विचार
मंदिरों को स्वतंत्र से अधिक कैसे बनाएँ, क्यों हिंदू समाज को इस तंत्र से जोड़ना अनिवार्य

राज्य के नियंत्रण से मंदिरों को मुक्त कराने को बढ़ावा मिल रहा है। कई घटनाएँ हुई हैं जहाँ मंदिर की भूमि के विक्रय का विरोध हुआ, मंदिरों से राशि के हस्तांतरण पर आपत्ति जताई गई तथा राज्य सरकारों द्वारा और मंदिरों को नियंत्रण में लाने वाले कानूनों को न्यायालय में चुनौती दी गई।

ये सब सकारात्मक घटनाएँ हैं क्योंकि ये संदेश देती हैं कि मंदिर प्रशासन के साथ मनमानी नहीं की जा सकती और कई एक्टिविस्ट मंदिरों के संसाधनों के कपटपूर्ण दुरुपयोग के प्रति सतर्क हैं कि कोई साक्ष्य मिलते ही वे कार्रवाई करें।

लेकिन अभी भी इस बात पर विस्तृत चर्चा नहीं हुई है कि मंदिरों के स्वतंत्र होने के बाद क्या करना है। तर्क दिया जाता है कि एक बार मंदिर मुक्त हो जाएँ तब विचार किया जाए कि क्या करना है लेकिन वर्तमान चुनौती मंदिरों पर से राज्य का नियंत्रण हटाना है।

लेकिन यह सत्य नहीं है। बिना व्यवहार्य संरचनाओं के, जो मंदिर प्रबंधन संभाले और पारदर्शी एवं कुशल तरीके से मंदिर चलाए तथा हिंदू जनसंख्या को समग्रता का विश्वास दिलाए, मंदिरों में सरकार के हस्तक्षेप के लिए थोड़ा समर्थन हमेशा रहेगा।

राज्य को मंदिरों से हटाने के लिए मंदिर एक्टिविस्ट्स को ऐसा विकल्प बताना होगा जो मंदिरों के स्वतंत्र होने का लाभ पारंपरिक संरक्षकों के छोटे-से समुदाय तक ही सीमित न रखे बल्कि जहाँ मंदिर स्थित है, उस जिले के पूरे हिंदू समुदाय तक पहुँचाए।

यहाँ पर जो दाँव पर लगा है, वह सिर्फ पारंपरिक संरक्षकों का अधिकार नहीं है बल्कि करोड़ों हिंदुओं का भविष्य भी है। यदि मंदिर संसाधनों को वास्तव में उपलब्ध करा दिया जाए तो हिंदू छात्रों को लाखों छात्रवृत्तियाँ दी जा सकेंगी और सभी जातियों के हिंदू छात्रों के लिए संस्थान खोले जा सकेंगे जिससे ईसाई शैक्षिक संस्थानों द्वारा हो रहे धर्मांतरण को रोका जा सके।

हिंदुओं को प्राथमिकता देकर मंदिर उन्हें रोजगार आदि के माध्यम से सामाजिक सुरक्षा भी प्रदान कर सकते हैं जिससे एक समृद्ध मंदिर पारिस्थितिकी तंत्र का हितधारक करोड़ों हिंदुओं को बनाया जा सके। हिंदू मंदिर बड़े अस्पताल चला सकते हैं जो लाखों भक्तों को आकर्षित करेंगे और उन्हें लाभ भी पहुँचाएँगे।

लेकिन मंदिर ये सब करने में सक्षम हों, उसके लिए आवश्यक होगा कि वे ऐसे सशक्त और संगठित हों कि हिंदू समुदाय के हर भाग को समाहित कर सकें। ये कुछ तरीके हैं जो मंदिरों को पारंपरिक पूजा स्थल से अधिक बनाकर एक समुदाय के नियंत्रण के अधीन ला सकते हैं।

पहला यह कि संगठन का औपचारिक उद्देश्य हिंदू धर्म का प्रचार-प्रसार जो अलग-अलग धार्मिक स्थल अपने पंथ के अनुसार कर सकें, हिंदुओं की आर्थिक स्थिति का ध्यान रखना और धर्म को चुनौती देने वाले तत्वों से निपटना हो।

दूसरा यह कि मंदिर चलाने वाले संगठनों या निकायों का नेतृत्व जिला स्तर पर हिंदुओं द्वारा चुना जाए। इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि पारंपरिक संरक्षकों का मंदिर के क्रिया-कलापों में कोई मत नहीं होगा, वे धार्मिक मामलों में अपनी भूमिक निभाते रहेंगे जैसा हर समुदाय का मंदिर से संबंध रहा है, उस अनुसार।

हालाँकि हर हिंदू को अपने जिले के मंदिर मामलों में हितधारक बनाना आवश्यक है। यहाँ समानता के सिद्धांत के दिखावे के लिए ऐसा नहीं करना है बल्कि इससे यह होगा कि मंदिर के नेतृत्व के लिए प्रतिस्पर्धा बनी रहेगी, मंदिर के संसाधनों का सदुपयोग कैसे हो इसके लिए खुली चर्चा का मंच बनेगा और ऐसे हिंदू नेता उभरकर आएँगे जो हिंदुओं के हित में मंदिरों को हृदय में रखकर काम करेंगे।

इस प्रक्रिया से उद्यमी विचारों को बढ़ावा मिलेगा- एक महत्वाकांक्षी मंदिर नेता अपने मंदिर नगर में विश्व का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय या अस्पताल बनाने का लक्ष्य कर सकता है। एक अच्छा प्रचारक बड़ी मात्रा में दान आकर्षित करेगा, धार्मिक पर्यटन को बढ़ावा देगा और भी बहुत कुछ।

तीसरा यह कि द्वितीय स्तर के नेतृत्व में जिले में स्थित हर जाति या समाज का प्रतिनिधित्व होना चाहिए। पहले हर समुदाय का मंदिर के रीति-रिवाजों में पारंपरिक अधिकार होता था लेकिन कुछ सदियों से यह सांकेतिक ही रह गया है और मंदिरों से समुदाय के जुड़ाव में इसकी कोई विशेष भूमिका नहीं है।

मंदिर का यह अर्ध-राजनीतिक निकाय मंदिर के सेक्युलक मामलों को चलाने के लिए सशक्त होगा जिसमें हर जाति का मत रहेगा और वे अपने समाज के हित के लिए संसाधनों की माँग उठा सकेंगे।

चौथा यह कि कुशल मंदिर संचालन के लिए आवश्यक इंफ्रास्ट्रक्टर के कम से कम कुछ भाग के निर्माण के लिए सरकार को जोड़ा जाना चाहिए। मंदिर संसाधनों को इंफ्रास्ट्रक्चर पर व्यय करना निरर्थक है, यह सरकार का काम है। कोविड-19 महामारी के दौरान यूएस कैथोलिक चर्च ने सरकार के करोड़ों डॉलर अपनी जेब में डाल लिए। मंदिर नेतृत्व के राजनीतिक होने से वह स्थानीय या राज्य सरकारों पर इसके लिए दबाव बना सकेंगे।

अवश्य ही उपरोक्त चार तर्कों का विरोध हो सकता है। मंदिरों को कुछ जिलों का समूह बनाकर भी संगठित किया जा सकता है, मताधिकार में कुछ परिवर्तन किए जा सकते हैं, पुराने जाति विवादों, आदि को सुलझाया जाना चाहिए।

हो सकता है कि तमिलनाडु जैसे राज्य में हिंदू-विरोधी विचार रखने वाले राजनेता भी मंदिर निकायों का नेतृत्तव प्राप्त कर लें। लेकिन निरंतर चुनाव सुनिश्चित करेंगे कि हिंदू बेहतर प्रचार कर सकें, कराब प्रबंधन को रेखांकित कर सकें और हिंदू-विरोधी राजनीति को चुनौती दे सकें। इससे हिंदुओं को भी गतिशील किया जा सकेगा।

इसकी बहुत आवश्यकता है कि मंदिरों को सिर्फ मुक्त ही न करवाया जाए बल्कि मंदिरों और उसके संसाधनों को अर्ध-राजनीतिक स्थान दिया जाए हिंदू पनर्जागरण किया जा सके। ऐसा हो पाने के लिए आवश्यक है कि पारंपरिक संरक्षकों से अधिक लोगों का इसमें मत हो।