विचार
माओ और मासिक धर्म: कैसे खत्म होती समानता की परंपरा की वजह से चीनी महिलाओं को सहना पड़ा

प्रसंग
  • सबरीमाला की तरह ही यह गहरा धार्मिक लोकतन्त्र है जो पिनरई विजयन जैसे मार्क्सवादियों को खलनायक माओ की नरसंहार एकरूपता को केरल में लागू करने से रोक रहा है, और एक अस्थायी और सौम्य रूप वाली को अपनाने के लिए मजबूर कर रहा है।

धर्म और संस्कृतियों में मासिक धर्म को लेकर लगी पाबंदी पित्रसत्ता महिला विरोधी माने जाते हैं, जो दमनकारी प्रणाली से उपजे हुए है। जहां इन धर्मों और संस्कृतियों ने मासिक चक्र के आधार पर प्रदूषण, शुद्धता और अलग रहने की धारणा बनाई, वहीं, यह इस चक्र का जश्न भी मानते हैं।

कई समाजों में पित्रसत्ता प्रवृतियों की वजह से मासिक धर्म को प्रदूषित और महिलाओं को नीचा समझने का ईश्वरीय संकेत माना जाता है। फिर भी गैर-पश्चिमी संस्कृतियों ने भी रिवाजों के जरिये एक प्रणाली बनाई है जो महिलाओं को जरूरी शारीरक और मानसिक आराम देती है।

जैसे समाज ने आधुनिकता के दौर में प्रवेश किया, इन पाबन्दियाँ ने रक्तस्त्राव से जुड़े कलंक को खत्म करने का रास्ता दिखाया। तो जो बदलाव हुए, हालांकि धीरे हुए, प्रकृतिक और शांतिपूर्ण रहे।

एक मामले में मुद्दा यह है कि कैसे रूढ़िवादी यहूदी महिलाओं ने खुद को बदला (या सच्चा अर्थ समझा), उनके पवित्र कानून, मित्वह द्वारा अनुष्ठान विसर्जन, इसे जश्न मनाने और जीवन का नवीनीकरण करने के लिए- हालांकि इसे महिला विरोधी के रूप में तर्क दिया जाता है। इस तरह, यहूदी और हिंदुओं ने दर्शाया कि मासिक चक्र से संबन्धित धार्मिक प्रथाओं को कैसे बदलकर और उसे जीवन का जश्न बनाया जा सकता है और दूसरे लिंग को स्त्री के जीवन के इस रहस्य का सम्मान देने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। आज बहुत से पश्चिमी देशों में, अमेरिका सहित मित्वह के कई पूल केंद्र हैं। अगर वह सेमितिक विरोधी कीड़े से प्रभावित हैं तो स्त्रियाँ इसे खत्म करने के लिए आंदोलन नहीं करतीं। जहां मध्य युग के दौरान मासिक धर्म को लेकर कलंक और प्रदूषण के बारे में सुनने को मिलता है और यहाँ तक कि कुछ पुरातन यहूदी परम्पराओं में, यहूदियों ने स्वास्थ्य और आध्यात्मिक महत्व की प्रथाओं को अपनाया वहीं, इसी समय, ‘प्रदूषण’ की बात को नीचा दिखाया।

हिंदुओं में भी यही प्रवृतियाँ देखने को मिलती हैं, हालांकि कुछ हिन्दू-भयग्रस्त महिलाओं ने हिन्दू-विरोधी मीडिया की मदद से स्थिति को डामाडोल करने की कोशिश की- जो न्यूयॉर्क टाइम्स से लेकर टैबलोइड़ समाचारपत्रों में ‘माउंट रोड माओ’ के नाम से चर्चित हुई।

लेकिन फिर, पश्चिम की धर्मनिरपेक्ष संस्कृति, जिसमे दोनों मार्क्सवादी और मिशनरी शामिल थीं, ने इन प्रथाओं को समझने की कोशिश नहीं की और उन्हे अंधविश्वास ही मानती रहीं। यह उनपर दमनकारी असपष्ट प्रथाओं का ठप्पा लगा देना चाहते थे, और उन्हे जहां भी हो सके, हिंसा के द्वारा उखाड़ फिंकना चाहते थे। इसके फलस्वरूप बड़ी तादाद में मानव क्षति और पीड़ा उठानी पड़ी, विशेषकर महिलाओं को। उदाहरण के लिए माओ के मार्क्सवादी रेच ने  सदियों पुरानी मासिक धर्म से संबन्धित सभ्यता पर पाबंदी को जबरन खत्म करके अनगिनत चीनी महिलाओं के जीवन में गरीबी और मृत्यु को धकेल दी।

सबरीमाला की तरह ही यह गहरा धार्मिक लोकतन्त्र है जो पिनरई विजयन जैसे मार्क्सवादियों को खलनायक माओ की नरसंहार एकरूपता को केरल में लागू करने से रोक रहा है, और एक अस्थायी और सौम्य रूप वाली को अपनाने के लिए मजबूर कर रहा है।

 प्रोफेसर और इतिहासकर फ्रैंक डिकोत्तर, जिनकी किताब माओ’स ग्रेट फमीने (2010) चीन में 1958-62 के दौरान आए अकाल का वर्णन करने के लिए बेहतरीन किताबों में से एक मानी जाती है, वह कुछ ही ऐसे इतिहासकारों में से एक हैं जिनहे पुरानी मूल संग्रह सामाग्री तक पहुँच दी गयी है जिससे वह अपने काम की सत्यता बड़ा सकें। यहाँ उन्होने यह बताया है कि कैसे चीनी महिलाओं ने माओवादी और मार्क्सवादी द्वारा लगाई गयी समानता का सामना किया:

“ हम में से ज़्यादातर महिलाएं इसकी चपेट में थी, क्योंकि ऐसे शासन में जहां भोजन के लिए निर्दयतापूर्वक व्यापार किया गया, हर कमजोरी भूख जगाती थी। और ज़्यादा पाने की इच्छा की दौड़ में, भट्टी में, मैदान में और कारखानों की ज़मीन पर, मासिक धर्म एक दोष के रूप में दिखा। लोकप्रिय धर्म के मासिक धर्म की पाबन्दियाँ, जो इस दौरान महिलाओं की क्षमता को प्रभावित करती मानी जाती थीं, वो रातों-रात गायब होती प्रतीत हुईं। इस क्षेत्र में विफलता को दंडित किया गया, प्रतिशोध का सबसे आम रूप कार्य बिन्दुओं में कमी होना है। कुछ पुरुष अधिकारियों ने अपनी सत्ता का रोब दिखाकर, बीमारी की छुट्टी मांगने वाली महिलाओं को प्रताड़ित किया। हुनान में क्षु यिंजिए, चेंगडोंग पीपल’स कोमयूने के सचिव ने उन महिलाओं को निचले वस्त्र उतारकर सरसरी निगाह के निरीक्षण के लिए बाधित किया जिन्होने मासिक धर्म के नाम पर आराम की मांग की थी। कुछ ने इस प्रताडना को स्वीकार किया, और कुछ फलस्वरूप बीमार पड़ गईं, बहुत सी मासिक दर्द या स्त्री रोग संबंधी परेशानियों को सहन करते हुए मर गईं।

माओ’स ग्रेट फमीने बाइ फ्रैंक डिकोत्तर

लाइनों के बीच में पढ़कर कोई भी यह नोट कर सकता है कि डिकोत्तर का इन शब्दों से क्या मतलब है, “लोकप्रिय धर्म के मासिक धर्म की पाबन्दियाँ, जो महिलाओं की क्षमता को प्रभावित करना बताती हैं, ने असल में महिलाओं को ज़रूरी आराम और मनोवैज्ञानिक कायाकल्प प्रदान करवाया। यह पाबन्दियाँ प्रदूषण और शुद्धता की धारणा को खत्म करते हुए मासिक धर्म के मनोवैज्ञानिक और शारीरिक पहलुओं को समझने के लिए अपनाईं जा सकती थीं। लेकिन माओ और उनकी पार्टी ऐसा नहीं चाहती थीं। अपनी संस्कृति के लिए भरा द्वेष इनहोने सभी जगह लागू किया, जिससे महिलाओं को झेलना पड़ा। इसके परिणाम भयंकर हुए। माओ रेच के भय पर इतिहासकार और बताते हैं :

थकी हुई और भूखी महिलाएं इतनी कमजोर हो जाती कि उनका मासिक धर्म आना बंद हो जाता। यह हर जगह हो गया था, यहाँ तक कि शहरों में भी, जहां महिलाओं को कुछ स्वास्थ्य सुविधाएं मिल रहीं थीं। दक्षिण बीजिंग के तियांकियाओ जिले में धातुशोधन के कारखाने में लगी आधी महिलाओं को मासिक धर्म न आने, योनि संक्रामण और बढ़े हुए गर्भाशय जैसी परेशानियाँ थीं। एक ही शौचलाय होने कि वजह से उसमे कोई न कोई हमेशा रेहता था, कुछ महिलाएं महीनों तक बिना धोये रहीं…ग्रामीण महिलाओं कि स्थिति तो इतनी बदतर थी कि बहुतों का गर्भासय बढ़ा हुआ था, मतलब गर्भाशय जो मसपेशियों और अस्थिबंधकों द्वारा श्रोणि में रहता है, योनि की नाली के अंदर ध्वस्त हो गया। अधिक करी और भोजन की कमी के अभाव में भी कमजोरी से गर्भाशय अपनी समान्य स्थान से खिसक गया।

माओ’स ग्रेट फमीने बाइ फ्रैंक डिकोत्तर

फिर महिलाओं के बचाव में कौन आया? पुरातन ‘अंधविश्वास’ और ‘अशपष्ट’ परम्पराएँ जिन्होने महिलाओं की देखभाल के लिए स्वास्थ्य प्रणाली बनाई थी।

“ कई ग्रामीण अस्पताल जाने से डरते थे और वह स्थानीय ईलाज पर ही टिके रहे। हूबे में, महिला चिकत्सक कई तरह की विधियों की मदद से, जो उन्हे पीढ़ी दर पीढ़ी के हस्तांतरण से मिलीं थीं, उन महिलाओं की देखभाल करती थीं जो स्त्री रोग संबंधी परेशानियों से जूझ रहीं थीं, जिसमें सामग्रियों को पीसकर उसका पाउडर बनाकर और जड़ीबूटियों को मिलाकर गरम करके योनि द्वार पे लगाया जाता था जिससे मासिक धर्म विकार ठीक हो जाए। ज़्होंग्क्षियांग देश के एक गाँव में वेंग चाची, जैसा कि उन्हे प्यार से बुलाया जाता था, ने हजारों महिलाओं कि मदद की, उनका घर हमेशा से ही 4-5 मरीजों से भरा रहता था, जिनके पति जंगल में महत्वपूर्ण पत्तियों और जड़ों को ढूँढने गए होते थे। लेकिन ऐसे पुराने ईलाज को मजबूर समूहिककारण में शायद ही नज़रअंदाज़ किया जाता था, और प्रभावी स्वास्थ्य देखभाल के अभाव में जायदातार महिलाओ को उनकी स्थिति और दर्द को सहना पड़ता था।

माओ’स ग्रेट फमीने बाइ फ्रैंक डिकोत्तर

तो माओ ने ताओस्त, बौध्य और मैनाओं के अलावा कोख के खिलाफ भी युद्ध छेड़ा। आखिरकार, उन्होने यह घोषणा की थी कि अगर आधी जनता को खत्म कर दिया जाए, तो बची हुई आधी जनता खूब फल-फूलेगी- मार्क्सवादी हान हितलेरियन आर्यन के बराबर सपना। क्या कोई आश्चर्य की बात होगी कि, फिर, बौद्धिक लोग और पार्टी जिसने राक्षसी और माओ नरसंहार किया, भारत में भी ऐसे ही खेल-जवाहरलाल नेहरू विश्वविध्यालय से सबरीमाला तक- में शामिल होने का प्रयास कर रहें हैं। अगर उन्होने अभी तक केरल की महिलाओं को माओ द्वारा लगाए गए अपमानजनक हत्यारे एकरूपता के अधीन नहीं किया, तो पक्का ऐसा इसलिए नहीं क्योंकि उनके पास इरादे नहीं हैं, लेकिन सबरीमाला जैसी परम्पराएँ उन्हें इस आखिरी स्थायी मूर्तिपूजक हिन्दू देश में अपनी सीमाएं दर्शाती हैं।

अरविंदन ‘स्वराज्य’ के काउंट्रीबूटिंग एडिटर हैं