विचार
जलियांवाला बाग हत्याकांड- क्यों, कैसे और इसके पश्चात क्या

आशुचित्र- जलियांवाला कांड के बाद जनरल डायर ने स्वीकार किया कि सभा विसर्जन का उसका कोई इरादा था ही नहीं वरन उसका ध्येय मनोवैज्ञानिक रूप से आतंक के द्वारा आंदोलन को तोड़ देना था।

जुरासिक पार्क के लेखक माइकल काइटन लिखते हैं, “यदि आप अपने इतिहास के विषय में नहीं जानते हैं तो आप कुछ नहीं जानते हैं। आप उस पत्ते की तरह हैं जो अपने वृक्ष से अनभिज्ञ है।”

भारत अपने स्वतंत्रता आंदोलन की सफलता के लिए कांग्रेस का आभारी रहा है। किंतु जैसे-जैसे स्वतंत्रता के बाद इंदिरा कांग्रेस भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को निगलती चली गई, और लोकतंत्र पारिवारिक ज़मींदारी में बदलता चला गया, इतिहास के तेवर बदलते चले गए। गांधी का उपनाम नेहरू परिवार ने अधिग्रहित कर लिया और एक होड़ सी चल पड़ी आज़ादी के संघर्ष को गांधी जी के साथ आरंभ और नेहरू परिवार के साथ समाप्त करने के लिए इतिहास के काले-सफ़ेद पृष्ठों को रंगीन करने की। कांग्रेस के प्रथम परिवार से बाहर का स्वतंत्रता का इतिहास ऐसा मिटाया गया जैसे गांधी के द्वारा कब्जाए जाने से पहले आंदोलन या स्वतंत्र रहने की इच्छा का ही भारत में कोई अस्तित्व नहीं था। जब हमने चौरी चौरा जैसी घटना को देखा तो पता चलता है की कितने भोले-भाले देशभक्तों के नामों को गुमनामी के अंधकार में धकेल दिया गया है। यही रामप्रसाद बिस्मिल, आज़ाद और अशफ़ाक़उल्लाह ख़ान जैसे क्रांतिकारियों के इतिहास के साथ हुआ और यही स्थिति उस घटना के साथ हुई जिसने चौरी चौरा से पूर्व भारतीय इतिहास की दिशा का निर्धारण किया।

राजनैतिक कलेवर में लिखा हुआ ऐतिहासिक साहित्य न इतिहास के साथ न्याय कर पाया, न साहित्य के साथ। हम भी ज़ॉम्बियों की भाँति उनींदी से स्थिति में जो परोसा गया वह पढ़ते चले गए। बड़ी-बड़ी घटनाएँ जो शक्तिशाली लोगों के क़द में वृद्धि नहीं कर पाईं, निर्ममता से हाशिये पर धकेली गईं। किसी ने कभी पूछा ही नहीं कि “बिस्मिल की आत्मकथा” जैसी पुस्तकें क्यों बाजार से लुप्त होती चली गईं। मुंशी प्रेमचंद अपने लेख साहित्य का उद्देश्य में लिखते हैं, “साहित्य वही खरा है जिसमें उत्तम चिंतन हो, स्वाधीनता का भाव हो, सौंदर्य का सार हो, सृजन की आत्मा हो…. जो हम में गति और बेचैनी पैदा करे सुलाए नहीं।” परंतु हुआ यह कि हम एक राष्ट्र के तौर पर तन्द्रा में डूबते चले गए और इंडिया आफ्टर गांधी पढ़ने के बाद हमने यह कभी नहीं पुछा कि गांधी के पहले का भारत क्या था जिसने गांधी को जन्म दिया था। क्या गांधी के भारतीय आंदोलन को ख़िलाफ़त से जोड़ने के पूर्व भी सांप्रदायिक भेद उतने ही गहरे थे? असहयोग क्यों हुआ, चौरी चौरा क्यों हुआ? जलियाँवाला बाग़ कांड क्यों हुआ।

13 अप्रैल 1919 को आज से सौ वर्ष पूर्व पराधीन भारत ने शांति काल का और आधुनिक समय का सर्वाधिक नृषंस नरसंहार देखा जिसे हम जलियांवाला बाग़ कांड के नाम से जानते हैं। इस एक घटना ने कांग्रेस के लार्ड डफ्रिन द्वारा शुरू की गई कांग्रेस-रूपी होम्योपैथिक किटी पार्टी को एक राजनैतिक क्रांति का रूप दे दिया। ऐसी महत्त्वपूर्ण घटनाएँ शून्य में उत्पन्न नहीं होती हैं। जब हम धूल पोंछते हैं तो उस शून्य से एक ऐसे भारत का चित्र उभरता है जो कभी पराधीनता स्वीकार करले निष्क्रिय नहीं बैठा था। 1857 के क्रूर दमन के बाद भी स्वतंत्रता के प्रयास अनवरत चलते रहे, बस कांग्रेस उसके आगे नहीं खड़ी थी।

1857 की क्रांति के क्रूर दमन के बाद (ग़ालिब लिखते हैं कि किस प्रकार पुरानी दिल्ली में रक्त की नदियाँ बही थीं) भी भारतीय संघर्ष सहमा अवश्य था किंतु टूटा नहीं था। अलग-अलग किनारों से स्वतंत्रता की मांग उठ रही थी। 25 जून 1913 को अमेरिकी -कैनेडियन प्रवासी भारतीयों ने श्री सोहन सिंह भकना के नेतृत्व में ग़दर पार्टी की स्थापना की और 1 नवंबर 1913 को ग़दर नाम से राष्ट्रवादी मुखपत्र प्रकाशित किया। लाला हरदयाल इसके सचिव नियुक्त हुए। 1914 में एक संपन्न भारतीय गुरदीत सिंह ने कनाडा के प्रवसन कानून को चुनौती देने की दृष्टि से एक जापानी जहाज़ को चार्टर किया और भारत, शंघाई, मोजी और योकोहामा से भारतीयों को एकत्र करता हुआ कामागाटा मारु कनाडा की ओर चल पड़ा। कनाडा में इसे पूर्वी आक्रमण माना गया और 23 मई 1914 को 372 को पहुँचे जहाज़ को वैंकोवर बंदरगाह पर रोक दिया गया। कनाडा की सर्वोच्च अदालत ने जहाज़ में फंसे भारतीयों को उतरने की अनुमति नहीं दी और पोत को भारत रवाना कर दिया गया। ग़दर पार्टी ने इन अनधिकृत प्रवासियों का मुक़दमा लड़ा था।

जहाज़ हुगली पहुँचा और लोगों को पंजाब जाने का आदेश हुआ। जहाज़ से उतरने वाले लोगों ने जुलूस निकालने का प्रयास किया। उनपर पुलिस की गोलीबारी का परिणाम 20 लोगों की मृत्यु में हुआ। गुरदित सिंह अपने 28 साथियों के साथ फरार हो गए। यह संभवतः भारत का पहला संगठित क्रांति दल था।

फरवरी 1915 तक विदेशों से लगभग 8000 ग़दर क्रांतिकारी भारत पहुँच चुके थे। उन्होंने 1857 की तर्ज़ पर सैनिक विद्रोह का प्रयास किया। 19 फरवरी 1915 को पहली बार सैनिक विद्रोह का विफल प्रयास किया गया। ग़दर पार्टी के हेराम्बा लाल गुप्ता जैसी क्रन्तिकारी विदेशो से हथियार लाने का प्रयास करते रहे और बाद में गिरफ्तार कर के जापान भेज दिए गए। सितंबर 1914 में चम्पा करामान पिल्लै को जर्मनी में ब्रिटिश विरोधी प्रकाशन की अनुमति मिल गई जे एन लाहिरी, लाला हरदयाल, बरक़तउल्लाह ख़ान, तारक नाथ दास, राजा महेंद्र प्रताप और हेराम्बा लाल गुप्ता के नेतृत्व में इंडिपेंडेंस कमिटी की स्थापना हुई। कांग्रेस अभी तक ब्रिटिश राज के भीतर ही स्थान ढूंढ रही थी। 1912 में डॉ अंसारी, ज़फर अली और मुहम्मद अली तुर्की गए और यंग टर्किश पार्टी से संबंध स्थापित किया।

भारत में 1918 के आस पास तिलक और एनी बेसेंट ने होम रूल लीग की स्थापना की जो बाद में एक हो गए। प्रथम विश्वयुद्ध के समाप्त होने के बाद आपातकालीन भारतीय सुरक्षा कानून 1915 के समाप्त होने का अवसर था। नवंबर 11, 1918 को युद्ध समाप्त हो चुका था। ऐसे समय पर आपातकालीन क़ानून को ग़दर और होम रूल जैसी घटनाओं को आधार मान कर सिडनी रौलेट के द्वारा बनाया रौलेट एक्ट पारित कर दिया गया। इसके अंतर्गत बिना कारण बताये गिरफ़्तारी का प्रावधान था, और सुनवाई गुप्त होती थी। सारे भारत में रौलेट एक्ट के विरोध में प्रदर्शन आरंभ हो गए। 1 मार्च 1919 को गांधी जी ने विट्ठलभाई पटेल, सी एम देसाई, अनुसूइया बेन के साथ सत्याग्रह के प्रतिज्ञा पत्र पर हस्ताक्षर किये और देश भर में हड़ताल का प्रस्ताव रखा गया। इससे पहले पंजाब में डॉ सैफुद्दीन किचलू और डॉ सत्यपाल भारतीयों को प्लेटफार्म टिकट की बिक्री पर रोक के विरोध में आंदोलन कर चुके थे। 29 मार्च को स्थानीय नेता गिरधारीलाल के नेतृत्व में हड़ताल की रूपरेखा बनायी गयी। 30 मार्च को एक और जनसभा का आयोजन हुआ जिसमे लगभग 40000 लोग एकत्रित हुए। नूर हसन आर्शी, फैज़ और अब्दुल वाहिद की नज़्मों के बाद महाशय रतन चाँद ‘रत्तो’ की पंजाबी कवितायें पढ़ी गईं। 30 मार्च को अमृतसर के साथ दिल्ली में भी जुलूस निकले। दिल्ली में स्वामी श्रद्धानन्द के नेतृत्व में निकले जुलूस पर पुलिस फायरिंग हुई जिसमे आठ लोग मारे गए। अमृतसर में स्थानीय बार कौंसिल के नेता सलारिआ और मक़बूल महमूद आंदोलन का नेतृत्व कर रहे थे। हॉल ब्रिज पर पुलिस की झड़प हुई और गोलीबारी में 20 मारे गए।

9 अप्रैल को राम नवमी के दिन हिंदू-मुस्लिम ने मिलकर रामनवमी की यात्रा निकाली। सांप्रदायिक एकता देखकर अंग्रेज़ और भी चिंतित हो गए। 10 अप्रैल को अमृतसर में हिंसा भड़क चुकी थी। लाहौर, अहमदाबाद, गुजराँवाला में भी प्रदर्शन हो रहे थे। पंजाब के ब्रिटिश गवर्नर सर माइकल ओ ड्वायर ने सेना को बुला लिया। पेशावर से लौटती गोरखा को भी अमृतसर में उतार लिया गया। 13 अप्रैल को पुलिस ने फ्लैग मार्च किया। 4:00 बजेजनरल डायर को जलियांवाला बाग़ में सभा की सूचना मिली। लगभग 20,000 लोग बाग़ में थे। बाग़ ऊँचे मकानों से घिरा 200 स 250 ग़ज़ की जगह थी। जनरल डायर 4:30 के आस पास पहुँचा। मशीन गन अंदर ले जाने में असफल होने के बाद वह सैनिकों के साथ अंदर घुसा। बिना चेतावनी के गोलीबारी शुरू कर दी गई जो 15-20 मिनट तक चली। सरकारी आँकड़ों के अनुसार 380 लोग मारे गए। जानकार मृतकों की संख्या 1000 से ऊपर बताते हैं। सिविल सर्जन डॉ स्मिथ मृतकों की संख्या 1800 के लगभग बताते हैं। जनरल डायर ने बाद में हंटर कमीशन के सामने स्वीकार किया कि सभा विसर्जन का उसका कोई इरादा था ही नहीं वरन उसका ध्येय मनोवैज्ञानिक रूप से आतंक के द्वारा आंदोलन को तोड़ देना था।

चौधरी बग्गा मल और महाशय रतन चंद को मृत्युदंड दिया गया। बग्गा मल की पत्नी के अनुरोध पर पंडित मोती लाल नेहरू ने चैम्सफोर्ड को जुलाई 1919 में सज़ा माफ़ी के लिए लिखा जिसका कुछ खास परिणाम न हुआ। चौरी चौरा की भांति इस बार भी महामना मदन मोहन मालवीय उनकी मदद को सामने आये। इम्पीरियल लेजिस्लेटिव कौंसिल में महामना की पैरवी के बाद मृत्युदंड को उम्र क़ैद में बदला गया। जलियांवाला की जनसभा जिसका अंत दुखद नरसंहार में हुआ, उस सभा के आयोजन के आरोप में दोनों नेताओं को 17 वर्ष बाद 1936 में मुक्ति प्राप्त हुई। लार्ड मोन्टेगु ने इस घटना को जनरल डायर की आतंकवाद की नीति बताया।

इस घटना की जाँच के लिए 14 अक्टूबर 1919 को हन्टर कमीशन बिठाया गया। इसमें चार ब्रिटिश और तीन हिंदुस्तानी- पंडित जगतनारायण मुल्ला, सर चिमनलाल हरीलाल सेतलवाड़, सरदार साहिबज़ादा सुल्तान अहमद खान थे। जलियांवाला के बाद जनरल डायर की क्रूरता में कमी नहीं थी। अमृतसर में सैनिक शासन स्थापित कर दिया गया। बाग के पास की सड़क पर भारतीयों के लिए रेंग के जाने का नियम लगाया गया। 8 बजे के बाद कर्फ्यू लगा दिया जाता था। जनरल डायर ने स्वीकार किया कि यदि मशीन गन अंदर ले जाने की संभावना होती तो वह अवश्य उसे उपयोग करता। इस घटना के बाद अंग्रेज़ों का भारत में उपनिवेश बनाए रखने का नैतिक अधिकार और एक शिक्षित न्यायप्रिय शासन का छलावा समाप्त हो गया।

जनरल डायर की मृत्यु सेरिब्रल हेमरेज से 1927 में हुई। माइकल ड्वायर की हत्या शहीद उधम सिंह ने मार्च 1940 में की। शहीद-ए -आज़म उधम सिंह को जुलाई 1940 में फाँसी हुई। जैसे हर बड़ी घटना में एक सीख भी होती है, इसमें भी है। विक्टर ह्यूगो लिखते हैं, “जो अब नहीं है उसे जानना नितांत आवश्यक है, ताकि हम उससे बच सकें।” ऐसी दुर्दांत घटना के बाद माइकल ड्वायर को स्वर्ण मंदिर में सम्मानित किया गया था। मृत्यु के बाद उसके परिवार को पंजाब से ही कुंज बिहारी थापर, उम्र हयात खान, चौधरी गज्जन सिंह और राय बहादुर लाल चंद की ओर से 1,75,000 रुपये दिए गए। कुंजबिहारी थापर के परिवारजन करन थापर, खुशवंत सिंह और नयनतारा सहगल ने स्वतंत्रता के बाद नेहरू परिवार से निकटता के आधार पर लुटयन्स के बौद्धिक अभिजात्य का निर्माण किया और उधम सिंह के निकटतम परिवारजन आज भी पंजाब में किसी कपड़ा व्यापारी के यहाँ काम कर रहे हैं और सरकारी नौकरी के लिए प्रयासरत हैं।

साकेत सूर्येश स्वराज्य में सहयोगी लेखक हैं। वे  @saket71 द्वारा ट्वीट करते हैं।