विचार
प्रकाश के पक्ष में 9 बजे, 9 मिनट- विपक्ष का अनैतिक तुष्टिकरण, विरोध तर्कहीन

“ॐ अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवमृत्विजम् | होतारं रत्नधातमम्” 

“मैं अग्नि की स्तुति करता हूँ । वे यज्ञ में देवों को बुलाने वाले एवं यज्ञ के फल रूपी रत्नों को धारण करने वाले हैं।” 

यह प्रथम वेद ऋग्वेद का प्रथम श्लोक है। अग्नि एवं उसके प्रकाश से ही मनुष्य जीवन पशुत्व से देवत्व की ओर बढ़ा। वन से निकलने वाले मनुष्य के लिए प्रकाश के अभाव में रात्रि के अंधकार का अर्थ भयावह अनिश्चितता से भरी निद्रा के अतिरिक्त कुछ नहीं था।

दिन भर के आखेट और भोजन संग्रह के पश्चात सूर्यास्त साथ ही मनुष्य जीवन की संभावनाएँ भी सुप्त हो जाती थीं। अग्नि और प्रकाश ने जब प्रथम श्लोक लिखने वाले विश्वामित्र ने को वन्य जीवन के संकटों से मुक्त हो कर दार्शनिक प्रश्नों पर विचार करने का साहस और समय दिया तो स्वाभाविक ही था कि प्रथम सूक्त अग्नि को ही समर्पित हो।

तमस् से ज्योति की ओर चल कर ही मनुष्य शरीर से उठ कर संवेदना और संवेदना से उठ कर ज्ञान बना जो विचारों के रूप में शारीरिक जीवन से आगे उसे जीवित रख सकता था, मृत्यु से अमरत्व की ओर ले जा सकता था। एक भयमुक्त समाज ही स्वयं के भीतर और स्वयं से इतर सोच सकता है। दर्शन, विचार, कला, संस्कृति और सबसे बढ़कर परस्पर बंधुत्व के देवगुणों को रात्रि के तिमिर को भेदने के लिए प्रकाश की आवश्यकता सदा रही है। 

धर्म के भेद से हट कर प्रकाश और अग्नि का सम्मान प्रत्येक प्राचीन संस्कृति में रहा है। पारसी इतिहास में अग्नि ही सर्वाधिक महत्वपूर्ण और मानव जीवन के लिए पवित्र मानी गई है। यूनानी कथाओं में प्रोमीथियस से ही मानव विकास की परंपरा का प्रारंभ माना गया है। प्रोमिथियस, जिसका शाब्दिक अर्थ आदि बुद्धिजीवी है, जो विचार के जन्म से पूर्व का मानव है, उसने देवताओं से अग्नि को चुराकर मनुष्य को दिया। संभवतः विचार यही है कि अग्नि और प्रकाश ने सर्वप्रथम मनुष्य को विचारशील सामाजिक प्राणी का स्थान दिया। प्राचीन सुमेर में ऐसी ही अग्नि देव की भूमिका एनकी की रही। 

आज कोविड-19 के प्रकोप से जब विश्व जूझ रहा है, भारत लॉकडाऊन में है। एक विश्वव्यापी महामारी के समक्ष मानवता विवश है। इसका उपचार कोई है नहीं, और संक्रमण शक्ति महाविनाशक है। ऐसे में जब घोषित बंद में सब अपने-अपने घरों में, अपने-अपने घेरों में प्रतिबंधित हैं, आवश्यक है कि इस मटमैले अंधकार में एक शलाका प्रकाश की निकले और कहे कि मानव मन थमा तो है परंतु भयभीत नहीं है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 5 अप्रैल 2020 को रात 9 बजे, 9 मिनट बत्तियाँ बुझा कर दीप या टॉर्च जलाने का आह्वान इसी भाव का प्रकटीकरण है। यह पार्टी, बूथ से इतर अनुग्रह है। मोदी इस संकट काल में धर्म, दल से आगे राष्ट्रीय वरिष्ठ बन कर उभरे हैं। यह पर्व ना केवल भारत की अपराजेय इच्छाशक्ति का समारोह है, वरन यह कहता है कि अपने अपने घरों की सीमाओं में बंधे हम किस प्रकार हम एक राष्ट्र के रूप में एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।

अंधकार से प्रकाश की ओर जाने की इच्छा, अभिलाषा और एक दृढ़ संकल्प शक्ति का दिवस है यह। विपक्ष को नकारात्मकता के इस विरोधाभास से निकलना चाहिए जहाँ वे कभी इसे हिंदू धर्म से जोड़ते हैं कहीं कहते हैं कि या हिंदू धर्म के विरूद्ध है।

उनसे तो यही कहा जा सकता है कि दल कोई हो, धर्म कोई, राष्ट्र एक है, समाज एक है और संकट एक। यह भी कहा जा रहा है कि इसके स्थान पर विस्थापित हुए श्रमिकों पर काम करना चाहिए, चिकित्सा पर काम होना चाहिए। परंतु यह समझा नहीं पा रहे हैं दोनों परस्पर अनन्य कैसे हैं, एक के होने से दूसरा कैसे प्रभावित होता है।

अपने घरों में 9 मिनट उनके समर्थन में जो इस महामारी से लड़ रहे हैं, अपार संकट में स्थिति को सामान्य रखे हुए हैं, उन्हें यदि व्यक्तिगत प्रयास से आभार देते हैं तो राष्ट्र की गतिविधियों पर क्या प्रभाव होता है? विपक्ष का अंतर्निहित विरोधाभास यह है कि राष्ट्रीय संकट और राष्ट्रीय निर्देशों को धता बता कर आयोजित जिस तग्लीबी मरकज़ के कारण कोरोना 30 प्रतिशत तक बढ़ा है, उसके समर्थन में वे धार्मिक तुष्टिकरण के नाम पर खड़े हैं, और वही चिकित्सा व्यवस्था पर और संपूर्ण प्रशासनिक ढाँचे पर इस आपत्काल में पूर्णतया परिहार्य बोझ डाल रहा है।

एक तर्क यह है कि ऐसी मूलत: अवैज्ञानिक क़वायद का परिणाम क्या होगा। वैसे अधिकांशतः तार्किक स्तर पर इसका विरोध करने वाले वही हैं जो व्यक्तिगत दुराव के द्वारा महामारी रोकने के सिद्धांत की अनदेखी करते हुए हज़ारों की संख्या में धर्म के नाम पर जमा हुए तग्लीबी जमात के समर्थन में खड़े हैं और इसके विरोध को एक धर्म का विरोध बता रहे हैं।

ऐसे नेता और बुद्धिजीवी मज़हबी मूर्खता और उन्माद को धर्म से जोड़ते समय उस अन्याय के विषय में भी नहीं सोचते जो वे इस तरह के अनैतिक तुष्टिकरण की दौड़ में उन समझदार मुसलमानों के साथ कर रहे हैं जो राष्ट्र के साथ हाथ जोड़ कर जाकिया सैयद (इंदौर की डॉक्टर जिस पर जमात के लोगों ने हमला किया) की तरह इस आपदा के सामने ढाल बन के खड़े हैं। 

कांग्रेस के नेता ने नौ की संख्या को हिंदू धर्म से जोड़कर इसका उपहास किया है। ऐसे तर्कशास्त्रियों से महान फ़्रांसीसी गणितज्ञ, वैज्ञानिक एवम् विचारक ब्लेज़ पास्कल का तर्क ही कहा जा सकता है। पास्कल का कहना था- ईश्वर है या नहीं, इसका तार्किक प्रमाण नहीं है, परंतु यदि यह एक दाँव है, एक शर्त है, तो ईश्वर के पक्ष में दाँव लगाने में ही लाभ है। यदि ईश्वर नहीं है तो ईश्वर के पक्ष में खड़े होने में कोई हानि नहीं है, और यदि है, तो उसके अस्तित्व को नकारने का कोई लाभ नहीं है।

वैसे भी पाँच वर्ष जनता के विश्वास को रौंद कर अंतिम चुनाव प्रचार में मंदिर पर्यटन यात्रा का क्या ही लाभ होगा? इसका अर्थ वैज्ञानिक न हो न सही, इसका अर्थ सांकेतिक है, इसका अर्थ वही है जो अंग्रेजों के विरूद्ध चरखा कातने का था और नमक बनाने का था। आईए, हम भारत के लोग, इस संकट के समय हाथ से हाथ मिला कर, राष्ट्र के वरिष्ठ नायक के आह्वान को सुनें, और नौ बजे नौ मिनट, साथ आकर कहें- 

 “असतो मा सद्गमय/
 तमसो मा ज्योतिर्गमय/
 मृत्योर्माऽमृतम गमय।”

 हम असत्य से सत्य को, अंधेरे से प्रकाश को, मृत्यु से अमरत्व की ओर चलें।