विचार
भारतः जहाँ विज्ञान और संख्या का मेल होता है

प्रसंग
  • भारत के भविष्य का निर्माण इसकी परंपरा और सर्वोत्तम आधुनिक विज्ञान की मिश्रित शक्ति पर करने की इच्छा प्रबल हो रही है लेकिन भारतीय विचारों को वैश्विक-वैज्ञानिक दृष्टिकोण के ऊपर रखने की लालसा का विरोध किया जाना चाहिए

चार्ल्स डार्विन, सांख्य के एक आचार्य।

ठीक है, ठीक है, मैं अतिशयोक्तिपूर्ण हो रहा हूँ। वस्तुतः चार्ल्स डार्विन सांख्य के आचार्य नहीं थे। दरअसल, शायद उन्हें सांख्य का अर्थ भी ज्ञात नहीं था।

फिर भी एक गहरे एवं अधिक मूलभूत बोध में डार्विन और सांख्य आचार्यों में बहुत कुछ उभय-निष्ठ था।

और यह मौलिक समानता थी उनकी मानसिकता यानी की दुनिया को समझने का उनका दृष्टिकोण। जब आप एकसमान मानसिकता रखते हैं तो विश्व के लिए एक निष्कपट दृष्टिकोण आपको अत्यंत समान निष्कर्षों तक ले जाता है।

चार्ल्स डार्विन, बाएँ, और सामाख्य के संस्थापक कपिला मुनी। (राष्ट्रीय पोर्ट्रेट गैलरी और ब्रिटिश संग्रहालय)

अब, डार्विन एक साधारण वृद्ध व्यक्ति नहीं थे जो एक वैज्ञानिक सिद्धान्त के साथ आए थे। यहाँ तक कि पिछले 300 वर्षों के बौद्धिक इतिहास के एक संक्षिप्त सर्वेक्षण में ध्यान दिया गया कि डार्विन का क्रम-विकास का सिद्धान्त इस अवधि की सबसे महत्वपूर्ण बौद्धिक घटना थी। डार्विन जानवरों के जीवन-मरण के रोचक विचार के साथ ही नहीं आए बल्कि उन्होंने मानवता की स्वयं की धारणा को पुनःपरिभाषित किया।

या, कम से कम उन्होंने मानवता को लेकर यूरोपीय सभ्यता की धारणा को तो पुनःपरिभाषित किया ही था।

अंग्रेज़ी में भारतीयों की धाराप्रवाहिता और पश्चिम के वर्तमान सांस्कृतिक प्रभुत्व का एक दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम यह है कि हमारे अभिजात वर्ग का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अब यह समझने में सक्षम नहीं है कि भारत के पास इसका अपना अद्वितीय सभ्यतागत वैश्विक दृष्टिकोण है। यदि आपके पास “आधुनिक” युवा दोस्त हैं तो आप ऐसे बहुत सारे भारतीयों को जानेंगे जो इस बात से आश्वस्त हैं कि धर्म और क्रम-विकास के बीच रिचर्ड डॉकिन्स –शैली की निर्णायक लड़ाई भारत में अपरिहार्य है (इस प्रकार का एक उदाहरण यह है कि वे “I F***ing Love Science” पेज से बहुत सारी फेसबुक पोस्टों को शेयर करते हैं)।

निष्पक्षता से कहें, तो इस धारणा को आकार देने में उन लोगों का भी योगदान है जो भारतीय सभ्यता के लिए बोलने का दावा करते हैं। यह बहुत समय पहले की बात नहीं है जब कुछ प्रभावशाली हस्तियाँ दावा कर रही थीं कि वानरों से मनुष्य की उत्पत्ति असंगत है।

सांख्य से अनभिज्ञ लोग ही ऐसा कहेंगे।

अब, वास्तव में अधिकांश भारतीय सांख्य से अनभिज्ञ हैं। कुछ वर्ष पहले तक मैं भी था। मैं स्पष्ट करता हूँ।

सांख्य भारतीय दर्शनशास्त्र के दर्शनों में से एक है। दर्शन, जिसे शायद आप आप हिन्दी और संस्कृत में समान्यतः उपयोग होने वाले रूप में जानते हैं, अर्थात “देखना”। दूसरे शब्दों में, भारतीय दार्शनिकों ने महसूस किया कि वास्तविकता की हर समझ अंततः व्यक्ति के दृष्टिकोण पर निर्भर थी और किसी भी व्यक्ति का दृष्टिकोण अनुवंशिकी, मस्तिष्क की संरचना के साथ-साथ सामाजिक संस्कारों समेत अन्य कई कारकों द्वारा निर्धारित किया जाता।

चित्र 1: छः “आस्तिक दर्शन”। एक सामान्य तौर पर उपयोग किया जाने वाला वर्गीकरण जो छः “आस्तिक दर्शनों” को तीन समूहों में (उनके बीच समानता के आधार पर) वर्गीकृत करता है। हालांकि यह सिर्फ वर्गीकरण से कहीं अलग है। श्रिंगेरी के चौदहवीं शताब्दी के एक शंकराचार्य माधव ने अपने सर्वदर्शनसंग्रह में 16 अलग-अलग दर्शनों का वर्णन किया, जिसे उन्होंने एक क्रम में व्यवस्थित किया – जिसमें भौतिकवादी चारवाक एक छोर पर और उनके अपने अद्वैत वेदान्त को दूसरे छोर पर रखा। प्रत्येक दर्शन ने, अन्य सभी दर्शनों को एक पदानुक्रम में व्यवस्थित करने के साथ अपने स्वयं के दर्शन को शीर्ष पर रखते हुए, ऐसी सूचियाँ प्रस्तुत कीं।

सांख्य दर्शन भारतीय दर्शन में सबसे पुराना दर्शन हो सकता है। यह पतंजलि के योग सूत्रों के साथ-साथ भगवद गीता का मौलिक दर्शन है। सांख्य अवधारणाएँ, जैसे कि तीन गुण, आज पूरी भारतीय संस्कृति में पैठ बना चुकी हैं और बौद्ध धर्म के माध्यम से पूरे एशिया में प्रभाव डाला है।

व्यापक रूप से, सांख्य ब्रह्मांड को द्रव्य निर्मित रूप में देखता है जिसे प्रकृति के रूप में जाना जाता है, और चेतना को पुरुष के रूप में जाना जाता है। इस आदि युगल से ब्रह्मांड में प्रत्येक अन्य वस्तु का सृजन होता है – अचानक तो नहीं, लेकिन एक चरणबद्ध प्रक्रिया में।

चित्र 2: आदि चेतना – पुरुष और आदि द्रव्य – प्रकृति से ब्रह्मांड के विभिन्न पहलुओं की चरणबद्ध अभिव्यंजना का सांख्य दर्शनिकों द्वारा अवधारणात्मक सूत्रीकरण।

डार्विनवाद के क्रम-विकास के साथ सांख्य की समानताएं ब्रह्मांड की इस समझ से आती हैं जो कि कई चरणों मे उत्पन्न होती है। यह एक नियमित संशोधन के साथ शनैः शनैः परिवर्तन के विचार से सहज है।

हमारे पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपनी विस्तृत कृति इंडियन फ़िलॉसोफी में सांख्य के बारे में काफी उल्लेख किया:

“निरंतरता के सिद्धान्त पर इसके बल द्वारा यह, कुछ हद तक, ब्रह्मांड को एक गुच्छे के रूप में बंधे हुए देखने के दृष्टिकोण की प्रवृत्ति का परित्याग करता है….यह सृजन के लिए विकास को प्रतिस्थापित करके अलौकिक धर्म के मूल को दुर्बल करता है।”

दूसरे शब्दों में कहें, तो सांख्य एक अनीश्वरवादी दर्शन था। चरणबद्ध क्रम-विकास-संबंधी परिवर्तन इसकी ब्रह्मांड की समझ की आधारशिला थी। माना, कि इसमें प्राकृतिक चयन की अवधारणा नहीं थी लेकिन इसे छोडकर यह आश्चर्यजनक रूप से डार्विनवाद की मानसिकता के समान है।

निश्चित रूप से सिर्फ यह ही समानान्तर रेखा नहीं है जो भारतीय दर्शनों और विभिन्न वैचारिक दृष्टिकोणों, जो आधुनिक वैज्ञानिक वैश्विक दृष्टिकोण को बल देते हैं, के बीच खींची जा सकती है।

कई अँग्रेजी शिक्षित भारतीयों की तरह, मैं पी.जी. वोडहाउस की कृतियों का उत्साही पाठक था, खासतौर पर जिनमें जीव्स का किरदार होता था। जीव्स एक अति बुद्धिमान सेवक था जो अपने चातुर्य से सभी तरह की समस्याओं का समाधान कर देता था।

जीव्स के पसंदीदा लेखक हैं स्पिनोजा, जैसा कि उपन्यासों में चित्रित है। यह एक ऐसा नाम है जिससे हम में से अधिकांश लोग अपरिचित हैं। लेकिन कुछ सौ साल पीछे जाइए, वह
यूरोप में काफ़ी चर्चित थे।

चित्र 3: दार्शनिक बरुच स्पिनोजा

बरुच स्पिनोजा का जन्म पुर्तगाली-यहूदी परिवार में 1677 में हुआ था और वह वहाँ रहते थे जिसे अब नीदरलैंड के नाम से जाना जाता है। वह एक दिलचस्प किरदार थे, जो कि चश्मों के लेंसों को तराशते थे और साथ ही साथ लेखन का भी कार्य करते थे। उनका बड़ा विचार यह था कि मन और शरीर के बीच के कोई अंतर नहीं है और ब्रह्मांड की प्रत्येक वस्तु एक आधारभूत पदार्थ, जिसे वे भगवान के समानार्थी मानते थे, का हिस्सा है।

तब उन दिनों में कहने के लिए यह सब सामान्य बातें नहीं थीं। इसलिए, उन्होंने अपने बहुत सारे दुश्मन बनाए और खुद को यहूदी समुदाय से अलग कर लिया। उन्होंने 23 वर्षीय गरीब स्पिनोजा, जिन्हें “हराम” कहा गया, के खिलाफ एक आज्ञापत्र जारी किया, जो कुछ इस प्रकार था:

“वह दिन में शापित हो और वह रात को शापित हो; जब वह लेटे तब शापित हो और जब वह उठे तब शापित हो; जब वह बाहर जाये तब शापित हो और जब वह अंदर आए तब शापित हो….

“हम आदेश देते हैं कि किसी को भी उसके साथ मौखिक या लिखित रूप में संवाद नहीं करना चाहिए, या सहायता के लिए नहीं कहना चाहिए, या उसके साथ एक ही छत के नीचे नहीं रुकना चाहिए, या उसके इर्द-गिर्द नहीं भटकना चाहिए या उसके द्वारा लिखी गयी किसी भी रचना को नहीं पढ़ना चाहिए।”

“खतरनाक विचारों” वाली उनकी विख्यात छवि ने उनका हर जगह पीछा किया और उनकी कृतियों को कैथॉलिक चर्च की वर्जित पुस्तकों की अनुक्रमणिका में स्थापित कर दिया गया।

जबकि उस समय के अधिकारी उनके विचारों के लिए सज्जनतापूर्वक प्रवृत्त नहीं थे, लेकिन स्पिनोजा को उनके कई दार्शनिक-उत्तराधिकारियों द्वारा जबरदस्त सम्मान दिया गया था। महान जर्मन हेगेल ने कहा था, “आप या तो एक स्पिनोज़िस्ट हैं या दार्शनिक नहीं हैं।” बीसवीं शताब्दी के फ्रांसीसी उत्तर-आधुनिकतावादी गिल्स डेलेज़ ने स्पिनोजा को “दर्शनिकों का राजकुमार” कहा था।

स्पिनोज़ा के विचारों से केवल दार्शनिक ही नहीं आकृष्ट थे। अल्बर्ट आइंस्टीन उनके सबसे प्रसिद्ध प्रशंसकों में से एक थे। भगवान में उनकी आस्था के बारे में पूछे जाने पर, आइंस्टीन की प्रतिक्रिया अक्सर इन पंक्तियों के साथ आई:

“मेरे विचार स्पिनोज़ा के विचारों केआस-पास हैं: सुंदरता के लिए प्रशंसा की और तार्किक सरलता में विश्वास की व्यवस्था, जिसे हम विनम्रतापूर्वक और केवल अपूर्ण रूप से समझ सकते हैं।”

“हम देखते हैं कि ब्रह्मांड अद्भुत रूप से व्यवस्थित है और कुछ निश्चित नियमों का पालन कर रहा है, लेकिन उन नियमों को हम अस्पष्ट तरीके से ही समझते हैं। हमारा सीमित मस्तिष्क रहस्यमयी शक्ति को नहीं समझ सकता है जो नक्षत्रों को नियंत्रित करती है। मैं स्पिनोजा के सर्वेश्‍वरवाद पर मुग्ध हूँ। आधुनिक विचारों पर उनके योगदान की मैं सराहना करता हूँ। स्पिनोजा आधुनिक दार्शनिकों में सबसे महान हैं….।”

इसलिए, हमने तय किया है कि स्पिनोजा एक महान विचारक थे, जिनकी प्रशंसा महत्वपूर्ण लोगों के समूह ने की और उन्हें सम्मान दिया। अब हम अधिक आवश्यक सवाल पर आते हैं – यह भारतीयों के रूप में हमसे कैसे संबन्धित है?

उन्नीसवीं शताब्दी के जर्मन संस्कृत विद्वान, थियोडोर गोल्डस्टकर, स्पिनोजा के बारे में जो सोचते थे, वह है:

“…दर्शन की एक पाश्चात्य प्रणाली, जो सभी देशों और युगों के दर्शनों के बीच एक सबसे प्रमुख स्थान रखती है और जो वेदांत के विचारों का इतना सटीक प्रतिनिधित्व है कि हम इसके संस्थापक के बारे में संदेहात्मक हो सकते हैं कि उन्होंने अपने आधारभूत सिद्धांत हिंदू धर्म से तो नहीं लिए हैं। क्या उनकी जीवनी हमें संतुष्ट नहीं करती है कि वह पूरी तरह से अपने सिद्धांतों से अनजान थे… हमारा तात्पर्य स्पिनोजा के दर्शन से है…

“…दोनों के मौलिक विचारों की तुलना करते हुए हमें यह साबित करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि यदि स्पिनोजा एक हिंदू थे, तो सभी संभावनाओं में उनकी पद्धति वेदांत दर्शन के अंतिम चरण को चिह्नित करती।”

इसी तरह की सम्मति एक अन्य जर्मन, अच्छी तरह से लोकप्रिय, मैक्स मूलर द्वारा व्यक्त की गई थीः

“ब्राह्मण, जिसकी उपनिषदों में व्याख्या की गई और जिसे शंकर द्वारा परिभाषित किया गया, स्पष्ट रूप से स्पिनोज़ा के ‘सबस्टेंशिया’ के समान ही है।”

थियोसोफिकल सोसाइटी की संस्थापक हेलेना ब्लवात्स्की ने अपनी एक अधूरी रचना में लिखा था, “स्पिनोज़ा के देवता की तुलना में …. यह वेदांतिक देवता शुद्ध और सामान्य हैं।”

हम वापस आएँगे

कई मायनों में, पश्चिम में वैज्ञानिक क्रांति को, लंबे समय तक निष्क्रिय रहने वाले मूर्तिपूजक विचारों के पुनरुत्थान के रूप में समझा जा सकता है।

सदियों की शीतनिद्रा के बाद, यह प्लेटो और अरस्तू की मानसिकता का प्रबोधन था।

हमारे आस-पास की दुनिया में, ग्रहों की चाल से लेकर जन्म, मृत्यु, के चक्रों और सभी जीवित रूपों में नवीनीकरण तक सब कुछ विस्मयकारी है। यह जानने की ज्वलंत इच्छा है कि वस्तुएँ ऐसी सांस्कृतिक अवधारणा के लिए स्थापित होने के लिए एक अनिच्छुकता के साथ संयोजित क्यों थीं। और सबसे महत्वपूर्ण है इस विचार का प्रतिरोध कि सामूहिक लाभ के लिए “खतरनाक” विचारों वाले व्यक्तियों का दमन होना चाहिए।

चित्र 4: द स्कूल ऑफ एथेंस, एक पेंटिंग जिसे कलाकार राफेल द्वारा 1500 के दशक में तैयार किया गया था। चित्र के केंद्र में प्लेटो और अरस्तू हैं। यूरोपीय पुनर्जागरण और अनुवर्ती वैज्ञानिक क्रांति को मूर्तिपूजक ग्रेको-रोमन दर्शन के पुनरन्वेषण से पैदा किया गया था।

वैज्ञानिक परियोजना के लिए आधारभूत ये मानसिकतायें यूरोप के लिए अनूठी नहीं थीं। वे मानव मस्तिष्क में कुछ मौलिकताओं का प्रतिनिधित्व करती हैं –कई भिन्न-भिन्न समयों पर कई अन्य संस्कृतियों में निहित संसार के साथ जुड़ने के मार्गों का।

हालांकि जो भारत को विशेष बनाता है, वह यह है कि यह हमारा सौभाग्य था कि सत्य के निर्धारण के लिए हमारे पास कोई एकल विचारधारा कभी नहीं रही। विभिन्न भारतीय दार्शनिकों ने विभिन्न दृष्टिकोणों के माध्यम से वास्तविकता से संपर्क किया, और इसने हमें एक समग्र सभ्यतावादी वैश्विक नज़रिया दिया, जो आधुनिक विज्ञान द्वारा प्रदान की गई बहुत सारी बातों को साझा करता है।

और यही कारण है कि युवा, उज्जवल भारतीयों द्वारा अपनी मूल दार्शनिक परंपराओं से घृणा करते हुए और इन्हें “अंधविश्वासी”, “पिछड़े” और “तर्कहीन” रूप में देखना बहुत पीड़ादायक है। यह अपने लोगों से निपटने में बहुत कठोर, लेकिन प्राचीन ग्रीस से नवजागृत यूरोप से कैम्ब्रिज और हार्वर्ड तक सीधी रेखा में चल रही एक अकेली “वैज्ञानिक” परंपरा की मिथ्या कहानियों को फैलाने में बहुत सीधा-साधा है।

छुरे की धार

क्षुरस्यधारानिशितादुरत्यया

दुर्गंपथस्तत्कवयोवदन्ति॥

छुरे की धार की तरह तेज, संत कहते हैं।

क्या पथ, पार करना मुश्किल है।।

ऐसे लोगों का एक छोटा सा लेकिन उभरता हुआ समूह है जो भारत के लिए एक भविष्य की कल्पना करता है जो आधुनिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी को तो अपनाता है लेकिन अपनी पहचान को भी संरक्षित रखता है। जिस प्रलोभन के खिलाफ हमें सतर्कता बरतनी चाहिए वह है भारतीय विचारों को किसी भी तरह पश्चिमी विचारों से “बेहतर” देखना और अपने चित्त को संतुष्ट करने वाले कथनों से बचना, जैसे कि “हम अधिक पूर्णतावादी हैं”, “हम स्थिरता की परवाह करते हैं”, “हम आध्यात्मिकता को एकीकृत करते हैं” या और अन्य कथन जो इस समय प्रचलन में हैं।

विज्ञान केवल “वस्तुएं जो काम करती हैं” के लिए लघुरूप है। एक समाज जो अपने केन्द्रीय स्तर से वैज्ञानिक विधि को हटा देता है वह अपने प्रतिद्वंदियों द्वारा गुलाम बनने के लिए स्वयं को तैयार कर रहा होता है।

जापान से हमें एक सीख मिलती है कि क्या होता है जब समाज सिर्फ पारंपरिक होने के लिए विचारों को महत्व देता है न कि प्रभावी होने के लिए। 1600 में जब तोकुगावा शोगुनराज ने जापान की सत्ता संभाली तो उन्होंने अपने देश को सभी विदेशी प्रभावों से मुक्त करने का फैसला लिया। उनके प्रारंभिक प्रतिद्वंदियों को बाहरी लोगों (देशों) द्वारा खासकर यूरोप से समर्थन दिया गया, और शोगुन ने अपनी सत्ता की रक्षा के लिए स्वयं को हर किसी से अलग कर लिया।

इस बंद प्रणाली ने थोड़े समय तक बहुत अच्छी तरह से काम किया। हालांकि 1853 में अमेरिका ने तय किया कि वह जापानी बाजारों में उसके उत्पादों के वर्जित होने से तंग आ चुका था। फिर कमोडोर मैथ्यू पेरी के नेतृत्व में कुछ जंगी जहाज जापानियों के दरवाजे पर दिखाई दिए। और आप अनुमान लगा सकते हैं कि क्या हुआ था जब 1600 के दशक में फंसे हुए जापानियों ने खुद को भविष्य में दो शताब्दियों की एक शक्ति के आमने-सामने पाया।

चित्र 5: 1853 में अमेरिकी कमोडोर मैथ्यू पेरी ने अपने यहां की सबसे श्रेष्ठ तकनीक के दम पर अलगाववादी जापानियों को चौंकाया और डराया। यह एक कहानी है जो पूरे इतिहास में खुद को दोहराती है कि जब एक समाज विज्ञान को नकारता है, तो वह खुद को गुलाम बनने के लिए तैयार करता है।

हम में से जो भी भारत, एक प्रबुद्ध भारत, के लिए एक वैज्ञानिक लेकिन पारंपरिक भविष्य देखना चाहते हैं, हमें अपनी सर्वोत्तम प्रज्ञता के साथ विश्व के सर्वोत्तम ज्ञान को संतुलित रूप से संकलित करना होगा और इसे अमल में लाना होगा। यह आसान नहीं होगा, लेकिन हम निश्चित रूप से दिलचस्प समय में रह रहे होंगे!

वी.आर. आनंद हार्वर्ड मेडिकल स्कूल से संबद्ध एक चिकित्सक हैं।