विचार
दास्तानगोई- मेहमूद फारूकी ने गढ़ा दानवीर कर्ण का विराट रूप

प्रसंग- दास्तानगोई की संवेदनाओं और कर्ण के व्यक्तित्व को छूने का प्रयास।

शायद आज की पीढ़ी यानी स्कूल-कॉलेज में पढ़ रहे नौजवान उस दौर के देश की कोई कल्पना ही नहीं कर सकते, जब न मोबाइल फोन थे, न इंटरनेट, न टीवी, न डीटीएच और न नेटफ्लिक्स वगैरह-वगैरह। जब हवाई जहाज़ भी नहीं थे, रेलगाड़ियाँ भी नहीं और टैक्सी-बस नहीं। न्यूज पेपर नहीं थे, रेडियो नहीं था। तब दुनिया एक गहरी शांति में थी। मनोरंजन तब भी था, संपर्क-संचार भी बराबर था।

तरीके दूसरे थे, जो ज्यादा आत्मीय थे, बहुत करीबी थे। नाटक खेले जाते थे। लीलाओं का मंचन होता था। नृत्य और संगीत की सभाएँ थीं। वह एक अनिवार्य सादगी का समय था। आज के “परफॉर्मिंग आर्ट’ की भाषा में कहें तो कुछ लोग ऐसे होते थे, जो बातों को बहुत लुभावने और प्रभावी अंदाज में पेश करने के हुनरमंद थे, जो सामने बैठे लोगाें को बांधे रखते थे। वे किस्से सुनाते थे। दास्तानें सुनाते थे।

वे सुनाने लायक सब सुनाते थे और सिर्फ सुनने भर से लोगों को इतिहास और आसपास के किरदारों और घटनाओं की जानकारी याद ही हो जाती थी। दास्तानगोई एक ऐसी ही विधा थी, जो दौर बदलने के साथ वैसे ही याददाश्त के हाशिए पर चली गई, जैसे आज खटखट करते टाइपराइटर, पुराने काले रंग के फिक्स फोन, बड़े रेडियो सेट, घर में आटा पीसने की चक्की, बैलगाड़ी वगैरह दर्शन से ही दुर्लभ हैं।

बारिश की झड़ी के दरम्यान मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के भारत भवन में दो दिन बड़े ही यादगार रहे। रंगमंडल की ‘दास्तानगोई’ में पहला दिन मशहूर उपन्यास ‘राग दरबारी’ पर केंद्रित था और दूसरे दिन ‘कर्ण की कथा’। पहले दिन मेहमूद फारूकी और दारैन शाहिदी श्रीलाल शुक्ल की अमर रचना ‘राग दरबारी’ के साथ रूबरू थे। दूसरे दिन सवा दो घंटे की बेहद प्रभावशाली एकल प्रस्तुति में सिर्फ मेहमूद फारूकी कर्ण की कथा सुनाने आए। दूसरा दिन पहले पर भारी था।

इस दास्तानगोई में वही भूली-बिसरी रवायत जीवंत हुई, जिसे 2005 में यादों के अंधेरे तहखानों से निकालकर मेहमूद फारूकी की टीम धो-पौंछकर बाहर ले आई थी। तब से अब तक वे कई लोगों को इसका हुनर सिखा चुके हैं और कई शहरों में कई दास्तानें सुना चुके हैं। भोपाल में उनका आना अब हुआ। दोनों दिन दो अलग विषय थे। पहले दिन की दास्तान एक चर्चित किताब की और दूसरे दिन भारत के अतीत के एक महान किरदार की। 1968 में छपकर आई “रागदरबारी’ एक ऐसी किताब है, जिसे बहुतों ने बहुत-बहुत बार बहुत मजे से पढ़ा है। इसका हर किरदार शोले फिल्म के किरदारों की तरह याददाश्त में रच-बस गया है।

पहली शाम, एक छोटी सी भूमिका के साथ दारैन और मेहमूद अपने सामने बैठे सुनने वालों को अपनी बेहतरीन दास्तानगोई के पंखों की सवारी कराते हुए सीधे ले गए शिवपाल गंज। अब सामने है एक छोटा सा मंच, जिसके दोनों तरफ चांदी के प्याले रखे हैं। दोनों दास्तानगो के लिबास भी उसी दौर के हैं, जैसे आप लखनऊ में नवाबों की, हैदराबाद में निजामों की और दिल्ली में बादशाहों की हुकूमत के दौर में ही कहीं हजरत गंज, चार मीनार या चांदनी चौक में किसी ठसाठस भरी महफिल में दास्तानें सुन रहे हों। सफेद झक ढीले पजामे, कुरते, ऊपर शायद अचकन और मुसलमानी टोपी। ऊर्दू का मीठा लहजा। दो-सवा दो घंटों में कसी हुई एक दास्तान।

शिवपाल गंज की मूल कहानी के कुछ चुनिंदा फ्रेम थे, जिसमें तीन-तिकड़म से लबालब भरी वही स्थानीय राजनीति के कुचक्र और प्रपंच थे, जो 50 साल पहले श्रीलाल शुक्ल की किस आंतरिक प्रकाशित अवस्था में आयतों की तरह कागजों पर उतरे थे। तब लिखने का मकसद एक रोचक अंदाज में भारत के कस्बाई जीवन की एक सच्ची तस्वीर सामने रखना रहा होगा।

और गत रविवार भोपाल में इस दास्तान को सुनकर लगा कि अरे यह तो बिल्कुल आज के अपने आसपास की ही बात है। वैद्यजी, शनिचर, रुप्पन बाबू या मास्टरजी कहीं गए नहीं हैं। वे सिर्फ राग दरबारी के कोई काल्पनिक किरदार भी नहीं हैं। वे तो रियल लाइफ के अमर पात्र हैं। हर कहीं हैं। पक्ष में भी, विपक्ष में भी। इस गाँव में भी, उस कस्बे में भी और इधर राजधानी में भी। हर जगह भरपूर हैं।

दारैन और मेहमूद के साथ शिवपाल गंज में घूमते हुए कब सवा दो घंटे बीत गए पता ही नहीं चला। यह इतिहास के गहरे जानकार किसी कुशल गाइड के साथ एक ‘हेरिटेज वॉक’ जैसा अनुभव था। दास्तान को समेटने के लिए एक उपसंहार प्रभावशाली अंदाज में मेहमूद ने पेश किया, जिसके कुछ अंश मुझे हरी मिर्च के साथ फ्राई की गई तड़केदार लजीज दाल में आए कंकड़ की तरह लगे।

वे कह रहे थे-“तो अगर आप निराशा में हैं तो अतीत में चले जाइए। आप पतंजलि के पास जाइए, कणाद के पास जाइए…।’ यह एक लंबा संवाद था। पता नहीं यह राग दरबारी का मूल अंश है या सिर्फ उनकी स्क्रिप्ट का एक उपसंहारी टुकड़ा। पता नहीं क्यों, हम अपने अतीत को इतने हल्के में लेते हैं। हंसी में। मज़ाक में। खिल्ली के अंदाज़ में। जैसे भारत की पुरातन विरासत का जो कुछ भी है, वह पोगापंथी परंपरा के सिवा कुछ नहीं है।

ऐसे किसी भी प्रसंग में नाम लेकर पतंजलि या कणाद को घसीटना, दास्तानगोई के ऊँचे स्तर को कम करने वाला था। अगर मुस्लिमकाल में ऊर्दू के खुशबूदार लिहाज में पनपी एक शानदार और आदरणीय परंपरा दास्तानगोई है तो मुस्लिमकाल के पहले भी भारत के कई महान काल बीते हैं, जिनके कई महान किरदार हैं, उनकी महागाथाएँ हैं और वे कतई हास्य या हल्के में लिए जाने योग्य नहीं हैं।

दूसरे दिन मेहमूद फारूकी ने यह शिकायत जड़-मूल से दूर कर दी। वे भारत की महान स्मृतियों में चमक रहे एक ऐसे ही किरदार को लेकर अकेले रूबरू हुए और सच कहूँ तो महफिल लूट ले गए। मुझे लगा कि इसे क्यों 400 दर्शकों ने ही देखा-सुना। 4,000 या 40,000 की सभा में भोपाल सुनता तो क्या गज़ब होता!

महाभारत काल का वह किरदार था कर्ण। उसकी कथा तो सबको पता है। हर किसी ने सुनी है। बचपन से लेकर बुढ़ापे तक सुनी है। कई-कई बार सुनी है। लेकिन जिन्होंने मेहमूद फारूकी की दास्तान में नहीं सुनी, वे नोट कर लें कि अधूरा कर्ण ही उनकी स्मृति में है। मेहमूद की दास्तान ने कर्ण को उसके विराट रूप में पेश किया।

इस दास्तान की स्क्रिप्ट मूल महाभारत के अलावा कई ऐसी किताबों से सजी थी, जिनमें से कुछ के बारे में बहुत कम लोग जानते होंगे। जैसे बादशाह अकबर द्वारा कराया गया इसका फारसी तर्जुमा, जो ‘रज्मनामा’ के नाम से मशहूर है। 300 साल पहले किन्हीं तोताराम शायान का ऊर्दू अनुवाद, शिवाजी सावंत और रामधारी सिंह दिनकर की रचनाओं के अंश भी।

मेहमूद की प्रस्तुति ऐसी कि पलक झपकना भूल जाएँ। चंचल मन बिना प्रयास के स्थिर हो जाए। मेहमूद ने हिंदी, ऊर्दू, फारसी, संस्कृत जैसी महान भाषाओं के शब्दों के ईंट-गारे से जैसे कर्ण का बामियान के बुद्ध जैसा विराट बुत खड़ा कर दिया। महाभारत का एक ऐसा महान किरदार, जिसके हिस्से में वह सब आया, जिसका वह पात्र नहीं था-उपेक्षा, अपमान और हताशा।

इन सबसे जीवन भर जूझता हुआ वह अपनी मूल चमक पर भी आँच नहीं आने देता। वह शान से अपने हिस्से की भूमिका पूरी करके एक दिन कुरुक्षेत्र के मैदान में आखिरी साँस लेता है। खुद कृष्ण जिसके गुणों के कायल हैं। लेकिन एक भावुक दर्शक के रूप में मेरे लिए यह सिर्फ दास्तान-ए-कर्ण नहीं थी, जिसे सुनकर मेहमूद की टीम की तारीफ करता हुआ घर लौट आऊँ और फेसबुक पर एक पोस्ट डालकर राहत पाऊँ।

पांडवों से मुकाबले में जब एक सूत-पुत्र की पात्रता को सिद्ध कराने के लिए दुर्योधन उसे राजा घोषित करता है तो मेहमूद को सुनते हुए लगा कि किसी सफेदपोश ने अपनी सियासत साधने के लिए आरक्षण का एक टुकड़ा इधर फेंका! कर्ण की मजबूरी है कि उसे अपनी काबिलियत भी साबित करनी है और अपना हिसाब भी चुकता करना है तो वह आरक्षण की नियुक्ति को स्वीकार कर अपने जीते-जी दुर्योधन का भरोसा कायम रखता है।

आज़ादी के बाद बाबा साहेब आंबेडकर ने एक पवित्र भाव से महान भारत के सदियों से पीड़ित ऐसे ही सूत-पुत्रों को आरक्षण का प्रावधान दिया था। वह समय की ज़रूरत और संविधान निर्माताओं की समझदारी का प्रतीक था। लेकिन बाद में हस्तिनापुर में हर कहीं दुर्योधनों का राज आया और 125 करोड़ भारतीयों ने यह महसूस किया कि आरक्षण का वह पवित्र प्रावधान खैरात का एक अपमानजनक टुकड़ा बन गया, जो कभी इधर फेंका गया, कभी उधर फेंका गया।

आज के दुर्योधन सूत-पुत्रों की कई श्रेणियाँ बनाने लगे। दुर्भाग्य कि कर्णों को भी लगा कि वे इसके हकदार हैं। हक की होड़ में आज के हजारों-लाखों कर्ण हर जगह लड़े-पड़े हैं। दुर्योधन हर दल में आनंद में हैं। वह कर्ण तो अपनी क्षमता और योग्यता से खुद को सिद्ध करना चाहता था, लेकिन जाति की पहचान उसके महान गुणों पर एक आवरण की तरह चिपकी थी।

वह जीवन भर इस खोल से बाहर अपने व्यक्तित्व को संसार के सामने प्रस्तुत करता रहा। मूल रूप से एक राजकुल का अंश होने की बात कुंती से ज्ञात होने के बावजूद वह अपने स्वामी के प्रति निष्ठा से हिला नहीं और भगवान के अवतार ने भी उसके विराट रूप को मान्यता दी।

कर्ण का किरदार हमें क्या सिखाता है? ये दास्तानगोई क्या दो घंटे के स्वस्थ मनोरंजन की विचारोत्तेजक सभा भर थी? यह दास्तानगोई आज के लाखों कर्णों को झकझोरने की कोशिश मुझे लगी। यह सफेदपोश दुर्योधनों को भी हिलाने का विकट प्रयास है। यह आज के हस्तिनापुर के धृतराष्ट्रों और दुशासनों जैसे नीति-नियंताओं, सभासदों, शिक्षाविदों और आम नागरिकों को भी जगाने की एक ज़रूरी पहल है।

हम ऊँच-नीच के नज़रिए को दिमागों से निकाल दें। हम काबिलियत से सबको एक समान आगे बढ़ने के मौके दें। आज के लाखों सूतपुत्रों को आरक्षण के अपमान से बाहर आकर यह सिद्ध करने की चुनौती है कि वे भी कर्ण ही हैं। किसी से कम नहीं हैं। वे वीर भी हैं और दानवीर भी। उन्हें किसी दुर्योधन के सौंपे हुए राजपाट की ज़रूरत नहीं है। वे अपनी शपथ स्वयं लिखेंगे।

इस दास्तान के जरिए मेहमूद फारूकी ने प्राणों का बल फूँककर महाभारत के इस महान किरदार को जैसे सामने जिंदा कर दिया था। कर्ण को अब तक जितना पढ़ा या सुना था, मेहमूद को सुनते हुए लगा कि वो सब अधूरा था, आज मेहमूद ने उस मूर्ति को पूरा कर दिया!

मेरी राय में कभी इकबाल मैदान या काजी कैंप, चांदनी चौक, चार मीनार और हजरत गंज जैसी जगहों पर कर्ण की दास्तान सुनने का मौका मिले ताकि वो लोग जो भारत भवन जैसे सभागाराें में नहीं आ सकते, उन्हें भी महान भारत की स्मृतियों में रचे-बसे कर्ण से रूबरू होने का मौका मिले। गंगा-जमनी मुशायरों के ठिकानों पर मेहमूद फारूकी कर्ण की कथा सुनाएँ, यह कल्पना ही कितनी सुखद है।

दास्तान के आखिर में मेहमूद ने कहा कि महाभारत की यह कथा जो दिल की गहरी चाहतों से सुनता है, उसके सारे गुनाह माफ हो जाते हैं। मैंने तो आपको दिल की गहराई से कर्ण की दास्तान सुनाई है…। काश कभी मेहमूद फारूकी ‘दास्तान-ए-राम’ सुनाने तशरीफ लाएँ!

विजय मनोहर तिवारी भारत के काेने-कोने की आठ से ज्यादा परिक्रमाएँ करने वाले सक्रिय लेखक हैं। उनकी छः पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। वे स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। संपर्क- vijaye9@gmail.com