विचार
संप्रदाय-केंद्रित भाव रखने वाला मुस्लिम ‘पीड़ित’, उदार धर्म का अनुयायी हिंदू ‘असहिष्णु’?

बेंगलुरु की घटना इस्लाम के धर्म नहीं बल्कि एक संप्रदाय, पंथ होने की ओर संकेत करती है। धर्म में जहाँ वैयक्तिक-स्वतंत्रता नियम की तरह आवश्यक है वहीं संप्रदायों में वैयक्तिक-चेतना की जगह समूहवादी चेतना प्रमुखता से विद्यमान होती है।

संप्रदायों में रहन-सहन और नियम-कानूनों की एक कोई-न-कोई निर्देशिका या पुस्तक होती है। इससे व्यक्ति का पूरा अवचेतन उस केंद्र के प्रति एकदम समर्पित हो जाता है। यह समर्पण कट्टरता या हिंसा की हद तक चला जाता है। समूह या विचारधारा के विपरीत कुछ सुनकर इस अवचेतन की तीव्रता हिंसक तक हो जाती है।

धर्म और संप्रदाय में जितना बड़ा अंतर है, उतना ही हिंदुवाद और इस्लाम के बीच है। हिंदुओं में धर्म का उद्देश्य वैयक्तिक उत्थान है और वैयक्तिक उत्थान में प्रश्न करना, संदेह करना, आलोचना करना आवश्यक गुण माने जाते हैं। वहीं इस्लाम में आलोचना के लिए कोई स्थान नहीं है।

अब यह देखते हैं कि हिंदू-विरोधी भाव ने अपनी जगह कैसे बनाई। भारत में अंग्रेज़ों ने जो शिक्षा-जगत बनाया, उसकी मूल प्रस्थापना हिंदू-विरोधी रखी। आज का शिक्षा-जगत (ज्ञानजगत/एकेडेमिक्स) उसी भावना से संचालित है।

लगभग 220 वर्षों (फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना) से हिंदुओं के मूल्यों के विरोध और मुस्लिम तुष्टीकरण को प्रगतिशीलता तथा आधुनिकता का पर्याय बना दिया गया है। इसलिए हिंदुओं पर निर्मम-से-निर्मम प्रहार के समय यह ज्ञानजगत सामान्य तरीके से पेश आता है।

ज्ञानजगत खुद को धर्म-विरोधी मानता है लेकिन इफ़्तार करता है, रोज़े की शुभकामनाएँ देता है, बुर्के को इस्लामिक संस्कृति का प्रतीक बताता है। इस संप्रदाय को किसी अपराध में संलिप्तता होने पर ‘धर्म-विशेष’ कहकर संबोधित किया जाता है जबकि हिंदू अपराधी का न सिर्फ नाम, पता बल्कि उसकी जाति तक को उजागर कर दिया जाता है।

इस ज्ञानजगत ने मुस्लिम पक्ष की ऐसी चापलूसी की है कि आज मुस्लिम-तुष्टीकरण पदबंध भारत की राजनीति का सबसे ज़्यादा प्रयुक्त पदबंध हो गया है। इस तुष्टीकरण राजनीति के दुष्प्रभावों को झेलने के लिए देश जैसे अभिशप्त रहा हो।

भारत के ज्ञानजगत के इस पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण ने ही मुसलमानों को नागरिक की जगह मुस्लिम-अस्मिता वाला पक्ष बना दिया है। भारत के तुष्टीकरण समूह ने मुसलमानों को एक आधुनिक राष्ट्र के नागरिक की जगह मध्यकालीन संप्रदायगत अस्मिता के साथ बड़ा होने दिया, इतना  कि आज देश में स्थिति विस्फोटक हो गई है।

अब कुछ ज़रूरी बिंदुओं के आधार पर इस तुष्टीकरण और संप्रदायगत संरचना के आलोक में जन्मीं दिक्कतों को भी समझें-

  1. फ्रांस के पेरिस शहर में शर्ली-एब्दो नामक एक सटायर-मैग्ज़ीन(व्यंग्य-पत्रिका) में इस्लाम के पैग़ंबर हज़रत मुहम्मद के कार्टून छपे, परिणामतः दुनियाभर के मुसलमानों में घृणा और गुस्से का विस्फोटक प्रकटीकरण हुआ। एक कट्टर चरमपंथी संगठन ने तो मैग्ज़ीन के कार्यालय पर हमला करके 3 पुलिसकर्मियों सहित 17 लोगों को मौत के घाट भी उतार दिया।
  2. बेंगलुरु में हिंदू देवी-देवताओं की तस्वीरों को लेकर अपमानजनक पोस्ट किए गए और जवाब में प्रतिक्रियात्मक पोस्ट करने पर कांग्रेस विधायक के घर पर हमला और शहर में आगजनी हुई तथा सार्वजनिक वस्तुओं को बर्बाद किया गया।

दूसरा प्रश्न इतनी बड़ी तादाद में भीड़ के अचानक आ जाने पर भी उठता है। क्या ऐसी भीड़ें स्वतःस्फूर्त जुटती हैं? या इन भीड़ों को कोई इकट्ठा करता है? और इस पूरे मसले पर मीडिया और साहित्य-कला के क्षेत्र के ऐकेडेमिक्स में चुप्पी क्यों है?

यही ऐकेडेमिक्स पिछले छह सालों से चीख-चीखकर, चिल्ला-चिल्लाकर नहीं कह रहा कि मुसलमान डरे हुए हैं? डरे हुए लोग ऐसे होते हैं? वह भी ऐसी क़ौम जिसके लिए भाजपा डर का कारण बताई जाती है, वह उसी पार्टी के शासन में इस तरह उग्रता से इकट्ठा कैसे हो गए?

क्या भीड़ के बल पर लोकतंत्र को हाईजैक करने की कोशिश अब मनोवृत्ति नहीं बन गई है? शाहीन-बाग ऐसी ही एक कोशिश नहीं थी?

जिस कमेंट के जवाब में पुलिस में शिकायत हो सकती थी, फेसबुक पर ही लानत-मलानत हो सकती थी, उसके प्रतिउत्तर में दंगों और मंदिर तोड़ने की मनःस्थिति के क्या निहितार्थ हैं? इस भीड़ के मन में क्या था और सबसे बड़ी बात कि इस भीड़ की इतनी तैयारी कैसे थी ?

मंदिर तोड़ने की कोशिश के गहरे मायने हैं। यह कोई त्वरित नाराज़गी का विषय नहीं है। राम मंदिर के भूमिपूजन के बाद से तो मैं इस घटना को और हल्के में लेने को तैयार नहीं हूँ।

लोकतांत्रिक तरीके से अदालतों के माध्यम से हिंदुओं को मिली जीत के प्रति इस तरह की प्रतिक्रिया को क्या कहेंगे? यह अपने विचारों के अनुसार घटना के न घटने पर हिंसात्मक प्रतिक्रिया ही तो है जिसे जिहादी और असभ्य जीवन-दृष्टि की उपज ही तो कहा जा सकता है न?

यह पक्ष भारत को कैसे देख रहा है ? क्या अंबेडकर की भाषा में वह भारत को ‘दारुल-इस्लाम’ (जिस देश में मुस्लिम शासक हों) बनाना चाहता है ? वे दुनिया के किसी भी कोने में रहकर उस देश के कानून या सिविल-कोड की जगह शरियत को क्यों मानना चाहते हैं?

पिछले 70 सालों का तुष्टीकरण ही है कि यह समुदाय आज इतना मनमाना हो गया है और मन-मुताबिक काम न होने पर हिंसक प्रतिक्रियाएँ देने लगा है। वैसे भी दुनिया का इतिहास है कि यह समुदाय दुनिया के किसी भी सेटअप में रहता अपने मन-मुताबिक ही है।

इसके साथ ही मैं भारतीय मार्क्सवादी विचारधारा द्वारा निर्मित एकेडेमिक्स के हिंदू और मुस्लिम मुद्दों पर बरते जाने वाले बरतावों के भिन्न रूपों की ओर भी इशारा करना चाहूँगा-

  1. भारतीय एकेडेमिक्स हिंदू प्रतीकों और मूल्यों को धार्मिक पिछड़ापन कहकर उसकी भर्तस्ना करता रहा है जबकि इस्लामिक प्रतीकों को मुसलमानों की सांस्कृतिक पहचान बताता है।
  2. भारत का एकेडेमिक्स भाजपा के सत्ता में आने के पहले तक खूब बड़े पैमाने पर बीफ-पार्टियाँ करता रहा है। जिस देश में बहुसंख्यक-आबादी गाय को पूजती हो, उसकी छाती पर बैठकर बीफ-पार्टियाँ करना किस संवेदनशीलता या प्रगतिशीलता या आधुनिकता के अंतर्गत आता है, यह आप ही तय करें।
  3. यह एकेडेमिक्स महिषासुर को राजा और माँ दुर्गा को गाली (वह शब्द मैं नहीं लिख सकता) देता है और जेएनयू में इससे संबंधित बातें होती रही हैं। जिस शब्द और मुद्दे को लिखते समय मेरी उँगलियाँ काँप रही हैं, वह शब्द इनके द्वारा निर्लज्जता और धड़ल्ले से इस्तेमाल होता रहा है। क्या इससे घिनौनी कोई हरकत हो सकती है ?

पूजनीय नहीं तो अगर केवल स्त्री के रूप में भी देखें तो एक स्त्री के प्रति इस तरह के शब्द कैसी भावना को प्रकट करते हैं? क्या यह एकेडेमिक्स हिंदुओं के प्रति ईमानदार रहा है? क्या इस सड़े हुए घिनौने एकेडेमिक्स को नष्ट नहीं हो जाना चाहिए ?

असल में मेरी समस्या इस्लाम द्वारा दुनियाभर में असहिष्णुता के ऐसे क़िस्सों की सूची बनाना नहीं है। आपने ऐसी हज़ारों घटनाएँ सुनी हैं, देखी हैं, अख़बारों में पढ़ी हैं, टीवी और न्यूज़-चैनल्स की रिपोर्टिंग्स देखी हैं।

मेरी चिंता का विषय और लेख का कारण कुछ और है। मैं पूछना चाहता हूँ कि एक सभ्य और भव्य धर्म को इस संप्रदायगत अस्मिता के साथ कैसे रहना चाहिए? एक लोकतंत्र में जहाँ इस संप्रदाय के लोगों की संख्या 20 करोड़ हो और दिमाग़ में ऐसी संप्रदायगत अवधारणाएँ तो एक उदार और वैयक्तिक चेतना को महत्त्व देने वाला धर्म और उसके नागरिक एक ही देश में कैसे रह सकते हैं?

मैं पूछना चाहता हूँ कि मैं क्यों न कहूँ कि भारत में इस्लाम का आगमन एक शांत और भव्य धार्मिक अस्मिता वाले देश में जिहादी कट्टर अस्मिता का आना था, इतिहास की सबसे दुःखद और दुर्भाग्यशाली घटना थी?

जिस संप्रदाय की मज़हबी चेतना इतनी छुईमुई हो और जिसे आधुनिक राष्ट्र में रहने का तरीका न मालूम हो उसके साथ एक लोकतांत्रिक पक्ष शांति से कैसे रह सकता है? मेरी चिंता इसी विषय को लेकर है और इस लेख में भी मैं उन्हीं बिंदुओं को छूना चाहता हूँ।

आज़ादी के समय से ही मुसलमानों के साथ जिस तरह का तुष्टीकरण किया गया है उसे लेकर मन में इतने सवाल हैं कि उनके आलोक में देश की नारकीय स्थितियों को देखकर कोफ्त होती है-

  1. एक स्वतंत्र लेकतंत्र में एक संप्रदाय (मुसलमान) को मज़हबी पहचान के साथ क्यों विकसित होने दिया गया?
  2. ज्ञानजगत (एकेडेमिक्स) ने उनका तुष्टीकरण क्यों किया?
  3. एक आधुनिक लोकतंत्र में एक प्रगतिशील सेटअप में रहने के सिविल कोड की जगह मुसलमानों को संप्रदायगत (शरियत) नियमों के तहत रहने और विकसित होने की आज़ादी क्यों दी गई?
  4. अंग्रेज़ों की देखरेख में जब इस संप्रदाय ने अपने लिए एक अलग वतन माँग ही लिया था तब इतनी बड़ी जनसंख्या को भारत में क्यों रहने दिया गया?
  5. और अगर उन्हें रखा ही गया तो भारत के आम-नागरिक की जगह संप्रदायगत आज़ादी और पहचान और उसे पोषित करने वाला तुष्टीकरण का माहौल क्यों दिया गया?
  6. संविधान में सेकुलर शब्द जोड़कर देश को अधर में क्यों लटका दिया गया?
  7. भारत को हिंदू-राष्ट्र क्यों नहीं घोषित किया गया? धर्म के आधार पर बँटे देश को धार्मिक पहचान से वंचित क्यों रखा गया?
  8. यह कैसा न्याय है कि उस पक्ष का कोई अपराधी हो तो उसे ‘धर्म विशेष’ और ‘गंगा-जमुनी’ तहज़ीब के पर्दे के पीछे छुपाकर, उनका डिफेंस तैयार किया जाए?
  9. क्या देश में समय-समय पर शरियत के कानून के तहत उग्र तमाशे और हिंसक कांड इन्हीं सब कारणों की देन नहीं हैं?
  10. भारत के एकेडेमिक्स और कांग्रेस की 70-सालों सरकारों से मैं पूछना चाहता हूँ कि वे बताएँ कि संप्रदाय की इतनी तीव्र और हिंसक समझ रखने वाली इस भीड़, इस जनसमूह के साथ बेचारे उदार और लोकतांत्रिक हिंदू कैसे रहें?

है कोई जवाब? मुझे आपकी चुप्पी नहीं, आपका जवाब चाहिए। मुझे जवाब दीजिए। दीजिए जवाब।

आदित्य सेठ आनंदराम जयपुरिया कॉलेज, कोलकाता में अध्यापक हैं। वे @adityakumargiri के माध्यम से ट्वीट करते हैं।