विचार
मध्य प्रदेश के बैतूल में चमत्कारी स्मरण शक्ति का प्रदर्शन करने वाले छात्र

आशुचित्र- टेक्नोलॉजी से भंग एकाग्रता एक ऐसे देश के लिए खतरनाक है, जिसने हज़ारों साल पहले मनुष्य की स्मरण शक्ति को पहचाना और उन्हें तराशने के सूत्र संसार को दिए।

सफेद झक कुरते पाजामे में कतार से 50 बच्चे मंच पर आए और पाँच पंक्तियों में अनुशासन से बैठ गए। इसके बाद उन्होंने एक काली पट्‌टी निकाली और आँखों पर कसकर बांध ली। अब वे अपने आसपास की आवाज़ें ही सुन सकते थे। कुछ दिखाई देने वाला नहीं था। यह दृश्य मध्य प्रदेश में बैतूल के विनायकम् स्कूल के मैदान का है, जहांँ उनके 17वें सालाना जलसे की रौनक छाई हुई थी। मंच के सामने बड़ी तादाद में स्कूली बच्चे और उनके परिवारों के लोग मौजूद थे। दिन भर गायन, गीत और संगीत के आयोजनों में शिरकत के बाद सबसे शानदार और हैरतअंगेज़ प्रदर्शन अब होने वाला था। यह थी शतावधान यानी मेमोरी पावर की चुनौतीपूर्ण नुमाइश। शतावधान का अर्थ है-सौ काम एक साथ करने वाला।

कुछ कार्यकर्ता एक बॉक्स में कार्ड बोर्ड लेकर प्रकट हुए और मैदान में मौजूद लोगों से एक-एक कार्ड उठवाया। इन्हें मंच के बाईं ओर एक बड़े बोर्ड पर लगाते गए। पहले कार्ड पर तोते की तस्वीर थी, दूसरे पर किसान, तीसरा मकड़ी, चौथा नींबू, पाँचवा किंग और ऐसे लगातार क्रम से पूरे 50 कार्ड। एक-एक कार्ड मेहमानों से उठवाया गया। लाउड स्पीकर पर उनकी घोषणा होती गई। करीब आधे घंटे में पूरे 50 कार्ड बोर्ड सबके सामने थे जो मैदान में मौजूद बच्चों, उनके परिजनों और शिक्षकों को तो दिखाई दे रहे थे लेकिन आँखों पर पट्‌टी बांधे ध्यान मुद्रा में बैठे बच्चों को दिखने का सवाल ही नहीं था। अब ये बच्चे एक-एक करके नंबर से इन वस्तुओं के नाम सबको बताने वाले थे।

विनायकम् विद्यालय का कार्यक्रम

चमत्कार-सा लगने वाले इस विषय में इन प्रतिभाशाली बच्चों के गुरू ललित गुप्ता ने बताया कि सामान्य मनुष्य की याददाश्त पाँच या थोड़े से गहन के प्रयास के बाद अधिकतम दस तक वस्तुओं को एक क्रम से याद रख पाती है। इसके बाद नहीं। यहाँ से शतावधानी बच्चों की क्षमता शुरू होती है और आप उसे देखकर चमत्कृत होते जाइए। यही हुआ। अगले आधे घंटे तक ये बच्चे क्रम से वस्तुओं के नाम गिनाते रहे। श्रोता हैरान थे। एक भी वस्तु अपने क्रम से यहाँ-वहाँ नहीं हुई, न ही बच्चों को उत्तर देने के लिए एक सेकंड भी सोचना पड़ा। इसके फौरन बाद अगला और जटिल चरण शुरू हुआ। अब बच्चों से कहीं से कुछ भी पूछा गया। बताओ 12वें नंबर पर क्या है? पतंग किस नंबर पर है? टमाटर कहाँ है? तीसवें नंबर पर कौन सी चीज है? प्रश्न पूछते ही झटपट उत्तर हाज़िर। वह भी सौ फीसदी सही। पैनी याददाश्त के बेहद खास इस प्रयोग का यह कामयाब और पहला ही प्रदर्शन था।

17 साल पहले विनायकम् स्कूल बैतूल के चार युवाओं अमित मालवीय, संजय राठौर, तरुण वैद्य और कमलेश खासदेव ने एक तरह से शून्य से शुरू किया था। बेहद सीमित साधनों की यह यात्रा कड़े परिश्रम और धैर्य के बाद आज एक बड़े मुकाम पर है। पुरानी बस्ती से स्कूल का लगातार विस्तार नई इमारत में ले आया है। चार मंज़िला इमारत में 65 कमरे हैं और एक नई इमारत भी आकार ले रही है। दो हज़ार बच्चे हैं। इनमें से एक हज़ार बच्चों को शतावधान में शामिल किया गया और इनमें से चुनिंदा 50 बच्चों को छह महीने के अभ्यास से गुज़रने के बाद शहर ने एक अलग और विलक्षण रूप में पहली बार देखा। ललित गुप्ता ने बताया कि गिनीज़ बुक में 50 वस्तुओं को क्रमानुसार याद रखने का विश्व रिकॉर्ड किन्हीं डोमिनिक ओ’ब्रायन नाम के किन्हीं सज्जन के नाम दर्ज है। हमने अपने बच्चों की स्मरण शक्ति को 100 वस्तुओं तक सफलतापूर्वक आजमाया है। यानी बैतूल के बच्चे दो गुनी क्षमता से विश्व रिकॉर्ड तोड़ने की स्थिति में आ चुके हैं। इस मेमोरी काेर्स की अगली कड़ी में तैयारी यह है कि बच्चे किसी भी किताब के पूरे पेज को ही क्रमानुसार अपने दिमाग में स्कैन कर पाएँ। और तब वो यह बता पाएँगे कि किसी भी किताब के 50वें पेज पर क्या है और 100वें पेज पर क्या? कौन-सा अध्याय कहाँ है और उसमें क्रम से क्या लिखा है? है न हैरतअंगेज़?

हम जानते हैं कि अपने पूरे जीवन में मनुष्य अपने मस्तिष्क का 2-4 प्रतिशत ही इस्तेमाल कर पाता है। बड़े से बड़ा वैज्ञानिक भी इससे कुछ ही ज्यादा मस्तिष्क की क्षमता पर काम कर पाता है। यानी 90 फीसदी से ज्यादा मस्तिष्क की क्षमता का उपयोग हो ही नहीं पाता। भारत ने मानवीय मस्तिष्क की इस अपार क्षमता को काफी पहले ही पहचान और पकड़ लिया था। पतंजलि ने योगसूत्र में ध्यान साधना के जरिए निर्विकल्प समाधि के अंतिम लक्ष्य तक पहुँचने के सूत्र बताए हैं तो वे बहुत सरलता से यह भी समझाते हैं कि जब ऊर्जा एक-एक चक्र को छूती हुई ऊर्ध्वगामी होकर आगे बढ़ती है तो क्या होता है? आप किन असाधारण अनुभवों से होकर गुज़रते हैं। किन विलक्षण शक्तियों का जागरण आपमें होना शुरू हो जाता है। हो सकता है आप किसी को पहली बार देखें और उसके बारे में सब कुछ बता दें। हो सकता है आप किसी को कोई आशीर्वाद दें और वह सच हो जाए या किसी को क्रोध में कुछ कह दें और वह अभिशाप बन जाए। पतंजलि ने इन्हें सिद्धि कहा है। ये सिद्धियाँ हैं।

कहते हैं कि स्वामी विवेकानंद की स्मृति भी कैमरे जैसी थी। वे एक-एक पंक्ति पढ़ने की बजाए किसी किताब के पेज पलटते भर थे और कैमरे की तरह वह उनके मस्तिष्क में अंकित होता जाता था। ओशो ने बचपन में ही सैकड़ों किताबें घोंट डाली थीं। पुणे में कोरेगांव पार्क स्थित ओशो इंटरनेशनल रिजॉर्ट में ओशो के अपने घर की लाइब्रेरी में हजारों किताबें प्रदर्शित हैं। ये सब ओशो ने पढ़ी थीं। इनमें दुनिया भर के धर्मों, मनोचिकित्सकों, दार्शनिकों की अनगिनत दुर्लभ पुस्तकें हैं। हाल ही के वर्षों में कई मुनियों को हमने शतावधान में असाधारण दक्षता के साथ टेलीविज़न के खास कार्यक्रमों में देखा है। हालाँकि वे तो संसार की ज़िम्मेदारियों से मुक्त ध्यान मार्ग पर ही समर्पित सन्यासी हैं। लेकिन ये स्कूली बच्चे! वे अपने सारे विषयों के साथ एक क्लास भर इसकी कर रहे हैं और यह कमाल!

‘विनायकम्” के चारों कर्णधार अमित, संजय, तरुण और कमलेश इस प्रयोग की सफलता से सबसे ज्यादा उत्साहित हैं। वे कहते हैं कि स्कूल-कॉलेज की उम्र में बच्चों के हाथ में मोबाइल और घर में टेलीविज़न ने एक तरह से सारी एकाग्रता भंग कर दी है। उनका काफी समय और बेशकीमती ऊर्जा इनमें व्यर्थ खर्च हो रही है। टेक्नोलॉजी का यह दुष्प्रभाव है। इसका सीधा असर उनकी निर्दोष स्मरण शक्ति पर हो रहा है, जो कुदरत की एक अनमोल देन है। हमें अपने ज़रूरी मोबाइल नंबर भी याद नहीं रह पाते। यह स्थिति एक ऐसे देश के लिए खतरनाक है, जिसने हज़ारों साल पहले मनुष्य की स्मरण शक्ति को पहचाना और उन्हें तराशने के सूत्र संसार को दिए। शिक्षा व्यवस्था से जुड़े होने के नाते यह हमारा कर्त्तव्य है कि इस दिशा में हम अपना एक अंजुलि योगदान समाज को दे पाएँ। इस प्रयोग से जुड़ने के बाद अगर ये बच्चे अपने करिअर में कुछ अलग कर पाएँगे ताे यह सिर्फ स्कूल की ही नहीं, हमारे शहर की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी और दूसरे हज़ारों बच्चों को प्रेरणा भी।

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छः पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com