विचार
मातृभाषा दिवस विशेष- जानिए इंटरनेट पर कैसे बढ़ा भारतीय भाषाओं का प्रभाव

आशुचित्र- किसी भी राष्ट्र के विकास में समुत्थान के लिए तकनीक और भाषा दोनों का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। जब दोनों साथ मिलकर आगे बढ़ते हैं तो तकनीक के विकास से भाषाई वैविध्य में भी एकता और सामंजस्य दिखाई पड़ता है।

वर्तमान भारत में 1600 से अधिक बोलियाँ और लगभग 121 भाषाएँ अस्तित्व में हैं जिनमें से 22 भाषाएँ संविधान में अनुसूचित भाषाओं के रूप में स्वीकृत हैं। यूनेस्को द्वारा प्रकाशित 2009 की विश्व सांस्कृतिक रिपोर्ट के अनुसार भारत का भाषा विविधता सूचकांक 0.93 है। भाषा विविधता सूचकांक यह बताता है कि यदि कोई दो व्यक्ति यादृच्छया (रैन्डमली) चुने जाएँ तो उनकी मातृभाषाएँ अलग-अलग होने की प्रायिकता (संभावना) क्या है। यह सूचकांक शून्य से एक तक बढ़ती विविधता को दर्शाता है। भाषा विविधतता सूचकांक के द्वारा किसी भी देश के भाषाई वैविध्य को देखा जाता है।

आइए एक नज़र डालते हैं कुछ महत्त्वपूर्ण आँकड़ों पर-

भाषाएँ हिंदी बांग्ला तेलुगु मराठी तमिल गुजराती कन्नडा मलयालम
2018 में जनगणना आयुक्त (गृह मंत्रालय) द्वारा बताए गए आठ प्रमुख भारतीय भाषाओं को बोलने वालों की संख्या-
बोलने वाले 52.8 9.72 8.11 8.30 6.90 5.54 4.37 3.48
2016 के अंत में गूगल द्वारा भारतीय भाषाओं के उपयोग* को बताते आँकड़े-  
उपयोगकर्ता 25.4 5.3 4.0 6.4 4.0 3.2 3.2 2.2

(आँकड़े करोड़ में हैं।)

* भारतीय भाषाओं के उपयोगकर्ता वे लोग हैं जो पढ़ने, लिखने और वार्तालाप करने के लिए अपनी मातृभाषा को प्राथमिकता देते हैं।

2017 में आई गूगल और केपीएमजी की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार 40.9 करोड़ भारतीय लोग इंटरनेट का उपयोग करते हैं। जिसमें से 23.4 करोड़ लोग इंटरनेट पर अपनी मातृभाषा को प्राथमिकता देते हैं। इसी रिपोर्ट के अनुसार 2021 तक इंटरनेट पर भारतीय उपयोगकर्ताओं की वार्षिक वृद्धि दर 18 प्रति शत होगी, वहीं अंग्रेज़ी उपयोगकर्ताओं की वार्षिक वृद्धि दर 3 प्रति शत होगी। स्मार्टफ़ोन उपयोगकर्ताओं में वृद्धि, सस्ता मोबाइल डाटा, ग्रामीण भारत में बढ़ती साक्षरता, इंटरनेट पर भारतीय भाषाओं में बढ़ती सामग्री के कारण इंटरनेट पर भारतीय भाषाओं के उपयोगकर्ता बढ़ रहे हैं

1878 का वर्नेकुलर प्रेस अधिनियम हो अथवा मैकॉले द्वारा अंग्रेज़ी को भारत की सरकारी तथा शैक्षणिक भाषा बनाना, भारत में ब्रिटिश शासन द्वारा भारतीय भाषाओं को दबाने के अनेकों प्रयास किए गए थे। जिसका प्रभाव हमारी मानसिकता पर पड़ा और धीरे-धीरे हम अंग्रेज़ी उन्मुख होते गए। स्वतंत्रता मिलने के बाद भी हम इस भ्रांति से उभर नहीं पाए। हिंदी को राजभाषा तो बना दिया लेकिन उसे वह सम्मान नहीं मिला। फ़िर सूचना प्रौद्योगिकी का युग आता है। इस समय तकनीक के विकास के साथ-साथ उनके परिणाम दुनिया भर में यथाशीघ्र पहुँचाने के लिए भाषाई संकुचन का दौर आरंभ हुआ। इसका अर्थ यह है कि तकनीकी विकास के अगुआ राष्ट्रों ने इसके लिए अपनी भाषा को प्रमुखता दी या फिर बहुसंख्य समाज की चुनिंदा भाषाओं को अपनाया। इसका प्रभाव यह हुआ कि बहुत सारी भाषाएँ इसमें पिछड़ गईं और धीरे-धीरे उनका अस्तित्व लुप्तप्रायः हो चला है। इससे एक ओर जहाँ केवल कुछ भाषाओं के उभरने से भाषाई संकेंद्रण जैसी स्थिति बनी है, वहीं दूसरी ओर चाहे-अनचाहे अपनी मातृभाषाओं की खोने जैसी स्थिति बन गई है। भारतीय संदर्भ में अंग्रेज़ी में चीज़ें आईं और इंटरनेट पर अंग्रेज़ी की अनिवार्यता के कारण भारत में एक नया विभाजन हुआ जिसे ‘डिजिटल डिवाइड’ कहा गया।

भारत जैसे बहुभाषा-भाषी देश में विदेशों से आई कंप्यूटर विद्या ने प्रारंभ में अपने अंग्रेज़ी वर्चस्व से आतंकित अवश्य किया किंतु भारतीय मनीषा और यहाँ की भाषाई शक्तियों ने इस चुनौती को शीघ्र ही चुनौती दे दी। परिणामतः भारत के नौजवानों और अनुभवी विद्वानों ने सूचना प्रौद्योगिकी का उत्तर ‘भाषा प्रौद्योगिकी’ से दिया। अनेक भाषाओं, उपभाषाओं, बोलियों तथा उपबोलियों से समृद्ध इस देश में हमारे कंप्यूटर वैज्ञानिकों ने कठोर परिश्रम से कंप्यूटर पर भारत की सभी प्रमुख भाषाओं को प्रतिष्ठित कर दिया। किसी भी राष्ट्र के विकास में समुत्थान के लिए तकनीक और भाषा दोनों का अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। जब दोनों साथ मिलकर आगे बढ़ते हैं तो तकनीक के विकास से भाषाई वैविध्य में भी एकता और सामंजस्य दिखाई पड़ता है जो राष्ट्र को एक सूत्र में बांधने के लिए मूलाधार का कार्य करता है। भाषा प्रौद्योगिकी के कारण इंटरनेट पर भारतीय भाषाओं का प्रभुत्व स्थापित होना प्रारंभ हुआ जिससे भाषा और तकनीक का मेल हुआ जो भारत की उन्नति के लिए सकारात्मक है। केंद्र सरकार द्वारा संचालित भारतीय भाषाओं हेतु तकनीकी विकास (टीडीआईएल) परियोजना के अंतर्गत राजभाषा विभाग, सीडेक, सीएफआईएलटी, आईआईआईटी हैदराबाद जैसे कई संस्थानों ने इस क्षेत्र में विशेष योगदान दिया है। यांत्रिकी अनुवाद (मशीन ट्रांसलेशन), कृत्रिम बुद्धिमता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) जैसे क्षेत्रों में विकास के चलते गूगल ट्रांसलेशन, गिरगिट, ट्रांसलिटरेशन, अनुसारक तथा ज्ञान निधि का विकास किया गया है जिसके उपयोग से अंग्रेज़ी से सभी भारतीय भाषाओं में अनुवाद आसानी से किया जा सकता है। अनुसारक एक ऐसा सॉफ्टवेयर है जिससे कि भारतीय भाषाओं में पारस्परिक अनुवाद की सुविधा उपलब्ध है। ‘स्काइप ट्रांसलेटर’ भी ऐसा ही एक अनुप्रयोग है जो कि ऑनलाइन बातचीत के दौरान किसी भी भाषा को बदलकर सामने वाले को समझ आने वाली भाषा में रूपांतरण कर देता है। ‘श्रुतलेखन’ सॉफ्टवेयर बोलने पर भारतीय भाषाओं में लिखता है। इससे संबंधित अन्य सॉफ्टवेयर वाचक, प्रवाचक, और गूगल ट्रांसलेट ‘टेक्स्ट टू स्पीच’ भी इस कड़ी को और उन्नत बनाते हैं। भाषा प्रौद्योगिकी के कारण ही इंटरनेट पर सूचनाएँ भारतीय भाषाओं में उपलब्ध हुई और अंग्रेज़ी की अनिवार्यता समाप्त होने लगी।

इंटरनेट पर भारतीय भाषाओं के बढ़ते उपयोग को देखकर बहुत सारी बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भारतीय भाषाओं में अपनी सेवा देना प्रारंभ कर दिया जिसके कारण अन्य देशों की तरह भारत में भी स्थानीयकरण का दौर आरंभ हुआ। आज के समय में गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ भी स्थानीय भाषाओं में अपनी सेवाएँ उपलब्ध करवा रही हैं। भाषा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विकास के कारण भारत में इंडस ओएस, रीवेरी, भारत भाषा संगणन जैसी कई कंपनियाँ उभरी जो मातृभाषा में अपनी सेवाएँ देकर सीधे लोगों तक पहुँच पा रही हैं। गाँवों और पिछड़े क्षेत्रों में भी लोग ऑनलाइन वार्तालाप अनुप्रयोग, समाजिक मंच, डिजिटल समाचार, ऑनलाइन विज्ञापन, डिजिटल मनोरंजन, ई-बाज़ार, ऑनलाइन सरकारी सेवाओं जैसे विभिन्न प्रकल्पों से जुड़ रहे हैं। अब इंटरनेट मात्र मनोरंजन का साधन नहीं है, यहाँ पर लोग पढ़ते और सीखते भी हैं और यदि ज्ञान उन्हें अपनी मातृभाषा में मिलें तो वे उसे सहर्ष स्वीकारते हैं। ‘डिजिटल इंडिया’ कार्यक्रम के अंतर्गत केंद्र सरकार द्वारा लोगों को डिजिटल रूप से साक्षर बनाने के कारण स्मार्टफ़ोन उपयोगकर्ताओं की संख्या में वृद्धि हुई है जिससे इंटरनेट पर सामान्य लोगों द्वारा भारतीय भाषाओं में उत्पादित सामग्री बढ़ी है।

कुल मिलाकर देखा जाए तो लोग अब अपनी मातृभाषा को लेकर जागरूक हो रहे हैं। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कहा था कि “भाषा कोई ओवरकोट या छाता नहीं है जो किसी से भी मांग कर काम चलाया जाए, भाषा मनुष्य की जीती-जागती खाल होती है जिसके तंतुओं से उसके संस्कार प्रवाहित होते हैं।” किसी भी स्वाधीन राष्ट्र की अपनी स्थानीय भाषा का राजभाषा होना उसके नागरिकों के लिए राष्ट्रीय स्वाभिमान और गौरव का प्रतीक होती है। राष्ट्र की भाषा के साथ-साथ अपनी-अपनी मातृभाषा से आत्मीय लगाव भी हम भारतीयों की विशेष पहचान है। गूगल और केपीएमजी की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार 2021 तक इंटरनेट पर भारतीय भाषाओं के उपयोगकर्ताओं की संख्या 53.6 करोड़ होगी भारतीय भाषाओं का उपयोग भारत को एक मृदु शक्ति के रूप में उभरने का नया अवसर देगा इसमें कोई संशय नहीं है              

लेखक मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान, भोपाल के छात्र हैं व हिंदी के प्रचार-प्रसार हेतु तूर्यनाद आयोजन समिति से जुड़े हुए हैं।