर नहीं फैला होगा। प्रचार और प्रसार आवश्यक है। आदि शंकराचार्य का उदाहरण लें।

आदि शंकराचार्य पर अपनी पुस्तक में पवन वर्मा उन्हें हिंदू धर्म के सबसे बड़े विचारक कहते हैं लेकिन वे न सिर्फ विचारक थे बल्कि एक कर्ता और मिशनरी भी थे। अन्यथा वे देशभर में घूमकर विरोधी विचारों से वाद-विवाद क्यों करते और अपने 32 वर्ष के लघु जीवन में चार मठों की स्थापना क्यों करते?

यदि हिंदू धर्म की मिशनरियाँ नहीं थीं तो इसके विचारों को दक्षिण-पूर्व एशिया में फैलाया नहीं जा सकता था। यहाँ तक कि इंडोनेशिया जैसे मुस्लिम बहुल देश के पास भी रामायण का अपना संस्करण है।

लेकिन हिंदू धर्म को मिशनरी धर्म क्यों बनना चाहिए इसका असल कारण है कि विस्तार और धर्मांतरण रणनीतियाँ आपको अपने विचारों, रूढ़ियों, संस्थाओं, संसाधनों आदि पर चिंतन का अवसर देती हैं।

यदि हिंदू संस्थान स्थापित नहीं करेंगे, उन्हें वित्तपोषित कर उनकी स्थापना करने वाले व्यक्तियों से बड़ा नहीं बनाएँगे, अपने धर्म को समझने योग्य सरल विचारों में नहीं तोड़ेंगे, यदि उन विचारों का कोई आर्थिक आयाम नहीं होगा जो धर्मांतरित व्यक्ति को लाभ पहुँचाए तो यह विश्व के किसी हिस्से में सिमटा हुआ छोटा धर्म बनकर रह जाएगा।

वर्तमान में, कई हिंदू अपने बारे में निम्नलिखित बयान देकर आलस्य और मूर्खता का परिचय देते हैं। मैंने इन सबका प्रतिवाद देकर इन तर्कों के खोखलेपन पर सवाल उठाया है।

(1) हम पिछले 1,000 वर्षों से बचे हुए हैं, इसलिए हम अगले 1,000 वर्ष भी टिके रहेंगे। बौद्ध धर्म भी भारत में सदियों से एक प्रमुख धर्म था, भले ही इसका प्रभुत्व नहीं था। यह अचानक कैसे गायब हो गया? और कैसे इसने हिंदू धर्म को प्रबल विश्वास बनने दिया यदि हिंदू धर्म ने खुद को मजबूत नहीं किया होता और अपने विचारों को फिर से फैलाया नहीं होता।

1940 के दशक में, दक्षिण कोरिया में सिर्फ 2 प्रतिशत ईसाई थे। 2014 में, ईसाई धर्म को मानने वालों की संख्या 30 प्रतिशत से अधिक हो गई यानी कि तीन पीढ़ियों के अंतराल में 15 गुना वृद्धि। लेकिन अचानक, ईसाई धर्म का विकास फीका पड़ गया, क्योंकि युवाओं ने चर्च में जाना बंद कर दिया है। जब धर्म लोगों की अपेक्षाओं से मिलते हैं तो वे बढ़ते हैं और यदि नहीं तो सिकुड़ जाते हैं।

हिंदू धर्म तेज़ी से घट सकता है यदि यह जनसांख्यिकीय रुझानों का अध्ययन नहीं करता और यह समझने में विफल रहता है कि वह वह क्या है जो लोगों को धर्म के प्रति निष्ठावान या विमुख बनाता है। भारत में ईसाई धर्म बढ़ रहा है क्योंकि इस धर्म ने यह समझने में निवेश किया है कि लोग विश्वास से क्या चाहते हैं।

यदि हिंदू जनसांख्यिकीय संकुचन को रोकना चाहते हैं, तो उन्हें ईसाई और इस्लाम की कमजोरियों और ताकत का अध्ययन करना होगा, और उनकी शक्तियों को अपनाकर और उनकी कमजोरियों पर हमला करके अपनी रणनीतियाँ तैयार करनी होंगी।

धर्मांतरण रणनीतियों के लिए प्रतिबद्धता आपको स्वायत्त रूप से इन विचारों पर सोचने के लिए मजबूर करेगी। धर्मांतरण पर प्रतिबंध का मतलब है कि आप आराम कर सकते हैं और सोने जा सकते हैं और इस प्रकार हम नींद लेकर अपने दुश्मनों को बढ़त बनाने में सक्षम कर रहे हैं।

2. हम सभी लोगों को उनके विश्वास पर उन्हें स्वयं के विचारों का पालन करने की स्वतंत्रता देते हैं, जिसका अर्थ है कि हम खुले और उदार हैं। खुले विचारों का होना एक बात है और धर्म की चुनौतियों का सामना करने में आलसी होना और उन्हें खारिज करना दूसरी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, असम, केरल और मंगलोर के आसपास यानी कर्नाटक के तटीय इलाकों में मुस्लिम आबादी बढ़ रही है, और ईसाई धर्म पूर्वोत्तर सहित पूरे दक्षिणी और आदिवासी भारत में अपने पंख फैला रहा है। इन क्षेत्रों में हिंदू धर्म पहले से ही पीछे है।

इस गिरावट को दूर करने का एकमात्र तरीका धर्मांतरण से विस्तार की प्रतिबद्धता को विकसित करना है। एक धर्म जो परिभाषित नहीं करता है कि वह संभावित धर्मांतरित को क्या प्रदान करेगा तो वह सिकुड़ जाएगा और अंततः विफल होगा। अगर कोई भी अपनी शर्तों पर हिंदू होने का दावा कर सकता है, तो हिंदू बनने प्रयास क्यों करेगा?

लेकिन साथ ही साथ एक और बात भी है। हालाँकि यह अच्छा है कि हिंदू धर्म अपेक्षाकृत हठधर्मिता से है, लेकिन हिंदू धर्म इस बात को नहीं मानता कि आपके पास खुद के मौलिक मूल्यों और प्रस्तावों की संहिता नहीं होनी चाहिए। यदि हिंदू धर्म “कुछ भी चलता है” का ही रहेगा तो किसी को भी इसे अपनाने की ज़रूरत नहीं रहेगी, क्योंकि यह किसी के लिए स्पष्ट रूप से परिभाषित मूल्य प्रस्तावित नहीं करता है।

अगर हिंदू धर्म “अपने आप करो“ वाला एक धर्म बना रहा तो वैसा ही होगा जैसे एक दिन शशि थरूर ने अचानक “द हिंदू वे” पर एक किताब लिख दी और कोई भी हिंदू इसे “बकवास” नहीं कह पाएगा। वे हिंदू धर्म को इस तरह से परिभाषित कर सकते हैं जो धर्म को आत्म-पराजित हो। यह अच्छा है कि हिंदू धर्म मान्यताओं और प्रथाओं को अपने अनुसार ढालने की अनुमति देता है, लेकिन अगर एक मूल विकसित नहीं किया गया तो यह खोखला गोला बनकर रह जाएगा।

3. सभी धर्म एक समान हैं तो क्या समस्या है अगर कुछ हिंदू दूसरे धर्मों में परिवर्तित होते हैं? यह ऐसी बकवास है जिसे हमें फैलने से रोकना चाहिए। सभी धर्म समान नहीं हैं, और कभी नहीं होंगे, भले ही कुछ बिंदु उनके लिए सामान्य हों। यदि सभी धर्म समान हैं, तो हिंदू भी ईसाई या इस्लाम या बौद्ध धर्म में क्यों परिवर्तित होते हैं? बाबासाहेब अंबेडकर ने बौद्ध धर्म में परिवर्तित होकर एक बड़ा मुद्दा क्यों बनाया?

भारत में होने वाली 2021 की जनगणना लगभग पूरे भारत में हिंदू आबादी में और गिरावट तथा मुस्लिम जनसांख्यिकी में वृद्धि का संकेत देगी। ईसाइयत की वृद्धि छुपी रह सकती है क्योंकि कई लोग नौकरी के आरक्षण के लाभ को खोने के डर से खुले तौर पर अपने नए विश्वास की घोषणा नहीं करते हैं।

हिंदू धर्म का पतन हो रहा है क्योंकि आलसी हिंदू “सभी धर्म समान हैं” का दावा करके प्रतिबद्धता से बचना चाहते हैं और इस प्रकार अपनी निष्क्रियता और हार के लिए बौद्धिक कारण देते हैं। ‘दिल्ली दूर अस्त’, में विश्वास कभी जीतने की रणनीति नहीं हो सकती है। 

4. अगर हिंदू धर्म हिंदुत्व हो गया तो यह हिंदू धर्म नहीं रहेगा। मैं हिंदुत्व को या तो राजनीतिक हिंदू धर्म के रूप में परिभाषित करता हूँ या फिर इसे सभी हिंदू संप्रदायों एवं वर्गों के बीच एकता की मजबूत परत मानता हूँ। हालाँकि यह सच है कि हिंदू धर्म में विचारों को एकीकृत करने के किसी भी प्रयास से कुछ विविधताएँ कम हो जाएँगी, हमारी वास्तविक समस्या विविधता नहीं है, बल्कि असमानता का महिमामंडन है। कोई भी धर्म जो जीवित रहना चाहता है, उसे एकता की परतों का निर्माण करना होगा जहाँ विविध इकाइयाँ अपने मतभेदों का जश्न मनाते हुए भी अपने सामान्य हितों के लिए लड़ सकें। 

सिख धर्म के मामले पर विचार करें। पहले नौ गुरु सुधार और प्रतिबद्धता के माध्यम से विश्वास फैला रहे थे। नौवें गुरु, तेग बहादुर ने तो धर्म के लिए अपना सर भी सौंप दिया और मुगल शासन ने इसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया। अपना सर सौंप देना आपको युद्ध में विजयी नहीं बनाता है। गुरु तेग बहादुर का यह बलिदान बहुत बड़ा था लेकिन निस्संदेह ही उनका यह बलिदान भारत के उत्तर-पश्चिम में इस्लाम की चुनौती से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं था

10वें गुरु थे गुरु गोविंद सिंह, जिन्होंने सिख धर्म को अंतिम रूप दिया और मूल सिद्धांतों को हिंदू और इस्लाम दोनों से लिया जिससे वे इस्लाम के हमले का सामना कर सकें। क्या इसके कारण सिख धर्म बदल गया? हाँ।

क्या इस बदलाव के बिना सिख धर्म बच सकता था? हम नहीं कह सकते लेकिन एक बात स्पष्ट है, यदि आप खड़े होकर लड़ना चुनते हैं, तो आप बदल जाते हैं। यदि आप नहीं बदलते हैं, तो आप हार जाते हैं। फिर आपको विजेताओं द्वारा निर्धारित शर्तों पर परिवर्तन करने के लिए मजबूर किया जाता है। किसी को क्या चुनना चाहिए? खुद को बदलें और अपने भाग्य को नियंत्रित करें, या उन लोगों द्वारा बदलने के लिए मजबूर किया जाए जो आपकी या आपकी विरासत की परवाह नहीं करते।

5. वसुधैव कुटुम्बकम (दुनिया एक परिवार है)। यह बकवास है। दुनिया कभी एक परिवार नहीं रही है, और यहाँ तक ​​कि केवल एक धर्म से चलने वाली दुनिया भी कभी एक परिवार नहीं होगी। कौरव और पांडव मूलत: एक ही परिवार के थे लेकिन वे अपने हिस्से की पाटीदारी के लिए युद्ध में गए थे। धर्म ने सौभाग्य से जीत हासिल की, लेकिन यदि अर्जुन की कमजोरी (वह भी वसुधैव कुटुम्बकम में विश्वास करता है) को श्रीकृष्ण द्वारा धर्म के लिए लड़ने की सलाह से दूर नहीं किया गया होता तो ऐसा नहीं होता, जैसा कि गीता में वर्णित है।

भारत में हिंदू धर्म के प्रतिद्वंद्वी ईसाई धर्म और इस्लाम भी वसुधैव कुटुम्बकम की अपनी खुद की मान्यता में विश्वास करते हैं और केवल अंतर यह है कि यह यीशु या अल्लाह के बैनर के तहत होना चाहिए। लेकिन न तो ईसाई धर्म और न ही इस्लाम ने एक ही विश्वास रखने वाले राज्यों और समाजों के बीच युद्ध को समाप्त कर पाया है, न ही हिंदू धर्म ने ऐसा किया है।

वसुधैव कुटुम्बकम एक सद्भाव का नारा है, रणनीति नहीं। परिवार की भावनाओं का अभ्यास करना ठीक है जब संबंधित व्यक्ति परिवार की तरह व्यवहार करता है, न कि तब जब वह आपको लूटने की योजना बना रहा हो।

दुनिया को एक परिवार बनाने का एकमात्र तरीका इस परिवार की प्रत्येक इकाई के लिए एक दूसरे को रोकने के लिए पर्याप्त म़जबूत होना है, ताकि धर्मों और लोगों के बीच शांति रहे। जब सभी धर्मों को पता चलेगा कि वे दुनिया पर शासन नहीं कर सकते, तो वे शांति और वसुधैव कुटुम्बकम की दिशा में जाएँगे। शांति की एकमात्र गारंटी प्रभावी सशस्त्र निरोध है।

वसुधैव कुटुम्बकम को प्राप्त करने के लिए, हिंदू धर्म को एक बार फिर एक मिशनरी धर्म बनकर अपने आप को स्थापित करना होगा। जब तक यह धर्मांतरण करने से इनकार करेगा, तब तक धर्म परिवर्तन को अपनाकर विश्व धर्म बन चुके दो रेगिस्तानी पंथ इसे नष्ट कर देंगे।

पुनश्च: – सरकारी नियंत्रण से मंदिरों को मुक्त करने का आंदोलन केवल तभी वैध है जब आप मंदिर के संसाधनों का उपयोग विश्वास के प्रसार और विस्तार के लिए करते हैं। यदि आप केवल देवता से प्रार्थना करना चाहते हैं, तो आप मंदिर क्यों चलाना चाहते हैं? शायद सरकार भी इसे चला सकती है?

आर जगन्नाथन स्वराज्य के संपदकीय निदेशक हैं। वे @TheJaggi से ट्वीट करते हैं।