विचार
तथाकथित सेक्युलर जिन्ना का कट्टर इस्लामवादी पक्ष छिपा नहीं है

हमारे देश के कुछ राजनेता पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना को सेक्युलर-ए-आज़म होने का प्रमाण पत्र देते रहते हैं इसलिए जिन्ना को लेकर एक बहस चलती रहती है जिससे जिन्ना की छवि का कायाकल्प हो गया है। उन्हें धर्मांध मुस्लिम नेता के बजाय एक धर्मनिरपेक्ष राजनीतिज्ञ माना जाने लगा है जिसने धर्म के आधार पर भले ही देश का विभाजन कराया हो लेकिन बाद में उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ और उन्होंने पाकिस्तान को धर्मांध राज्य नहीं वरन मुस्लिम बहुल धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाने की कोशिश की, जिस तरह भारत हिंदू बहुल धर्मनिरपेक्ष राज्य है। जिन्ना के इस ह्रदय परिवर्तन पर जानेमाने इतिहासकार मशीरूल हसन ने गालिब का यह शेर कहकर बेबाक टिप्पणी की थी- “मेरे कत्ल के बाद उसने जफा से तौबा की।” वैसे विभाजन के दौरान जिस तरह दस लाख से ज्यादा लोगों की जानें गईं, उस कारण बहुत से लोग उन्हें कायदे-आज़म के बजाय कातिले-आजम कहने लगे थे।

लेकिन क्या जिन्ना ने सचमुच धर्मांधता से तौबा कर ली थीक्या वे सेक्युलर हो गए थेदुख की बात यह है कि धारणा सत्य के विपरित है।जिन्ना का कोई ह्रदय परिवर्तन नहीं हुआ था। हकीकत यह है कि 1937-38 के बाद जिन्ना न केवल मुस्लिम अलगाववादी वरन इस्लामवादी हो गए थे। पश्चिमी अभिजात्य जीवन के शौकीननमाज़-रोज़े से दूर रहनेवालेसुअर का मांस और शराब का सेवन करनेवाले जिन्ना मुस्लिम लीग के नेता और भाग्यविधाता बनने के बाद धर्मप्रवण मुसलमान बन पाए या नहीं इस बारे में विद्वानों में मतभेद है। मगर पाकिस्तान की मांग की पुरजोर वकालत कर मुस्लिमों के इकलौते प्रवक्ता बनने के बाद वे इस्लामवादी ज़रूर बन गए थे जो पाकिस्तान को केवल हिंदू वर्चस्व से मुक्त मुस्लिम बहुल राज्य ही नहीं बनाना चाहते थे वरन वहाँ इस्लामी धर्मग्रंथों के सिद्धांतों के आधार पर राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था भी स्थापित करना चाहते थे। एक जगह उन्होंने पाकिस्तान को प्रीमियर इस्लामी स्टेट‘ (फरवरी 1948) भी कहा है।1937 के बाद और पाकिस्तान बनने के पहले उन्होंने बार-बार ऐसे बयान दिए हैं जिनमें इस्लामी धर्मग्रंथों के सिद्धांतों के आधार पर समाज रचना की बात जोर देकर कही गई है। आज की राजनीतिक शब्दावली में ऐसे लोगों को, जो इस्लाम को केवल मजहब के तौर पर नहीं देखते वरन वादके रूप में देखते हैं और इस्लाम के धर्मग्रंथों के आधार पर राजनीतिक-आर्थिक व्यवस्था का निर्माण करना चाहते हैं, इस्लामवादीराजनीतिक इस्लामी या इस्लामी उग्रवादी कहा जाता है। आखिरकार इस्लामवादी चिंतक मौलाना मौदूदीहसन अल बन्नासईद कुत्ब भी तो यही चाहते थे जो जिन्ना चाहते थे। यह बात अलग है कि जिन्ना इस्लामी धर्मशास्त्रदर्शनन्यायशास्त्र और इतिहास में पारंगत नहीं थे इसलिए इस्लाम की शास्त्रीय भाषा और शब्दावली का प्रयोग नहीं कर पाते थे।

इसे जिन्ना के जीवन की विडंबना ही कहा जाएगा कि कांग्रेस के नेता के रूप में जिन्ना ने जिन मुद्दों को लेकर महात्मा गांधी का विरोध किया था, 1937 के बाद मुस्लिम लीग के नेता के तौर पर उन सबको अपनाया। कभी जिन्ना संविधानवादी होने के कारण गांधी द्वारा शुरू किए जन आंदोलनों के घोर विरोधी थे। इसी मुद्दे पर उन्होंने 1921 में कांग्रेस छोड़ी। लेकिन मुस्लिम लीग के नेता के तौर पर उन्होंने पाकिस्तान के आंदोलन को जन आंदोलन बनाने की कोशिश की उसे डायरेक्ट एक्शन जैसे हिंसक मुकाम तक पहुँचाया, जिसमें हज़ारों लोग मारे गए। जिन्ना राजनीति में धर्म को लाने की गांधी की नीति के खिलाफ थे। इसलिए उन्होंने खिलाफत आंदोलन का विरोध किया था। लेकिन 1937 के बाद जिन्ना मुसलमानों की धार्मिक भावनाएँ भड़काने की कोशिश करते रहे। इतना ही अपनी आधुनिक सोच को छोड़कर पुरातनपंथी बन गए। 1938 में गया में मुस्लिम लीग के सम्मेलन में उन्होंने अपने बदले हुए नज़रिए का परिचय देते हुए राजनीति को धर्म से संचालित करने का समर्थन करते हुए कहा- “जब हम कहते हैं यह इस्लाम का झंडा है तो वे सोचते हैं कि हम राजनीति में धर्म को ला रहे हैं लेकिन इस हकीकत पर हमें गर्व है। इस्लाम हमें संपूर्ण कानून संहिता देता है। उसमें कानून दर्शन और राजनीति सब है। असल में उसमें वह सब है जो सुबह से शाम तक एक आदमी के लिए ज़रूरी है। जब हम इस्लाम की बात करते हैं तो हम उसे समावेशी मानते हैं। हमारी इस्लामी संहिता का आधार स्वतंत्रतासमानता और भाईचारा है।”

सितंबर 1945 में उन्होंने ईद के मौके पर दिए संदेश में क़ुरान के आधार पर समाज रचना की बात ज़्यादा विस्तार से कही- “जो लोग अज्ञानी हैं, उन्हें छोड़कर सभी जानते हैं कि क़ुरान मुसलमानों का आम कानून है। वह धार्मिकसामाजिकनागरिकव्यावसायिकसैनिकन्यायिकआपराधिक पेनल कोड है। वह हर चीज़ का नियमन करता है- दैनिक जीवन के धार्मिक कर्मकांडों से लेकर शरीर, स्वास्थ्य और आत्मा के मोक्ष तक। सबके अधिकारों से लेकर व्यक्तिगत अधिकारों तकनैतिकता से अपराध तकयहाँ मिलनेवाले दंड से लेकर परलोक में मिलनेवाले दंड तक। और हमारे पैगंबर ने हमसे कहा है कि हर मुसलमान के पास कुरान की प्रति होनी चाहिए और वह अपना पुरोहित आप बने। इसलिए इस्लाम केवल आध्यात्मिक मूल्योंसिद्दांतोंकर्मकांडों और आयोजनों तक सीमित नहीं है, वह सारे मुस्लिम समाज के जीवन हर क्षेत्र चाहे सामूहिक हो या व्यक्तिगत का नियमन करनेवाली संपूर्ण संहिता है।”

एक बार जिन्ना से पत्रकारों ने पूछा कि पाकिस्तान के शासन का स्वरूप क्या होगा तो उन्होंने जवाब दिया कि उसके शासन का स्वरूप 1350 साल पहले ही तय हो चुका है। इस तरह जिन्ना इस्लाम को जीवन और समाज की राजनीतिक सामाजिक समस्या का हल मानने लगे थे। एक बार उन्होंने जवाहरलाल के नास्तिक समाजवाद से असहमति जताते हुए मुसलमानों के विकास की विभिन्न समस्याओं का हल इस्लाम में ही तलाशने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। 19 मार्च 1945 को छात्रों की एक सभा को संबोधित करते हुए साम्यवादियों को चेतावनी दी कि अपने हाथ मुसलमानों से कतई दूर रखें। इस्लाम उनका एकमात्र पथप्रदर्शक और संपूर्ण आचार संहिता है। उन्हें दूसरे किसी वाद की ज़रूरत नहीं है। (जिन्ना एक पुनर्दॉष्टि-वीरेंद्र कुमार बरनवाल)

अपने अथक प्रयत्नों से बने पाकिस्तान के राजप्रमुख बनने के बाद तो जिन्ना इन बातों को और पुरजोर तरीके से कहने लगे। उन्होंने इस्लाम में वर्णित स्वतंत्रताभाईचारा और समानता (25 अगस्त 1947) इस्लामी लोकतंत्रइस्लामी सामाजिक न्याय और मानवों की समानता (21 फरवरी1948), सच्चे इस्लामी आदर्शों और सिद्धांतों के आधार पर अपने लोकतंत्र की नींव रखने (14 अगस्त 1948)इस्लामी संस्कृति और आदर्शों की तरफ प्रयाण (18 अगस्त 1947), अगर हम पवित्र कुरान से प्रेरणा लेंगे तो अंतिम विजय हमारी होगी (30 अक्तूबर 1947), यह विशाल भूमि अब एक ऐसे शासन के तहत है जो इस्लामिक और मुस्लिम शासन है और सार्वभौम और स्वतंत्र राज्य है (18 अप्रैल 1947)। सोच यह है कि एक ऐसा राज्य हो जहाँ हम स्वतंत्र मनुषय की तरह साँस ले सकें, जिसे हम अपनी संस्कृति के अनुसार विकसित कर सकें और जहाँ इस्लामी सामाजिक न्याय को खुलकर खेलने का अवसर मिले (11 अक्तूबर 1947), सेना से इस्लाम की उच्च परंपरा और राष्ट्रीय बैनर थामें रखने की अपील (30 अक्तूबर 1947) आदि इस्लामी राज्यइस्लामी सिद्दांतों से प्रेरित राज्य की अवधारणा को स्पष्ट करनेवाले बयान दिए।

“जिन्नाज़ विज़न ऑफ पाकिस्तान” लेख के लेखक शरीफ मुजाहिद जिन्ना के पाकिस्तान का गवर्नर बनने के बाद दिए इन बयानों का हवाला देकर कहते हैं यदि पाकिस्तान बनने से पहले और पाकिस्तान बनने के बाद के इतने सारे बयानों के प्रमाणों के बावजूद भी अगर कोई कहता है कि जिन्ना सेक्युलर राज्य की अवधारणा में विश्वास करते थे तो उससे पूछना पड़ेगा क्या एक-दो दानों से पूरा भोजन बन जाता है।यदि 1934 से 1948 के बीच के जिन्ना के बयानों का सूक्ष्मता से अध्ययन किया जाए तो सेक्युलरिज़्म (विचारधारा के रूप में) कहीं नहीं मिलता। इस बारे में पूछे गए सवालों से वे बच निकलते हैं। 17 जुलाई 1947 को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में उनसे किए गए सवालों के जवाब इस प्रकार थे-

सवाल- पाकिस्तान धर्मनिरपेक्ष होगा या धर्मराज्य ?

जिन्ना- आप मुझसे एब्सर्ड सवाल पूछ रहे हैं। मैं नहीं जानता कि धर्मराज्य का मतलब क्या होता है।

एक संवाददाता ने बताया कि धर्मराज्य यानी वह राज्य जहाँ एक धर्म विशेष के लोग ही पूर्ण नागरिक हो सकते हैंगैर-मुस्लिम पूर्ण नागरिक नहीं हो सकते हैं।

जिन्ना- यह मुझे बत्तख की पीठ पर पानी डालने की तरह लगता है। मुझे अफसोस है कि आप लोकतंत्र की बात कर रहे हैं मगर आपने इस्लाम का अध्ययन नहीं किया। हमने 1300 साल पहले लोकतंत्र सीखा।

पाकिस्तान के जाने-माने विचारक परवेद हूदभाई ने कराची में “70 साल बाद पाकिस्तान” विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा था, इस सवाल का जवाब आज तक नहीं मिला कि जिन्ना और उनके साथियों ने क्या सोचकर पाकिस्तान बनाया था? परवेज हुदभाई के अनुसार, भले ही पाकिस्तान बनने के ठीक पहले 11 अगस्त 1947 को जिन्ना ने यहा कहा हो कि सरकार की नजर में सभी नागरिक एक बराबर होंगे और उनमें कोई फर्क नहीं किया जाएगा, लेकिन जनवरी 1948 में कराची बार एसोसिएशन में उन्होंने कहा था कि पाकिस्तान में इस्लामिक कानून वैसे ही लागू होंगे जैसे 1300 साल पहले थे और इसमें हमें संदेह नहीं होना चाहिए।

जिन्ना पाकिस्तान के राष्ट्रपति बनने के बाद इतने इस्लाममय हो गए थे कि इस्लामी लोकतंत्रइस्लामी सामाजिक न्याय के अलावा इस्लामी अर्थव्यवस्था की वकालत करने लगे थे। 1 जुलाई 1948 को स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान के उद्घाटन के अवसर पर दिया गया भाषण जिन्ना का आखिरी भाषण था। इस दृष्टि से भाषण के निम्न लिखित अंश विचारणीय हैं- “पश्चिमी दुनिया मशीनीकरण और औद्योगिक कौशल के बावजूद आज इतिहास में पहले से कहीं ज्यादा उलझन और खराब हालत में है। एक खुशहाल और संतुष्ट राष्ट्र के निर्माण की लक्ष्य की प्राप्ति में पश्चिमी आर्थिक सिद्धांत और उस पर अमल बहुत मददगार नहीं साबित होंगे। हमें अपनी नियति की रचना अपने ढंग से करनी होगी। और सामाजिक न्याय और मनुष्यों की समानता जैसे इस्लामी विचारों पर आधारित आर्थिक व्यवस्था दुनिया के सामने पेश करनी होगी। इस तरह हम बतौर मुसलमान अपना लक्ष्य हासिल कर सकेंगे।”

जिन्ना धर्मनिरपेक्ष थे या नहीं यह बहस हिंदुस्तान में भले ही नई हो मगर पाकिस्तान के बुद्दिजीवियों में लंबे समय से बहस चल रही है।मीडिया का एक तबका तो मानता है कि जिन्ना सेक्युलर थे। उधर कट्टरतावादियों का कहना है कि जिन्ना की इस्लामवादी सोच को छुपाया गया। इस सिलसिले में वे बैंक ऑफ पाकिस्तान वाले भाषण का हवाला देते हैं जिसमें इस्लामी अर्थव्यवस्था की वकालत की गई। “जिन्नापाकिस्तान एंड इस्लामिक आइडेंटीटी- द सर्च फॉर सालदीन” के लेखक अकबर अहमद जिन्ना को सेक्युलरवादी माननेवालों का मुँह बंद करने के लिए जिन्ना के इस बयान हवाला देते हैं। आइए जिन्ना के कथित सेक्युलरिज़्म के बारे में उनके ही आखिरी शब्द जान लें।अपनी मृत्यु से कुछ महीने पहले ही 25 जनवरी 1948 को पैगंबर के जन्मदिन के अवसर पर कराची बार एसोसिएशन में उन्होंने घोषणा की कि जब लोग इस्लामी राज्य के विचार को ठुकराते हैं तब वे शरारत कर रहे होते हैं। कुछ लोग प्रचार से गुमराह हो रहे होते हैं। उन्होंने कहा- “इस्लामी सिद्धांत आज भी जीवन में उतने ही लागू करने योग्य हैं जितने 1300 वर्ष पूर्व थे। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि पाकिस्तान का संविधान शरीयत पर आधारित होना चाहिए। कुछ हफ्तों बाद उन्होंने इसी नजरिये को दोहराया। उन्हीं विचारों और शब्दों के साथ। उन्होंने कहा हमारा कल्याण हमारे महान कानून निर्माता इस्लाम के पैगंबर द्वारा आचरण के लिए दिए गए सुनहरे नियमों का पालन करने में है। हमें हमारे लोकतंत्र का निर्माण सच्चे इस्लामी विचार और सिद्धांतों के आदार पर करना चाहिए।” ( सीवी दरबार,14 फरवरी)

अकबर अहमद निष्कर्ष के तौर पर कहते हैं कि जिन्ना सेक्युलरवादी नहीं थे मगर वे फंडामेंटलिस्ट भी नहीं थे। जिन्ना को फंडामेंटलिस्ट न माननेवालों का मुख्य तर्क यह है कि फरवरी 1948 को अमेरिका की जनता के लिए अपने रेडियो भाषण में पाकिस्तान के भावी संविधान की चर्चा करते हुए जिन्ना ने स्पष्ट कहा था पाकिस्तान एक धर्मतांत्रिक देश नहीं बनने जा रहा है जहाँ ईश्वरीय मिशन के साथ मुल्लाओं का शासन हो। हमारे यहाँ बहुत से गैर-मुसलमान- हिंदूईसाई और पारसी भी हैं। उन्हें यहाँ के दूसरे नागरिकों की तरह अधिकार प्राप्त होंगे।और वे पाकिस्तान के मामले में न्यायोचित भूमिका अदा करेंगे। लेकिन यहाँ स्पष्ट कर देना ज़रूरी है जिन्ना इस्लामी धर्माचार्यों द्वारा शासन के भले ही विरोधी रहे हो मगर इस्लामी धर्मशास्त्र के आधार पर शासन और अर्थव्यवस्था चलाने के पक्षधर रहे। यहाँ तक कि उन्होंने शरीयत लागू करने की वकालत की। दरअसल सभी आधुनिक इस्लामी फंडामेंटलिस्ट चिंतक इस्लामी धर्मशास्त्रों के आधार पर ही सारी सामाजिक राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्ता को चलाने की वकालत करते हैं। वही दृष्टिकोण जिन्ना का भी है। इस तरह वे भी इस्लामी फंडामेंटलिस्ट प्रतीत होते हैं। जिन्ना की इस्लामवादी सोच के साथ उनका संविधान सभा में दिया सबको धार्मिक स्वतंत्रता वाला भाषण मेल नहीं खाता। मगर कई बार वे इस्लामी लोकतंत्र और इस्लामी सामाजिक न्याय की तरह ही इस्लामिक सेक्युलरिज़्म गढ़ने लगते हैं। 14 अगस्त 1947 के अपने भाषण में इस्लाम की धार्मिक सहिष्णुता को अपनाने की अपील करते हुए कहते हैं, “गैर-मुसलमानों के प्रति प्रदर्शित सम्राट अकबर की सहिष्णुता और सदभावना कोई आज की चीज नहीं है। यह 1300 साल पुरानी है। हमारे पैगंबर ने सिर्फ शब्दों में ही नहीं आचरण में भी यहूदियों और ईसाइयों पर विजय हासिल करने के बाद उनके धर्म और विश्वास का आदर करते हुए अत्यंत सहिष्णुता और सम्मान का व्यवहार किया था। मुसलमानों का पूरा इतिहास जहाँ भी उन्होंने शासन किया, इन मानवीय और महान सिद्धांतों से भरा हुआ है, जिस पर हमें चलना चाहिए और अपने चरम में तारना चाहिए।

विडंबना यह है कि जिन्ना इस्लाम की जिस धार्मिक सहिष्णुता की दुहाई दे रहे थे, वह उनकी अपनी कल्पना की उपज है। इतिहास के तथ्यों से उसका कोई लेना-देना नहीं है। इस्लाम भले ही समता का दावा करे मगर उसके धर्मशास्त्र में मोमिन और काफिरस्त्री और पुरुष, मालिक और गुलाम के विभेदों को चित माना गया है। और इस बात पर बल दिया गया है कि खलीफा तो कुरैश जाति का ही होना चाहिए। इसलिए पहले चार खलीफा कुरैश जाति के थे। यही नहीं इस्लामी धर्मशास्त्रों में मुस्लिम शासन में रहने में रहनेवाले गैर मुस्लिमों को “धीम्मी” (दूसरे दर्जे के नागरिक) का दर्जा देने और उन पर जजिया लगाने की बात कही गई है। सबको धार्मिक स्वतंत्रता देने की बात करने वाले जिन्ना ने कभी स्पष्ट नहीं किया कि धीम्मी और जजिया के बारे में उनकी राय क्या है। इस्लामी सिद्धांतों के आधार पर बनने वाले पाकिस्तान में इन इस्लामी संकल्पनाओं पर अमल होगा या नहीं। जहाँ तक काफिरों के खिलाफ जिहाद का सवाल है जिन्ना डायरेक्ट एक्शन के रूप में जिहाद कर चुके थे। और उनके जीवनकाल में ही पाकिस्तानी मुजाहीदिनों ने कश्मीर में जिहाद शुरू किया। जीवन के अंतिम दिनों में वे शरीयत लागू करने की बात करने लगे थे मगर शरीयत कोर्ट में किसी गैर-मुस्लिम की गवाही नहीं चलती हालाँकि उनपर भी शरीयत कोर्ट के पैसले लागू होते हैं। शायद जिन्ना शरीयत को भी सेक्युलर ही मानते होंगे।