विचार
हिंदू भारत में हर प्रकार के हैं, कौन हिंदू है इसकी पहचान के लिए कुछ विचार

हिंदू धर्म के संदर्भ में विभिन्न धर्मों के बीच की सीमाओं पर जैन और सिख मित्रों से मैंने विस्तृत चर्चा की है। हिंदू शब्द की उत्पत्ति भौगोलिक और गैर-धार्मिक संदर्भ में हुई थी लेकिन जब आक्रमणकारी हममें आत्मसात न हो सके तो इस शब्द का उपयोग गैर-मुस्लिम और गैर-ईसाई लोगों को चिह्नित करने के लिए होने लगा।

19वीं शताब्दी में तीसरा चरण आया जब सिख, ब्रह्म समाजी और बौद्ध स्वयं को दूसरे धर्म के रूप में देखने लगे और अब ऐसा जैनों, लिंगायतों, आदि के साथ भी हो रहा है।

20वीं शताब्दी में मोहम्मद अली जिन्ना और डॉ बीआर अंबेडकर ने “कास्ट हिंदू” शब्द का उपयोग किया था अर्थात सवर्ण। वे सही थे, भले ही भारत की एकता को लेकर जिन्ना और अंबेडकर के विचार काफी भिन्न थे।

विडंबना यह है कि द्वितीय चरण में जब हिंदू शब्द का उपयोग गैर-ईसाइयों और गैर-मुस्लिमों के लिए होता था, तब यह एक क्रांतिकारी और राजनीतिक शब्द बन गया था और जातियों के बावजूद इस शब्द ने “काफिरों” को पहली बार एकजुट किया था।

तब तक बुतपरस्तों, नास्तिकों और मुशरिकों को दूसरे परिभाषित करते थे जबकि आध्यात्मिक तत्व वाले ये लोग स्वयं को कभी धर्म की सख्त सीमाओं में बाँटने का विचार नहीं करते थे।

जब मैंने अपने सिख मित्रों से पूछा कि हम दोनों में क्या अंतर है तो उसने कहा कि सिख धर्म में कोई जाति नहीं होती (जबकि सिख समाज में ऐसा होता है), मूर्ति पूजा नहीं होती (सुंदर और श्रद्धेय गुरु ग्रंथ साहिब के अलावा) और अब कई लोग कहने लगे हैं कि सिख धर्म “एकेश्वरवादी” है और उसे “इंडो-अब्राह्मिक” तक कहने लगे हैं।

जैसे कि हिंदू एकेश्वरवादी नहीं हो सकते हैं, वेदांतवादी नहीं हो सकते हैं या सर्वेश्वरवादी, आदि नहीं हो सकते हैं। 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हिंदू-सिख विभाजन क्यों हुआ?

आंशिक रूप से इसमें आर्य समाज की भूमिक रही जिसने हिंदू धर्म को वेदों की ओर लौटने का आह्वान किया और ‘मूर्ति पूजन’ समेत बाकि सब को “भ्रष्ट” बताया। भारतीय सभ्यता के लिए यह कठिन समय था और हिंदू धर्म के लिए आर्य समाज सकारात्मक था लेकिन सिखों से “अलगाव” भी इस कारण हुआ।

अब वास्तविकता में अधिकांश हिंदू आर्य समाज को नहीं मानते हैं और कई न ही उनकी परिभाषा से सहमत हैं। अधिकांश हिंदू देवताओं और उनकी मूर्तियों की पूजा करते हैं, बहुत हिंदू वेद नहीं पढ़ते हैं, अनुवादित वेद भी बहुत कम हिंदू ही पढ़ते हैं।

केरल या अन्य स्थानों के कई हिंदू गौमांस भी खाते हैं, हालाँकि यह प्रचलन हाल का है लेकिन इससे कोई यह नहीं कह सकता कि वे हिंदू नहीं हैं। लोग अपने आप को जो कहते हैं, वह मानना सही है लेकिन साथ ही हमें कुछ तार्किक अंतर बिंदुओं को देखना होगा।

तार्किक अंतर बिंदुओं को देखकर हम “हिंदुओं” को कैसे परिभाषित करेंगे? जैन धर्म का उदाहरण लेते हैं जो व्यक्तिगत रूप से मुझे बहुत पसंद है। मेरे जैन मित्रों का कहना है कि निरीश्वरवाद/अनीश्वरवाद और शाकाहार का सख्ती से पालन कुछ अंतर हैं जो उन्हें हिंदुओं से भिन्न बनाते हैं।

इसी प्रकार ब्रह्म समाजी और बौद्ध लोग भी मुझे कह चुके हैं कि वे हिंदू नहीं हैं। मैंने कुछ लेख भी पढ़े जिसमें मवेशी की बली पर कुछ जनजातीयों ने कहा था कि वे हिंदू नहीं हैं। यदि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ काम न करता और जगह-जगह पर उसके विद्यालय नहीं होते तो शेष पूर्वोत्तर और अधिकांश मध्य भारत भी हम ‘अब्राह्मिकवाद’ से हार जाता।

हालाँकि एक बात स्पष्ट है कि भारत में हर प्रकार के हिंदू हैं, भले ही अलग-अलग अनुपात में। शाकाहारी और मांसाहारी, जातिवादी और जातिवाद-विरोधी, मूर्ति पूजा करने वाले और किसी की पूजा न करने वाले (किसी पुस्तक या चिह्न की भी नहीं), आस्तिक और अनीश्वरवादी, श्रमिक और चरवाक, वैदिक और नास्तिक, एकेश्वरवादी और बहु-ईश्वरवादी, आदि।

मैंने कई बार कहा है कि यदि ईसाइयत और इस्लाम के चीन में गहरे पदचिह्न होते तो हिंदू से बड़ा धर्म हैनिज़्म होता वहाँ लेकिन ऐसा नहीं हुआ क्योंकि 19वीं शताब्दी में कमज़ोर राज्य के बावजूद उन्होंने सभी अब्राह्मिक साम्राज्यवादी विचारों का दमन किया।

इसलिए यदि हिंदू की कोई सकारात्मक परिभाषा देनी हो जा सबको समाहित करे तो वह होगी- हिंदू वह धार्मिक व्यक्ति है जो भारतीय संस्कृति से जुड़ा हुआ है। और धार्मिक कौन है? जो अध्यात्मवाद में परस्पर विनिमय पर विश्वास रखे।

धार्मिक कौन है, उसे मैं ऐसे ही परिभाषित करता हूँ और इसी प्रकार हिंदू की परिभाषा भी निकल आती है। अवश्य ही इस परिभाषा में भी त्रुटियाँ होंगी इसलिए मैं और बेहतर परिभाषा की प्रतीक्षा करूँगा। “परस्पर सम्मान” और “सिर्फ सहनशीलता” में कई सूक्ष्म अंतर हैं लेकिन अभी के लिए आगे बढ़ते हैं।

अगर हम हिंदू धर्म की इस परिभाषा के अनुसार चलें तो कई गैर-हिंदू धार्मिकों को इस जाँच की आवश्यकता नहीं होगी क्योंकि वे भारतीय संस्कृति का भाग हैं। क्या इन स्व-परिभाषाओं की स्वयं अनुभूति की जा सकती है? अवश्य हाँ, अधिकांश मामलों में।

क्या स्वयं को भिन्न दिखाने से विनियामक लाभ मिलता है क्योंकि हमारा ‘छद्म-सेक्युलर’ राज्य अल्पसंख्यता को शिक्षा और धार्मिक स्थलों के विनियमन के लिए वरदान बनाता है? हाँ, दुर्भाग्वश ऐसा होता है।

नेहरूवाद से और पीछे भी औपनिवेशिक काल तक राज्य विनियामक की बात की जाती है और इसपर चर्चा होती है कि कौन लड़ सकता था और कौन नहीं, अर्थात कौन सेना में नियुक्त हो सकता है, कौन नहीं- इस वर्गीकरण ने भारतीय धर्मों के बीच धर्म की खाई को और गहरा किया।

एक उदाहरण से मैं अपनी बात को विराम देना चाहूँगा- शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह स्वयं को अवध में रहने वाले किसी रणजीत सिंह से भिन्न नहीं समझते थे। उन्होंने काशी के मंदिरों के लिए सोना दिया था और कोहिनूर को ओडिशा के एक ‘जनजातीय’ हिंदू देवता भगवान जगन्नाथ के नाम किया था।

अपने साम्राज्य से दूर हिंदुओं को सोना या हीरा देना पंजाब में उनकी राजनीति के उपयोगी नहीं था, न ही उनकी सत्ता को बल दे रहा था लेकिन फिर भी उन्होंने किया। साथ ही अपने निकट स्थित मंदिरों को भी संरक्षण और धन दिया।

इसलिए सिर्फ इसलिए कि कुछ शब्द आज विवाद-योग्य हैं, हमें यथास्थिति को अंतिम स्थिति नहीं समझना चाहिए। किसी भी सूरत में हमें अर्थजाल से उबरकर चीज़ों को उस स्तर पर ले जाना है जहाँ पूरे विश्व के लिए हमारा आध्यात्मिक भाईचारा रहे लेकिन साथ ही हम सांस्कृतिक और राष्ट्रीय विविधता बनाए रखें।

सर्वप्रथम मीडियम पर अंग्रेज़ी में प्रकाशित लेख का निष्ठा अनुश्री द्वारा हिंदी में अनुवाद।