विचार
अंतरराज्यीय प्रवासन: प्रवासी श्रमिकों को क्यों होना चाहिए भारत की विकास की कहानी का हिस्सा
अंतरराज्यीय प्रवासन
प्रसंग
  • यह उथल-पुथल का समय है और लोगों के इस महत्वपूर्ण वर्ग को विकास तथा कल्याणकारी प्रक्रिया से दूर नहीं रखा जा सकता है

दो हफ्ते पहले, भारत के उत्तरी राज्य गुजरात में प्रवासी श्रमिकों को लक्षित किया गया था जिससे उनके पलायन की प्रक्रिया शुरू हो गई। एक प्रवासी श्रमिक द्वारा एक छोटे बच्चे के साथ कथित रूप से बलात्कार करने के बाद, छह जिलों में से साबरकांठा और मेहसाना में सबसे ज्यादा हिंसा हुई थी। इसका नतीजा यह हुआ कि गुजरात में काम कर रहे बिहार, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश के प्रवासियों को पलायन करना पड़ा, इनकी संख्या 20,000 से 50,000 के बीच हो सकती है।

विद्रोह की असल वजह राजनीतिक शासन के खिलाफ प्रेरित राजनीति हो सकती है या बाहरी व्यक्तियों के कारण स्थानीय लोगों को रोजगार न मिल पाने की शिकायत भी इसके पीछे एक कारण हो सकती है। कांग्रेस नेता अल्पेश ठाकुर दावा करते हैं कि गुजरात ऐसे कानूनों को लागू नहीं कर रहा है जिसमें करीब 80 प्रतिशत नौकरियों में स्थानीय लोगों की भर्ती की जानी चाहिए; इसके लिए सोशल मीडिया को दोषी ठहराया जा सकता है, जो किसी विवादित मुद्दे को उत्प्रेरित करने में अहम भूमिका निभाती है।

हालांकि, जिस चीज पर तर्क-वितर्क नहीं किया जा सकता है वह है नुकसान, आघात और असुविधा जो न सिर्फ प्रवासी श्रमिकों या उनके परिवारों को हुई है बल्कि फार्मास्यूटिकल्स, इंफ्रास्ट्रक्चर और निर्माण सहित कई अन्य कंपनियों, जो इन प्रवासी श्रमिकों पर निर्भर थीं, को भी इन समस्याओं का सामना करना पड़ा है। उदाहरण के तौर पर देखा जाए तो, सानंद में 15,000 में से 4,000 श्रमिकों ने कारखानों में काम करना छोड़ दिया था जिसके बाद कुछ दिनों तक कारखानों को बंद रख गया, भले ही मालिकों ने कानून और सुरक्षा सुनिश्चित करने और उन्हें वापस आने के लिए मनाने हेतु अपनी सर्वश्रेष्ठ कोशिश की हो। पुलिस कार्यवाई की गई, अपराधियों के खिलाफ मामले दर्ज किए गए और उनको गिरफ्तार किया गया तथा औद्योगिक इकाइयों और आवासीय कालोनियों को सुरक्षा देने के लिए राज्य सरकार का हस्तक्षेप हुआ और जनता में विश्वास को कायम रखने के लिए सामुदायिक बैठकों का आयोजन किया गया जिससे काफी मदद मिली। हालांकि लोगों में डर और संदेह अभी भी बना हुआ है, जो लोग वापस आ गए उन्होंने अपना काम करना शुरू कर दिया। जिन्होंने छोड़ दिया, वे अपने सुरक्षित क्षेत्रों – अपनी भूमि पर वापस चले गए।

श्रमिकों से पता चला है कि उनके ठेकेदारों ने सुरक्षा की गारंटी को नकारते हुए उन्हें तुरंत राज्य छोड़ने के लिए कहकर डरा दिया था, कुछ को भागना पड़ा था क्योंकि उनको उनके ठेकेदारों ने इस डर से बंदी बना लिया था कि कहीं वे चले न जाएं। हालांकि अब वे अपने सुरक्षित स्थानों पर वापस तो आ गए हैं लेकिन अब सवाल यह है कि – आगे क्या होगा?

जैसे इन प्रवासी श्रमिकों के भविष्य पर सवालिया निशान लगा है वैसे ही गुजरात के उद्योग की किस्मत पर भी लगा है। गुजरात में करीब 1 करोड़ प्रवासी श्रमिक राज्य के उद्योगों की रीढ़ हैं और इस घटना से उद्योग संघों ने अपने उत्पादन में 15 से 20 फीसदी तक की कटौती की है।

प्रवासी श्रमिक आर्थिक विकास के लिए एक महत्वपूर्ण कारक हैं, जो अपने साथ या तो कोई विशिष्ट प्रतिभा लेकर आते हैं या उनमें ऐसी इच्छा होती है जो स्थानीय रूप से अनुपलब्ध होती है। इस बात का इतिहास गवाह है कि श्रमिक काम करने के लिए आर्थिक केन्द्रों और उच्च विकास वाले स्थानों पर गए हैं और प्रांतीयता मूल भारतीय चरित्र के लिए एक अजनबी चीज है। फिर भी बाहरी लोगों के साथ ऐसी शत्रुतापूर्ण घटनाओं को पहचान की राजनीति, असुविधाजनक घटनाओं के कारण शत्रुतापूर्ण उन्माद के चलते या आर्थिक क्षरण के कारण पहले भी देखा गया है। प्रवासियों के लिए महाराष्ट्र में होने वाले ऐतिहासिक प्रतिरोध, कर्नाटक में उत्तरी-पूर्वी लोगों के प्रति प्रतिरोध, जो बहुत पहले की बात नहीं है, और पिछले साल केरल से अचानक भागने वाले प्रवासी श्रमिकों को याद करिए।

इस तरह की स्थानीय जातीय संरक्षणवादी और विभाजनकारी राजनीति, जिसके कारण गुजरात में विद्रोह हुआ, पर इस बात की गारंटी नहीं दी जा सकती है कि किसी दूसरी जगह पर किसी समय दोबारा ऐसा नहीं होगा। फिर भी, एक घटना के रूप में प्रवासन इतनी तेजी से बढ़ रहा है जितनी तेजी से पहले कभी नहीं बढ़ा। इसके रूझान इतने ज्यादा स्पष्ट थे कि 2017 की आर्थिक समीक्षा में इस पर पूरा एक अध्याय लिखा गया था और इसमें इस बात पर प्रकाश डाला गया था कि प्रवासन को जितना बड़ा समझा जाता था यह उससे कहीं ज्यादा बड़ा था।

चूंकि नवीनतम उपलब्ध आँकड़े 2011 की जनगणना पर आधारित थे, सर्वेक्षण ने कार्य से संबन्धित प्रवासी प्रवाह के लिए अनारक्षित यात्रा के शुद्ध प्रवाह को प्रतिनिधि के रूप में लिया।

उन्होंने इस यात्रा वर्ग पर ध्यान दिया क्योंकि यह “कम समृद्ध लोगों से सम्बंधित है, जो काम से जुड़ी हुई वजहों से यात्रा करने की अधिक संभावना रखते हैं।” इस डेटा ने 2011 की जनगणना से उपलब्ध अनुमानित आँकड़ों में एक बड़ी संख्या और नए आयाम जोड़े।

सर्वेक्षण से प्राप्त सारिणी नीचे दी गई है जो वित्तीय वर्ष 2011-12 के लिए पूरे भारत के वार्षिक यात्री प्रवाह को दर्शाती है-

इस सर्वेक्षण से यह पाया गया कि भारत भर में शुद्ध प्रवाह लगभग 9 मिलियन सालाना था, इसका अर्थ यह निकलता है कि भारत में श्रमिक गतिशीलता पहले से लगाए गए अनुमान से बहुत ज्यादा है। सन् 2000 की शुरुआत की तुलना में प्रवासन में वृद्धि अब महिलाओं के बीच बहुत ज्यादा पायी गयी।

सन् 1990 के बाद का विकास एक प्रमुख योगदानकर्ता था और अध्ययन में पाया गया कि 1990 की तुलना में 2000 में आंतरिक प्रवासन लगभग दोगुना हो गया था। 2001-2011 की तुलना में 2011-2016 की अवधि में प्रवासन ज्यादा तेजी से हुआ था। महत्वपूर्ण रूप से, सर्वेक्षण में कहा गया कि “यह त्वरण विभिन्न राज्यों में काम करने के लिए अधिवास प्रावधानों, लाभों की पोर्टेबिलिटी की कमी, स्थानांतरण पर कानूनी और अन्य पात्रताओं जैसे प्रोत्साहनों को हतोत्साहित करने की पृष्ठभूमि में हुआ है”, और यह सुझाव दिया कि इन नीतिगत बाधाओं को दूर किया जाए क्योंकि प्रवासियों की वृद्धि की बढ़ती दर का अनुमान लगाया गया है। उत्तर प्रदेश और बिहार शीर्ष स्रोत राज्य हैं; मध्य प्रदेश, पंजाब, राजस्थान और उत्तराखंड इसके बाद आते हैं और दिल्ली, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और गुजरात शीर्ष मेजबान राज्यों में से एक थे।

ऊपर दी गई तालिका यह दर्शाती है कि कम समृद्ध राज्यों से अधिक प्रवासन हुआ है और समृद्ध राज्य या मेट्रो शहर अधिक प्रवासी श्रमिकों को आकर्षित करते हैं। सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि समय के साथ-साथ दक्षिणी राज्यों में भी प्रवासन हुआ है और प्रवासन के लिए “भाषा को बाधा नहीं पाया गया।”

सूची से हम यह भी देखते हैं कि उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्य, जहाँ से प्रवासन होता है, वे भी कम समृद्ध क्षेत्रों से प्रवासियों को प्राप्त करते हैं। अधिकांश प्रवास आस-पड़ोस के राज्यों के साथ ही होता है लेकिन गुजरात, तमिलनाडु और महाराष्ट्र दूर-दराज के क्षेत्रों से भी प्रवासी श्रमिकों को आकर्षित करते हैं। प्रवासियों को आकर्षित करने वाले शीर्ष राज्यों में, गुजरात के प्रवासी तमिलनाडु भी जाते हैं, तमिलनाडु के प्रवासी आंध्र प्रदेश जाते हैं, महाराष्ट्र के प्रवासी गोवा और गुजरात जाते हैं। सबसे ज्यादा प्रवासी उत्तर प्रदेश से जाते हैं, और दिल्ली सबसे ज्यादा प्रवासियों को आकर्षित करने वाला राज्य है। कुल मिलाकर प्रवासन का चलन है और यह एक मुख्य आधार है।

आदान-प्रदान के बाद, नीचे दिया गया आँकड़ा राज्यों में औसत शुद्ध प्रवाह को दर्शाता हैः

जिला स्तर पर सकल और शुद्ध स्तर के प्रवाह की भी गणना की गई। सर्वे द्वारा रेलवे यात्री यातायात का इस्तेमाल करके गणना किया गया शुद्ध प्रवाह, प्रवासन पर कार्यकारी समूह (भारत सरकार, 2017) की रिपोर्ट के करीब था। आर्थिक सर्वेक्षण में एक महत्वपूर्ण खोज है जो “ग्रेविटी मॉडल” जैसी किसी चीज से सम्बंधित है। जिसका मतलब है कि किसी व्यावहारिक ज्ञान की सैद्धांतिक व्याख्या – यानी कि, जैसे दूरी बढती है, प्रवासियों का शुद्ध प्रवाह घट जाता है, और समीपवर्ती राज्यों में प्रवासन सबसे ज्यादा होता है। जिला स्तर के अनुमान, जो फिर रेलवे आरक्षण से ही प्राप्त हुए हैं, बताते हैं कि राज्य की सीमा के भीतर लोगों का प्रवाह, सीमा से बाहर प्रवाह से चार गुना ज्यादा था, जिसका मतलब है कि दूरी का आमतौर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

इस खोज के बावजूद, शीर्ष जिला-स्तर प्रवाहों पर एक नज़र से पता चलता है कि अंतर-राज्य प्रवास शीर्ष पदों पर हावी है:

अब हम आसानी से यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि शायद श्रमिक दूर जाना पसंद नहीं करते लेकिन आर्थिक मजबूरियों के कारण ऐसा होता है – खासकर उत्तर प्रदेश और बिहार में।

यह लोग एक अपमान और त्याग के जीवन का सामना करने के लिए तैयार क्यों है जबकि इन जगहों पर यह सब होने की प्रबल सम्भावना होती है और वह भी एक तेज गति से? आर्थिक सर्वेक्षण से यह निष्कर्ष निकला कि इस त्वरण के पीछे वज़ह हैं प्रवासन के प्रतिफल यानी कि गंतव्य में उच्च संभावित आय और रोजगार।

शहरीकरण की घटना इस तरह के प्रवासन का परिणाम है। फिर भी प्रायः लौटने की इच्छा तथा शोक में आर्थिक लाभ शामिल होते हैं। जो अपने गांवों से हैदराबाद प्रवास कर गए थे, उनमें से कई कहते हैं कि वे शहर में खुशहाल नहीं थे लेकिन उनके लिए मूल स्थान पर निवास करना एक विकल्प नहीं था। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि “रोजगार की पेशकश करने का वादा करने वाले कारखाने आगे नहीं आये हैं।”

यह स्पष्ट है कि कोई भी आंदोलन, यदि कमाने वाला व्यक्ति पलायन करता है तो पारिवारिक जीवन में बाधा डालकर जीवन को तबाह करता है, और यदि पूरा परिवार पलायन करता है तो लोगों को जड़ से उखाड़कर और उन्हें उनकी संस्कृति से अलग करके विनाश लाता है। कुल मिलाकर इससे पूरा समाज दुख उठाता है।

यह मौसमी प्रवासी श्रमिकों के लिए और भी बदतर है। आजीविका ब्यूरो के सह-संस्थापक और निदेशक कृष्णावतार शर्मा वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम वेबसाइट पर इस रिपोर्ट के बारे में विस्तार से बताते हैं, “मौसमी प्रवासी लोगों का भवन-निर्माण, होटल, वस्त्र उद्योग, विनिर्माण, परिवहन, सेवाओं, घरेलू कार्य आदि जैसे प्रमुख क्षेत्रों में कम भुगतान, जोखिम वाली और अनौपचारिक बाजार नौकरियों पर प्रभुत्व होता है। बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी पहुंच नहीं होती जिसके परिणामस्वरूप उनका व्यवसायिक स्वास्थ्य बहुत ही दयनीय होता है। चूंकि वे निजी अस्पतालों का खर्च नहीं उठा सकते हैं, इसलिए वे अक्सर बीमार पड़ने के बाद अपने गांवों में वापस चले जाते हैं। इससे उनके रोजगार के अवसरों पर प्रभाव पड़ने के साथ ही साथ वेतन में भी कमी आती है।” शर्मा, जो कि मौसमी प्रवासी श्रमिकों से जुड़े मुद्दों पर कई सालों से काम कर रहे हैं, कहते हैं कि आजीविका एक संस्था है जो प्रवासी श्रमिक समुदायों की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए काम करती है।

वर्तमान प्रवासन के साथ समस्या गृह राज्यों में उपलब्ध विकल्पों की कमी है – ऐसे परिदृश्य में बाहर जाने को शायद ही अपनी आजीविका कमाने की स्वतंत्रता या कहीं भी स्थानान्तरित होने की स्वतंत्रता माना जाता है। वे स्वतंत्र नहीं हैं क्योंकि वे गरीबी की जंजीरों में जकड़े हुए हैं। विशेष कौशल या कॉर्पोरेट या सेवा आधारित संगठनों के अलावा, प्रवसन नहीं होता अगर यही नौकरी उन्हे उनके गृह राज्य में मिली होती।

वर्तमान स्थिति में, यूपी और बिहार के मुख्यमंत्रियों ने व्यापक प्रवासन की निंदा की है और इसमें हस्तक्षेप करने की कोशिश की है। हालांकि, यह आत्मनिरीक्षण का मामला है: इन श्रमिकों को बहुत ही कम वेतनमान पर तथा निम्न स्तर पर रहकर कम- कौशल वाली नौकरी करने के लिए प्रवासन की आवश्यकता क्यों है? इसका कारण यह है कि प्रवासी श्रमिकों को योजनाकारों की सूची में शामिल नहीं किया जाता है और मौसमी प्रवासी इससे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं क्योंकि वे इस योजना में महत्वपूर्ण नहीं होते हैं। जैसा कि शर्मा बताते हैं, “मौसमी प्रवासी श्रमिकों के लिए नीतियां तैयार करने और सेवाएं प्रदान करने के लिए राज्य को उन प्रवासियों की वास्तविक संख्या तथा उनके स्थानान्तरण की प्रकृति की जानकारी होना अनिवार्य है। दुर्भाग्यवश भारतीय राज्य इन दोनों का आंकड़ा लगाने में विफल रहता है।” उनका कहना है कि हाल ही में हुए क्षेत्र के अध्ययन से पता चलता है कि काम के लिए बड़े पैमाने पर प्रवासन गतिविधियों के लिए मौसमी प्रवासन उत्तरदायी है।

विकास के लिए किसी भी समाधान में निश्चित रूप से बड़ी संख्या में उन लोगों को शामिल किया जाना चाहिए जो एक स्वीकार्य मानक से भी निचली श्रेणी का जीवन गुजारते हैं। यह दृष्टिकोण बहु-आयामी होना चाहिएः पहला, ग्रैविटी मॉडल के साथ मेल खाते आर्थिक सर्वेक्षण के निष्कर्षों को ध्यान में रखते हुए गृह राज्य के भीतर रोजगार के विकल्प पैदा करना; दूसरा, जो लोग अभी भी अपने मूल राज्यों से बाहर जाने का विकल्प चुनते हैं, उन लोगों के लिए पूरे राज्य में एक बुनियादी न्यूनतम मूल्यवर्ग पर मानक आजीविका परिस्थिति का निर्माण करना।

इसमें, स्मार्ट सिटी मिशन एक अवसर हो सकता है। यह पूरे देश में शहरीकरण बढ़ाकर 100 शहरों के नवीनीकरण और स्थायित्व के बारे में है, जो काफी हद तक जरूरी है। यह एक ही समय पर नौकरी सृजन तथा विकास के समावेश पर थोड़ा सा ध्यान देकर किया जा सकता है। जिन राज्यों से श्रमिकों का पलायन होता है वे अपने यहाँ प्रवास में जाने वाले श्रमिकों को रोजगार देकर अपने लक्ष्य हासिल कर सकते हैं। केंद्र सरकार एक सुपरा एजेंसी बनाने के माध्यम से उन्हें आवश्यक मदद और नियंत्रण प्रदान कर सकती है। फिलहाल इस समय राज्यों में विविध प्रकार की परियोजनाएं चल रही हैं, इनमें विविध प्रकार के लोग शामिल हैं और परियोजनाएं अलग-अलग गति से चल रही हैं; स्थाई रोजगार सृजन का यह दृष्टिकोण इसमें अतिरिक्त उद्देश्य उत्पन्न कर सकता है। इससे संभवतः शीर्ष बाह्य-प्रवासन वाले इन राज्यों में परियोजनाओं के काम में तेजी आएगी और साथ ही इन राज्यों को प्राथमिकता भी मिलेगी।

शीर्ष बाह्य-प्रवासन वाले राज्यों में निम्नलिखित स्मार्ट शहर हैं; 10 शहरों के साथ उत्तर प्रदेश के पास निश्चित रूप से रोजगार सृजन की विशाल क्षमता है।

राज्य स्मार्ट शहरों का संख्या स्मार्ट शहरों की सूची
उत्तर प्रदेश 10 इलाहाबाद, अलीगढ़, कानपुर, लखनऊ, झांसी, वाराणसी, आगरा, बरेली, मुरादाबाद और सहारनपुर
बिहार 4 मुज़फ्फरपुर, पटना, भागलपुर, बिहारशरीफ
मध्य प्रदेश 7 भोपाल, इंदौर, उज्जैन, ग्वालियर, जबलपुर, सतना, सागर
राजस्थान 4 जयपुर, उदयपुर, कोटा, अजमेर

 

इस संदर्भ में, छत्तीसगढ़ की कहानी से पता चल सकता है, जहां बाजार पुनर्निर्माण, वर्षा जल संचयन, अपशिष्ट प्रबंधन, सीवेज कार्यों, गैर मोटर चालित परिवहन मार्ग जैसे क्षेत्रों में रायपुर, बिलासपुर और अटल नगर जैसे स्मार्ट शहरों में काम तेजी से प्रगति पर है। गतिशील कुशलता एवं विकास के साथ-साथ बाह्य-प्रवासन के लिए समाधान इस तरह से निकाला जा सकता है।

यहां तक कि झुग्गी बस्तियों के पुनर्विकास तथा अद्यतन से कई उद्देश्य पूर्ण किए जा सकते हैं।

राज्यों में जीवनयापन सम्बन्धी परिस्थितियों में सुधार हमारी आबादी के इस वर्ग की देखभाल करने का दूसरा बिंदु है। जैसा कि आर्थिक सर्वेक्षण ने भी रेखांकित किया, “प्रवासियों के लिए खाद्य सुरक्षा लाभ, स्वास्थ्य देखभाल, और एक बुनियादी सामाजिक सुरक्षा ढांचे की सुवाह्यता महत्वपूर्ण है।” इसने पहले सुझाव दिया कि पहले एक अन्तरराज्यीय स्व-पंजीकरण प्रक्रिया और फिर प्रवासी कल्याण के लिए योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए अन्तरराज्यीय समन्वय होना चाहिए। राज्यों को चाहिए कि वे प्रवासियों को महत्वपूर्ण समुदाय मानते हुए उन प्रवासियों की प्रतिभाओं, जो उन राज्यों में पहले से मौजूद नहीं है, को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा करें और एक दूसरे से बेहतर करने का प्रयास करें।

वैधानिक प्रावधानों के समर्थन के साथ नियोक्ताओं और ठेकेदारों को उत्तरदायी और जिम्मेदार बनाया जाना चाहिए। जैसे कि श्रम बाजार असंगठित हैं और श्रमिकों को वेतन, खराब कार्य परिस्थितियां और दुर्व्यवहार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। आजीविका के शर्मा स्पष्ट करते हैं कि “मौजूदा वैधानिक तंत्र अनियोजित क्षेत्र में कानूनी विवादों की प्रकृति के प्रति संवेदनशील नहीं है।” अंतरराज्यीय प्रवासियों के मामले में समस्या गंभीर हो जाती है क्योंकि “राजनीतिक वर्ग उन्हें नकारता है क्योंकि वे मतदाताओं की श्रेणी में नहीं गिने जाते हैं; उनकी परिवर्तनशील प्रकृति के कारण उन्हें श्रमिक संघों के घोषणापत्र में शामिल नहीं किया जाता है।” विशेष रूप से अहमदाबाद का हवाला देते हुए लेखक कहते हैं, “प्रवासी रोजगार बाजार में अनुबंध श्रम प्रणाली और एक शिथिल विनियमन राज्य तंत्र ने केवल इन अनुचित मॉडलों और तरीकों को मजबूत बनाने में मदद की है।”

आजीविका ब्यूरो ने कथित तौर पर अहमदाबाद में प्रवासी श्रमिकों के लिए नवीनीकृत समाधानों की योजना बनाई है, जिनमें पहचान प्रमाण और पंजीकरण, कानूनी शिक्षा और परामर्श तथा विवादों में मध्यस्थता, और स्वास्थ्य देखभाल एवं कौशल प्रशिक्षण से संबंधित अन्य उपाय शामिल हैं। राज्यों में ऐसे बहुत सारे प्रयासों की आवश्यकता है।

इन प्रयासों के अलावा, बाह्य-प्रवासन वाले राज्यों में सरकारों को औपचारीकरण से संबंधित उपाय अपनाने चाहिए जैसे- पहचान प्रमाणपत्र और पंजीकरण, कानूनी परामर्श और विवादों का समाधान और स्वास्थ्य देखभाल तथा कौशल प्रशिक्षण में निवेश करके श्रमिक वर्ग की स्थिति में सुधार करना आदि।

यह उथल-पुथल का समय है और लोगों के इस महत्वपूर्ण वर्ग को विकास तथा कल्याणकारी प्रक्रिया से दूर नहीं रखा जा सकता है।

स्वाति कमल स्वराज्य की एक समीक्षक हैं।