विचार
किसान आंदोलन और महाभारत का सभा पर्व

गए दिनों किसान आंदोलन का बड़ा जोर रहा, भिन्न-भिन्न प्रकार के किसानों ने राजधानी की सड़कों को भर दिया और लाल-लाल टोपियों ने किसानों के सामूहिक सरों को इस प्रकार भर दिया कि सिर्फ लाल रंग की स्मृति रह जाए, कम-से-कम अगले चुनाव तक। किसानों का क्या है हल्कू तो बीसवीं सदी के पूर्वार्ध से पूस की खुली निष्ठुर ठंड से मैत्री निभाता आ रहा है। होरी के मालिक राय साहब प्रजा के पालन का पट्टा कब अंग्रेजों से लेकर नव-राष्ट्र के नए नेताओं के हाथ में थमा गए, पता ही नहीं चला। मुंशी प्रेमचंद बिना राजनैतिक लाग-लपेट के लिखते हैं, दरिद्रता में जो एक प्रकार की अदूरदर्शिता होती है, वह निर्लज्जता जो तकाज़े, गाली और मार से भी भयभीत नहीं होती, उसने उस होरी को और अधिक ऋण लेने को प्रेरित किया जबकि बिसेसर साह का भी देना बाकी है, जिस पर आने रुपये का सूद चढ़ रहा है।

प्रेमचंद लेखक थे और फटे जूते पहनने का साहस रखते थे सो लिखकर होरी को सजग करने का क्षीण-सा प्रयास कर गए। बाद के बुद्धिजीवी समझ गए कि होरी की दरिद्र-सुलभ निर्लज्जता में उनका स्वार्थ निहित है, और उनकी थालियों में बिरयानी परोसने के लिए आवश्यक है कि होरी की निर्दोष निर्लज्जता बची रहे और बिसेसर का कारोबार चलता रहे।समय के साथ बिसेसर का स्थान बैंकों ने लिया और होरी को ऋणों का तक्षक निगलता चला गया। भारत एक कृषि-प्रधान राष्ट्र है जिसका अर्थ यह है कि यहाँ किसान बहुतायत में पाए जाते हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था ने कृषक का राजनैतिक महत्त्व खोजने में अधिक समय नहीं लगाया। सत्ता एवं प्रजा के मध्य वाणिज्य की व्यवस्था स्थापित की गई, जिसमें किसान सर्वथा अंतिम सीढ़ी पर था, जिसका उपयोग राजनैतिक रैलियों में भीड़ बढ़ाने तक सीमित था। सत्ता का संवाद बहुत हुआ तो मंडियों तक पहुँचकर समाप्त हो जाता था जहाँ कांग्रेसी नेता अपना वर्चस्व बनाए बैठे थे।

किसान परेशान होता था तो नेता उसी अंदाज में उसकी ओर नोट उछाल देते थे जैसे नवाब रक्कासा की ओर राजशाही में मोतियों की माला भेजा करते थे। नवाबों की माला के मोती भी गरीबों के खून में उगाए जाते थे और ऋण-मुक्ति के पैकेज भी।ग़रीब किसान अब भी चुनावों के मौसम में प्रकट होते थे, और मुजरा करके, हिकारत से फेंके टुकड़े समेट कर गोदान के राय साहब की प्रजा की भांति कृतज्ञ भाव से वापस अपने फाँकों की ओर लौट जाते थे। भारतीय भूमि की शक्ति इसका बदलता मौसमी स्वाभाव है, और वही इसका प्रकोप भी। सदियों हमने स्वयं को इसके अनुरूप ढाला और इसने माँ बनकर अपने वात्सल्य से हमें सींचा। विदेशी उपनिवेशवाद का दुर्गुण है, मूल निवासियों से घृणा एवं धरती के स्वाभाव से स्नेहविहीन तटस्थता। अंग्रेज़ों के शासन में दुर्भिक्ष और अकालों का दौर चला।पर्यावरण परिवर्तन के प्रभाव तब भारत नहीं पहुँचे थे किंतु मानवीय लोभ और निर्दयता भारतीय कृषि व्यवस्था को ऐसे निचोड़ती गई कि कृषक भूख एवं गरीबी का पर्याय होता चला गया। सरकारी अनुदान पर उसे ऐसे मोहताज़ किया गया कि वह उत्पादक का स्वाभिमान भूलकर सत्ता की सबसे निचली सीढ़ी परक भी नेहरू टोपी और कभी लाल टोपी पहने दिखाई देने लगा।

वही अकाल और अत्याचार का मौसम कृषक समाज पर छाया रहा। भारत के कृषि प्रधान होने का राजनैतिक निष्कर्ष यह रहा कि भारत में कृषि के व्यवसाय में संलग्न लोग बहुतायत में हैं, लगभग 60 प्रतिशत भारतीय प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से कृषि में संलग्न हैं। मण्डियों द्वारा नियंत्रित यह भोला वर्ग किसी भी सत्ताच्युत नेता को भीड़ बनकर सिंहासन पर बैठाने का संख्यात्मक सामर्थ्य रखता है। इसकी उपयोगिता इसके अविकसित, निर्धन एवं निरुपाय रहने में ही है। संभवतः इसी विचार से इसे उसी अवस्था में रखने का प्रयास किया गया एवं आज भी किया जा रहा है। भारतीय इतिहास एवं दर्शन में हाशिये पर खड़े किसान को सही अर्थ में स्वावलंबी करने के समुचित संकेत हैं जिन पर कभी काम नहीं हुआ।नीति के स्तर पर कुछ बहुत मोटी-मोटी बातें हैं जिनके आधार पर व्यवस्थागत एवं ढाँचागत परिवर्तन करके राष्ट्र का अन्नदाता स्वावलंबी बनाया जा सकता था, किंतु फिर न उसके पास भीड़ बनने के लिए समय होता न रुचि।

आज के मिथ्या भाषण एवं मिथ्याचरण के समय में इतिहास के गर्भ में छुपे हर ज्ञान का विरोध सामान्य व्यवहार हो गया है किंतु देखें कहीं हमारे अर्वाचीन प्रश्नों का उत्तर प्राचीन ज्ञान में तो नहीं छुपा है जिससे मिथ्याभिमान में हम स्वयं को वंचित रखे हैं। उदाहरण के लिए महाभारत का सभा पर्व देखिए जहाँ देवऋषि नारद युधिष्ठिर को राजधर्म का ज्ञान दे रहे हैं। यह वह समय है जब जनक जैसे राजा भी हल जोतने को अपमान नहीं समझते थे। मनुष्य जिस स्नेह से धरती को आलिंगनबद्ध करता था, धरती भी माथा चुमकर उसी स्नेह से व्यक्ति का चुंबन लेती थी।

कच्चिनसर्वेकर्मांता: परोक्षास्तेविशंकिता:

सर्वेवपुनरुत्सृष्ट: संसृष्टंचात्रकारणम।

(पंचम अध्याय, श्लोक 32)

“क्या तुम्हारे राज्य के श्रमजीवी किसान एवं मज़दूर तुमसे (तुम्हारी नीतियों से) अनभिज्ञ तो नहीं हैं? क्या तुम उन पर समुचित ध्यान देते हो, और वे समय-समय पर रोज़गार-विहीन तो नहीं हो जाते। क्योंकि राज्य का समग्र विकास सबके योगदान से ही संभव है।“

यहाँ नारद व्यवस्था के बाहर के भूमिहीन कृषकों की बात करते हैं और कहते हैं किस प्रकार धनाढ्य भूमिपतियों से इतर कृषकवर्ग को मुख्य धारा में लाना राष्ट्र के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक है। नारद कहते हैं कि इस संदर्भ में आवश्यक है कि न केवल नीतियाँ बने, उन तक शासन के ऐसे प्रयासों की सूचना भी पहुँचे। स्वतंत्रता के 70 वर्ष बाद हम चाय बागान कर्मचारियों को बैंकिंग व्यवस्था में ला सके थे।

कच्चिनचौरर्लुब्धैर्वाकुमारै: स्त्रिवलेनवा।

त्वयावापीड्यतेराष्ट्रंकच्चिततुष्ट: कृषीवला:।।

(पंचम अध्याय, श्लोक 77)

“चोरों, लोभियों, राजपुत्रों, राजस्त्रियों या स्वयं तुमसे तुम्हारा राष्ट्र दुःखित तो नहीं है। तुम्हारे कृषक संतुष्ट तो हैं?”

इस संदर्भ में दो विषयों पर ध्यान दें। राजपरिवार के द्वारा स्वयं को कृषक घोषित कर, लाभ हेतु किसानों की भूमि का पिछली सरकार में छलपूर्वक अधिग्रहण, एवं वर्तमान नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा ग्रामीण विकास के भूमि अधिग्रहण विधेयक जिसे कांग्रेस के दबाव में मोदी सरकार को वापस लेना पड़ा। अधिग्रहित भूमि पर स्कूल, अस्पताल, क्रीड़ांगन, सड़क बन सकते थे जो ग्रामीण पलायन रोक सकते थे किंतु कांग्रेस ने यह होने नहीं दिया।

कच्चिदराष्ट्रेतड़ागानी पूर्णनिचवृहन्तिच।

भागशोविनिवृष्टानि न कृषिरदेवमातृका।।

(पंचम अध्याय, श्लोक 78)

“क्या तुम्हारे राष्ट्र में जल से परिपूर्ण बड़े-बड़े जलाशय निर्मित किए गए हैं? तुम्हारे कृषक कृषि के हेतु दैव पर आश्रित तो नहीं हैं?”

एक समय एक निष्ठुर नेता ने जल की माँग कर रहे किसानों पर बहुत ही भद्दी एवं अमर्यादित टिप्पणी की थी। जब एक देश अपने किसानों को नियति पर निर्भर कर देता है, वह उसे निर्बल कर देता है। यहाँ नारद शासक को किसानों की वर्षा पर निर्भरता सीमित करके उसे सिंचाई के विकल्प उपलब्ध कराने का निर्देश देते हैं। नरेंद्र मोदी सरकार की त्वरित सिंचाई लाभ योजना का विचार यहीं से आया प्रतीत होता है जिसमें 105 में से 54 परियोजनाएँ 2017 में ही पूर्ण हो चुकी थीं। भारत की खेती योग्य भूमि में से 65 प्रतिशत सिंचाई के साधनों से वंचित है जिसपर कार्य करके सरकार किसानों की अजीत पवार मूत्र सिंचन परियोजना से कृषकों की रक्षा कर रही है। बुंदेलखंड एवं गुजरात के शुष्क प्रदेशों में ऐतिहासिक बावड़ियों का बाहुल्य इसी विचार को इंगित करता है जिसे हमारे शासक कहीं भूल गए थे। 

कच्चिनंभक्तंबीजंच कर्षकस्यावसीदति।

प्रत्येकंचशतम वृद्धस्यददास्याणमनुग्रहम।।

(पंचम अध्याय, श्लोक 79)

“तुम्हारे कृषक का बीज ख़राब या नष्ट तो नहीं होता? क्या तुम किसान को सौ रुपये सैंकड़ा की दर पर ऋण देते हो?”

यहाँ ध्यान की बात है कि किसान को निर्बल और निर्भर बनाने की बात नहीं है। मदद है, अनुदान में, किंतु दान में नहीं।यह ऐसे शासक की बात है जो फ़सल बीमा देता है, सहायता देता है, भीख नहीं।

सबल किसान वोट बैंक भले न बने, राष्ट्र की रीढ़ बनेगा। किसानों के दुर्भाग्य एवं दुर्गति में अपनी राजनीतिक विजय देखने वाले कान से कान तक मुस्कुराते हुए अभिजात्य वर्ग को अपनी सत्ता भले ही न दिखे, एक संपन्न विकसित राष्ट्र का प्रारूप तो हमारे पास यहीं से आता है। हमारे सब उत्तर हमारे ही पास हैं किंतु हममें अगर अपने सत्य को स्वीकार करने का साहस नहीं होगा तो सब यूँही चलता रहेगा।मूर्धन्य व्यंग्यकार शरद जोशी जी के शब्दों में कहें तो “किसान बोए जाएँगे, कुर्सियाँ काटी जाएँगी।”