भारती / विचार
‘अल्पसंख्यक’ का ऐतिहासिक और संप्रति मूल आधार है ‘सांप्रदायिक’ [दीर्घ चर्चा]

प्रसंग- यह लेख 10 जून को स्वराज्य में प्रकाशित मेजर सरस त्रिपाठी के लेख के विस्तार के रूप में लिखा गया है। इस लेख में अल्पसंख्यक और सांप्रदायिकता के अंतर्संबंध को ऐतिहासिक एवं कालानुक्रमिक आधार पर सांप्रतिक परिप्रेक्ष्य में विवेचित-विश्लेषित किया गया है।

स्वराज्य में मेजर सरस त्रिपाठी का लेख ‘अल्पसंख्यक को परिभाषित करना अत्यावश्यक क्यों है’ पढ़ने को मिला। यह लेख संविधान में निर्दिष्ट ‘अल्पसंख्यक’ शब्द को वर्तमान समय में प्रकारांतर से जानने-समझने के लिए प्रेरित करता है।

समभाव वाले (भारतीय भावधारा) मित्रों के साथ-साथ अभारतीय (भारतेतर) विचारधारा का अनुसरण (कथित?) करने वाले कुछ मित्रों से संदर्भित मुद्दे पर चर्चा-परिचर्चा हुई तो ज्ञात हुआ कि ‘अल्पसंख्यक’ शब्द पर चिंतन (चिंता?) की दो धाराएँ विद्यमान (?) हैं।

समभाव वाले मित्रों का मानना-कहना था (है) कि यह शब्द ‘समान नागरिक संहिता’ की दृष्टि से भी विचारणीय एवं अनुकरणीय पहलू है। वार्ताओं के दौरान यह बात भी उभरकर आई कि ‘कथित’ अल्पसंख्यकों को संतुष्ट करने के लिए सरकारें हरसंभव प्रयास ही नहीं कर (करती) रही हैं, अपितु सारी हदें पार कर (करती) रही हैं।

यह भी कि कथित ‘बहुसंख्यक’ अर्थात् हिंदुओं की जनभावनाओं की ओर सरकारों का विशेष ध्यान नहीं (रहा) है। ‘अल्पसंख्यक’ को परिभाषित करने एवं तुष्टीकरण की चुनावी नीति पर लगभग सभी मित्र एकमत दिखाई दिए (हैं)।

इसके विपरीत अभारतीय विचारधारा के अनुसरणकर्ताओं (तथाकथित) का मानना-कहना था (है) कि संघ-भाजपा ने ‘अल्पसंख्यक’ को ‘हिंदू बनाम मुस्लिम’ कर दिया है। जैसा कि प्रायः हुआ (होता) है, भारतीय समाज में उत्पन्न सांप्रदायिक कटुता का ठीकरा हिंदू महासभा-संघ-भाजपा पर फोड़ा गया (जाता है)।

वास्तव में संदर्भित विषय पर इस दूसरी धारा के मित्रों के सोच-विचार का दृष्टिकोण ‘औपनिवेशकालीन’ भारत में प्रचलित विचारों की भाँति अर्थात् जातिवादी एवं सांप्रदायिक कटुतापूर्ण तथा गतानुगतिक प्रतीत हुआ (होता है)।

स्पष्टता के लिए इस लेख के अगले परिच्छदों में ‘अल्पसंख्यक’ (सांप्रदायिक) और औपनिवेशकाल के अंतर्संबंध पर संदर्भोचित उदाहरणों का उल्लेख किया गया है। अभारतीय विचारधारा के अनुसरणकर्ताओं की दृष्टि में ‘अल्पसंख्यक’ पर विचार-पुनर्विचार करने की कोई आवश्यकता नहीं है।

यों तो इस धारा के बुद्धिजीवी स्वयं को ‘वैज्ञानिक सोच’ वाले और ‘धर्मनिरपेक्ष’ कहते-समझते हैं, परंतु भारतीय समाज और समस्या के वर्णन-विश्लेषण में स्वाभाविक रूप से जातिवादी तथा मुस्लिमपरस्त प्रतीत हुए (होते हैं)।

वे प्रायः भारत में ‘सांप्रदायिकता’ के उभार का कालानुक्रमिक (क्रोनलॉजिकल) वर्णन-विश्लेषण करने से बचते हैं या पलायन करते हैं अथवा मनगढंत तथ्य जुटाने का उपक्रम करते हैं। इस लेख को लिखने की प्रेरणा इस दूसरी धारा अर्थात् अभारतीय विचारधारा के मित्रों के विचारों (गतानुगतिक) से ही प्राप्त हुई है।

इस लेख को पढ़ते हुए थोड़ा ‘रैशनल’ और थोड़ा ‘नैशनल’ होने की नितांत आवश्यकता है। यही बात (रैशनल-नैशनल) त्रिपाठी के लेख के संदर्भ में भी युक्तियुक्त है।

ध्यातव्य है कि ‘अल्पसंख्यक’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग अंग्रेज़ों ने अपने शासन काल के दौरान ‘अल्पसंख्यकों के लिए अलग चुनाव-क्षेत्र और वेटेज (अधिप्रतिनिधित्व) की व्यवस्था’ लागू करने के उद्देश्य से किया था। अलग चुनाव-क्षेत्र अंग्रेज़ों द्वारा हिंदुओं और मुसलमानों के बीच अलगाव उत्पन्न करने के लिए निर्मित किया गया था।

अंततः यही शब्द देश विभाजन का आधार एवं कारक बना (विस्तार के लिए देखें, ‘भारत विभाजन’, सरदार पटेल, सं. प्रभा चोपड़ा, पृ. 221, प्रभात प्रकाशन, दिल्ली)। अतः स्पष्ट है कि ‘अल्पसंख्यक’ के नाम पर अलग चुनाव-क्षेत्र का आधार ‘सांप्रदायिक’ (कम्यूनल) ही था।

इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि अंग्रेज़ों ने अपने लाभ के लिए ‘अल्पसंख्यक’ शब्द को ‘हिंदू बनाम मुस्लिम’ का रंग दिया। परिणामतः ‘अखंड भारत’ पहले दो और फिर तीन खंडों में विभाजित हुआ। कहना न होगा कि इन विभाजनों का मूल आधार ‘सांप्रदायिक’ (अल्पसंख्यक) ही था।

सर्वविदित है कि अल्पसंख्यकों के आग्रही सांप्रदायिक भाव ने पहले देश को खंड-खंड कर दिया। स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत भारत भूमि में स्वेच्छा से रह जाने वाले कथित ‘अल्पसंख्यक’ को संविधान में विशेष स्थान भी प्रदान किया गया।

उक्त संदर्भानुसार स्पष्ट है कि ‘अल्पसंख्यक’ और ‘सांप्रदायिक’ एक-दूसरे के पूरक हैं। परंतु अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता को अनदेखा कर ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को बहुचर्चित कर दिया गया।

भारतीय राजनीतिक सिद्धांतकार रजनी कोठारी ने अपनी पुस्तक सांप्रदायिकता और भारतीय राजनीति में ‘सांप्रदायिकता’ और ‘धर्मनिरपेक्षता’ को एक-दूसरे का न केवल पूरक माना है, अपितु उसे ‘सही’ बताया है। वे लिखते हैं–

“सांप्रदायिकता धर्मनिरपेक्ष राजनीति की ही उपज है। यह मूलतः आदर्शों से रहित धर्मनिरपेक्ष राजनीति है।” (पृ. 6, रेनबो पब्लिशर्स लिमिटेड, दिल्ली, 1998)

‘अल्पसंख्यक’ शब्द की प्रस्तुति के आलोक में त्रिपाठी ने कथित ‘बहुसंख्यक’ समुदाय (हिंदू) की भावनाओं को रेखांकित करने का यथेष्ट प्रयास किया है– “इसमें छेड़छाड़ के कारण हिंदू, कई मामलों में, दूसरे दर्जे के नागरिक होने के लिए अभिशप्त हैं। बहुत से ऐसे विषय हैं जहाँ हिंदुओं के अधिकारों का स्पष्ट हनन किया गया है।”

त्रिपाठी के उपरोक्त लेख में प्रस्तुत संपूर्ण विषय-वस्तु का अध्ययन-अवलोकन पूरी वस्तुनिष्ठता के साथ करने से प्रश्न उपस्थित होता है कि स्वतंत्रता के इतने वर्षों के पश्चात् भी कथित अल्पसंख्यकों को विशेषाधिकार क्यों दिए जाने चाहिए?

जबकि यह भी सत्य है कि पूरे विश्व में भारतीय संविधान की दृष्टि से कथित ‘अल्पसंख्यक’- ईसाई और इस्लाम अपनी-अपनी सुविधानुसार (?) पूरी तन्मयता के साथ धर्म-विस्तार हेतु प्रचार-प्रसार में लगे हुए हैं। त्रिपाठी ने उन बिंदुओं पर भी समुचित प्रकाश डाला है।

यह भी रेखांकित किया है कि “आज ईसाइयत और इस्लाम के अनुयायी भारत में अल्पसंख्यक गिने जाते हैं, जिनके क्रमश: 133 और 57 देश हैं और जिनकी संख्या भारत देश में भी इतनी अधिक है कि उनके नष्ट होने का कोई कारण नहीं है।” उनके द्वारा उठाए गए सभी प्रश्न उचित तथा विश्लेषण तर्कसंगत है।

इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि भारत में ‘अल्पसंख्यक’ कहलाने वाले ‘सांप्रदायिक’ समुदायों (ईसाई-इस्लाम) की वैश्विक स्थिति अत्यंत सुदृढ़ है। ऐसे में भारत में उनके ‘विलुप्त’ होने के भय से ‘संरक्षण’ (विशेषाधिकार) दिया जाना कितना तर्कसंगत है?

जबकि अविवादित सत्य यह भी है कि कथित ‘अल्पसंख्यक’ समुदायों का भारत में आगमन क्रमशः ‘आक्रांता’ एवं ‘व्यापारी’ के रूप में हुआ था। यह भी स्पष्ट है कि सांप्रदायिक सोच रखने वाले उक्त साम्राज्यवादी धर्म अपने धर्म प्रचार-प्रसार के लिए कितने कुटिल एवं आक्रामक (रहे) हैं।

कश्मीर में हिंदुओं (पंडित) के साथ इस कथित अल्पसंख्यकों ने जो कुछ किया, वह अविस्मरणीय है। कथित बहुसंख्यकों (हिंदुओं) ने ऐसी अनेकानेक सांप्रदायिक त्रासदियाँ झेली हैं। भारतीय हिंदू जनमानस ने अनेकानेक ‘हत्याकाण्डों’ के बावजूद इन सांप्रदायिक समुदायों को रचने-बसने के लिए कल्पनातीत अवसर प्रदान किए हैं।

संपूर्ण विश्व में भारत (हिंदू भूमि) एकमात्र देश है, जिसने ‘सर्वधर्म समभाव’ की उदात्त चेतना को चरितार्थ किया (कर रहा) है। इस देश ने अल्पसंख्यकों की सांप्रदायिक भावना को दृष्टिगत रखते हुए देश विभाजन की त्रासदियों को भी भारी मन से स्वीकार किया है।

‘अखंड भारत’ से खंड-खंड होकर निकले पाकिस्तान और बांग्लादेश में वास्तविक रूप में अल्पसंख्यक हिंदुओं के उत्पीड़न और पलायन की स्थिति से सारा विश्व परिचित है ही। इसके विपरीत भारत में अल्पसंख्यक समुदाय की उत्तम स्थिति एवं गति, दशा और दिशा को जानने-समझने के लिए गुलाम नबी आज़ाद का राज्यसभा में दिया गया विदाई भाषण उल्लेखनीय है-

“मैं उन खुशक़िस्मत लोगों में हूँ, जो पाकिस्तान कभी नहीं गया, लेकिन जब मैं पढ़ता हूँ कि वहाँ किस तरह के हालात हैं, पाकिस्तान के अंदर तो मुझे गौरव महसूस होता है, मुझे फख़्र महसूस होता है कि हम हिंदुस्तानी मुसलमान हैं। बल्कि अगर आज मैं कहूँगा कि विश्व में किसी मुसलमान को गौरव होना चाहिए तो वो हिंदुस्तान के मुसलमानों को गौरव होना चाहिए।

हमने पिछले 30-35 सालों से अफगानिस्तान से लेकर, इराक से लेकर और कुछ सालों पहले से देखें कि किस तरह से मुस्लिम देश खत्म होते जा रहे हैं, एक-दूसरे के अंदर और एक-दूसरे से लड़ाई करते हुए। वहाँ हिंदू तो नहीं है। वहाँ कोई क्रिश्चियन तो नहीं है। वहाँ दूसरा तो नहीं है, जो लड़ाई कर रहा है।” (राज्यसभा में दि. 9 फरवरी 2021 को विदाई भाषण का अंश)

इस कथन से भारतीय ‘अल्पसंख्यकों’ की बेहतर स्थिति एवं गति, दशा और दिशा का सहज ही आकलन किया जा सकता है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि स्वतंत्र भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद हुए (15 अगस्त 1947 से 22 फरवरी 1958) और तत्पश्चात हुमायूँ कबीर (1 सितंबर 1963 से 21 नवंबर 1963), फखरुद्दीन अली अहमद (14 नवंबर 1966 से 13 मार्च 1967), प्रो एस नुरुल हसन (24 मार्च 1972 से 24 मार्च 1977) अल्पसंख्यक समुदाय का ही नेतृत्व करते हुए भारत के शिक्षा मंत्री रहे हैं।

यहाँ तक कि इस देश के पहले नागरिक के रूप में डॉ ज़ाकिर हुसैन (13 मई 1967 से 3 मई 1969), न्यायमूर्ति मुहम्मद हिदायतुल्लाह (20 जुलाई 1969 से 24 अगस्त 1969), फखरुद्दीन अली अहमद (24 अगस्त 1974 से 11 फरवरी 1977), डॉ एपीजे अब्दुल कलाम (25 जुलाई 2002 से 25 जुलाई 2007) अल्पसंख्यक समुदाय से ही रहे हैं। न जाने कितने ही अल्पसंख्यक मंत्री, मुख्यमंत्री इत्यादि इस देश के नीति-निर्धारकों में (रहे) हैं।

ऐसे अनगिनत उदाहरणों के आलोक में ‘अल्पसंख्यक’ समुदाय की ‘उन्नत’ स्थिति का परिचय मिलता है। वैसे, संविधान में जिस भावना से अल्पसंख्यकों के संरक्षण का प्रावधान किया गया है, उसके बरक्स उनकी जनसंख्या, जनभागीदारी, जनप्रतिनिधित्व और सांप्रदायिक एकता को भी देखना-समझना चाहिए।

राष्ट्रीय, क्षेत्रीय एवं जिला स्तर पर जनसंख्या वृद्धि, जनांकिक परिवर्तन एवं धर्मांतरण के दिन-ब-दिन बढ़ते प्रभाव-दबाव की दृष्टि से भी इनका अनुपात ‘विलुप्तप्राय’ को संकेतित नहीं करता। अर्थात् स्पष्ट है कि ‘अल्पसंख्यक’ को अपरिभाषित रखना और उसे यथावत बनाए रखना यथोक्त ‘धर्मनिरपेक्ष राजनीति’ का हिस्सा ही नहीं, अपितु हद दर्जे की धूर्तता है।

हम जानते हैं कि भारतीय संविधान में ‘पंथ निरपेक्षता’ मूल भावना ही नहीं है, अपितु उसकी आत्मा है। कहना न होगा कि इसे ‘धर्म निरपेक्ष’ बनाने के आत्यंतिक आग्रह के कारण इसमें कई अंतर्विरोध उत्पन्न हुए हैं।

उदाहरणस्वरूप अनुच्छेद 14 के अंतर्गत विधि के समक्ष समता का अधिकार, अनुच्छेद 15 के अंतर्गत धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग और जन्मस्थान के आधार पर विभेद का प्रतिषेध, अनुच्छेद 16 के अंतर्गत सार्वजनिक नियुक्तियों में सभी नागरिकों को समान अवसर जैसे अनुच्छेद सम्मिलित हैं।

भारतीय संविधान की आत्मा को ‘पंथ-निरपेक्ष’ मानने के कारण ही संविधान सभा की बहस में बाबासाहब अंबेडकर ने स्पष्ट कहा था- “इसे (धर्म-निरपेक्षता को) संविधान में निर्धारित ही नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह लोकतंत्र को पूरी तरह से नष्ट कर रहा है।”

अंतर्विरोध देखें कि एक ओर भारतीय जनमानस एवं संविधान को स्वभावतया ‘पंथ निरपेक्ष’ माना गया और समता-समानता की दृष्टि से उपरोक्त अनुच्छेद सम्मिलित किये गये। वहीं, दूसरी ओर ‘अल्पसंख्यक’ को अपरिभाषित रखते हुए उन्हें अनिश्चतकालीन संरक्षण एवं विशेषाधिकार भी दिये गये।

प्रसंगावधान से स्मरणीय है कि सरदार पटेल की अध्यक्षता में ‘अल्पसंख्यक एवं मूल अधिकार आदि के लिए सलाहकार समिति’ गठित हुई थी। रिपोर्ट प्रस्तुत करते हुए सरदार पटेल ने कहा था-

“जब पाकिस्तान की स्वीकृति दी गई थी तब कम-से-कम यह माना गया था कि बाकी बचा हुआ भारत एक देश होगा और यहाँ ‘द्विराष्ट्र के सिद्धांत’ को लादने की कोशिश नहीं की जाएगी। यह कहने का कोई अर्थ नहीं कि हम लोग एक अलग चुनाव-क्षेत्र की माँग करेंगे।…

क्या आप अब भी चाहते हैं कि दो देश हों? क्या आप मुझे एक स्वाधीन देश दिखाएँगे, जिसका आधार धार्मिक है? अगर इस दुर्भाग्यपूर्ण देश को इससे फिर उत्पीड़ित होना है, बँटवारे के बाद भी, तो लानत हो इस घटना पर। इसके लिए जीना व्यर्थ है।” (भारत विभाजन, सरदार पटेल, सं प्रभा चोपड़ा, पृ 222)

11 जुलाई 1947 को सरदार पटेल द्वारा जीएस बोजमैन को लिखे पत्र का यह अंश भी उल्लेखनीय है– “भारत को विभाजित करने के निर्णय पर नाराज़गी के कारणों से मैं पूर्णतया सहमत हूँ। स्पष्ट रूप से कहूँ तो हमें इससे घृणा करनी चाहिए पर इसके अलावा कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा है। हम यह आशा करते हैं कि एक दिन पाकिस्तान वापस भारत में मिल जाएगा।” (आर्थिक एवं विदेश नीति, सरदार पटेल, सं. पी. एन. चोपड़ा, प्रभा चोपड़ा, पृ. 102, प्रभात प्रकाशन, 2009)

पत्र के इस अंश में ‘घृणा करनी चाहिए’ और ‘इसके अलावा कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा है’ में अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा अलग राष्ट्र के आग्रही भाव से उत्पन्न ‘विवशता’ को देखा-समझा जा सकता है। स्पष्ट है कि ‘अल्पसंख्यक’ के नाम पर स्वतंत्रता-पूर्व ही नहीं, अपितु स्वतंत्रता के पश्चात भी उठापटक चलती रही।

आज स्थिति यह है कि प्रायः ‘अल्पसंख्यक’ शब्द को ढाल बना कर ‘विक्टिम कार्ड’ खेला जाता है। हमें नहीं भूलना चाहिए कि ‘अल्पसंख्यक’ का मूल आधार ‘सांप्रदायिक’ (कम्यूनल) ही रहा है। उसी आधार पर भारत के टुकड़े हो चुके हैं। अपने आपको ‘अल्पसंख्यक’ मानने वाले समुदाय ने इस लिए देश के दो हिस्से काट लिए हैं।

स्पष्ट है कि आरंभ से ही हिंदुओं को ‘बहुसंख्यक’ और मुसलमानों को ‘अल्पसंख्यक’ कहा-माना गया। कालांतर में ईसाई, बौद्ध, सिख, जैन, पारसी को अल्पसंख्यकों की श्रेणी में जोड़ा गया। परंतु दुर्भाग्य कि ‘अल्पसंख्यक’ शब्द अब तक अपरिभाषित है। उसके लिए कोई निर्धारित अवधि और/अथवा जनसंख्या अनुपात नहीं दिया गया है।

वर्तमान समय में इस शब्द का सामाजिक सुधार, समन्वित विकास अथवा राष्ट्रोद्धार की दृष्टि से वास्तविक सरोकार नहीं है। स्मरणीय है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के कुछ वर्षों के पश्चात् चुनावी सत्ता प्राप्ति हेतु सामाजिक-सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण आरंभ हुआ। इसके अनेकानेक प्रसंग एवं संदर्भ मिलते हैं कि चुनाव प्रक्रिया में जाति ही प्रचार का मूल आधार रही।

‘सामाजिक’ आधार पर अनुसूचित जाति एवं जनजातियों का ध्रुवीकरण हुआ तो ‘सांप्रदायिक’ आधार पर मुस्लिम ध्रुवीकरण। इस प्रकार ध्रुवीकरण के लिए ‘तुष्टीकरण की राजनीति’ आरंभ हुई और विस्तार पाती गई। ‘इंदिरा का संविधान’ इस तथ्य की पुष्टि की दृष्टि से सर्वोचित साक्ष्य है।

ध्रुवीकरण के इन आयामों को जनतांत्रिक मूल्य, देशहित एवं लोकहितपरक राजनीति के विपरीत ही देखा जाना चाहिए। जनाधार जुटाने हेतु जनभावना को जाग्रत करने वाले ‘गरीबी हटाओ’ नारे से कांग्रेस को कल्पनातीत सफलता मिली थी, जिससे वह दीर्घावधि तक सुदृढ़ बनी रही। इसी नारे का मोह था कि भारत का विशाल जनाधार उसके साथ हो चुका था।

फिर समय-समय पर अनुसूचित जाति, जनजाति और मुस्लिम ध्रुवीकरण, फिर सिख बनाम हिंदू, मुस्लिम बनाम हिंदू इत्यादि ‘बनाम’ रूपी खेल में भारतीय प्रजातांत्रिक मूल्यों का शनैः-शनैः पतन हुआ। कांग्रेस येनकेनप्रकारेण सत्ता काबिज करने के लिए नानाविध हथकंडे अपनाती रही और समाज में ‘सांप्रदायिक सौहार्द’ के स्थान पर ‘सांप्रदायिकता’ को बढ़ावा दिया गया।

यह नीति अंग्रेज़ों की ‘फूट डालो, राज करो’ का ही विस्तार था। ध्यातव्य है कि सत्ता काबिज करने के ‘चुनावी खेल’ में कभी अनुसूचित जाति एवं जनजातियाँ सहारा (मोहरा?) बनीं, तो कभी मुस्लिम। इधर, अन्य पिछड़ा वर्ग का राजनीतिकरण उपरोक्त प्रयोग (चुनावी खेल) का ही विस्तार है।

यह भी कि अल्पसंख्यक की पुरानी धारा (सांप्रदायिक) में परिवारवादी राजनीतिक दल मुस्लिम-यादव, दलित-मुस्लिम (भीम-मीम) इत्यादि चुनावी राजनीतिक समीकरण (अवसरवादी?) गढ़कर अपना अस्तित्व बनाने-बचाने का उपक्रम करते रहे (रहते) हैं।

‘अल्पसंख्यकों की बहुसंख्यकता’ को दृष्टिगत रखते हुए ही राहुल गांधी ने केरल के वायनाड से लोकसभा का चुनाव (2019) लड़ना उचित समझा था। ऐसे अनेकानेक उदाहरण चुनावी राजनीतिक खेल में विद्यमान हैं। यह भी उल्लेखनीय है कि कांग्रेस ने प्रसंगौचित्य से हिंदुओं को भी इस चुनावी खेल में मोहरा बनाया है।

इस दृष्टि से ‘सिख बनाम हिंदू’ प्रसंग और चुनावी अभियानों में राजनीतिक गांधी परिवार का मंदिर-मंदिर घुमना जैसे प्रयोगों को देखा जा सकता है। स्मरणीय है कि ‘अल्पसंख्यक’ तुष्टीकरण ने बहुसंख्यकों (हिंदू) में असुरक्षा का भाव उत्पन्न कर दिया है, जो कि आज तक न केवल बना हुआ है, अपितु उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा है।

उल्लेखनीय है कि ‘अल्पसंख्यक तुष्टीकरण’ से कोई सरकार मुक्त नहीं हो पाई है। यहाँ तक कि मोदी शासित भाजपा सरकार कांग्रेस के ‘अल्पसंख्यक तुष्टीकरण’ के जाल से बाहर नहीं निकल पाोई है। मोदी शासित भाजपा ने ‘पंथ निरपेक्ष’ छवि बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

कथित अल्पसंख्यकों के लिए कई योजनाएँ एवं छात्रवृत्तियों के आवंटन को इसी दृष्टि से देखने की आवश्यकता है। जनसंख्या की दृष्टि से जम्मू-कश्मीर में कथित अल्पसंख्यक 68 प्रतिशत हैं। इसके बावजूद वहाँ अल्पसंख्यक छात्रवृत्तियाँ धड़ल्ले से बाँटी जा रही हैं।

वहीं, कथित बहुसंख्यकों (हिंदू) को छात्रवृत्तियों से वंचित रखा गया है। इससे हिंदी की कहावत ‘अंधा बाँटे रेवड़ी फिर फिर अपनों को दे’ चरितार्थ हो रही है। नहीं भूलना चाहिए कि राष्ट्रीय स्तर पर बहुसंख्यक (हिंदू) आज स्थानीय एवं क्षेत्रीय स्तर पर वास्तविक रूप में अल्पसंख्यक हो चुके हैं।

ऐसे में, क्या सरकार को ‘अल्पसंख्यक’ को परिभाषित नहीं करना चाहिए? यह प्रश्न वास्तविकता की दृष्टि से अवांछनीय नहीं है। अंतरराष्ट्रीय नियमों, परंपराओं, मान्यताओं के अनुसार किसी धार्मिक समूह को अल्पसंख्यक घोषित करते समय निम्न मापदंड होते है–

”अल्पसंख्यक धर्म के अनुयायियों की जनसंख्या कुल जनसंख्या अनुपात का 8 प्रतिशत से कम होना चाहिए अर्थात् 8 प्रतिशत या उससे अधिक की जनसंख्या अनुपात वाले धार्मिक समूह को अल्पसंख्यक श्रेणी में नहीं रखा सकता।” (स्रोत- सतीश मित्तल, जागरण)

ध्यातव्य है कि आरक्षण से पीढ़ी-दर-पीढ़ी मिलने वाले लाभ को दृष्टिगत रखते हुए जिस प्रकार अन्य जातियों को आरक्षण की माँग उठाने के लिए विवश कर दिया गया है, उसी प्रकार ‘अल्पसंख्यक’ को मिलने वाले लाभ को दृष्टिगत रखते हुए ही अन्य अल्पसंख्यक समुदायों की भावनाओं को भी जाग्रत करने का प्रयास किया (गया) जा रहा है।

इस देश को विखंडित करने के कार्य में पुनः परिवारवादी कांग्रेस ‘खिलाड़ी’ की भूमिका में दृष्टिगोचर हो रही है। स्मरणीय है, वर्ष 2018 में कर्नाटक की सिद्धारमैया शासित कांग्रेस सरकार ने लिंगायत और वीरशैव लिंगायत समुदाय को ‘धार्मिक अल्पसंख्यक’ का दर्जा देने का ‘चुनावी खेल’ खेला था।

यह भी कि नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 के विरोध में देश के कोने-कोने से कथित अल्पसंख्यक समुदाय की जो संगठित समस्वरी आवाज़ें उठी थीं और भारत के विभिन्न शहरों में सुनियोजित चक्काजाम किया गया था, उनमें रोहिंग्या मुसलमान घुसपैठियों को ‘अल्पसंख्यक’ के नाम पर भारतीय नागरिकता देने का मुद्दा पूरी उग्रता एवं तीव्रता के साथ उभर कर आया था।

भारत सरकार को कथित ‘अल्पसंख्यक’ समुदायों की दमनकारी तथा धर्म-विस्तारवादी (मजहबी) मानसिकता को देखते-परखते हुए ‘अल्पसंख्यक’ का राष्ट्रीय, राज्य-स्तरीय ही नहीं अपितु अखिल भारतीय परिप्रेक्ष्य में जिला स्तर पर अनुपात घोषित करते हुए उसे अविलंब परिभाषित करना चाहिए।

देश के अनेकानेक जिलों में कथित अल्पसंख्यक आज बहुसंख्यक की स्थिति में हैं और संवैधानिक लाभोपभोग कर रहे हैं। ऐसे में ‘अल्पसंख्यक’ को अपरिभाषित रखना कथित बहुसंख्यकों के लिए अभिशाप से कम नहीं है।

अभारतीय विचारधारा के कथित अनुयायी प्रायः ‘हिंदू बनाम मुस्लिम’ की बात को हवा देकर जनमन को भ्रमित (दूषित) करने का प्रयास करते हैं। मेरे विचार में ऐसे दिग्भ्रमित बुद्धिजीवियों को मुग़लकालीन तथा ब्रिटिशकालीन औपनिवेशिक इतिहास को गंभीरता से पढ़ना चाहिए और ‘अल्पसंख्यक’ की दृष्टि से आरंभ हुए सांगठिनक एकीकरण का कालानुक्रमिक वर्णन-विश्लेषण करना चाहिए।

नहीं भूलना चाहिए कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद मुसलमानों को मजहब के नाम पर अपना पाकिस्तान और बांग्लादेश तो मिला परंतु अल्पसंख्यकों के एकीकरण और उग्र सांप्रदायिक स्वरूप को दृष्टिगत रखते हुए आरंभ हुए हिंदू प्रतिक्रियावाद के फलस्वरूप हिंदुओं को ‘हिंदू राष्ट्र’ नहीं मिल सका।

दो राय नहीं कि भारत में हिंदुओं के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार होता (रहा) है और कथित ‘अल्पसंख्यक’ को पलकों पर बिठाया जाता (रहा) है।

एक और बात पूर्ण विश्वास के साथ कही जा सकती है कि किन्हीं परिस्थितियों में यदि ‘हिंदू राष्ट्र’ का स्वप्न साकार होता भी तो भारत विखंडनकारी मानसिकता वाले अभारतीय विचारधारा के कांग्रेस पोषित अनुयायी वर्गवाद और जातिवाद को उग्र से उग्रतर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते।

उनकी सारी बौद्धिक खुजलाहट का एकमात्र अभिप्राय है– भारत विखंडन। औपनिवेशिक जातीय कटुता एवं सांप्रदायिकता को बचाये-बनाये रखने हेतु ऐसे एजेंट बुद्धिजीवी सुनियोजित रूप में कार्यरत होते (हैं) और भारत को खंड-खंड करने का कार्य जारी रखते (हैं)।

कहना न होगा कि ‘अल्पसंख्यक’ शब्द मुस्लिम और ईसाई समुदाय के लिए निस्संदेह ढाल बन गया है। भारत के एक सरकारी विद्यालय में शिक्षक कुछ बच्चों की सारी शरारतें और उद्दंडता को इसलिए अनदेखा कर देते हैं क्योकि वे धर्मांतरित ईसाइयों के बच्चे हैं।

बच्चों के माता-पिता ‘अल्पसंख्यक’ और ‘भेदभाव’ शब्द का प्रयोग बात-बेबात पर अनावश्यक ही करते हैं। इस धूर्ततापूर्ण प्रयोग से भयभीत शिक्षक प्रत्येक बात पर चुप्पी साध लेते हैं। ‘अल्पसंख्यक’ शब्द के दोहन के ऐसे नानाविध प्रसंग एवं दृश्य सहज ही उपलब्ध हैं।

एक वरिष्ठ मित्र ने ईसाई मिशनरी स्कूल के माध्यम से हो रहे सुनियोजित धर्मांतरण की गतिविधि का खुलासा करते हुए कहा कि नायर उपनाम के एक विद्यार्थी को 96% अंक होने के बाद भी स्कूल में प्रवेश नहीं मिला। हद दर्जे की धूर्तता यह थी कि उस परिवार को यह स्पष्ट बताया गया कि सीटें अल्पसंख्यक ईसाई विद्यार्थियों के लिए आरक्षित हैं।

यदि आप ईसाइयत को स्वीकार कर लेते हैं तो प्रवेश की संभावना प्रशस्त हो सकती है। यह घटना ‘अल्पसंख्यक’ शिक्षा संस्थाओं की वास्तविकता को स्पष्ट दर्शाती है। चर्चा-परिचर्चा में ऐसी ही एक और घटना सामने आई।

देवभूमि उत्तराखंड के जोशी उपनाम के मित्र का किस्सा आश्चर्यचकित कर देने वाला है। जोशी मंदिर में पुजारी थे। पहले कुछ श्रद्धालु आरती की थाली में कुछ दक्षिणा दे दिया करते थे। परंतु बाद में निर्णय हुआ कि दान-दक्षिणा केवल हुंडी में ही स्वीकार की जाएगी। इससे जोशी की पारिवारिक आर्थिक स्थिति बिगड़ी। अंततः वे ईसाई पादरी के चंगुल में फँसे।

ईसाइयत स्वीकार करने के पीछे मूल कारण आर्थिक दुर्दशा और ईसाई मिशनरी का आर्थिक प्रलोभन था। देवभूमि जैसे स्थानों पर कथित बहुसंख्यकों की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। ऐसी घटनाओं से यह स्पष्ट हो जाता है कि ‘अल्पसंख्यक’ संरक्षण एवं विशेषाधिकारों के प्रयोग के सहारे कथित बहुसंख्यकों का येनकेन प्रकारेण सूपड़ा साफ करने के उपक्रम किए जा रहे हैं।

स्मरणीय है कि मोदी के ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ के बावजूद जब-जब मुस्लिम समुदाय को भाजपा को पटखनी देने का अवसर मिला, उसने वह शिद्दत के साथ कर दिखाया है। सीमांचल बिहार के अल्पसंख्यक विधायक मीम के टिकट पर चुनाव जीत चुके हैं। यह सांप्रदायिक एकीकरण का जीवंत उदाहरण है।

इसी दृष्टि से पश्चिम बंगाल में मुस्लिम बहुल क्षेत्रों पर ध्यान देने की आवश्यकता है। चुनावोपरांत वहाँ हुई (हो रही) चयनित हिंसा और हत्याओं का सामाजिक-सांप्रदायिक विश्लेषण करने की निश्चय ही आवश्यकता नहीं है। मोदी का ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ सांप्रदायिक एकजुटता की नीति के समक्ष विफल हो चुका है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी ‘हिंदू’ की नई व्याख्या करते हुए भारतीय मूल के सभी समुदायों को ‘हिंदू’ कहने का प्रचलन आरंभ कर दिया है। स्मरणीय है कि समन्वयवादी दृष्टि अपनाने के बावजूद अल्पसंख्यकों का अपना सांप्रदायिक ढर्रा जस-का-तस विद्यमान है। उन्हें केवल अपने धर्म में विश्वास है।

सोलह आने सच है कि संघ-भाजपा ने अल्पसंख्यकों का विश्वास जीतने के उदारतापूर्ण प्रयास किए (कर रहे) हैं। यह भी सच है कि इन ‘उदारतापूर्ण प्रयासों’ में हिंदुओं की जनभावनाओं को अनदेखा कर दिया गया है।

त्रिपाठी का लेख प्रत्येक सच्चे भारतीय को सामाजिक विभेदकारी नीतियाँ, राजनीतिक षडयंत्र, अपरिभाषित अनिश्चितकालीन अल्पसंख्यकता, धर्मनिरपेक्षता, सांप्रदायिकता की वास्तविकता से केवल साक्षात्कार ही नहीं कराता अपितु संदर्भित विषय की गुरुता एवं गंभीरता पर सोचने-विचारने के लिए बाध्य करता है।

डॉ आनंद पाटील तमिलनाडु केंद्रीय विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं। वे @AnandPatilCU के माध्यम से ट्वीट करते हैं।