विचार
मुस्लिम समाज, गैर-मुस्लिमों, सरकार, विपक्ष, सबके लिए शाहीनबाग-जाफराबाद के सबक

दिल्ली का दंगा सबके लिए कुछ कड़वे सबक छोड़ गया है, बशर्ते हम देखना चाहें। सबसे पहले तो यह धारणा दूर हो जानी चाहिए कि गंगा-जमनी जैसी कोई संस्कृति भारत में है। यह एक छलावा है, जो मस्जिद के सामने निकली एक शोभायात्रा या एक हिंदू-मुस्लिम कन्या के मनमर्जी के विवाह भर से छट जाता है।

हम गहरे अविश्वास और असुरक्षा से भरे हैं। समरसता नाम की चीज सिर्फ भाषणों में है। हिंदू-मुसलमान के बीच की खाई गहरी है। इस हिंदू में जैन, बौद्ध और सिख भी शामिल हैं। एकता अपवाद है। अलगाव सामान्य है। सेक्युलरिज्म ने कट्‌टरता को बढ़ाया है। इसे मुस्लिम तुष्टिकरण में बदलने के दुष्परिणाम घातक हुए हैं।

सेक्युलर पार्टियों ने मुसलमानों को वोट बैंक बनाकर इस्तेमाल किया। इसने बाकी समुदायों में भारी निराशा पैदा की। देश का मिजाज़ बदला हुआ है और इस बदले हुए माहौल में हाशिए पर पड़े सेक्युलर दल अपने वजूद को लेकर सब कुछ दाव पर लगाने पर आमादा हैं। दिल्ली दंगों से उनके खतरनाक इरादे जाहिर कर दिए हैं। बेहतर होगा हम सचाइयाें को स्वीकार करें और कुछ सबक लें। सरकार, विपक्ष, अल्पसंख्यक और बहुसंख्यकों के लिए कुछ कड़वे सबक इस प्रकार हो सकते हैं-

सरकार के लिए सबक

  • अल्पसंख्यक कौन, इसकी परिभाषा न्याय और तर्क की कसौटी पर तय होनी चाहिए। कितनी आबादी पर किस समुदाय को कब तक इस श्रेणी में रखा जाए और कब उसे इससे मुक्त किया जाए, इसके स्पष्ट मापदंड बनने चाहिए।
  • दुनिया के कई देश अपने अनुभवों के आधार पर अपनी मुस्लिम आबादी को मुख्यधारा में लाने के लिए कई ज़रूरी कदम उठा रहे हैं। जैसे- मजहबी पहचान। बुर्का और टोपी पर बंदिश। भारत को आगे-पीछे इस तरफ फैसला करना ही होगा कि हम क्या करें। श्रीलंका में चर्च के धमाकों ने उसे फौरन सिखा दिया कि ये मजहबी पहचानें घर के भीतर हों। मुस्लिम देश तुर्की में तो 100 साल पहले कमाल पाशा ने यह कदम उठाए और एक आधुनिक इस्लाम का साफ-सुथरा विकल्प पेश किया।
  • ज्यादातर मुस्लिम आबादी बेहद तंग गलियों में रहती है, जहाँ आपात स्थिति में एंबूलैंस या फायर बिग्रेड घुस भी नहीं सकते। यह बाकी शहर के बाशिंदों से बिल्कुल अलग-थलग एक अजीब दुनिया है, जिसके बारे में हर जगह कहा जाता है कि कोई गैर मुस्लिम जा नहीं सकता। यह स्थिति शर्मनाक और चिंताजनक है। इन मुस्लिम बस्तियों के अंदरुनी इलाकों तक सब तरह के अतिक्रमण हटाकर सड़कें चौड़ी की जानी चाहिए। इन्हें बाकी शहर के साथ बेहतर कनेक्ट किया जाए।
  • सघन मुस्लिम बस्तियों में अत्याधुनिक सीसीटीवी और ड्रोन कैमरों से हिफाजत के स्थाई इंतजाम किए जाएँ ताकि बाहरी तत्वों पर निगरानी रखी जा सके। इन बस्तियों में पढ़े-लिखे मुस्लिमों की कमेटियां बनाई जाएँ, जिनके जरिए उनकी समस्याओं पर प्रशासन नियमित बात करे। किसी भी तरह की आपराधिक या आतंकी गतिविधि या ऐसी किसी भी वारदात की तैयारी की जानकारी के लिए खुफिया तंत्र बेहद मजबूत किया जाए।
  • मस्जिदों-मदरसों और मजारों के फैलाव की रफ्तार हर शहर में हैरतअंगेज है। दिल्ली में सांसद प्रवेश शर्मा ने दिल्ली की एक केस स्टडी में चौंकाने वाले आँकड़े और जमीनी हकीकत उजागर की थी। वे पार्काें, तालाबों, सरकारी जमीनों पर कब्जे कर रहे हैं। नई मस्जिदें बन रही हैं। पुरानी बढ़ रही हैं। इस घातक प्रवृत्ति पर अंकुश जरूरी है। मस्जिदों समेत सभी धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर उतारे जाएँ।
  • कट्‌टर मान्यताओं के बंद दिमागों में मजहब को दम घोंटू बना दिया गया है। दुनिया हर कहीं उन्हें शक की नज़र से देख रही है। मौलवी और इमामों के माइंड-सेट पर पैनी नज़र ज़रूरी है। वे इस्लाम की गलत व्याख्या करके करोड़ों मुसलमानों को दुनिया की वास्तविक सच्चाइयों से दूर अशिक्षा के अंधेरे में डाले हुए हैं। इनसे व्यापक संवाद ज़रूरी है। यह पढ़ना ज़रूरी है कि उनके दिमागों में क्या चलता है?
  • हज की सब्सिडी की तरह इमामों-मुअज्जिनों को दिए जाने वाले मानदेय बंद होने चाहिए। यह समाज पर छोड़ा जाए कि वे उन्हें उनकी मजहबी सेवाओं के बदले क्या देते हैं। यह सरकारों का काम नहीं कि जनता के कर के पैसे से उनके पेट भरे जाएँ। क्या दारुल-उलूम फतवा देगा कि इस्लाम में ऐसी सरकारी खैरात हराम है?
  • शादियों-निकाहों में मुफ्त के हजारों रुपए देने, फिर प्रसव और नसबंदी के नाम पर हजारों रुपयों की मदद फिजूल है। इसकी बजाय बेटियों की आधुनिक और ऊँची शिक्षा में मदद करना ज्यादा बड़ा काम होगा। तब वे अपने परिवारों को खुद संभालने लायक बन पाएँगी।
  • इस्लामिक संस्थानों के काेर्स की पड़ताल सबसे ज़रूरी है। आखिरकार जाकिर नाइक सालों तक इस्लामिक टीचिंग ही कर रहा था लेकिन आतंकियों का प्रेरणापुरुष पाया गया तो दुकान बंद करानी पड़ी। कौन जानता है कि मौजूदा संस्थानों में क्या पढ़ाया जा रहा है? इस पर दानिशमंद मुसलमानों का ही एक बोर्ड तय करे कि सब कुछ ठीक है या नहीं। हो सकता है आरिफ मोहम्मद खान ने देवबंद के पाठ्यक्रमों के आपत्तिजनक हिस्सों पर कोई रिपोर्ट सरकार को दी हो।

विपक्षियों के लिए विनम्रता सहित

  • अपनी ऐतिहासिक भूलों को कुबूल करें। सेक्युलरिज्म का एक नाकाम मॉडल उन्होंने अपनाया था, जिसने बहुसंख्यक समाज को उपेक्षित किया और मुसलमानों काे भी ठगा। उन्हें अपमानजनक वोट बैंक बनाकर रखा। वे अपनी इस सबसे बड़ी सियासी भूल को जितना जल्दी सुधार लेंगे, उतना ही भला होगा और यह केवल चुनाव के दिनों में तिलक-जनेऊ, पूजा-पाठ के पाखंड से नहीं होगा।
  • अल्पसंख्यक को मुसलमानों का पर्याय बनाना एक बड़ी गलती थी। मुसलमान अकेले अल्पसंख्यक नहीं हैं। लेकिन सेक्युलर सियासी नेता कभी बौद्ध, जैन या पारसी समाज के तीज-त्यौहारों में नजर नहीं आए। रोजा-इफ्तारी को ज़रूर राष्ट्रीय महापर्व बना दिया। सत्ता से खदेड़े जाकर इसका खामियाजा वे भुगत रहे हैं। उनकी निगाह में सारे धार्मिक समूह बराबर होने चाहिए थे। सबकी भलाई के समान प्रयास नज़र आने चाहिए थे।
  • अल्पसंख्यकों में साफ-सुथरा और पढ़ा-लिखा नेतृत्व पनपने ही नहीं दिया और सिर्फ मौकापरस्तों को पालकर रखा, जिन्हाेंने न कौम का भला किया, न देश का। वे अपने उल्लू सीधे करते रहे और सांप्रदायिकता का जहर फैलाते रहे। ज्यादातर सेक्युलर पार्टियों में दोयम दरजे के अल्पसंख्यक नेता ही आगे आए। किसी भी राज्य में उन्हें देख लीजिए।
  • कश्मीर में 370 और मंदिर मुद्दे पर सेक्युलर पार्टियों का रवैया सबसे घातक था, जो उन्हें ले डूबने में दो बड़े पत्थर ही सिद्ध हुए। समस्याओं को लंबित रखना तात्कालिक तौर पर फायदेमंद था, लेकिन न कश्मीर का भला हुआ और न ही बहुसंख्यक आबादी को खुश रख पाए। शाहबानो केस में नौसिखिए नेताओं ने गलत कदम उठाए और फिसलते गए। ऐसा करके एक पूरी पीढ़ी की आदतें बिगाड़ दीं। ये ऐसे नुकसान हैं, जिनकी भरपाई 2029 के पहले मुमकिन नहीं।
  • आज़ादी की लड़ाई को अनंंतकाल तक भुनाया नहीं जा सकता। किसी भी सियासी खानदान की चौथी पीढ़ी सिर्फ आज़ादी की लड़ाई के नाम पर सियासी अनुकंपा नियुक्तियों की हकदार नहीं हो सकती। उन्हें नया और विचारशील नेतृत्व आगे लाना होगा, जो किसी खानदान की नुमाइंदगी नहीं करेगा। आदत बदलने में समय लगेगा, लेकिन विपक्षी पार्टियों को खोया हुआ भरोसा हासिल करने के लिए परिवारवाद से बाहर आना ही होगा।
  • विज़नरी नेतृत्व ज़रूरी है, जो समय सीमा में कुछ बेहतर नतीजे लाने की इच्छाशक्ति भी रखता हो। बकवास भाषणों, व्यर्थ प्रचार, दिखावे और वीआईपी कल्चर का ज़माना गया। अब हर कहीं परफार्मेंस पर जोर है। इसलिए पंचायत, नगरीय निकाय, राज्य या केंद्र में मौका मिलते ही उन्हें ऐसे कोने छूने होंगे, जहाँ कुछ बेहतर कर दिखाने की गुंजाइश है। दिल्ली में स्कूलों की बेहतरी देश की खबर बनी, जिसका चुनाव में सत्ता दल को फायदा हुआ। गुजरात के कई प्रयोग केंद्र में सत्ता दल को मददगार साबित हुए। भाजपा के बाकी धुरंधर भाषणों और दिखावे में पड़े रहे, वे अपने राज्यों में राजनीति को कर्कश बनाकर बाहर हो गए।
  • वामपंथियों को एक ऐतिहासिक सर्जरी की ज़रूरत है। उन्हें भारत केंद्रित सोच अपनानी होगी। कम्युनिस्ट वेशधारी मुस्लिम लीगियों को छांटकर अलग करना होगा, जिनके जहरीले घालमेल ने उन्हें कहीं का नहीं छोड़ा है। एक पूरी युवा पीढ़ी को दिशा भ्रष्ट करने का गुनाह उनके सिर पर है। जेएनयू और जामिया काे उन्होंने अपनी जहरीली सियासत की खतरनाक प्रयोगशाला बना दिया। यह प्रयोग न वामपंथियों के लिए फायदे का रहा और न ही मुस्लिमों का कोई उत्थान कर पाया। इनके घातक मिश्रण ने बाकी सेक्युलर सियासी पार्टियों की लुटिया भी डुबो दी। सबके हिस्से में बदनामियों के गहरे दाग ही आए।

मुसलमानों के लिए गौरतलब

  • यह मानना चाहिए कि वे बाहर से आए नहीं हैं, न ही उनके वंशज हैं, जिन्होंने इस्लाम के नाम पर हमले किए, लूटा, कब्ज़े किए। जिन लुटेरों ने यह बेरहमी भारत में दिखाई, उन्होंने ही हमारे पुरखों को बेइज्ज़त किया। उनपर जज़िया लगाया। मंदिर तोड़े। औरतों-बच्चों काे गुलाम बनाया। धर्मांतरण किया। वे धर्मांतरित हिंदू, जैन और बौद्ध हैं। अगर वे तुर्की या अफगानिस्तान से आया हुआ मानते हैं तो यह सिर्फ समय की बात है कि वे थोड़ा पहले कन्वर्ट कर दिए गए। धर्मांतरण की क्रूर कहानी सब जगह एक जैसी अपमानजनक रही है।
  • यह समझना ज़रूरी है कि धर्मांतरण कोई बहुत सम्मानजनक हालात में नहीं था। उन हजारों गुलाम औरतों-बेटियों के बिना धर्मांतरण के व्याकरण को समझना मुश्किल है, जो हारे हुए हिंदू राज्यों से लगातार बड़ी तादाद में लूटी गईं। उनके बच्चे कहाँ गए होंगे? वे संख्या में आज कितने और किन शक्लों में होंगे? मातृपक्ष से उनकी वंशावली दिल दहलाने वाली है। कन्वर्टेड होकर भी वे जालिम बादशाहों के कहर से बच नहीं पाए। अपना असल इतिहास तो पढ़ें।
  • वे यह विचार करें कि आज़ादी के बाद उन्हें वोट बैंक बनाकर कितना इस्तेमाल किया गया और इसका खामियाजा भारी पड़ा। वे बिल्कुल अलग-थलग कर दिए गए। सिर्फ चंद मुस्लिम नेताओं को ही फायदा हुआ। पूरी कौम इस्तेमाल हुई और यह गुनाह सेक्युलर पार्टियों ने किया, जो उनकी असल हितैषी कभी नहीं है। उनकी दयनीय हालत की एकमात्र जिम्मेदार वे ही हैं। इन्होंने मुसलमानों से ज्यादा इस्लाम का अहित किया है। भारत में धार्मिक वैमनस्य की बड़ी वजह यही है।
  • अपनी सियासी और मजहबी कट्‌टर ताकतों को पहचानें, उन्हें अलग-थलग करें। इस्लाम की मनमानी व्याख्याओं पर सवाल करें। दिमागबंद मौलवियों के बहकावे में न आएँ। किसी भी सूरत में भीड़ का हिस्सा न बनें। इस्लामिक जीवन पद्धति के बेहतर मॉडल रोजमर्रा की जिंदगी में स्थापित करें। केवल यह कहने से कुछ नहीं दिखता कि औरतों को सबसे पहले उनका हक इस्लाम ने दिया और अल्लाहो-अकबर।
  • हर स्तर पर अपना नेतृत्व बदलें। मजहबी पहचान की बजाय अच्छे पढ़े-लिखे, आधुनिक साेच रखने वाले नेता चाहिए, जो खुद इस वहम से मुक्त हों कि इस्लाम खतरे में है। एपीजे अब्दुल कलाम जैसे शख्स उनके आदर्श होने चाहिए और आरिफ मोहम्मद खान जैसे दानिशमंद लोग सियासी लीडरशिप में बढ़ने चाहिए। आपराधिक पृष्ठभूमि के नकारात्मक छवियों वाले लोग ही मुस्लिम नेतृत्व के नाम पर पनपे हैं। ये कौम के लिए आत्मघाती साबित हुए हैं। यह समय है कि कौम इस चक्रव्यूह से बाहर आए।
  • यह भी विचारणीय होना चाहिए कि हिंदुओं के साथ 1,000 साल नाइंसाफियाँ हुई हैं। वे तो मुसलमानों की तरह मजहब बदलकर उन जैसी तात्कालिक राहत भी नहीं पाए। वे एक ऐसा असल पीड़ित पक्ष हैं, जिन्हें इस नज़रिए से देखा ही नहीं गया और बहुसंख्यक होने मात्र से उन्हें हर तरह के काल्पनिक दोषों का जिम्मेदार मानकर आरोप जड़े गए। सेक्युलर भारत के 60 साल उनके कठिन इम्तहान के सब्र से भरे साल थे। हिंदू आतंक की घातक थ्योरी आते ही उन्होंने निजाम उलट दिए।
  • दुनिया में तुर्की अकेला देश है, जिसने मजहबी सुधारों की शानदार मिसाल पेश की और इस्लाम के दायरे में रहकर कुछ ऐसा कर दिखाया, जो बाकी दुनिया के मुस्लिम देशों और मुस्लिम बहुत देशों के लिए गौर करने लायक है। ऐसे उपायों के बगैर मौजूदा छवि से छुटकारा मुमकिन नहीं है। समाज को आत्मसुधार की कठोर पहल करनी होगी। वे एकमात्र सर्वश्रेष्ठ मजहबी विचार हैं, जिसे दुनिया को मानना ही होगा, वे इस वहम से बाहर आएँ।

गैर-मुस्लिमों के लिए

  • अतीत की नाइंसाफियों के लिए आज के मुसलमान कुसूरवार नहीं हैं। वे उन्हीं के समाज के टूटे हुए हिस्से हैं, जिन्होंने किसी मजबूरी में इस्लाम कुबूल किया। वे आज़ादी के बाद सेक्युलर पार्टियों का मोहरा बनाकर रखे गए। दिलों की दूरियाँ कम करें। मिल-जुलकर रहने में ही सबकी भलाई है। किसी बुरी बात को याद रखने की बजाय अच्छी मिसालों पर बात करें।
  • अपने बच्चों खासकर बेटियों को यह सीख दें कि वे किन हालातों बचकर रखें, दोस्त बनाने में सावधानी रखें। खासतौर से उन इलाकों के अभिभावक जो मुस्लिम बस्तियों के आसपास हैं। बच्चे अपने आसपास चौकन्ना रहें। रास्ते में नज़र आने वाले आवारा तत्वों की जानकारी घरवालों को दें। लव-जिहाद के संदर्भ में रिश्तों में एक सम्मानजनक दूरी शांति में मददगार सिद्ध होगी।
  • जो सिंध या कश्मीर से बेदखल होकर आए, उन्हें अपने साथ जोड़कर रखें। कश्मीरी परिवार कई शहरों में फैले हुए हैं, लेकिन स्थानीय समाज का उनसे बहुत सक्रिय रिश्ता नहीं है। उन्हें लगना चाहिए कि सरकारों की गलतियों से वे भले ही अपने पुरखों की जमीन से उखड़ने पर मजबूर हुए लेकिन बहुसंख्यक समाज ने उन्हें गले लगाया, उनके हितों की चिंता की और उन्हें जोड़ लिया।
  • जातिगत भेद को खत्म करें। एक पहचान में एकरूप होकर समाहित हों। किसी को यह कहने का मौका न दें कि हिंदू हैं कौन? कोई दलित है, कोई ठाकुर है, कोई ब्राह्मण है। नहीं। दंगों में जो पिटे और मारे गए, उन्हें हिंदू के रूप में एक ही पहचान के तहत निपटाया जाता रहा है। फिर उन्हें क्यों ये संकीर्ण दायरे स्वीकार होने चाहिए? यह दायरे हर हाल में मिटना ही चाहिए। हम सब कुछ बाद में हैं। पहले एक हिंदुस्तानी समाज हैं। हम हिंदू हैं। कोई अलग करके न देखे। एक दूसरे के सामाजिक और पारिवारिक आयोजनों में उपस्थिति बढ़ाएँ।