भारती / विचार
मीडिया जैसे आपदा का चित्रण कर रही है, वह उन्हें लोकतंत्र का चौथा स्तंभ नहीं बनाता
जय मेनन - 29th April 2021

यह बात किसी से छुपी नहीं है कि पिछली आधी सदी से “थर्ड वर्ल्ड” के पीड़ित होने के दृश्यों से पश्चिमी विश्व में एक संदेहास्पद नैतिक उत्साह-सा जाग जाता है। अधिकांशतः यह उत्साह अफ्रीका की दुर्गतियों के लिए देखने को मिला लेकिन भारत की पीड़ाओं पर भी काफी ध्यान दिया गया।

पिछले एक दशक या कुछ समय में चीज़ों में थोड़ा परिवर्तन आया है। हर जगह विद्यमान रहने वाले गैर-सरकारी संगठनों (एनजीओ) को सहानुभूति दिखाने के अवसर कम मिले हैं। यह और जटिल तब हो गया जब 2020 में कोविड-19 वैश्वित महामारी ने विश्व के हर क्षेत्र को बिना भेदभाव के प्रभावित किया।

विश्व के वीडियो में रिकॉर्डेड इतिहास में यह पहली बार हुआ जब विश्व ने एक अयोग्य यूएस और एक हारे हुए यूरोप को देखा जो ऐसी मुश्किलों का सामना कर रहे थे जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि कोई आपदा इन आधुनिक और विकसित देशों को इतना परेशान कर सकती है।

अस्पताल अपनी क्षमता से अधिक काम कर रहे थे, स्वास्थ्य कर्मचारी व्यथित थे और मीडिया सही शब्दों को खोजने का संघर्ष कर रही थी जिससे इस व्याकुलता को व्यक्त किया जा सके। कुछ समय तक पूरा वातावरण एक प्रलय-सा लगता था।

निस्संदेह ही कई काले और भूरे समीक्षकों के मन को गोरों की विपत्ति देखकर थोड़ा अच्छा भी लगा होगा। लेकिन यह भी सत्य है कि वे भी सोच रहे होंगे कि क्यों वायरस यूरेशियाई और अफ्रीकी भूभाग पर मौत का वह तांडव नहीं कर रहा है जो पश्चिमी यूरोप और उत्तरी अमेरिका, विशेषकर यूएस में देखने को मिला।

हालाँकि अब यह प्रश्न किसी को चिंतित नहीं कर रहा है, कम से कम सार्वजनिक रूप से तो ऐसी चिंता किसी ने व्यक्त नहीं की है। भारत में यह महामारी कैसा प्रलय मचाएगी, इसके कम संकेत मिलने के बावजूद समस्या का सामना करते हुए यूएस-ब्रिटिश मीडिया में प्रलय के अनुमान लगाए जा रहे थे।

विदेशी मीडिया के भारत में स्थित सहयोगी भी इस पृष्ठभूमि पर आधारित किसी भी संकेत को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने में प्रसन्नता की अनुभूति करते। समस्या यह थी कि उनके प्रलय दर्शाने वाले अनुमानों को डाटा का समर्थन नहीं मिल पा रहा था। इस प्रकार भारत में कोविड की दूसरी लहर उनके लिए वरदान सिद्ध हो रही है।

दूसरी लहर के आने की जितनी अपेक्षा नहीं थी, उससे अधिक अपेक्षा दूसरी लहर के कारण पश्चिमी मीडिया में उत्साह की लहर की थी। अब हम रोज़, लगातार, निरंतर हृदय-विदारक दृश्यों को देख रहे हैं जिसमें लाचार लोग किसी न किसी तरह से स्वास्थ्य सुविधा पाने के लिए व्याकुल हैं।

इन दृश्यों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने वालों में से एक हैं वॉशिंगटन पोस्ट की ऐनी गोवेन जिन्हें जलती हुई चिताओं का ड्रोन द्वारा लिया गया चित्र “स्टनिंग” लगा (जैसा कि उन्होंने ट्वीट में लिखा था जो अब डिलीट कर दिया गया है)। द गार्जियन  ने इसे “नर्क की ओर भारत का अवतरण” कहा।

इसी तरह के कई लेख विदेशी मीडिया में प्रकाशित हुए। वहीं भारत के कुछ पत्रकारों से भी ऐसी टिप्पणियाँ आईं जैसे बरखा दत्त ने भारत को एक “टूटा हुआ राष्ट्र” कहा जहाँ “असंवेदनशीलता और अयोग्यता हमें मार रही” है। द प्रिंट के एक वरिष्ठ पत्रकार का कहना है कि ये सब इसलिए हो रहा है क्योंकि भाजपा समझ गई है कि “वायरस मतदान नहीं करता”।

विश्व के किसी भी लोकतंत्र के साथ इन मामलों में ऐसा व्यवहार नहीं होता जैसा भारत के साथ होता है। उन हिंदुओं की संवेदनाओं का यह एक निर्दयी अनादर है जो नहीं चाहते होंगे कि उनके परिजनों की जलती चिताएँ एक सार्वजनिक दृश्य बने। लेकिन इस सभ्यता और इसकी पवित्रता के प्रति कोई आदर देखने को नहीं मिलता।

एक श्मशान के बाहर अड्डा जमाकर पूछना “क्या कोई मुर्दों की गिनती कर रहा है?” से अधिक अनैतिक क्या होगा। वहीं, इन लोगों के पश्चिमी समवर्ती इस प्रकार की कहानियों को “ह्यूमन स्टोरीज़” कहकर सम्मानित करते हैं। सार्वजनिक पीड़ा और व्यक्तिगत दुख का बाज़ारीकरण हिट्स, क्लिक्स, लाइक्स और शेयर्स के लिए करने के बाद वे अपने आप को नैतिक प्रश्नों से इन्हीं तर्कों से बचाते हैं।

असंवेदनशील होने का आरोप मीडिया बड़ी सरलता से सरकार और काफी हद तक हर किसी पर लगा देती है, सिवाय स्वयं उनके लेकिन सामान्य जन को पूछना चाहिए कि रिपोर्टिंग के ये जो तरीके अपनाए जा रहे हैं, उनका उद्देश्य लोगों को जागरूक करना है या पैसा कमाना? क्या इस मोर्चे पर मीडिया का कोई उत्तरादायित्व नहीं होना चाहिए?

चिंता के वेश में जो यह असंवेदनशीलता परोसी जा रही है, उसका सबसे दुखद भाग है कि इसमें अधिकांश योगदान हमारे ही लोग करते हैं, कम से कम पारंपरिक मीडियाकर्मी जो अपने इस चारित्रिक पतन से अनभिज्ञ हैं और ज़मीन पर बदली राजनीतिक वास्तविकताओं से अनजान।

वे इस महामारी को एक अवसर के रूप में देख रहे हैं जहाँ वे सरकार को इतना नीचा दिखा सकें कि पूर्ववर्ती व्यवस्था फिर से उठ खड़ी हो जहाँ वे अब की तुलना में अपने आप को काफी सहज महसूस करते थे। पीड़ा का नंगा नाच ऐसा करने का एक महत्त्वपूर्ण आयाम है क्योंकि इससे सार्वजनिक अनिश्चितता और भय पनपता है जो अंततः सड़क पर आक्रोश बन सकता है।

लोगों को सड़क पर हिंसा करने के लिए उकसाने के लिए सिर्फ एक थनबर्ग टूलकिट ही नहीं है, बल्कि ऐसी कई योजनाएँ चल रही हैं। इन प्रयासों का प्रभाव सिर्फ किशोर मन पर नहीं पड़ता जो कैसे भी बस दुनिया बदलना चाहता है जबकि वास्तविकता की समझ उनमें काफी सीमित होती है।

मीडिया (सोशल और पारंपरिक) द्वारा विपत्ति के प्रचार से आवेग ही उत्पन्न नहीं हो रहा है। आश्चर्यजनक रूप से एक के बाद एक यूरोप और मध्य पूर्व की सरकारें एवं कुछ माथापच्ची के बाद यूएस की सरकार भी भारत के सहयोग के लिए आगे आई है तथा सहायता पहुँचाने के लिए समन्वय किया जा रहा है।

वहीं, सोशल मीडिया पर भी कई देशों के लोगों ने भारत की विपत्तियों के प्रति चिंता व्यक्त की है और देशवासियों के लिए प्यार एवं शुभकामनाएँ भेजी हैं। इनमें एक सबसे हृदयस्पर्शी और सरल बयान ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट खिलाड़ी और आईपीएल में कोलकाता नाइट राइडर्स के लिए खेलने वाले पैट कमिंस से आया है।

50,000 डॉलर की दान राशि के साथ उन्होंने एक पत्र जारी कर भारत के “दयालु” लोगों के प्रति सहानुभूति व्यक्त की और पीएम केयर्स को दान देते हुए ऑक्सीजन आपूर्ति के लिए दान राशि के उपयोग की अपेक्षा की। उनके इस रवैये से हमारे टिप्पणीकारों और पारंपरिक मीडिया को कुछ सीख लेनी चाहिए कि विपत्ति के समय कैसा आचरण श्रेष्ठ होता है।

समस्या को बढ़ाने की बजाय कुछ अच्छा करने का प्रयास हो, समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्वों पर अपनी राजनीतिक प्रेरणाओं को हावी न होने दिया जाए। मीडिया से एक बात कहना चाहूँगा जो काफी बार कही जा चुकी है- आप लोकतंत्र का चौथा स्तंभ हो और इसे अंदर से खोखला करने वाला पाँचवाँ स्तंभ मत बनो।