विचार
न्यायपालिका नहीं है ‘ईज़ ऑफ़ डुइंग बिज़नेस’ की सफलता की भागीदार
आशुचित्र-
  • ईज़ ऑफ़ डुइंग बिज़नेस सूची में अनुबंध लागू करने और संपत्ति पंजीकरण के मानदंड पर भारत का प्रदर्शन सबसे खराब रहा।
  • इन आयामों पर रुख करने और इनमें सुधार लाने के प्रयासों पर काम करने की आवश्यकता है।

ईज़ ऑफ़ डुइंग बिज़नेस सूची में 23 पायदानों की छलांग लगाकर भारत के 100वें से 77वें स्थान पर पहुँचने में यदि किसी संस्था को शर्मिंदा होना चाहिए ते वह है न्यायपालिका। अगर इसमें आप एक और संस्था को जोड़ना चाहते हैं तो यह राज्य-स्तरीय संपत्ति पंजीकरण प्राधिकारी हैं।

नरेंद्र मोदी सरकार ने चार वर्षों में यू.पी.ए. के समय की 142 वीं रैंक से 77वें पायदान पर भारत को लाकर वैश्विक स्तर पर कमाल का प्रदर्शन किया है। भारत को व्यापार सुलभ बनाने की प्रधानमंत्री की प्राथमिकता का परिणाम है यह। औद्योगिक नीति एवं संवर्धन विभाग को विशेष श्रेय जाता है जिसने राज्यों को नियमों को सुलभ बनाने के लिए प्रोत्साहित किया जिससे वे व्यापार सुलभता की आंतरिक सूची में खुद को ऊपर उठा सकें।

जिन 10 मानदंडों पर रैंकिंग दी गई है, उनमें भारत ने छः में सुधार किया है और चार में नीचे गिरा है। हमने इन मानदंडों पर अपनी स्थिति में सुधार किया है- निर्माण अनुमती में 181 से 52 तक कि लंबी छलांग, व्यापार शुरू करने की सुलभता में 156 से 137, सीमा पार व्यापार में 146 से 80, ब्याज मिलने में 29 से 22, बिजली आपूर्ति में 29 से 24 और अनुबंध लागू करने में नाम मात्र का फर्क- 164 से 163।

हम अल्पसंख्य निवेशकों के संरक्षण में 4 से 7 पर आए, कर भुगतान में 119 से 121, दिवालियापन समाधान में 103 से 108 और संपत्ति पंजीकरण में 154 से 166।

इससे पहले कि हम इस बात पर ध्यान दें कि किन बातों का असर इन रैंकिंग पर पड़ा है, इन दो बिंदुओं पर ध्यान देना ज़रूरी है।

पहला, सैद्धांतिक तौर पर मात्र एक पद के सुधार की भी प्रशंसा की जानी चाहिए। इसलिए अनुबंध लागू करने में 164 से 163 के पद पर भारत के जाने का उपहास नहीं करना चाहिए। लेकिन क्या 163 और 77 में इतना कम अंतर है कि न्यायपालिका इस बात पर गर्व महसूस करे?

दूसरा, जब हम निर्माण अनुमतियों में इतनी लम्बी छलांग लगा सकते हैं, सीमा पार व्यापार और व्यापार शुरू करने की सुलभता में इतना सुधार कर सकते हैं, तो यह सूक्ष्म सुधार क्या मात्र सांख्यिकीय विचलन नहीं हो सकता?

इससे बुरा यह कि हम संपत्ति पंजीकरण में 154 के एक बुरे पद से 166 के और बुरे पद पर आ गए हैं। संपत्ति पंजीयन राज्य का मामला है इसलिए केंद्र इसके सुधार का उत्तरदायी नहीं है। वास्तविकता में हम जानते हैं कि पंजीयन कार्यालयों में भ्रष्टाचार की थान होती है और राज्य के नेता उन्हें उसी प्रकार रखना चाहते हैं क्योंकि इससे नेताओं और बाबुओं को अवेध संतुष्टि मिलती है। स्पष्ट रूप से राज्यों को इस गड़बड़ का निपटारा करना होगा।

उनके अधीन आने वाले अनुबंधों का लागू होना और संपत्ति पंजीयन के क्षेत्रों में भारत का प्रदर्शन सबसे बुरा है। अनुबंध लागू होना कानून के दायरे में आता है। और अगर हमारी निचली अदालतों, जहाँ अनुबंधों पर विवाद की सबसे पहले सुनवाई होती है, के कारण हम नीचे जा रहे हैं तो यह उच्च न्यायपालिका, राज्य सरकारों और केंद्र सरकार का दायित्त्व बनता है कि वे इस ऊपर लेकर आएँ।

भारतीय न्यायपालिका अपनी शिथिलता के कारण व्यापार करने को मुश्किल बना रही है। इन दो में से एक हमारी समस्या है या दोनों हमारी समस्याएँ हैं। या तो निचली अदालतों के न्याय अधिकारी अनुबंध नियम से सरोकार करने में सक्षम नहीं हैं या तो प्रक्रिया ही इतनी शिथिल है कि वह अनुबंधों को लागू नहीं कर पा रही है। अब इन आयामों पर गौर करने का समय आ गया है और इनमें सुधार होना ही चाहिए।

जगन्नाथन स्वराज्य के संपादन निदेशक हैं। वे @TheJaggi से ट्वीट करते हैं।